all you need to know about allegations of disturbances in EVM EVM में गड़बड़ी का गुणा-भाग: जानें- मायावती और अखिलेश यादव के दावों का सच

EVM में गड़बड़ी का गुणा-भाग: जानें- मायावती और अखिलेश यादव के दावों का सच

बता दें कि यूपी में निकाय चुनाव में नगर निगम, नगर पालिका और नगर पंचायत के चुनाव होते हैं. जिसमें मेयर, अध्यक्ष और सभासद जनता सीधे चुनती है.

By: | Updated: 02 Dec 2017 08:52 PM
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नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश निकाय चुनाव में बीजेपी की बंपर जीत के बाद समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने ईवीएम को फिर कटघरे में खडा कर दिया है. बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने कहा है कि साल 2019 में बैलेट पेपर से चुनाव हो. वहीं, यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने दावा किया है कि जहां ईवीएम का इस्तेमाल हुआ वहां बीजेपी 46% सीट पर जीती और जहां बैलेट पेपर से मतदान हुआ, वहां बीजेपी को महज 15% सीट मिलीं.

क्या हैं यूपी निकाय चुनाव के ताजा नतीजे

यूपी के 75 ज़िलों में 652 निकाय हैं. इनमें 16 बड़े शहरों में नगर निगम है. 198 नगर पालिका परिषद है और 438 नगर पंचायत हैं. कुल जोड़ हुआ 652. 16 नगर निगम में से 14 में बीजेपी का मेयर बना और दो में बीएसपी के. इन्हीं 16 नगर निगम के 1300 वार्ड के लिए सभासद चुने गए. जिसमें 596 पर बीजेपी जीती यानि 46% सीट बीजेपी के पास आयीं. नगर निगम का पूरा मतदान इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन पर हुआ था.

इन्हीं नगर निगम के नतीजों को आधार बना कर अपने हिसाब से मायावती और अखिलेश यादव बीजेपी की जीत में ईवीएम की भूमिका पर संदेह जता रहे हैं,जबकि सच्चाई संदेह से परे है. इसके लिए आपको यूपी निकाय चुनाव के पूरे नतीजे ध्यान से समझने होंगें.

उत्तर प्रदेश में 198 नगर पालिका परिषद हैं, जिनमें 5261 वार्ड के लिए सभासद का चुनाव भी हुआ. जिसमें बीजेपी 922 कॉर्पोरेटर जीते यानी 18 फीसदी यहां बैलेट पेपर से मतदान हुआ. बता दें कि यूपी में निकाय चुनाव में नगर निगम, नगर पालिका और नगर पंचायत के चुनाव होते हैं. जिसमें मेयर, अध्यक्ष और सभासद जनता सीधे चुनती है.

क्या हैं नगर पंचायत के नतीजे

उत्तरप्रदेश में 438 नगर पंचायत हैं, जिसमें 5446 वार्ड हैं. जिसमें नगर पंचायत के अध्यक्ष और वार्ड के सभासद के लिए चुनाव हुआ था. इसमें बीजेपी के 664 वार्ड सदस्य जीते. यानि नगर पंचायत वार्ड सदस्य में बीजेपी की हिस्सेदारी 12 फीसदी रही.

अखिलेश यादव ने कहा है कि ईवीएम में बीजेपी की जीत का प्रतिशत 46 है, जबकि बैलेट में 15 है. बैलेट से मतदान वाले नगर पालिका और नगर पंचायत में बीजेपी की जीत का अलग अलग प्रतिशत क्रमश: 18 और 12 है. ऐसे में सवाल उठता है कि अखिलेश के आंकड़ों में 15% कहां से आया?

अखिलेश के दावे का सच क्या है?

दरअसल आखिलेश यादव के गणितज्ञों ने नगर पालिक परिषद के 5261 वार्ड और नगर पंचायत के 5446 वार्ड को जोड़ा, जो 10707 हुईं. फिर उन्होंने नगरपालिका में जीते बीजेपी के 922 और नगर पंचायत में जीते बीजेपी के 664 सदस्यों को आपस में जोड़ दिया, जो आंकड़ा 1586 बना. जो 10707 का 15% हुआ. यानि बैलेट से मतदान में जीते बीजेपी प्रत्याशियों का प्रतिशत.

उम्मीद है कि अभी हुए जोड़ घटाने को आप अच्छी तरह समझ गए होंगे और ये भी कि अखिलेश यादव का 15 प्रतिशत बैलेट और 46 फीसदी ईवीएम का आधार क्या है. लेकिन अब आप इस पूरे गणित में हुई चालाकी को समझिए.

बैलेट पेपर के जरिए केवल वार्ड सदस्यों का चुनाव नहीं हुआ है, बल्कि नगरपालिका परिषद के अध्यक्ष और नगर पंचायत अध्यक्ष का भी चुनाव हुआ है. 198 नगर पालिका अध्यक्ष में से बीजेपी 70 पर जीती, यानी बीजेपी ने 35 फीसदी सीटों पर कब्जा किया. और 438 नगर पंचायत अध्यक्ष में भी बीजेपी 100 सीटें जीती यानि 22 फीसदी सीटें बीजेपी के खाते में गई.

यहां साफ हो गया कि बैलेट मतदान में सदस्यों की छोटी जीत को दिखाया गया, लेकिन बैलेट से ही नगर पालिका और पंचायत के अध्यक्षों की बड़ी जीत को नहीं बताया गया. ऐसे में नतीजों को ईवीएम के नाम पर गुमराह करने की कोशिश बेनकाब हुई है.

जीत के नतीजों में निर्दलियों का बड़ा प्रतिशत है. नगर पालिका परिषद के 5261 वार्ड सदस्य में से 64.12% निर्दलीय जीते हैं, जबकि नगर पंचायत के 5446 वार्ड सदस्यों में 71.29% निर्दलीय जीते हैं.

मतलब साफ है कि नगर पालिका और नगर पंचायत में निर्दलीयों का प्रतिशत बहुत ज्यादा है न कि ईवीएम और बैलेट में बीजेपी की हार के अंतर का डंका बजाने वाले दलों का. एक बात और कि बैलेट मतदान के वोट कांग्रेस,एसपी और बीएसपी को न मिलकर निर्दलियों को ज्यादा मिले हैं.

2012 के निकाय चुनावों से 2017 के निकाय चुनाव की तुलना

साल 2012 में बैलेट मतदान के जरिए 388 नंगर पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में बीजेपी सिर्फ 35 सीटें ही जीत पाई थी. यानी सिर्फ नौ फीसदी. लेकिन पांच साल बाद बैलेट पेपर मतदान के जरिए हुए चुनाव में बीजेपी ने 438 में 100 सीटें जीतने में कामयाब रही. जीत का प्रतिशत 22 फीसदी रहा, यानि पिछली बार से 13% ज्यादा. यानि बैलेट पेपर मतदान में भी बीजेपी विजय प्रतिशत बढ़ा है.

इसी तरह 2012 में 12 शहरों में मेयर के चुनाव हुए, जिसमें 10 पर बीजेपी जीती और इस बार 16 में 14 मेयर बने. यानी 83 फीसदी मेयर पिछली बार बीजेपी के बने और इस बार 87 फीसदी हो गए. बैलेट से ईवीएम पर वोटिंग ट्रांसफर हुई तब भी बीजेपी का विजय प्रतिशत बढ़ा है. साल 2012 में 186 में 41 नगर पालिका परिषद अध्यक्ष की सीटें जीतीं. पिछली बार 22 फीसदी सीटें बीजेपी ने जीती और इस बार 198 में 70 सीटें यानी 35 फीसदी सीटें बीजेपी को मिली.

बड़ी तस्वीर ये है कि 2012 के मुकाबले बीजेपी की सीटें बढ़ी हैं. चाहे वोटिंग बैलेट से हो या ईवीएम से. अब शीशे की तरह साफ है कि बैलेट हो या ईवीएम बीजेपी का विजय प्रतिशत बढ़ा है.

मेरठ में वोटिंग के दौरान तस्लीम आरिफ नाम के शख्स ने वोट डाला और दावा किया कि बीएसपी की जगह वोट बीजेपी को जा रहा है. इस मामले में चुनाव आयोग ने ईवीएम में गड़बड़ी के दावे को खारिज कर दिया था.

खारिज हुआ था ईवीएम में गड़बड़ी का मुद्दा

आपको बता दें कि यूपी विधानसभा चुनाव के बाद ईवीएम में छेड़छाड़ बहुत बड़ा मुद्दा बना था. तब चुनाव आयोग ने ईवीएम को बिना छुए गड़बड़ करने की चुनौती सबको दी थी. तीन दिन का समय़ दिय़ा था. ज्यादातर दल तो गए नहीं और जो गए वो भी कुछ साबित नहीं कर पाए. नतीजा सत्ता के साथ विपक्षी के खिलाफ वाला ईवीएम में गड़बड़ी का मुद्दा तब भी खारिज हुआ था औऱ आज भी खारिज हो रहा है.

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