FULL INFORMATION: तीस्ता दोषी या उनसे बदला लिया जा रहा है?

By: | Last Updated: Thursday, 23 July 2015 4:18 PM
Activist Teesta Setalvad

नई दिल्ली: तीस्ता सेतलवाड एक ऐसा नाम है जिसे नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री रहते हुए साल 2002 में गुजरात में हुए दंगों के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ने के लिए जाना जाता रहा है लेकिन अब वही तीस्ता सेतलवाड लेकिन गलत वजह से चर्चा में हैं. सुप्रीम कोर्ट में गुजरात पुलिस ने एक हलफनामा देकर तीस्ता और उनके पति जावेद की अग्रिम जमानत का विरोध किया है. उस हलफनामे में आरोप लगाया गया है दंगा पीड़ितों की मदद के लिए मिले पैसे का तीस्ता और उनके पति ने निजी कामों में उपयोग किया.

 

13 साल पुरानी दर्दनाक तस्वीरों में दर्ज है साल 2002 में हुए गुजरात दंगे का दर्द जिसमें सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 1044 लोग मारे गए, 2500 लोग जख्मी हुए और 223 लोग आज भी लापता हैं.

 

बीते 13 सालों में दंगा पीड़ितों की कानून और हालात से लड़ाई का सबसे अहम चेहरा तीस्ता सेतलवाड बनीं. दंगा पीड़ितों की मदद और कानूनी लड़ाई जारी रखने के लिए तीस्ता सेतलवाड को बेशुमार चंदा मिला. गुजरात पुलिस के हलफनामे के मुताबिक करीब 6 करोड़ रुपये. इस पैसे से दंगा पीड़ितों की मदद होनी थी लेकिन एबीपी न्यूज के पास मौजूद है गुजरात पुलिस का ये हलफनामा जिसमें चंदे के पैसे के निजी इस्तेमाल की वो कहानी दर्ज है जो आपको चौंका देगी.

 

गुजरात पुलिस के हलफनामें के मुताबिक तीस्ता सेतलवाड ने जोधा अकबर, पा गजनी और सिंघम जैसी फिल्मों की डीवीडी दंगा पीड़ितों की मदद के लिए मिले चंदे के पैसे से खरीदी थी. इसी हलफनामे के मुताबिक तीस्ता सेतलवाड और उनके पति जावेद ने चंदे का पैसा व्हिस्की और रम पीने के लिए गेलार्ड, चाइनागार्डन, लिटिल इटली, सबवे, लियोपोल्ड कैफे में खाने-पीने का बिल चुकाने, ब्लैकबेरी टीशर्ट्स, ईयरबड्स, नैपकिन खरीदने के लिए और मिल्स एंड बून्स जैसे रोमांटिक और दूसरे थ्रिलर उपन्यास खरीदने के लिए खर्च किया. यहां तक कि जावेद आनंद के लिए सेनेटरी नेपकिन खरीदने का भी ब्योरा गुजरात पुलिस के हलफनामें में दर्ज है.

 

तीस्ता पर गुजरात पुलिस के इल्जामों की लंबी लिस्ट का ये एक छोटा सा हिस्सा भर है. तीस्ता के सामाजिक कार्यकर्ता बनने की कहानी 1993 में मुंबई में हुए सीरियल बम धमाकों से शुरू होती है.

 

मुंबई दंगा पीड़ितों की मदद के लिए तीस्ता ने अपने पति जावेद आनंद के साथ सबरंग ट्रस्ट नाम से एक चैरिटेबल ट्रस्ट बनाया था. साल 2002 में गुजरात दंगों के बाद उन्होंने एक और संस्था सीटिजन फॉर जस्टिस एंड पीस नाम से भी एक एनजीओ बनाया. सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किए गए हलफनामे के मुताबिक इन्हीं दोनों संस्थाओ को मिले चंदे के पैसे का तीस्ता और उनके पति ने निजी इस्तेमाल किया.

 

चंदे के दुरुपयोग को लेकर जनवरी 2014 में तीस्ता और उनके पति पर एक एफआईआर दर्ज की गई थी. गिरफ्तारी से बचने के लिए तीस्ता और जावेद ने गुजरात हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत मांगी लेकिन उसे खारिज कर दिया गया. अब दोनों सुप्रीम कोर्ट से अग्रिम जमानत मांग रहे हैं. और गुजरात पुलिस ने इसी जमानत याचिका का विरोध करने के लिए दाखिल किया है ये हलफनामा जिसमें दावा किया गया है कि चंदे के पैसे का निजी इस्तेमाल किया गया और इसे छिपाया भी गया.

 

अहमदाबाद की क्राइम ब्रांच के असिस्टेंट कमिश्नर के एन पटेल के मुताबिक तीस्ता सेतलवाड और जावेद आनंद के पास ट्रस्ट से मिलने वाली तनख्वाह बढ़ाने के अधिकार थे और इसका भी दुरुपयोग किया गया.

 

सबरंग ट्रस्ट में साल 2008-09 में तीस्ता सेतलवाड की तनख्वाह थी – 1,79,400 रुपये सालाना. लेकिन ये तनख्वाह साल 2012-13 में बढ़कर 8,75,800 रुपये सालाना हो गई.

 

वहीं साल 2009-10 में तीस्ता के पति जावेद आनंद की तनख्वाह 2.40 लाख रुपये सालाना से बढ़कर साल 2012-13 में 8.61 लाख रुपये हो गई.

 

गुजरात पुलिस के हलफनामे के मुताबिक तीस्ता सेतलवाड ने सीजेपी नाम की अपनी दूसरी संस्था में भी तनख्वाह में बेतहाशा बढ़ोतरी की.

 

साल 2008-09 में सीजेपी में तीस्ता सेतलवाड की तनख्वाह सिर्फ 46,200 रुपये सालाना थी जो कि साल 2012-13 में 4 लाख रुपये तक जा पहुंची.

 

गुजरात पुलिस के मुताबिक सबरंग ट्रस्ट को मिले चंदे का करीब 20 फीसदी तनख्वाह के तौर पर निकाल लिया गया जबकि दंगा पीड़ितों को इसका कोई फायदा नहीं मिला. आरोप ये भी है कि मुंबई में सबरंग ट्रस्ट में हर साल भरे जाने वाले फॉर्म में 2009 के बाद बढ़ी हुई तनख्वाह की जानकारी भी नहीं दी गई. यही नहीं साल 2008 के बाद 6 साल तक सीजेपी और साल 2003 से साल 2010 के बीच सात साल तक ट्रस्ट का अकाउंट भी मुंबई के चैरिटी कमिश्नर को नहीं दिए गए. हर साल की बजाए दोनों के एकाउंट बाद में एक साथ दिए गए.

 

गुजरात पुलिस का हलफनामा इसकी वजह भी बताता है. तीस्ता सेतलवाड ने सबरंग ट्रस्ट और सीजेपी के अलावा एक निजी कंपनी भी बनाई जिसका नाम था सबरंग कम्यूनेकिशन प्राइवेट लिमिटेड जो कम्यूनल कांबेट नाम की मैगजीन छापती थी.

 

ये कंपनी भी मुंबई के जूहू में मौजूद तीस्ता सेतलवाड के घर निरांत बंगलो से चल रही है और सबरंग ट्रस्ट भी यहीं से चलता है. गुजरात पुलिस के मुताबिक सबरंग कम्यूनिकेशन की कोई आमदनी नहीं थी और इसमें दोनों ट्रस्टों का पैसा ट्रांसफर किया गया. साल 2008-09 में सेतलवाड की इस निजी कंपनी को 2 लाख 64 हजार रुपये दिए गए लेकिन साल 2012-13 में रकम बढ़कर 23 लाख 69 हजार रुपये तक जा पहुंची यानी हर साल करीब 75 फीसदी की दर से चंदे का पैसा निजी कंपनी में पहुंचाया गया.

 

कुल मिलाकर सबरंग कम्यूनिकेशन को 72 लाख रुपये मिले. इसमें तीस्ता ने 9 लाख रुपये. जावेद के नाम पर 8 लाख रुपये और तीस्ता की बहन आमली के नाम पर 3 लाख रुपये यानी कुल 20 लाख रुपये निकाल लिए गए.

 

दरअसल साल 2008 में तीस्ता सेतलवाड ने गुजरात दंगे का शिकार हुए गुलबर्गा सोसाइटी के लोगों से म्यूजियम बनाने का वादा किया था. इसके लिए जमीन मांगी और बदले में मदद करने को कहा. प्रस्तावित म्यूजियम के लिए तीस्ता की संस्था में जैसे जैसे पैसा आता गया, निजी खर्च, तनख्वाह और निजी कंपनी की आमदनी बढ़ती गई. लेकिन दूसरी तरफ ना तो दंगा पीड़ितों की मदद हुई और ना ही म्यूजियम बना. गुलबर्ग सोसाइटी के लोगों ने साल 2013 में इसकी शिकायत दर्ज करवाई. जांच शुरू हुई और अब तीस्ता के खिलाफ इसी मामले में एफआईआर दर्ज हो चुकी है. ये खुलासे उसी जांच का हिस्सा हैं.

 

तीस्ता के पीछे की कहानी?

 

तीस्ता सेतलवाड के घर पर सीबीआई छापे और अब गुजरात पुलिस का हलफनामे को लेकर ये भी कहा जा रहा है कि गुजरात दंगे में आवाज उठाने की वजह से उन पर बदले की कार्रवाई की जा रही है. इस आरोप की वजह छिपी है तीस्ता की इस कहानी में.

 

ये दंगों के 117 दोषियों को जेल पहुंचाने वाली 53 साल की सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सेतलवाड की कहानी है. एक दौर था जब देश के पहले अटार्नी जनरल एम सी सेतलवाड की पोती तीस्ता पत्रकार हुआ करती थीं और उन्होंने पत्रकार जावेद आनंद से शादी कर ली थी. जिंदगी में बड़ा मोड़ तब आया जब साल 1993 में मुंबई एक के बाद एक 13 धमाकों से दहल उठी.

 

पहले दंगा और फिर सीरियल बम धमाकों ने तीस्ता की जिंदगी बदल दी. पति और पत्नी दोनों ने नौकरी छोड़ दी और दंगा पीड़ितों के लिए काम करना शुरू कर दिया. मुंबई के जूहू के निरांत बंगले में सबरंग ट्रस्ट की नींव पड़ी और तीस्ता ने दंगा पीड़ितों के लिए काम करना शुरू कर दिया.

 

तीस्ता ने मुंबई दंगे के वक्त एफएम रेडियो से मुंबई पुलिस के वायरलेस मैसेज रिकॉर्ड कर लिए थे और उसके जरिए वो ये साबित करने की कोशिश कर रही थीं कि मुंबई पुलिस की भूमिका निष्पक्ष नहीं थी. इस काम ने उन्हें चर्चा में ला दिया था. दंगा पीड़ितों के साथ जुड़ाव तीस्ता को साल 2002 में गुजरात भी खींच ले गया और यहीं से शुरू होती है तीस्ता की बड़ी जंग.

 

साल 2002 के फरवरी महीने में गोधरा में ट्रेन के जलाए जाने की घटना के बाद गुजरात में तीन दिन तक भयानक दंगा हुआ. और इस दंगे की आंच में वडोदरा की बेस्ट बेकरी भी जला दी गई.

 

तीस्ता सेतलवाड ने गुजराज दंगा पीड़ितों की मदद के लिए सिटीजन फॉर जस्टिस एंड पीस नाम से एक और संस्था बनाई. यही नहीं साल 2003 में तीस्ता सेतलवाड मुंबई में बेस्ट बेकरी केस की गवाह जाहिरा शेख के साथ नजर आईं. एक पीड़ित का खुला बयान दुनिया ने सुना और तीस्ता राष्ट्रीय सुर्खी बन गईं.

 

लेकिन जाहिरा का साथ ज्यादा नहीं निभा. कोर्ट में जाहिरा शेख ने बयान पलट दिया और सभी आरोपी बरी हो गए. लेकिन एक बार फिर तीस्ता जाहिरा को अपने साथ लाने में कामयाब हुईं और तब जाहिरा ने कहा कि बीजेपी एमएलए मधु श्रीवास्तव के दबाव में उन्होंने बयान बदला था. लेकिन इसके बाद ही जाहिरा ने एक बार फिर तीस्ता पर गंभीर आरोप लगाते हुए किनारा कर लिया. जाहिरा को सुप्रीम कोर्ट ने झूठी गवाही देने के जुर्म में जेल भेज दिया.

 

तीस्ता ने इसके बाद एक बड़ी लड़ाई छेड़ दी साल 2009 में गुलबर्ग सोसाइटी की दंगा पीड़ित जाकिया जाफरी के साथ तीस्ता सुप्रीम कोर्ट जा पहुंची और आरोप लगाया कि दंगा एक बड़ी साजिश थी और इसमें तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी समेत 62 लोग शामिल थे. नरेंद्र मोदी पर आपराधिक मामला चलाने की याचिका तो मंजूर नहीं हुई लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने दंगो की जांच कर रही एसआईटी को जांच करने को कह दिया.

 

नरेंद्र मोदी के खिलाफ तीस्ता की ये जंग प्रेस कॉन्फ्रेंस, मीडिया और उनकी अपनी मैगजीन कम्यूनल कॉम्बेट में भी जारी रही. लेकिन एसआईटी ने नरेंद्र मोदी की भूमिका पर जो रिपोर्ट तैयार की उसमें लिखा गया कि जाकिया की वो याचिका जिसमें तीस्ता भी शामिल थीं भ्रामक तथ्यों से भरी हुई है.

 

तीस्ता सेतलवाड नरेंद्र मोदी के खिलाफ ये लड़ाई जीत नहीं पाईं. पहले एसआईटी की एन्कवायरी और फिर इनवेस्टीगेशन दोनों में साल 2012 में नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट मिली और अदालत ने भी साल 2013 में क्लोजर रिपोर्ट को सही ठहराया. मोदी दंगों के दाग से बेदाग बाहर आ गए. लेकिन तीस्ता के समर्थक कहते हैं कि नरेंद्र मोदी से उस लड़ाई के बाद ही तीस्ता का चैन छिन गया.

 

तीस्ता के समर्थकों के मुताबिक तीस्ता से अलग हुए रईस खान को तत्कालीन बीजेपी सरकार ने तोड़ लिया. रईस खान का आरोप था कि गवाहों को पैसा देकर तीस्ता ने खुद तैयार किए हलफनामों पर हस्ताक्षर कराए.

 

यही नहीं गुलबर्ग सोसाइटी के जो लोगों को ही तीस्ता के खिलाफ खड़ा कर दिया गया. गुलबर्ग सोसाइटी के लोगों ने ही म्यूजियम बनाने के वादे से मुकरने और चंदे के दुरुपयोग की शिकायत अहमदाबाद क्राइम ब्रांच से की थी. हालांकि तीस्ता के समर्थक आज भी ये कह रहे हैं कि पूरी गुलबर्ग सोसायटी तीस्ता के खिलाफ नहीं है बल्कि सिर्फ एक तबका तीस्ता का विरोध कर रहा है.

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