ANALYSIS: राहुल के लिए 2015 कैसा रहा?

By: | Last Updated: Thursday, 31 December 2015 6:26 PM
ANALYSIS: rahul gandhi

नई दिल्ली: कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के लिए साल मिला जुला रहा . हालांकि शुरुआत काफी खराब रही . जब दिल्ली में उनकी पार्टी जीरो पर क्लीन बोल्ड हो गई . विदेश दौरे को लेकर भी वो विवादों में रहे . लेकिन राहुल ने पूरे साल बयानों का बल्ला थामे रखा . नतीजा हुआ कि साल के अंत में आते आते बिहार में चौका छक्का लगा दिया .

 

राहुल के लिए कैसा रहा साल ?

कांग्रेस पार्टी के स्टार बल्लेबाज के तौर पर राहुल गांधी राजनीति की पिच पर बैटिंग कर रहे थे. राहुल गांधी के सामने साल की शुरुआत में ही सबसे पहली चुनौती दिल्ली चुनाव की थी. टीम राहुल ने दिल्ली की लड़ाई को जीतने के लिए जमकर नेट प्रैक्टिस की. चुनाव प्रचार में अपनी ताकत झोंक दी लेकिन जब फाइनल मैच हुआ तो कांग्रेस दिल्ली में खाता भी नहीं खोल पाई. 70 विधानसभा सीटों वाली दिल्ली में 67 सीटें जीतकर केजरीवाल ने इतिहास रच दिया और राहुल बिना एक रन बनाए शून्य पर आउट हो गए.

 

लगातार 15 सालों तक दिल्ली की सत्ता अपने पास रखने वाली कांग्रेस और राहुल गांधी के लिए ये बहुत बड़ी हार थी. हार के बाद राहुल गांधी अचानक गायब हो गए. किसी को पता नहीं था कि राहुल कहां हैं ना तो परिवार ने कोई जवाब दिया ना ही पार्टी के पास इसकी कोई आधिकारिक जानकारी थी.

 

कांग्रेस पार्टी बिना अपने कप्तान के विरोधियों से लोहा लेती रही और अपने कप्तान के लौटने का इंतजार करती रही. फरवरी महीने में छुट्टी पर गए राहुल 59 दिनों बाद अप्रैल में वापस लौटे. अप्रैल में कांग्रेस मुख्यालय में दीवाली मनाई जाने लगी. क्योंकि राहुल गांधी अज्ञातवास के बाद वापस लौट आए थे.

 

59 दिनों बाद राहुल गांधी एक बार राजनीति की पिच पर बैटिंग के लिए उतरने वाले थे. मौका था भूमि अधिग्रहण बिल पर मोदी को घेरने का. राहुल पिच पर उतरे और आउट भी नहीं हुए.

 

राहुल क्रीज पर जमे हुए थे. राहुल को अपनी विरोधी टीम मोदी पर हमला करना था. सारे कयासों से उलट राहुल गांधी आक्रामक तेवर में बल्लेबाजी करते नजर आए.

पिछले 11 साल में राहुल गांधी सदन में जितना नहीं बोले उतना तो एक बार में ही बोल गए. राहुल गांधी के तेवर को देखकर पार्टी के नेता और कार्यकर्ता फूले नहीं समा रहे थे और विरोधी भी कम हैरान हो रहे थे ये सोचकर कि छुट्टी में ऐसी कौन सी घुट्टी पीकर आए हैं राहुल जो उनका कायाकल्प ही हो गया.

 

45 साल के राहुल गांधी आक्रामक हो चुके थे. वो कभी पंजाब की अनाजमंडी का दौरा करते नजर आए तो कभी ट्रेन की जनरल बोगी में सफर करते नजर आए. राहुल सिर्फ क्रीज पर जमे ही नहीं थे वो लगातार एक के बाद एक शॉट भी खेल रहे थे.

 

मोदी सरकार की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज पर आईपीएल घोटाले के आरोपी ललित मोदी की मदद के आरोप लगे तो राहुल गांधी सदन में दहाड़ते हुए नजर आए और अकेले मोर्चा संभाले रहे.

 

कांग्रेस ने कई महत्वपूर्ण बिलों को पास नहीं होने दिया. लेकिन राहुल के तमाम हमलों और कोशिशों के बीच सबसे बड़ी चुनौती था बिहार चुनाव. एक तरफ लालू-नीतीश और राहुल का महागठबंधन और दूसरी तरफ मोदी गठबंधन. दिल्ली में हार के बाद साल की शुरुआत को खराब हो चुकी थी अगर बिहार में मात खाते तो पूरा साल ही बर्बाद हो जाता लेकिन ऐसा हुआ नहीं बिहार में राहुल गांधी ने जीत का छक्का लगाया.

 

बिहार में कांग्रेस 41 सीटों पर चुनाव लड़ी थी जिसमें से उसने 27 सीटों पर जीत हासिल की. ये जीत बड़ी थी क्योंकि 2010 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को सिर्फ 4 सीटें मिली थीं. पिछली बार के मुकाबले कांग्रेस की सीटें 6 गुना बढ़ी.

 

राहुल गांधी रन पर रन ठोंके जा रहे थे. एक तरफ बिहार में जीतने की खुशी तो दूसरी तरफ मोदी का विजयरथ रोकने की. यहां तक तो सब ठीक था लेकिन साल के आखिर में दिसंबर महीने में राहुल गांधी को बाउंसर मिला जब राहुल और सोनिया गांधी को दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट में पेश होने का आदेश मिला.

 

दरअसल नेशनल हेरल्ड केस में सोनिया और राहुल समेत कांग्रेस के छह नेताओं पर गलत तरीके से नेशनल हेरल्ड अखबार की करीब 2 हजार करोड़ की संपत्ति हड़पने का आरोप है.

 

हालांकि राहुल और सोनिया गांधी को कोर्ट से बिना किसी शर्त के जमानत मिल गई थी. राहुल गांधी के पास खोने के लिए कुछ नहीं था लेकिन पाने के लिए कई मौके थे. 2015 ने राहुल को राजनीति के कई पाठ पढ़ा दिए. साल खत्म-खत्म होते राहुल दोबारा छुट्टी पर यूरोप रवाना हो गए लेकिन इस बार सबको बाकायदा बताकर पिछली बार की तरह बिना बताए नहीं.

आने वाले साल में नेशनल हेरल्ड का केस राहुल के लिए चुनौती बना रहेगा और इस बात का इंतजार भी रहेगा कि क्या राहुल गांधी 2016 में पार्टी के अध्यक्ष बनाए जाएंगे.

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