AIMIM के अध्यक्ष असद्दुदीन ओवैसी का बिहार में क्या होगा असर?

By: | Last Updated: Thursday, 20 August 2015 11:19 AM
AIMIM president Asaduddin Owaisi impact on bihar election

नई दिल्ली: बिहार की राजनीति में AIMIM के अध्यक्ष असद्दुदीन ओवैसी ने एंट्री मार दी है. किशनगंज की रैली के बाद से बिहार में ओवैसी के सियासी कद की पड़ताल होनी लगी है. सवाल उठ रहे हैं कि क्या ओवैसी सीमांचल में मुस्लिम वोटों को अपनी तरफ कर पाएंगे? या फिर उनकी भूमिका वोट काटने तक ही सीमित रहेगी.

 

विरोधियों पर हमले का यही अंदाज है AIMIM चीफ असद्दुदीन ओवैसी का. बिहार में 16 अगस्त को हुई किशनगंज की रैली में ओवैसी की हुंकार से विरोधियों के कान खड़े हो गए हैं.सबसे ज्यादा उन सियासी पार्टियों की नींद उड़ती नजर आ रही है जिनका मुस्लिम वोटों पर कब्जा माना जाता है.

 

बिहार के सीमांचल में जेडीयू, आरजेडी और कांग्रेस के महागठबंधन को अब अपनी सियासी जमीन दरकती नजर आने लगी है. मुस्लिम आबादी वाले सीमांचल में इन्हीं पार्टियों की हनक और रसूख है. हालांकि औवैसी ने अभी तक अपने पत्ते नहीं खोले हैं कि विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी उतरेगी भी या नहीं.

 

माना जा रहा है कि किशनगंज में असद्दुदीन ओवैसी यूं ही नहीं आए थे. वो भी विधानसभा चुनाव से ऐन पहले सीमांचल मुस्लिम बहुल बेल्ट माना जाता है.

 

2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर होने के बावजूद बीजेपी इस इलाके से एक भी सीट नहीं जीत पाई. ओवैसी बिहार में जिस सियासी जमीन को तलाशने की कोशिश कर रहे हैं उसकी बुनियाद सीमांचल के मुस्लिम हैं. सीमांचल में आने वाले मुख्य जिले हैं किशनगंज, अररिया, पूर्णिया, कटिहार, सहरसा, सुपौल और मधेपुरा. यहां करीब मुस्लिम 40-45 फीसद मतदाता हैं. किशनगंज में जहां ओवैसी ने अपनी रैली की वहां मुस्लिमों की आबादी करीब 70 फीसद है.

 

ओवैसी को बिहार की राजनीति में लाने वाले हैं अख्तरुल ईमान. ईमान 2010 में आरजेडी से चुनाव जीतकर विधायक बने लेकिन 2014 विधायक पद से इस्तीफा देकर जेडीयू से लोकसभा चुनाव लड़े. हालांकि चुनाव के आखिरी दौर में कांग्रेस के उम्मीदवार को अपना समर्थन दे दिया. तब से अख्तरुल ईमान सीमांचल में चर्चित नेता के तौर पर उभरे हैं. अख्तरुल ईमान ओवैसी को यहां उतरने के पीछे ठोस वजह भी बता रहे हैं.

 

AIMIM बिहार में कितने सीटों पर चुनाव लड़ेगी ये अभी साफ नहीं है लेकिन सियासत के जानकारों के मुताबिक वो 25 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार सकती है. कहा तो यहां तक जा रहा है AIMIM की झोली में 7-8 विधानसभा सीटें आ जाएंगी.

 

राजनीतिक पंडितों की मानें तो अगर वे अपनी बात समझा पाने में कामयाब हुए तो कोई शक नहीं कि सीमांचल समेत पूरे बिहार का राजनीतिक समीकरण बदल जाएगा. ऐसे में ओवैसी अगर सेंध लगाते हैं तो नीतीश-लालू को झटका लगना तय है.

 

ओवैसी की यहां की राजनीति में दखल से अगर किसी फायदा होता नजर आ रहा है तो वो है बीजेपी. सीमांचल में बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चुनौती हैं मुस्लिम मतदाता. अगर मुस्लिम वोटर नीतीश-लालू की बजाए ओवैसी का रुख करते हैं तो फायदा बीजेपी को ही होगा. ऐसे में ओवैसी को वोट काटने के रुप में देखा जा रहा है और फायदा बीजेपी को मिलता दिख रहा है.जो भी हो कम से कम ओवैसी के आने से बिहार की राजनीति में बड़ा ट्विस्ट आने वाला है.

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