ABP स्पेशल: मोदी की तारीफ में छिपी बहू की सियासी चाहतें!

By: | Last Updated: Friday, 14 November 2014 4:51 PM
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नई दिल्ली/लखनऊ: नरेंद्र मोदी को एक बड़ा राजनीतिक फैन मिल गया है और उत्तर प्रदेश की राजनीति को एक मसालेदार कहानी. कहानी की किरदार हैं यूपी के यादव परिवार की छोटी बहू– अपर्णा यादव.

 

मोदी के सफाई अभियान ने तो बस इतना किया है कि उत्तर प्रदेश के सबसे ताकतवर राजनीतिक परिवार के भीतर पल रही सियासी चाहतों पर जमे धूल को फूंक मारकर उड़ा दिया है. बना दिया है मुलायम सिंह यादव के परिवार की छोटी बहू अपर्णा यादव को इस कहानी का किरदार.

 

छोटी बहू अपर्णा यादव की ये दिलचस्प कहानी जानने से पहले जानिए छोटी बहू के मोदी कनेक्शन और इस कनेक्शन से पैदा हुए विवाद की दास्तान

 

अपर्णा यादव मोदी की तारीफ में कहती हैं, “हमें मोदी के नक्शे कदम पर चलना चाहिए. उन्होंने झाड़ू उठाई और पूरा देश उनके सफाई अभियान में शामिल होने के लिए प्रेरित हो गया. वो देश के लिए एक रोल मॉडल हैं. मोदी महात्मा गांधी की तरह काम कर रहे हैं. उनके काम का हिसाब लगाने से पहले उन्हें और वक्त दिया जाना चाहिए.”

 

कहानी का अहम मोड़

मुलायम परिवार की छोटी बहू का ये बयान चौंकाने वाला भी था और हंगामा खड़ा करने वाला भी क्योंकि यूपी की सियासत के दो ध्रुव हैं नरेंद्र मोदी और मुलायम सिंह यादव. चंद रोज पहले वाराणसी में जब पीएम नरेंद्र मोदी ने सफाई अभियान के लिए यादव परिवार के सीएम अखिलेश यादव को नॉमिनेट किया था तो अखिलेश ने मोदी को सांप्रदायिकता की सफाई की नसीहत वाला तीखा जवाब टिका दिया था.

 

लेकिन मुलायम परिवार में सबसे ज्यादा पढ़ी लिखी मानी जाने वाली छोटी बहू नहीं रुकीं तो नहीं रुकीं. मोदी की तारीफ पर सवाल उठे तो अपर्णा यादव ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा, “मैं उस कार्यक्रम में एक सामाजिक कार्यकर्ता की हैसियत से शामिल हुई थी. मैं यादव परिवार की सदस्य हूं ना कि पार्टी की. सामाजिक कार्यकर्ता की हैसियत से मेरी अपनी भी कोई सोच है.”

 

अपर्णा के मुंह से मोदी की तारीफ हजम करना आसान नहीं था कि अपर्णा ने एक और तीखा बयान देकर अपने ही परिवार की सरकार पर सवाल खड़ा कर दिया.

 

यूपी में है भौकाल मंत्रालय

वह कहती हैं, यूपी में एक ही मंत्रालय काम कर रहा है. और वो है भौकाल मंत्रालय.

छोटी बहू जिस भौकाल शब्द का इस्तेमाल कर रही हैं उसे अंग्रेजी में लिप सर्विस कहते हैं जिसके मायने हैं काम कम बात ज्यादा. छोटी बहू के बयानों के बाद सफाई आनी थी तो छोटी बहू की सफाई भी आ गई है.

 

अपर्णा यादव कहती हैं, मेरे बयान को तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया है. इस मसले पर गंभीरता से सोचना चाहिए.

 

लेकिन सफाई के साथ यूएन की एक रिपोर्ट के सहारे अपर्णा अब भी अपने बयान से पूरी तरह कदम पीछे नहीं खींचा है. कम से कम अखिलेश सरकार के कामकाज को लेकर.

 

अपर्णा कहती हैं, “संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट आई है, जिसमें कहा गया है कि यूपी के लोग ज्यादा हिंसक हैं. इतनी बड़ी एजेंसी की रिपार्ट है तो उसे गंभीरता से लेना चाहिए.”

 

क्या राजनीतिक संभावनाओं परवान चढ़ेंगी?

 

राजनीतिक परिवार से नाता अपर्णा के बयानों को सुर्खियों में ले तो आया है. लेकिन अब लाख टके का सवाल ये है कि क्या ये सुर्खियां अपर्णा की राजनीतिक संभावनाओं को परवान चढ़ा पाएंगी. उलझे हुए इस सवाल का जवाब मिलना बाकी है.

 

बयान से विवाद तक और इससे पहले परिवार. प्यार और एक एनजीओ के साथ दबा छिपा प्रचार. क्या अपर्णा भी परिवार की बड़ी बहू की तरह राजनीति में भी आने के लिए हो गई हैं बेकरार. सस्पेंस है और सवाल तो हैं ही.

 

ये सवाल इसलिए क्योंकि छोटी बहू सैफई महोत्सव से जनता के बीच आई हैं. मुलायम सिंह यादव का अपना सैफई और वहां होने वाला सैफाई महोत्सव विवादों की वजह से चर्चा में रहता है लेकिन साल 2012 के विधानसभा चुनाव से पहले ये महोत्सव छोटी बहू अपर्णा की वजह से चर्चा में आ गया था.

 

साजिद-वाजिद जैसे संगीतकारों के साथ छोटी बहू अपर्णा नेताजी यानी मुलायम सिंह यादव और अपनी पार्टी के लिए प्रचार का ये गीत खुद गा रही थीं – थिरक रही थीं.

 

यादव परिवार के बंधे बंधाए पारिवारिक दायरे को पहली बार उन्हें पार करते देखा गया.

 

नहीं बना पाईं पार्टी की आवाज!

 

मौका तो था लेकिन दस्तूर नहीं था लेकिन अपर्णा ने अपना पहला दांव चल दिया था. विधानसभा चुनाव में उस्ताद शबार साबरी अली के लिखे गीत को छोटी बहू अपनी आवाज में पार्टी की आवाज बना देना चाहती थीं. लेकिन दांव नहीं चला. मुलायम सिंह के गुरू का लिखा एक दूसरा गीत एसपी के कैंपेन में इस्तेमाल हुआ और अपर्णा का गीत पार्टी की जीत के जश्न में गुम हो गया.

 

उस गीत का जिक्र दोबारा नहीं हुआ. लेकिन ये साफ हो गया कि मुलायम परिवार की ये छोटी बहू पर्दे के पीछे छिपकर नहीं बैठेगी. किस्मत ने अपर्णा को यादव परिवार में जो पहुंचा दिया था.

 

अपर्णा की कहानी में सबसे अहम बरस था साल 2011 – आठ साल पुराना प्यार अपनी मंजिल पाने जा रहा था.

 

4 दिसंबर 2011 में देश की बड़ी हस्तियों की मौजूदगी में मुलायम सिंह के छोटे बेटे के साथ अपर्णा यादव की शादी हुई और देश के कुछ सबसे बड़े राजनीतिक परिवारों में से एक की सदस्य बन गईं अपर्णा.

 

ये कहानी भी बड़ी दिलचस्प है कि मुलायम सिंह उत्तराखंड से आकर लखनऊ में पत्रकारिता करने वाले अरविंद सिंह बिष्ट की बेटी अपर्णा से प्रतीक की शादी के खिलाफ थे. अखिलेश पहले ही ठाकुर परिवार से नाता रखने वाली डिंपल से लव मैरिज कर चुके थे और प्रतीक भी इसी राह पर थे.

 

मुलायम सिंह की दूसरी पत्नी यानी प्रतीक की मां की पहल पर प्रतीक और अपर्णा के बीच 8 साल पुराना प्यार शादी के बंधन में बदल गया.

 

क्या है परिवार में हैसियत!

 

छोटी बहू यानी अपर्णा की परिवार में हैसियत जानना जरूरी है. बहुत कम लोगों को मालूम है कि मुलायम सिंह यादव ने दो शादियां की थीं. दोनों पत्नियों से उन्हें दो बेटे हुए. पहली पत्नी से यूपी के सीएम अखिलेश यादव और दूसरी पत्नी से प्रतीक यादव. अपर्णा प्रतीक की पत्नी हैं परिवार में कानूनी तौर पर उनकी वही हैसियत है जो अखिलेश की पत्नी और सांसद डिंपल यादव की.

 

मुलायम सिंह की पहली पत्नी का नाम था मालती देवी. उनके निधन के बाद साल 2003 में सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर पहली बार मुलायम सिंह ने साधना यादव को अपनी दूसरी पत्नी के तौर पर स्वीकार किया था.

 

पहली पत्नी मालती देवी से जन्मे अखिलेश यूपी के सीएम हैं और उनकी पत्नी डिंपल कन्नौज से सांसद. वहीं दूसरी पत्नी साधना यादव से जन्मे प्रतीक यादव परिवार के रिएलिटी कारोबार यानी जमीन जायदाद संभालते हैं और उनकी पत्नी की बड़ी हैसियत में हैं अपर्णा यादव यानी छोटी बहू.

 

मुलायम के छोटे बेटे प्रतीक और अपर्णा की जोड़ी तो बन गई लेकिन दोनों की सोच में फर्क साफ नजर आता है. प्रतीक को राजनीति में दिलचस्पी नहीं है वो परिवार के रियल एस्टेट का कारोबार संभालते हैं. कई बार इसका जिक्र कर चुके हैं लेकिन उन्होंने अपर्णा के राजनीति में जाने का दरवाजा बंद नहीं किया है.

 

वजह ये है कि पहलवान मुलायम सिंह यादव के बेटे प्रतीक खुद फिटनेस के दीवाने हैं. हर रोज 24 घंटे तक जिम में कसरत करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा है. कहा तो यहां तक जाता है कि उनके हर दफ्तर और घर में कसरत के लिए खास इंतजाम रहते हैं.

 

ऐसे में जिस सामाजिक कार्यकर्ता की हैसियत से अपर्णा अपना दूसरा परिचय करवाती हैं उसे राजनीति में कदम रखने की तैयारी के तौर पर देखा जा रहा है. अपर्णा दरअसल महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा को लेकर हर्ष नाम का एक एनजीओ चला रही हैं.

 

इस एनजीओ के जरिए उन्होंने यूपी के तमाम मंचों पर लगातार अपनी मौजूदगी बनाए रखी है.

 

यादव परिवार की सबसे ज्यादा पढ़ी लिखी सदस्य

 

दूसरी तरफ अपर्णा परिवार की सबसे ज्यादा पढ़ी लिखी सदस्य हैं. अपर्णा ने मैनचेस्टर से अंतराष्ट्रीय राजनीति में डिप्लोमा किया है. लखनऊ के लॉरेटो कॉन्वेंट से पढ़ाई करने वाली अपर्णा शास्त्रीय संगीत में पारंगत हैं. लखनऊ की ही भातखंडे यूनिवर्सिटी से अपर्णा ने संगीत की शिक्षा ली थी. और सैफई में अपनी इसी प्रतिभा के बलबूते वो मंच पर जा पहुंची थीं.

 

अब सवाल ये कि राजनीति के मंच पर अपर्णा क्या करना चाहती हैं और क्यों?  इसके लिए परिवार के भीतर राजनीति के समीकरण समझने होंगे. परिवार के 14 सदस्यों में से 4 सांसद हैं. बाकी यूपी में मंत्री से लेकर कोऑपरेटिव के सदस्य हैं. लेकिन अपर्णा को अब तक सत्ता का ये स्वाद नहीं मिला है.

 

छोटी बहू अपर्णा फायरब्रांड मानी जाती हैं जबकि बड़ी बहू डिंपल उनके मुकाबले शांत तबीयत की हैं. इसके बावजूद परिवार ने डिंपल यादव को ही राजनीति में कदम रखने के लिए चुना था. साल 2012 में डिंपल यूपी के कन्नौज से निर्विरोध सांसद चुनी गईं और पहुंच गई संसद. अपर्णा को मौका नहीं मिला उन्होंने इसकी शिकायत नहीं की.

 

‘अखिलेश यादव से-बदलाव की लहर’ नाम की किताब में सुनीता ऐरन ने अपर्णा से इसके बारे में पूछा तो जवाब मिला,  “कैसा तनाव?  हम सब एक ही परिवार में रहते हैं. एक ही रसोई का इस्तेमाल करते हैं और अक्सर एक साथ खाते हैं. अखिलेश प्रतीक के साथ बैडमिंडन खेलते हैं. घर में कोर्ट बना हुआ है.”

 

दूसरा मौका आया जब साल 2014 के लोकसभा चुनाव में मुलायम सिंह यादव ने मैनपुरी और आजमगढ़ से चुनाव लड़ा और दोनों सीटें जीत गए. उन्हें मैनपुरी की सीट छोड़नी थी और ये सीट परिवार के ही एक सदस्य को मिलनी थी लेकिन इसके दावेदार बने मुलायम सिंह के बडे़ भाई के पोते तेज प्रताप.

 

‘अखिलेश यादव -बदलाव की लहर’ नाम की किताब में सुनीता ऐरन से अपर्णा ने कहा, “जहां तक मेरी महत्वाकांक्षाओं की बात है तो मैं भातखंडे संगीत महाविद्यालय से संगीत सीख रही हूं और बहुत खुश हूं लेकिन मैंने अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की पढ़ाई की है. आखिर में, परिवार के बड़े लोग, जनता और पार्टी ही तय करेगी.”

 

इसके बाद की खबरें चौंकाने वाली थीं. इसी साल यूपी सरकार ने डिंपल यादव की पहल पर महिला सुरक्षा से जुड़ा हेल्पलाइन नंबर जारी किया. नंबर था 1090 जिसे डायल करने पर पीड़ित महिला को फौरन मदद मिल जाती. अपर्णा ने हफ्ते भर के भीतर ही अपने एनजीओ के साथ 200 लड़कियों को ना सिर्फ पुलिस से ट्रेनिंग दिलवाई बल्कि पुलिस के पुराने हेल्पलाइन नंबर यानी 100 नंबर को ज्यादा बेहतर बता दिया.

इसके बाद से कहा जा रहा है अपर्णा ने अपने एनजीओ के माध्यम से कानून व्यवस्था को लेकर जागरुकता अभियान तेज कर दिया है. यूएन की रिपोर्ट के हवाले से महिला सुरक्षा को लेकर दिया गया ताजा बयान भी उनके तेज होते तेवरों से ही जुड़ा है.

 

अंदरखाने में ये चर्चाएं भी हैं कि अपर्णा के पिता अरविंद सिंह बिष्ट राज्यसभा जाना चाहते थे लेकिन उन्हें यूपी का सूचना आयुक्त बना दिया गया. छोटी बहू की मां यानी लखनऊ डेवलपमेंट अथॉरिटी यानी एलडीए में उपसचिव भी बनाई गईं हैं. लेकिन हसरतें और भी हैं. अपर्णा ने खुलकर कभी राजनीति में आने की बात तो नहीं कही है लेकिन चाहते ना चाहते हुए भी राजनीतिक चर्चाओं में तो वो आ ही चुकी हैं.

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