ABP स्पेशल: किसके हैं आंबेडकर?

By: | Last Updated: Monday, 13 April 2015 3:39 PM
Ambedkar: politics and his heritage

बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर देश के उन चुनिंदा नेताओं में शामिल हैं, जिनके योगदान को बयान करने के लिए काग़ज़ के टुकड़े कम पड़ जाएं, लेकिन इस बार उनके जन्मदिन को मनाने की होड़ लगी है. बीएसपी के अलावा कांग्रेस और बीजेपी खुद को आंबेडकर की विरासत के करीब जाने की जोरआज़माइश कर रही है.

 

बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर ने 1956 में अपना धर्म परिवर्तन किया. उन्होने हिंदू धर्म को छोड़कर बौद्ध धर्म को स्वीकार कर लिया. हिंदू धर्म को छोड़ने का फैसला अचानक नहीं था. 1935 में ही आंबेडकर ने सार्वजनिक तौर पर यह घोषणा की थी कि उनका जन्म भले ही हिंदू धर्म में हुआ है लेकिन उनकी मृत्यु एक हिंदू के रूप में नहीं होगी. आंबेडकर का मानना था कि हिंदू धर्म को छोड़ना धर्म परिवर्तन नहीं बल्कि गुलामी की जंजीरें तोड़ने जैसा है. इसीलिए वो हिंदू धर्म को छोड़कर बुद्ध की शरण में चले गए.

 

जिस नागपुर शहर में आंबेडकर ने हिंदू धर्म का त्याग किया, उसी नागपुर में मौजूद है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी RSS का मुख्यालय. RSS की पहचान एक हिंदू राष्ट्रवादी संगठन के तौर पर है. लेकिन वही RSS अब हिंदू धर्म पर आंबेडकर के विचारों को एक नये नजरिए से पेश करने में लगा है और इसके लिए मौका चुना गया है आंबेडकर जयंती का.

 

डॉक्टर आंबेडकर के 125वें जयंती वर्ष की शुरूआत के उपलक्ष्य में RSS के मुखपत्र पांचजन्य और organiser ने बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर पर एक विशेषांक निकाला है. पांचजन्य के इस विशेषांक में आंबेडकर के हिंदू धर्म छोड़ने की घटना को भी उनके राष्ट्रवाद का प्रमाण बताया गया है.

 

RSS के मुखपत्र पांचजन्य में छपे एक लेख में लिखा है, “आंबेडकर ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने के लिए जानबूझकर भारत की मिट्टी में पैदा हुआ बौद्ध धर्म स्वीकारणीय माना. इस्लाम और ईसाइयत का अनुगामित्व उन्होंने नहीं किया, कारण भारतीय भाव-विश्व से दगा करना उन्हें सर्वथैव नामंजूर था”.

 

संजय राउत का कहना है कि डॉक्टर साहेब को बहुत बड़ा ऑफर था कि आप इस धर्म में आइए और आप ये धर्म स्वीकारिए लेकिन हिंदुत्व के नजदीक एक बुद्ध धर्म है उनको स्वीकार लिया तो हमेशा उनकी विचारधारा हिंदुत्व की और रही है. क्योंकि वो हिंदु समाज से आए थे लेकिन उनकी जिंदगी में जो तुफान आ गया उससे उन्हें धर्मांतरण करना पड़ा ये कोई दलित एजेंडा की बात नहीं है और ये सच है कि डॉक्टर आम्बेडकर जी और हम सभी लोग एक साथ रहें और हमेशा उनका सम्मान किया है.

 

इतना ही नहीं, बावजूद इसके खुद आंबेडकर ने हिंदू धर्म को छोड़ दिया, इस पत्रिका में छपे एक लेख में डॉक्टर आंबेडकर को घर वापसी का समर्थक बताने की कोशिश भी की गई.

 

इस लेख में लिखा गया है कि बंटवारे के हालात में डॉक्टर आंबेडकर ने हिंदू समाज को चेतावनी देते हुए कहा, ‘मैं पाकिस्तान में फंसे वंचित समाज से कहना चाहता हूं कि उन्हें जो मिले उस मार्ग और साधन से उन्हें हिन्दुस्तान आ जाना चाहिए. दूसरी एक बात और कहना है कि पाकिस्तान और हैदराबाद की निजामी रियासत के मुसलमानों अथवा मुस्लिम लीग पर विश्वास रखने से वंचित समाज का नाश होगा. वंचित समाज में एक बुरी बात घर कर गई है कि वह यह मानने लगा है कि हिन्दू समाज अपना तिरस्कार करता है, इस कारण मुसलमान अपना मित्र है. पर यह आदत अत्यंत घातक है. जिन्हें जोर जबरदस्ती से पाकिस्तान या हैदराबाद में इस्लाम की दीक्षा दी गई है, उन्हें मैं यह आश्वासन देता हूं कि कन्वर्जन करने के पूर्व उन्हें जो व्यवहार मिलता था. उसी प्रकार की बंधुत्च की भावना का व्यवहार अपने धर्म में वापस लौटने पर मिलेगा.

 

तारीक अनवर का कहना है, “मैं समझता हूं कि इसमें कोई तर्क नहीं है और आम्बेडकर ने तो खुद अपना धर्म परिवर्तित कर लिया था अंत में और बौद्ध धर्म को अपना लिया था. तो इसलिए मैं नहीं समझता कि जो तर्क आरएसएस दे रहा है उसमें कोई सच्चाई है.”

 

दिग्विजय सिंह का कहना है, “कोई तो ऐसा उदाहरण बता दें… अगर घर वापसी इस प्रकार से थी तो जब उन्होंने लाखों सनातन धर्म के मानने वालों को बुद्ध धर्म में ले गए तो उसे वो क्या मानते हैं.”

 

RSS के इस आंबेडकर प्रेम की वजह क्या है?

 

पांचजन्य के इस विशेष अंक के हीरो आंबेडकर हैं. उन्हें युगदृष्टा और भारत भूमि का भक्त बताया गया है. RSS का अंग्रेजी मुखपत्र ORGNISER भी इस बार डॉक्टर आंबेडकर को ही समर्पित है. पांचजन्य और ORGANISER ने यह संग्रहणीय संस्करण डॉक्टर आंबेडकर के 125वें जयंती वर्ष की शुरूआत के उपलक्ष्य में निकाले हैं.

 

इससे पहले RSS की तरफ से ऐसे खास संस्करण दो ही बार निकाले गये हैं. एक बार RSS संस्थापक डॉक्टर हेडगेवार पर और दूसरी बार राम जन्मभूमि आंदोलन पर. इसलिये यह सवाल उठ रहा है कि RSS के इस आंबेडकर प्रेम की वजह क्या है?”

 

RSS के मुताबिक आंबेडकर हिंदू धर्म के विरोधी नहीं थे बल्कि उन्होंने हिंदू समाज को सुधारने की कोशिश की. हालांकि आजादी के बाद जब कानूनी मंत्री के तौर पर डॉक्टर आंबेडकर हिंदू कोड बिल लाना चाहते थे उस वक्त उनका सबसे ज्यादा विरोध हिंदूवादी संगठनों ने ही किया था. तब आंबेडकर को संविधान सभा में यह बयान देना पड़ा.

 

संविधान सभा की बैठक, 24 फरवरी 1949, नई दिल्ली. आम्बेडकर ने कहा, “अगर आप सभी हिन्दू संस्कृति और हिन्दू समाज की रक्षा करना चाहते है… उसे बचाना चाहते हैं तो उसमें जो खामियां हैं, उन्हें सुधारने में हिचकिचाइए मत. यह बिल उन हिस्सों का सुधार चाहता है जो बिगड़ गए है. इससे अधिक और कुछ नहीं है.”

 

हिंदू कोड बिल के मुद्दे पर आंबेडकर का विरोध करने वालों में न सिर्फ हिंदूवादी संगठन थे बल्कि जनसंघ के नेता श्यामाप्रसाद मुखर्जी भी थे. लेकिन अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसा हिंदूवादी संगठन आम्बेडकर के विचारों की तारीफ कर रहा है. इसीलिए RSS की मंशा पर सवाल उठ रहे हैं.

 

धारा 370 पर आम्बेडकर की राय?

 

RSS और बीजेपी के मुताबिक धारा 370 के मुद्दे पर भी आंबेडकर के विचार उनकी विचारधारा से मेल खाते थे. इसके पक्ष में आंबेडकर के उस बयान का हवाला दिया जाता है जो उन्होंने शेख अब्दुल्ला से तब कहा था, जब नेहरू के कहने पर शेख अब्दुल्ला धारा 370 का प्रस्ताव लेकर आंबेडकर के पास गये थे. जनसंघ के नेता बलराज मधोक के मुताबिक तब आंबेडकर ने शेख से कहा, “तुम चाहते हो कि भारत, कश्मीर की रक्षा करे. इसकी सारी जरूरतें पूरी करे लेकिन उसका कश्मीर पर कोई अधिकार न हो. मैं भारत का कानून मंत्री हूं, तुम्हारे प्रस्ताव को मानना देश के साथ विश्वासघात होगा. मैं इसके लिए तैयार नहीं हो सकता.”

 

RSS का कहना है कि आंबेडकर को लेकर उनका रुख नया या किसी रणनीति के तहत नहीं है बल्कि वो हमेशा से आंबेडकर और उनके विचारों को मानते रहे हैं.

 

आंबेडकर की विरासत पर नजर

 

हर साल 14 अप्रैल को आंबेडकर जयंती मनाई जाती है. अब तक खुद को आंबेडकर की विरासत का सबसे बड़ा दावेदार बताने वाली बीएसपी ही बड़े स्तर पर आंबेडकर जयंती मनाती थी. लेकिन इस बार हर राजनीतिक दल ने इस दिन को खास बना दिया है. RSS अगर आंबेडकर को युगद्रष्टा बता रहा है तो बीजेपी ने भी खास कार्यक्रमों का आयोजन किया है. कांग्रेस ने इस पूरे साल आंबेडकर से जुड़े कार्यक्रमों की घोषणा की है. आखिर क्या वजह है कि अचानक सभी राजनीतिक दलों के लिए आंबेडकर जयंती इतनी खास हो गयी है.

 

डॉक्टर भीमराव आंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्यप्रदेश के महू में हुआ था. उन्हें भारत के संविधान निर्माता के तौर पर जाना जाता है. वो भारत के पहले कानून मंत्री थे. यही नहीं वो एक बेहद काबिल अर्थशास्त्री भी थे. लेकिन उनकी एक और पहचान है, वो है दलितों के सबसे बड़े नेता की. उन्होंने पूरे जीवन दलितों के उत्थान के लिए संघर्ष किया. क्या राजनीतिक दल, आंबेडकर की इसी पहचान का फायदा उठाना चाहते हैं. RSS हो या बीजेपी या कांग्रेस– आखिर क्यों आंबेडकर जयंती के बहाने आंबेडकर की विरासत पर हक जताने की जंग सी शुरू हो गयी है.

 

हाथ में संविधान की एक कॉपी लिए बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर की यह मूर्ति भारत में जगह जगह पर देखी जा सकती है. हर बार 14 अप्रैल को राजनीतिक दलों के नेता बाबा साहेब आंबेडकर की ऐसी ही मूर्तियों या तस्वीरों पर फूल चढ़ाते और माला पहनाते देखे जाते हैं. लेकिन इस बार यह परंपरा सिर्फ रस्म अदायगी तक सीमित नही हैं. इस बार आंबेडकर जयंती मनाने के लिए देश के दो बड़े राजनीतिक दलों में होड़ सी मच गई है. आखिर क्यों…

 

भारत की कुल आबादी का करीब 16 फीसदी दलित हैं. चुनाव के समय कई जगहों पर जीत हार का फैसला दलित वोट बैंक पर निर्भर करता है. खास तौर से पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में. 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सभी 17 सीटों पर जीत हासिल की. इसका नतीजा था खुद को दलितों का रहनुमा बताने वाली मायावती का सफाया. क्या यही वजह है कि अब आंबेडकर जयंती के बहाने दलित वोट बैंक को अपनी तरफ खींचने की तैयारी हो रही है.

 

इस साल के अंत में बिहार में चुनाव हैं और 2017 में उत्तर प्रदेश में. बीजेपी के लिए ये दोनों ही राज्य काफी अहम है. और इन दोनों ही राज्यों में जीत के लिए जरूरी है दलितों के समर्थन की.

 

बिहार में दलित आबादी करीब 16 से 17 फीसदी है जबकि उत्तर प्रदेश में 21 फीसदी से ज्यादा दलित हैं. माना जा रहा है कि 14 अप्रैल यानी आंबेडकर जयंती के दिन पटना में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की रैली और कार्यकर्ता सम्मेलन का आयोजन उसी दलित वोट बैंक को लुभाने के लिए किया गया है.

 

बीजेपी को सवर्णों की पार्टी माना जाता है लेकिन 2014 के चुनाव से बीजेपी दलितों और पिछड़े वर्ग को भी अपने साथ जोड़ने की कवायद में लगी है. इसीलिए आंबेडकर जयंती के मौके पर बीजेपी बिहार में खिचड़ी भोज का आयोजन कर रही है. वहीं यूपी पर भी उसकी नजर है. इसीलिए इस दौरान बीजेपी राज्य के उन इलाकों में अपना सदस्यता अभियान तेज करेगी जहां दलितों की आबादी ज्यादा है.

 

उधर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं में भी आंबेडकर से जुड़े कार्यक्रमों का आयोजन हो रहा है. RSS के मुखपत्रों पांचजन्य और organizer ने जिस तरह डॉक्टर आंबेडकर पर विशेषांक निकाले हैं उससे साफ है कि RSS और बीजेपी आंबेडकर की विरासत पर अपना हक जताने के बहाने दलित वोट बैंक को अपने साथ जोड़ने की रणनीति बना चुके हैं.

 

कांशीराम और मायावती जैसे नेताओं ने अपनी राजनीति का आधार ही डॉक्टर आंबेडकर को बनाया. मायावती ने आंबेडकर के नाम पर स्मारकों की लाइन लगा दी. आंबेडकर जयंती को जश्न की तरह मनाने की परंपरा शुरू की. आंबेडकर के नाम पर खुद को दलितों का शुभचिंतक बताने की कोशिश की और उन्हें इसका फायदा भी मिला. लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव में यूपी में बीएसपी को एक भी सीट नहीं मिली. क्या यही वो वजह है कि अब बाकी राजनीतिक दलों को लग रह है कि आंबेडकर का नाम लेकर वो दलित वोटरों को अपनी तरफ खींच सकते हैं.

 

एक तरफ बीजेपी आंबेडकर जयंती पर बड़े बड़े कार्यक्रम कर रही है तो दूसरी तरफ कांग्रेस भी पीछे नहीं है. लोकसभा चुनाव के बाद से कई विधानसभा चुनावो में हार का सामना कर चुकी कांग्रेस अब आंबेडकर के बहाने अपनी राजनीतिक जमीन तलाशने की कोशिश कर रही है.

 

बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर के 125वीं जयंती वर्ष के समारोह के लिए कांग्रेस ने बाकायदा 21 सदस्यों की कमेटी बनाई है. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी खुद इस कमेटी की कमान संभाल रही है. मध्यप्रदेश में आंबेडकर के जन्म स्थल महू से शुरू होने वाले इस समारोह का अंत अगले साल 14 अप्रैल को नागपुर में वहीं होगा जहां आंबेडकर ने बौद्ध धर्म स्वीकार किया था.

 

इस दौरान कांग्रेस अलग-अलग जगहों पर सेमीनार, रैली और पदयात्राएं करेगी. इनके जरिए आंबेडकर के विचारों का प्रचार और प्रसार किया जाएगा. आखिर क्या वजह है कि लोकसभा चुनाव में हार के बाद से पस्त पड़ी कांग्रेस आंबेडकर जयंती को लेकर इतना सक्रिय हो गयी है.

 

कांग्रेस के लिए नई मुश्किलें

दशकों से नेहरू और गांधी के नाम पर राजनीति करती आ रही कांग्रेस के लिए बीजेपी ने नई मुश्किलें खड़ी कर दी हैं. पिछले साल सरदार पटेल के जन्मदिन पर बीजेपी ने जिस तरह के आयोजन किये उससे कांग्रेस को बचाव की मुद्रा में आना पड़ा. कांग्रेस ने खुद कभी पटेल का नाम उस तरह से नहीं लिया था जिस तरह से वो गांधी और नेहरू का लेती रही है. क्या इस बार आंबेडकर के मुद्दे पर भी कांग्रेस के साथ यही हो रहा है. क्या कांग्रेस को यह लग रहा है कि कहीं पटेल की तरह बीजेपी, आंबेडकर की विरासत पर भी अपना हक न जमा ले.

 

आम आदमी पार्टी का बागी गुट भी आंबेडकर जयंती के मौके पर चूकना नही चाहता. यह वही गुट है जो देशभर में आम आदमी पार्टी को फैलाने का पक्षधर है. क्या इसीलिए इसने अपने कार्यक्रम स्वराज संवाद को करने के लिए 14 अप्रैल का दिन चुना? जाहिर है कोई भी राजनीतिक दल इस बात को स्वीकार नहीं करता कि उनकी राजनीति वोटबैंक के आधार पर तय होती है. लेकिन इस बात को नकारा भी नहीं जा सकता कि आंबेडकर के नाम को सभी राजनीतिक दल अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करते हैं. क्या यह इतिहास में आंबेडकर की भूमिका से अन्याय करने जैसा नहीं है.

 

भारत के इतिहास में डॉक्टर भीम राव आंबेडकर की भूमिका को कोई नकार नहीं सकता. लेकिन आंबेडकर के जीवन काल में उन्हें वो स्थान नहीं मिला जिसके वो हकदार थे.

 

डॉक्टर भीम राव आंबेडकर उस दौर के सबसे पढ़े लिखे और जानकार नेताओं में से थे. वो अपने विचारों के पक्के थे. इसीलिए कई मुद्दों पर गांधी और नेहरू से आंबेडकर के मतभेद भी रहे. यहां तक कि आखिरी कुछ सालों में उन्होने कांग्रेस से किनारा कर लिया. यही वजह थी कि तब की राजनीति में आंबेडकर की विरासत का दावेदार कोई नहीं था. लेकिन वोटबैंक के इर्द गिर्द घूमने वाले चुनावी राजनीति ने धीरे धीरे आंबेडकर को एक प्रतीक बना दिया. पहले बीएसपी और अब कांग्रेस और बीजेपी, आंबेडकर के नाम का इस्तेमाल दलितों के वोट हासिल करने के लिए कर रहे हैं. क्या यह दलितों के साथ धोखा नहीं है?

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