व्यक्ति विशेष: नरेंद्र मोदी के संकटमोचक!

By: | Last Updated: Saturday, 22 November 2014 1:17 PM
ajit doval

हॉलीवुड के मशहूर किरदार का नाम है जेम्स बॉन्ड. जासूस जेम्स बॉन्ड का 007 नंबर भी आपने सुना होगा. दरअसल जासूसी की दुनिया जितनी तिलस्मी है उतनी ही रहस्यों से भरी हुई भी होती है इसीलिए हॉलीवुड से लेकर बॉलीवुड तक जासूसी की कहानियों पर रोमांचक फिल्मों का दौर आज भी जारी है. रील लाइफ में जासूसों का किरदार बेहद आकर्षक अंदाज में पेश किया जाता है लेकिन रीयल लाइफ के जिस जासूस की बात हम आज आपको बता रहे हैं वह ना तो हवाओं में उड़ता था और ना ही आसमान में तैरता नजर आता था. फिल्मी जेम्स बॉन्ड की तरह ये जासूस ना तो दुश्मन पर गोलियां बरसाता था और ना ही हसीनाओं से आंखे लड़ाता था लेकिन अपनी हिम्मत और जज्बे से उसने जासूसी की दुनिया में ऐसी मिसालें कायम कर दी जिन्होनें उन्हें बना दिया है देश का रीयल जेम्स बॉन्ड.

 

म्यांमार में घूसकर उग्रवादियों को भारतीय सेना ने मार गिराया. इसके मुख्य सूत्रधार रहे अजित डोभाल. भारत में जासूसी की दुनिया का ये वो चेहरा रहा है जो आज नरेंद्र मोदी की सरकार में रुतबे और रसूख की एक नई पहचान बन चुका है. देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल की प्रधानमंत्री मोदी से ये करीबियत ही उनकी अहमियत को बयान कर देती है. डोभाल केंद्र सरकार में सबसे ताकतवर अफसर माने जाते हैं क्योंकि उनके कंधों पर देश की सुरक्षा का भार है. देश के अहम फैसलों में उनकी राय की अहमियत और खास जगहों पर उनकी मौजूदगी से भी जाहिर है कि केंद्र सरकार में अजित दोभाल बन गए हैं कितने अहम और कितने खास.

 

 

खुफिया ब्यूरो के पूर्व प्रमुख दुल्लत बताते हैं कि उनका बहुत क्रूसल रोल है . इस सरकार के सक्सेस और असफल के बीच अजीत दोभाल ही होगा. मैं इस तरह कहूंगा इसे. देश के पांचवे सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राइट हैंड मैन माने जाते है लेकिन उनके इतने ऊंचे रुतबे के पीछे संघर्ष की उतनी ही बड़ी एक दास्तान भी दर्ज है. जासूसी की दुनिया में अजित डोभाल का एक हैरतअंगेज इतिहास रहा है उनके उस इतिहास में भी झांकने की कोशिश हम करेंगे लेकिन पहले आपको बताते है कि आखिर कौन है अजित डोभाल.

 

31 मई को प्रधानमंत्री के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बने अजित डोभाल इंटेलीजेंश ब्यूरों के चीफ रह चुके हैं. उन्हें आंतरिक सुरक्षा और काउंटर टेरेरिज्म का मास्टर माना जाता हैं क्योकि पंजाब से लेकर नार्थ ईस्ट तक और कंधार से लेकर कश्मीर तक एक जासूस के तौर पर डोभाल ने देश और दुनिया में आतंकवाद के खिलाफ लडाई में अहम योगदान दिया है और उनकी इन्हीं खूबियों के चलते आज वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सबसे भरोसेमंद और सबसे खास बन गए हैं.

 

खुफिया ब्यूरो पूर्व आफिसर के एन सिंह बताते हैं कि नरेंद्र मोदी की सरकार में अभी तक जो एपाइंटमेंट हुए है एक एक बड़े चुन के हुए हैं. किसी में कोई खामी नहीं निकाल सकता है लेकिन मेरे ख्याल से सबसे अच्छा सलेक्शन अजीत दोभाल का ही था. जैसा कि मैने कहा कि एनएसए को इंटरनल सेक्युरिटी और एक्सटरनल सेक्युरिटी का पूरा कंप्लीट ज्ञान होना चाहिए. जो इनमें है औऱ  इसीलिए चाहे चाइना. चाइनीज प्रेसीडंट के एडवांस विजिट में वहां गए. यहां भी आपने देखा होगा ब्राजील में गए साथ में जापान में क्रूसल रोल प्ले किया. अभी आपने देखा म्यामार गए. आस्ट्रेलिया में है हर जगह मैं तो देखता हूं टीवी में आपके चैनल के माध्यम से मुझे मालूम होता है मैं देखता हूं कि इन सब इंपार्टेंट मीटिंग में राइट हैंड पर बैठे होते हैं अजीत दोभाल. तो मुझे तो खुशी होती है बैच मैट और गुड फ्रैंड.

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साये की तरह नजर आने वाले डोभाल का मशवरा सत्ता के गलियारों में ऊंचा मकाम रखता हैं. दरअसल राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद का मुखिया राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार होता है जिसका मुख्य काम प्रधानमंत्री को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर सलाह देना होता है. एनएसए का ये पद 1998 में पहली बार उस वक्त बना था जब देश में दूसरी बार परमाणु परीक्षण किया गया था. तब देश का न्यूक्लियर प्लान और पॉलिसी बनाने और इस मुद्दे पर विदेशी सरकारों से बात करने के लिए एक सुरक्षा परिषद का गठन भी किया गया था जिसका कोऑर्डीनेटर ऱाष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को बनाया गया था लेकिन बदले हालात में जब देश को आतंकवाद से बड़ी चुनौती मिली तो देश के अंदर और बाहर सुरक्षा की जिम्मेदारी भी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के दायरे में आ गई. जाहिर है आज एनएसए का ये ओहदा देश के सबसे अहम पदों में शुमार हो गया है और यही वजह है कि प्रधानमंत्री मोदी के साथ नजर अहम जगहों पर नजर आते हैं देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल.

 

खुफिया ब्यूरो के पूर्व प्रमुख दुल्लत बताते हैं कि देखिए अभी तो सरकार को छह महीने भी नहीं हुए हैं. लेकिन ऐसा है कि जो मैने देखा है. उससे बडी पॉजीटिव चीज जो देखने में आती है उससे लगता है कि  मोदी जी का और डोवाल साहब का रिलेशनशिप बहुत करीबी लग रहा है. जो जरुरी है उसके बगैर एनएसए फंक्शन नहीं कर सकता. और मैं समझता हूं कि इनकी सोच भी मिलती जुलती है. एक दूसरे को जानते हैं. समझते हैं और डोभाल साहब के लिए इशारा काफी होता है बाकी वो संभाल लेंगे.

 

आईबी के पूर्व प्रमुख अरुण भगत ने कहा कि चाहे डिफेंस मिनिस्टर हो चाहे होम मििनस्टर हो. चाहे प्राइम मिनिस्टर हो. उनको इन पर काफी भरोसा है. और पूरा यकीन है कि इनको जो भी काम दिया जाए या जो भी काम का दायरा है. उसको ये पूरी तरह समझते है. और उसमें वह जो सलाह देंगे वो सबसे अच्छी सलाह होगी. सबसे अच्छा तरीका होगा इसीलिए मुझे लगात है कि उन पर जो भरोसा किया जा रहा है. वो इन वजहों से है.

 

जून महीने में 46 भारतीय नर्सों को ईराक में आतंकी संगठन ISIS ने बंधक बनाया था. नर्सों की वापसी को लेकर उस वक्त खूब हंगामा भी मचा था तब परदे के पीछे नर्सों की सुरक्षित वापसी के लिए जो ऑपरेशन चला उसके मास्टर माइंड थे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल.

 

पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों की नई शुरुवात हो या फिर पश्चिमी देशों के साथ संबंधों का नया दौर जानकार मानते हैं कि इन सारी कवायद के पीछे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल का ही दिमाग काम कर रहा है.

 

सीमा पर पाकिस्तान को करारा जवाब देने की केंद्र की नीति हो या फिर देश के अंदर आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई एनएसए अजित डोभाल हर मोर्चे पर आगे नजर आए हैं. अक्टूबर में पश्चिम बंगाल के वर्धमान में जब बम फटे तो जांच अधिकारियों के साथ खुद अजित डोभाल घटना स्थल का जायजा लेने वर्धमान भी पहुंचे थे और ऐसा पहली बार हुआ है कि देश का राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मौके ए वारदात पर नजर आया हैं. 

 

वरिष्ट पत्रकार कंचन गुप्ता ने बताया कि दोवाल साहब का पश्चिम बंगाल मे जाने का तीन कारण था. एक तो है कि ग्राउंड का असेसमेंट करना. स्थिती कितनी खराब है. इनकी पेनीट्रेशन कहां तक हुई है. दूसरा है ये एक अच्छा मौका था कि आप एक टेस्ट करें कि आपकी जो एक्जिस्टिंग इंटेलीजेंश नेटवर्किंग है वो कितनी मजबूत है. या वो कितना बिगड़ गया है. तो आप उसको उस हिसाब से करेक्ट कर सकते हैं. तीसरा जो है पश्चिम बंगाल की जो सरकार है. उसके साथ बात करके उनको ये समझाना कि देखिए ये पश्चिम बंगाल की इश्यू नहीं है ये वर्धमान की इश्यू नहीं है. ये एक जिला दो जिला या तीन जिला की इश्यू नहीं है. ये पूरे देश का इश्यू है.

 

 खुफिया ब्यूरो पूर्व आफिसर के एन सिंह बताते हैं कि ये खुद इनवाल्व हो जाते हैं. जो हम आर्मी और पुलिस में कहते है हू इज द लीडर, हू कैन लीड द फ्रंट. तो ये वो लीडर है जो खुद आगे चलते है पीछे लोग आए. इनमें ये क्षमता है और इसीलिए पंजाब में इन्होंने मिलिटेंशी जो वहां पर इनहोंने हैंडल किया 80 में. शायद ये पहले पुलिस आफिसर है जिनको कीर्ति चक्र मिला.

 

अजित डोभाल के साथ काम कर चुके के एम सिंह बताते हैं कि डोभाल अपने करियर में ऊंची उड़ान भरते रहे हैं लेकिन उनके पैर हमेशा जमीन पर टिके रहते हैं. एक जासूस के तौर पर उन्होनें बेशुमार खतरों का सामना भी किया है लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बनने के बाद अब उनके सामने चुनौतियां बेशुमार है. डोभाल की उन चुनौतियों का जिक्र भी हम करेंगे आगे लेकिन पहले सुनिए कहानी जासूस अजित डोभाल की. 

 

आईबी के पूर्व प्रमुख अरुण भगत ने बताया कि जब आप ऐसे लोगों से मिलते हैं. जो आपके देश की तरफ आपकी तरफ दुश्मनी की भावना से देखते हैं. तो उनसे आप मिलते है ऐसी टेरेटरी में जिसमें आपके पास कोई प्रोटेक्शन नहीं होता है. तो खतरा तो बहुत है. पर फिर भी खतरा मोल ना लिया जाए तो फिर जो जानकारी आपको चाहिए. जो रिलेशनशिप आपने बनाने है. वो नहीं बन पाते. तो इस लिहाज से मैं समझता हूं कि दोभाल एक कंप्लीट इंटेलीजेश आफिसर हैं. जो सिक्योरिटी के जितने भी पहलू हैं. उनकी समझ बहुत आच्छी है.

 

1968 बैच के IPS ऑफिसर अजीत डोभाल ने चार साल बाद 1972 में इंटेलीजेंश ब्यूरो ज्वाइन कर लिया था. 46 साल की अपनी नौकरी में महज 7 साल ही उन्होनें पुलिस की वर्दी पहनी है क्योंकि डोभाल का ज्यादातर वक्त देश के खुफिया विभाग में बतौर जासूस गुजरा है इसीलिए पहली नजर में अजित डोभाल जितने सामान्य नजर आते है उनका करियर उतनी ही करिश्माई कामयाबियों से भरा हुआ है.

 

 

खुफिया ब्यूरो पूर्व आफिसर के एन सिंह बताते हैं कि यही एक अफसर है जो कि आईबी में रहे. इन्होंने मिजोरम इनसरजेंशी वर्स्ट आफ द पीरियड 1975 से हैंडल किया है. पंजाब प्रो खालिस्तान मिलिटेंशी जब अपनी हाइट पर थी तब उसको इन्होंने हैंडल किया है. कश्मीर 90 में जब बहुत बुरी हालात थी तब हैंडल किया है. तो आतंरिक सुरक्षा में इन्होंने हर पहलू को हैंडल किया है. जहां तक बाहर का है सबसे बड़ा पाकिस्तान हमारा सबसे बड़ा प्राब्लम होता है. इन्होनें इंडियन हाई कमीशन पाकिस्तान में छह साल से ऊपर काम किया है. इसका अलावा वेस्टर्न वर्ल्ड में इंडियन हाई कमिशन लंदन में करीब चार साल तक रहे. दस साल से ऊपर ये फारेन सर्विस में भी काम किए हैं. तो दोनों जो प्राब्ल्म है उसका इनकों पूरा अनुभव भी है ज्ञान भी है. और इतना इनमें विजन है कि सोच भी सकते है कि कैसे इसे हल किया जाए.

 

फिल्मी परदे पर जासूसी की जो कहानी दर्शकों को रोमांच से भर देती है लेकिन असल जिंदगी की जासूसी की कहानी अगर सुनाई जाए तो सुनने वाले के रोंगटे खड़े हो जाए. एक जासूस की जिंदगी कैसे खतरों से भरी होती है ये आप खुद सुनिए उन्हीं लोगों की जुबानी जिन्होंने अजित डोभाल के साथ जासूसी के खतरनाक काम को अंजाम दिया है. 

 

आईबी के पूर्व प्रमुख अरुण भगत ने बताया कि उसमें स्ट्रेस भी बड़ा रहता है. फिर इसके जो रिएक्शन होते हैं इसके नतीजे उल्टे भी पड़ सकते हैं. तो ये बड़ी टेंस लाइफ होती है इटेंलीजेंस आफिसर की. खास कर के जो हालात आज कल के है और पीछे जो थे. सिचुएशऩ इतनी खराब थी.

 

 

खुफिया ब्यूरो के पूर्व प्रमुख दुल्लत बताते हैं कि रिस्क तो होता ही है लोनलीनेस बहुत ज्यादा होती है. क्योंकि आप अकेले रहते हैं. और जो चीजें आपको मालूम है वो आप किसी के साथ शेयर नहीं कर सकते. अकेलापन बड़ा लगता है. और जब चीजें आपके हक में जा रही हो आपके फेवर में जा रही हो तो बड़ा मजा आता है जब चीजें आपके खिलाफ होने लगती हैं गलत होने लगती है तो वो अकेलापन काफी बढ जाता है.

 

अजित डोभाल का जासूसी की दुनिया में 37 साल का तजुर्बा रहा है. वह नौ साल पहले इंटेलीजेंस ब्यूरो यानी आईबी प्रमुख के पद से रिटायर हुए हैं. अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार में डोभाल मल्टी एजेंसी सेंटर और ज्वाइंट इंटेलिजेंस टास्क फोर्स के चीफ के तौर पर भी काम कर चुके है लेकिन डोभाल की दूसरी खूबी उनकी ये विचारधारा भी रही है.

 

अजित डोभाल का झुकाव हिंदुत्ववादी विचारधारा की ओर माना जाता है. वो उस विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन के फाउंडर अध्यक्ष भी रह चुके है जो राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के थिंक टैंक के तौर पर जाना जाता हैं. साल 2010 में बीजेपी ने राष्ट्रीय सुरक्षा पर हरिद्वार में जो पहला अधिवेशन बुलाया था उसमें भी अजीत डोभाल को खास तौर से बुलाया गया था. यानी बीजेपी और आऱएसएस से उनकी करीबियत पुरानी रही है.

 

अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार में अहम पदों पर रहे अजित डोभाल लालकृष्ण आडवाणी के भी करीबी माने जाते हैं. कहा जाता है कि अगर 2009 में बीजेपी चुनाव जीतती और आडवाणी प्रधानमंत्री बनते तो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की जिम्मेदारी अजित डोभाल को ही सौंपी जानी तय थी.

 

आईबी के पूर्व प्रमुख अरूण भगत ने बताया कि आरएसएस का उसका संबंध तो डेफीनेटली है. क्योंकि विवेकानंद फाउंडेशन उन्हीं का बनाया हुआ है.

 

वरिष्ट पत्रकार कंचन गुप्ता ने कहा कि मैं ये नहीं कह रहा कि सलाहकार कुछ भी कह दें और सरकार मान ले ऐसा होता भी नहीं है. उसकी प्रापर एससमेंट होती है उसके आप्शन होते हैं. ये भी सही है कि अभी की जो सरकार है. इस सरकार के साथ नेशनल सेक्युरिटी एडवाइजर की एक अडरस्टैंडिग कहिए या जो रिलेशनशिप होता है ट्रस्ट का वो भी है. वो पहले से था इनके करीबी हैं तो इन सब बातों का भी असर होता है.

 

लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी से अजित डोभाल की करीबियत से कही ज्यादा अहम उनकी काबीलियत है. डोभाल खुफिया जगत में सीधी कार्रवाई करने वाले सबसे तेज-तर्रार अधिकारियों में शुमार किए जाते रहे हैं और अपनी ऐसी ही साफ समझ की बदौलत अजित डोभाल ने अटल बिहारी वाजपेयी सरकार को भी एक बड़े संकट से उभारा था.   

 

24 दिसंबर 1999 को नेपाल से दिल्ली आ रहे एयर इंडिया के जहाज का अपहरण कर लिया था. एयर इंडिया की फ्लाइट आईसी 814 को आतंकवादी हाईजैक कर अफगानिस्तान के शहर कंधार ले जाने में कामयाब रहे थे. उस समय भारत सरकार एक बड़े संकट में फंस गई थी क्योंकि विमान में 176 भारतीय सवार थे.  

 

अफगानिस्तान में उन दिनों तालिबान की हुकूमत थी जिसे भारत सरकार ने मान्यता नहीं दी थी. कंधार एयरपोर्ट पर भारतीय जहाज को तालिबान कमांडो ने चारों तरफ से घेर रखा था इसीलिए ये मामला और भी ज्यादा पेचीदा हो गया था. ऐसे हालात के बीच उन आतंकवादियों से बातचीत भी मुश्किल हो गई थी जो यात्रियों के बदले भारतीय जेलों में कैद 35 आतंकवादियों को रिहा करने की मांग कर रहे थे.

 

वरिष्ठ पत्रकार राजू संथानम ने बताया कि अजीत डोभाल गए थे जो रिलीफ प्लेन गई थी कंधार में. साथ ही हम ये भी कोशिश कर रहे थे कि क्या कोई रेस्क्यू भी हो सकती है या नहीं और उसके लिए कहते हैं कि 15-20 कमांडो भी थे प्लेन में . ग्रीन लाइट का इंतजार था सेंटर की तरफ से पर वो आई नहीं .

 

कंधार में हाईजैकिंग का ये पूरा ड्रामा करीब सात दिनों तक चला और इस दौरान इधर देश में सरकार पर यात्रियों को सुरक्षित वापस लाने का दबाव काफी बढ़ गया था. ऐसे मुश्किल हालात के बीच अजित दोभाल ने सरकार और आतंकवादियों के बीच बातचीत में अहम भूमिका निभाई थी और सरकार महज तीन आतंकवादियों की रिहाई के बदले 176 भारतियों को सुरक्षित देश वापस लाने में कामयाब रही थी.

  

खुफिया ब्यूरो पूर्व ऑफिसर के एम सिंह ने कहा कि ये कश्मीर में पोस्टेड थे. तो हाईजैकर जो थे कश्मीर के मिलिटेंट को निगोशिएट कर रहे थे. इनको उसके बारे में पूरा आइडिया था. तो जो निगोशिएशन हुआ. शायद इनसे अच्छा कोई और हैंडल नहीं कर सकता था इसीलिए उनको चुना गया और कंधार भेजा गया. और लेकर वापस आए लोगों को.

 

खुफिया ब्यूरो के पूर्व प्रमुख दुल्लत बताते हैं कि 814 में ज्यादा इलेबरेशन का स्कोप है नहीं. क्योंकि हमारे जो आप्शन थे वह बंद हो चुके थे. एक ही चीज थी कि वो जो हमारे लोग फंसे हुए थे जहाज में उनको वापस कैसे लाना. और कम से कम प्राइस पर. और वह उन्होंने करवाया डोभाल साहब ने. सिर्फ डोभाल साहब ही नहीं और भी थे हमारे सहाय साहब थे विवेक काटजू भी थे एन एच एल संधू भी थे जो बाद में डीआईबी बने. और मुझे याद आता है आनंद आदनी भी थे. बहुत सारे लोग थे टीम वर्क था.

 

 

अजित डोभाल को काउंटर टेरेरिज्म का माहिर माना जाता है क्योंकि सीमा पार पलने वाले आतंकवाद को उन्होंने बेहद करीब से देखा और उसके खिलाफ कई अंडर कवर ऑपरेशन में वो हिस्सा भी ले चुके हैं इसीलिए आतंकवाद के खिलाफ उनका रुख बेहद सख्त रहा है.

 

एक इंटेलीजेंश ऑफिसर के तौर पर अजित डोभाल अपने विरोधियों पर मनोवैज्ञानिक असर डालने में महारत रखते हैं. 90 के दशक में जब कश्मीर आतंकवाद की आग में झुलस रहा था तब ऐसे खतरनाक हालात में डोभाल ने पाक समर्थित आतंकवादी संगठनों की कमर तोड़ कर रख दी थी. डोभाल के बैच मैट रहे के एम सिंह वह पूरी कहानी बताते है कि कैसे डोभाल ने कश्मीर में आतंकवादियों को ही आतंकवादियों के खिलाफ इस्तेमाल किया था. 

 

खुफिया ब्यूरो के पूर्व अफसर केएम सिंह बताते हैं कि जब कश्मीर में मिलिटेंशी शुरु हुई तो पाकिस्तानियों ने एक इंप्रेशन दिया चाहे जेकेएलएफ वाले थे या बाकी जो मिलिटेंट आर्गेनाइजेशन को. कि आप वहां मिलिटेंशी शुरु करो इनसरजेंशी शुरु करो. और जब एक लेवल तक पहुंच जाएगा तो हम लोग आकर आपको हेल्प करेंगे और आपको आजाद करा देंगे. तो ये जो मूवमेंट चल रहा था इसमें मारे जा रहे थे कश्मीरी, मारे जा रहे थे सेक्युरिटी फोर्सेस वाले. पाकिस्तान का सिर्फ पैसा खर्च हो रहा था. तो उनके लिए ये चीपेस्ट और बेस्ट आप्शन था . इंडिया को ब्लीड कराने के लिए. उस हालत में जाकर इन्होंने जो मिलिटेंट के साथ राप्ता और आम कश्मीरियों के साथ राप्ता कायम करके. उनको ये समझाना कि आप मारे जा रहे हो. आपके लोग मारे जा रहे हैं जनरेशन खराब हो रही है. पाकिस्तान आपको बेवकूफ बना रहा है. आप इंडिया से बात करो गवर्मेंट इंडिया से बात करो. जो चाहों आप ओपन टेबल पर बात करो. जो कहते है माइंड सेट चेंज करने वाली वो माइंड सेट चेंज करने वाला एक बहुत बड़ा काम इन्होंने किया.

 

ये पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी कूका पैरी की साल 2003 की आखिरी तस्वीरें हैं जब वो एक आतंकवादी हमले का शिकार बन गया था. कहा जाता है कि कूका पैरी का ब्रैनवॉश कर अजीत डोभाल ने ही उसे और उसके संगठन इखवान ए मुस्लेमीन को आतंकवाद के खिलाफ लड़ने के लिए तैयार किया था. डोभाल के इस अंडर कवर ऑपरेशन के बाद ही कश्मीर में राजनीतिक भी राह निकली थी. कश्मीर में 1996 में केंद्र सरकार चुनाव करवाने में कामयाब रही थी. आतंकवादी कूका पैरी ने भी अपनी राजनीतिक पार्टी बनाकर चुनाव में हिस्सा लिया था और वो विधायक चुना गया था लेकिन 2003 में एक आतंकवादी हमले में कूका पैरी मारा गया.   

 

रॉ के पूर्व अफसर आर के यादव ने बताया कि डोभाल हार्ड टास्क मास्टर है. वो जो काम अपने हाथ में लेते है वो उसकी तह तक जाकर उसको पूरा करके रहते हैं. अब कश्मीर में जब मिलिटेंशी 90 के मिडिल में थी. तो वहां पर जो टेरेरिस्ट थे उनको जीत कर के उनको एक्रास द बार्डर जो लोग आ रहे थे उनके खिलाफ यूज किया था. उसमें एक कूका पैरी नाम का टेरेरिस्ट था बाद में उसको गर्वमेंट की सपोर्ट मिली और बहुत से पाकिस्तानी मिलिटेंट थे उसको मारा. बाद में उसको भी उन्होंने हांलाकि एक एंबुस में उडा दिया था. लेकिन वो एक नई ट्रेंड मिलिटेंसी में शुरु हुई थी कश्मीर में. और उसका एक ये रिजल्ट हुआ था. कि सब एक दूसरे को शक की नजर से देखने लगे थे. और उनमें अफरा तफरी मचनी शुरु हो गई थी. ये जो सेप्रेटिस्ट लीडर जो है जो पाकिस्तान का राग अलाप रहे थे. इनको भी इन्होंने लाइन पर ले आए थे इन्होंने इलेक्शन करा दिया था 96 में. तो डोभाल को जो भी काम दिया जाता है वो इसको पूरी हिम्मत से डेयर डेविल तरीके से करते हैं.

 

कश्मीर में आतंकवाद के खिलाफ ऐसे अभियान और कूका पैरी की बात किस्स कहानियां का ही हिस्सा रहे हैं और इनका कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं है. खुद अजित डोभाल ने भी इस बारे में कभी कुछ नहीं कहा है. इस शो के लिए भी डोभाल ने एबीपी न्यूज से बात नहीं की है.

 

फिल्मों में जासूस की जिंदगी में रहस्य भी होता है और रोमांच भी. एक जासूस की जिंदगी जितनी दिलचस्प होती है उतने ही खतरों से भरी भी होती है क्योंकि जासूस के लिए उसका मिशन ही उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा मकसद बन जाता है. हॉलीवुड से लेकर बॉलीवुड तक फिल्मों में जबरदस्त एक्शन के जरिए जासूसी की इस दुनिया को एक आकर्षक अंदाज में पेश किया जाता है लेकिन असलियत में जासूसी की ये दुनिया एक अलग ही रंग में रंगी होती है और वो रंग देश भक्ति का है. देश के लिए जान की बाजी लगा देने का जज्बा लिए जब एक जासूस अपने मिशन पर निकलता है तो उसके पीछे छूट जाता है उसका परिवार और पूरा समाज. 1968 बैच के IPS  ऑफिसर अजित कुमार डोभाल ने भी जब इंटेलीजेंश ब्यूरो में काम शुरु किया तो उनका ये काम ही उनकी जिंदगी का जुनून बन गया और 70 के दशक में डोभाल का यही जुनून उन्हें पूर्वोत्तर के राज्य मिजोरम तक खींच लाया था.

 

खुफिया ब्यूरो के पूर्व ऑफिसर के एम सिंह बताते हैं कि काम उनकी पहली प्राथमिकता है. मिजोरम 1970 में जब हालात वहां इतनी खराब थी बहुत खराब थी. कोई जाने को तैयार नहीं था ये चले गए. इनकी कुछ ही साल पहले शादी हुई थी. फैमिली को यहां छोड़कर चले गए. और वो कई महीनों तक नहीं आए यहां इसी हालत में हम लोग साथ थे. मिजोरम ये हालात थी कि आपको पता होगा जो आईजी थे मिजोरम मिस्टर आर्या. वह वहां मारे गए थे आफिस एक्सप्लोशन में मारे गए थे. उस हालात मे जब मिजोरम जाने में लोगों को डर लगता था. अजीत डोभाल ने वोलेटियर करके गए वहां पर. वहां भी इनका सबसे बड़ा ये रहा है कि ये मिलिटेंट से डायरेक्टली मिलने में डर नहीं लगता है. मिले बात किए आपरेशन लांच किए. विन औवर किए.

 

भारत का पूर्वोत्तर राज्य मिजोरम. कुदरती खूबसूरती से सराबोर है मिजोरम. लेकिन 70 के दशक में मिजोरम भारत विरोध का अड्डा बन गया था. यहां अलगाववादी नेता लालडेंगा सरकार के लिए एक बड़ा सिरदर्द बना हुआ था. वह अलग देश की मांग कर रहा था और इसीलिए उसके संगठन मिजो नेशनल आर्मी ने लंबे वक्त से सरकार के खिलाफ विद्रोह का झंडा उठा रखा था. उन दिनों आईबी आफिसर अजित डोभाल पूर्वोत्तर में ही तैनात थे. तब डोभाल के साथ ही रहे विनोद दुग्गल बताते हैं कि कैसे एक अंडर कवर ऑफरेशन के तहत आईबी ने मिजो नेशनल आर्मी की कमर तोड़ दी थी.

 

पूर्व गृह सचिव विनोद दुग्गल ने बताया कि मेरी लाइफ के ऊपर भी बहुत थ्रेट थे उस समय मीजो नेशनल फ्रंट और मीसो नेशनल आर्मी बहुत एक्टिव थी उस वक्त और मैं डिस्ट्रिक्ट सेशन जज भी था. मैं केसेज ट्राई भी करता था . आईबी हेड के तौर पर वो हम सब के लिए बहुत मतलब कि एडमिनिस्ट्रेशन और भी जो लोग हैं उनके ऊपर कोई आंच न आए. तो मैं तो इनका उसी वक्त से जैसे कि ये जैसे काम करते थे जैसे कनेक्ट करते थे अंडरग्राउंड के साथ और कैसे उन्होंने . मैं समझता हुं कि 1976 में जो हमारा पहला पीस एकॉर्ड हुआ एमएनएफ के साथ वो इंप्लीमैंट नहीं हो पाया इसकी वजह दूसरी है. लेकिन 1976 में जो पहला पीस एकॉर्ड हुआ भारत सरकार औऱ अंडरग्राउंड लोग. जो कि फ्रंट था मीजो नेशनल फ्रंट , जो कि सेपरेट स्टेट सेपरेट कंट्री चाहते थे उसमें अजीत का रोल निंसंदेह सबसे ज्यादा था.

 

मिजो नेशनल आर्मी के मुखिया लाल डेंगा ने एक इंटरव्यू में कहा था कि अजित डोभाल ने उनके 7 में से 6 टॉप कमांडरों को उनके ही खिलाफ भड़का दिया था. दसअसल डोभाल ने उस मिजो नेशनल आर्मी में ही सेंध लगा दी थी जो मिजोरम में भारत सरकार के खिलाफ खड़ी थी और इसका नतीजा ये हुआ कि साल 1986 में लाल डेंगा को भारत सरकार के साथ समझौता करने के लिए मजूबर होना पडा था. 

 

आईबी के पूर्व प्रमुख अरूण भगत ने बताया कि उसमें उन्होंने बहुत अच्छा काम किया था अंडरग्राउंड गए थे उनको इनफ्रट्रेट किया था. और उनके बारे में बहुत सारी जानकारियां ली थी. और फिर जब समझौता भी हुआ उसमें भी इनका एक बहुत बड़ा हाथ था. और उसमें भी इन्होंने अपना दिखाया कि किस तरीके से अपनी जान पर खेल कर ये आपरेशन इन्होंने किया था.

 

पूर्व गृह सचिव विनोद दुग्गल बताते हैं कि जो उस वक्त रणनीतियां बनाई जाती थीं जो उस वक्त स्ट्रेटजी एडॉप्ट की जाती थी  उसमें इनकी बहुत भागीदारी होती थी. मैं तो पहले भी कह चुका हूं कि लेकिन आखिर में सारी चीजे पॉलीटिकल डिसीजन से होती  देश के जो हेड होते हैं उन्हें कई चीजे सोचनी होती है इसमें उनका कंट्रीब्यूशन ज्यादा था ये मैं नहीं कह सकता लेकिन जो वहां पर लोकल स्ट्रेटजी थी जो हम भारत सरकार के अप्रूवल के साथ हम अडाप्ट करते थे उसमें इट वास फेनटास्टिक.

 

मिजो नेशनल आर्मी को शिकस्त देकर डोभाल ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का भी दिल जीत लिया था. यही वजह है कि उन्हें महज 6 साल के करियर के बाद ही इंडियन पुलिस मेडल से सम्मानित भी किया था जबकि ये पुरस्कार 17 साल की नौकरी के बाद ही दिया जाता है. क्रास ब्रॉर्डर टेरेरिज्म के अलावा आंतरिक सुरक्षा के भी डोभाल माहिर खिलाड़ी माने जाते है. ऐसी बातें भी कहानियों की शक्ल में सामने आती रही है कि अजित डोभाल ने अंडर कवर ऑफरेशन के तहत मुंबई अडंरवर्ल्ड में दाउद इब्राहीम की काट के तौर पर डॉन छोटा राजन को इस्तेमाल किया था. किस्सा ये भी है कि एक वक्त दाऊद इब्राहीम तक भी पहुंच गए थे अजित डोभाल के हाथ.

 

रॉ के पूर्व अफसर आर के यादव ने बताया कि दाउद पर एक अटैक हुआ था. करांची में और जो विक्की मलहोत्रा जो एक छोटा राजन का आदमी था उसने उस पर अटैक किया था. वो दाउद को खत्म करने के लिए वो दोभाल का ही आपरेशन था. और फिर 2005 मे जब ये रिटायर हुए तो वही विक्की मल्होत्रा को दाउद ने मुंबई पुलिस से मिल के इनकी गाड़ी से दिल्ली में अरेस्ट करा दिया था क्योंकि ऐसा सुनने में आया था कि आपरेशन चल रहा था तो दाउद को जो उसकी लड़की की शादी होनी थी दुबई में. उस पर कुछ करने के लिए विक्की मल्होत्रा को दोबारा यूज करना था. ये खबरे हैं अब आपरेशन में क्या था ये सच्चाई हमारे सामने नहीं है.

 

मुंबई अडंरवर्ल्ड के खिलाफ ऐसे किसी अभियान से जुड़ी ये बातें किस्से-कहानियों में रही है और इनका कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं है. खुद अजित डोभाल ने भी इस बारे में कभी कुछ नहीं कहा है. इस शो के लिए भी अजित डोभाल ने एबीपी न्यूज से बात नहीं की है.

 

अजित डोभाल ने 6 साल पाकिस्तान की जमीन पर भी गुजारे हैं. वो चीन और बांग्लादेश की सीमा के उस पार मौजूद आतंकवादी संगठनों और घुसपैठियों की नाक में नकेल डालने में भी कामयाब रहे हैं. डोभाल की कामयाबी की लिस्ट में आतंकवाद से जूझ रहे कश्मीर ही नहीं पंजाब में भी चुनाव कराना शामिल रहा है.

 

1984 में हुए ऑपरेशन ब्लू स्टार . तब भारतीय फौज ने अकाल तख्त पर काबिज जनरैल सिंह भिड़रावाले और उसके आतंकवादियों को मार गिराया था. ऑपरेशन ब्लू स्टार के ठीक चार साल बाद 1988 ऑपरेशन ब्लैक थंडर. जब स्वर्ण मंदिर में छिपे चरमपंथियों को बाहर निकालने के लिए एक बार फिर सुरक्षा बलों ने धावा बोला था. ऑफरेशन ब्लैक थंडर को 300 नेशनल सिक्युरिटी गार्ड और BSF के 700 जवानों नें अंजाम दिया था. इस ऑफरेशन में अजित डोभाल ने खुफिया ब्यूरो के अधिकारियों के दल का नेतृत्व किया था.

 

वरिष्ठ पत्रकार राजू संथानम ने बताया कि ऑपरेशन ब्लैक थंडर हुआ था ब्लू स्टार के बाद 1988 में और उस टाइम केपी एस गिल थे डायरेक्टर जेनेरल पंजाब उस टाइम सिख मिलिटेंट ने फिर से आकाल तख्त तक पहुंच गए थे. काफी हथियार और बारूद थे अंदर, तब डोभाल को ऑथराइज किया कि वो जाए और उनसे मिले . एक खालिस्तान टेरिरिस्ट की तरह , आईएसआई टेरेरिस्ट की तरह और वो मिलें और लोगों से बात करें  और वो अंदर  घुस गए  और वहां से उन्होंने जो स्नाइपर्स थे बाहर  हर स्नाइपर को इंफरमेंशन मिलता था कि कौन सा टेरेरिस्ट कहां है और एक एक को मार दिया उन्होंने.

 

अस्सी के दशक में जब पंजाब आतंकवाद की चपेट में था तब 1988 में किसी वक्त डोभाल ने पाकिस्तानी एजेंट बन कर स्वर्ण मंदिर में एंट्री मारी थी. कहा जाता है कि डोभाल ने उस वक्त एक रिक्शा चलाने वाले का भेष बनाया था और वो खालिस्तान समर्थक आतंकियों को ये समझाने में कामयाब रहे थे कि वो पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI के एजेंट हैं और उनकी मदद करने के लिए ही यहां आए हैं.

 

ऑपरेशन ब्लैक थंडर से दो दिन पहले अजित डोभाल रिक्शेवाले के भेष में स्वर्ण मंदिर के अंदर दाखिल हुए थे और जब वो बाहर आए तो उनके पास स्वर्ण मंदिर में छिपे आतंकवादियों से जुड़ी सारी अहम जानकारियां मौजूद थी. बताया जाता है कि सेना जब ऑपरेशन ब्लैक थंडर को अंजाम दे रही थी उस वक्त भी अजित डोभाल हरमिंदर साहब के अंदर ही मौजूद थे.

 

खुफिया ब्यूरो के पूर्व अफसर के एम सिंह ने बताया कि ये जो इंटेलीजेंश जनरेशन ऐसी चीज है. उसके बड़े पहलू होते हैं ऑपरेशन के तो ये तो पब्लिक डोमेन में नहीं होता है. इसके बारे में बात करना उचित नहीं होगा पर मैं यही कहूंगा. कि ये एक ऐसे पुलिस आफिसर थे कि पोस्टेड तो थे दिल्ली में पंजाब आपरेशन हैडंल कर रहे थे. लेकिन दिल्ली से हैंडल नहीं किया खुद अमृतसर गए पंजाब के डिस्ट्रिक्ट हैडक्वार्टर में गए. वहां से उन्होंने हैंडल किया. जितने इंपार्टेंड आपरेशन हुए वो खुद उन्होने हैडंल किया. ये ऐसे इंटेलीजेंश आफिसर हैं जो थ्रू इंटेलिजेंश आपरेशन टॉप मिलिटेंट से खुद मिलकर बात करना इनमें ये क्षमता है और निर्भीक होकर काम करने वाली जो बात है. ये नहीं कि मिलिटेंट से कैसे मिले तो ये काफी बड़ी बात है बाकी इंटेलीजेंश आपरेशन कैसे हैंडल किया ये पब्लिक डोमेन की बात नहीं है.

 

 

ऑपरेशन ब्लैक थंडर से जुडी ये सारी बीते किस्से- कहानियों में रही हैं और इसका कोई आधिकाराधिक रिकॉर्ड नहीं है. जासूसी की दुनिया में अजित डोभाल का नाम एक ऊंचा मकाम रखता है. डोभाल को आंतरिक सुरक्षा और काउंटर टेरेरिज्म का माहिर माना जाता रहा है. क्रास बॉर्डर टेरेरिज्म और ट्रांस बॉर्डर टेरेरिज्म से निपटने में डोभाल अपनी काबलियत बार – बार साबित कर चुके है लेकिन देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के तौर पर अब उनका रोल बेहद बड़ा हो गया है और उनकी जिम्मेदारी बेहद अहम. 

 

पूर्व गृह सचिव विनोद दुग्गल बताते हैं कि एनएसए का जो रोल है वो काफी बड़ा रोल है इससे काफी बढ़के तो उसमें सिर्फ काउंटर टेरेरिज्म ही नहीं उसमें पॉलिसी हैं. स्ट्रेटजीस हैं उसमें देश को प्रोटेक्ट करते हुए कैसे आगे बढ़ना है.

 

वरिष्ठ पत्रकार राजू संथानम ने बताया कि चुनौतियां बहुत हैं चाइना उभरता हुआ कंट्री है और एक इकॉनमिक और सेक्यूरिटी थ्रेट माना जा सकता है और बगल में पाकिस्तान है और पाकिस्तान से आजकल रिश्ते कठिन होते जा रहे हैं  दूसरी बात हमें फॉरेन इनवेस्टमेंट भी चाहिए तो एक तरफ हम इकॉनामिक इनवेस्टमेंट चाहते हैं बाकि देशों से और दूसरी ओर सेक्यूरिटी कनसर्न हैं दोनों को बैलेंस करना उनके लिए कठिन है और चैलेंजिग हैं.

 

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल का मानना है कि देश के अंदर और बाहर आतंकवाद की चुनौती से निपटने के लिए NCTC यानी नेशनल काउंटर टेररिज्म सेंटर जैसी किसी बड़ी संस्था बनाने की जरूरत है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी आतंकवाद के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग करते रहे हैं हांलाकि गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होनें NCTC का विरोध भी किया था लेकिन अब जबकि सत्ता उनके हाथ में है तो ऐसे में उन्हें ऐसे हाथ की जरुरत है जो आतंकवाद पर मजबूत वार कर सके.

 

आईबी के पूर्व प्रमुख ए एस दुल्लत बताते हैं कि मैं ये सोचता हूं कि ये एक नियर परफेक्ट च्वाइस है. परफेक्ट च्वाइस थी ब्रजेश मिश्रा जी. क्योकि आपको याद होगा उस समय ब्रजेश मिश्रा सिर्फ एनएसए नहीं थे वो प्रिसिंपल सेक्रेटरी भी थे. और एक तरह से मुल्क को वही चलाते थे अटल जी के गाइडेंश के अंदर. तो वो बहुत परफेक्ट रिलेशनशिप था. अब इसको मैं नियर परफेक्ट समझता हूं. मोदी जी का और डोवाल साहब का जो है.

 

खुफिया ब्यूरो के पूर्व प्रमुख अरुण भगत बताते हैं कि एक तो टेरेरिज्म है. और टेरेरिज्म भी यहां दो तीन किस्मों का है. एक तो हमारा एथनिक है हमारा. और दूसरा रिलिजियस है इस्लामिक टेरेरिज्म है. और साथ साथ माओइस्ट कहिए नकस्लाइट कहिए उन्हें जो भी है. तो ये तीनो फार्म आफ टेरेरिज्म जो है. ये हमारे देश में काफी देर से मौजूद है. और इनको कंट्रोल करना इनको खत्म करना मेरे ख्याल से सबसे बड़ी चुनौती जो एनएसए के लिए है और देश के लिए भी वहीं है. 

 

मंबई पर 26-11 के आतंकवादी हमले के बाद से देश की आंतरिक सुरक्षा एक बार फिर NSA के रडार पर है. देश की करीब पांच हजार किलोमीटर लंबी सीमा पर आतंकियों की घुसपैठ भी एक बड़ी चुनौती है. कश्मीर में किस तरह की रणनीति अपनाना है. उडीसा से लेकर आंध्रप्रदेश तक फैले रेड कॉरीडोर में माओवादियों की चुनौती से किस तरह निपटना है. पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों को मजबूत करने की भी जरुरत है ताकि भारत विरोधी हरकतों पर शिकंजा कसा जा सके. देश में आर्थिक तरक्की की रफ्तार बढाने और विदेशी निवेश लाने के लिए सुरक्षा व्यवस्था की मजबूत किलेबंदी बेहद अहम हो चुकी है. जाहिर है भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के सामने वक्त कम है और चुनौतियां है बेशुमार.  

 

 

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Web Title: ajit doval
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