विश्लेषण: क्या 2015 में पेट्रोल और सस्ता होगा?

By: | Last Updated: Wednesday, 31 December 2014 7:03 AM

नई दिल्ली: साल 2014 की जुलाई में दिल्ली में एक लीटर पेट्रोल की कीमत थी करीब 73 रुपए और दिसंबर होते होते ये हो गई 61 रुपए. हो सकता है 2015 में पेट्रोल और सस्ता हो जाए. लेकिन ऐसा क्यों हो रहा है? पिछले कुछ सालों से पेट्रोल की कीमत में लगातार इजाफा हो रहा था, लेकिन अचानक ऐसा क्या हो गया कि पेट्रोल की कीमत इतनी तेजी से कम हो गई.

 

क्या नरेंद्र मोदी के पीएम बनने से अच्छे दिन आ गए हैं? नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है. कम से कम इसमें उनका कोई योगदान नहीं है. इसका जवाब अर्थशास्त्र में छिपा है. अर्थशास्त्र की भाषा में इसका जवाब आसान है- डिमांड कम, सप्लाई ज्यादा, इसलिए कीमत सस्ती. सवाल ये है कि क्या भारत में पेट्रोल की डिमांड कम होने से कीमत कम हुई है? जवाब है, नहीं. भारत जैसे विकासशील देश में तो उल्टे डिमांड बढ़ रही है. भारत में पेट्रोल सस्ता होने की बड़ी वजह है अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत कम होना. भारत अपनी पेट्रोल-डीजल की जरूरत अंतर्राष्ट्रीय बाजार से कच्चा तेल खरीद कर पूरी करता है. ऐसे में जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत कम हुई तो भारत में भी पेट्रोल की कीमत कम हो गई. भारत में भले ही पेट्रोल की कीमत को उस अनुपात में कम नहीं किया गया जितनी गिरावट कच्चे तेल की अंतर्राष्ट्रीय कीमत में आई.

 

2014 के जून महीने में अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 115 डॉलर प्रति बैरल थी जो साल खत्म होते-होते 59 डॉलर प्रति बैरल हो गई. यानि लगभग आधी. कई जानकारों का मानना है कि 2015 में कच्चे तेल की कीमत 50 डॉलर प्रति बैरल के नीचे भी जा सकती है. ऐसा क्यों हो रहा है, इसपर एक विस्तृत विश्लेषण की जरूरत है.

 

अमेरिका की भूमिका क्या है?

विश्लेषक औऱ अमेरिकी पत्रकार ब्रैड प्लूमर के मुताबिक अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत कम होने की वजह जानने के लिए हमें पहले 10 साल पीछे जाना पड़ेगा. उस वक्त तेल की कीमत बढ़ रही थी क्योंकि पूरी दुनिया में तेजी से डिमांड बढ़ रही थी. खास तौर पर चीन में. इस डिमांड को पूरा करने के लिए जितने तेल उत्पादन की जरूरत थी उतना उत्पादन नहीं हो रहा था. इस वजह से कीमत बढ़ती चली गई. 2011 से 2014 के बीच कच्चे तेल की कीमत लगातार 100 डॉलर प्रति बैरल के आस-पास मंडराती रही.

 

जैसे जैसे कच्चे तेल की कीमत बढ़ती गई, अमेरिका की कई पेट्रोलियम कंपनियों को मुश्किल जगहों से भी कच्चा तेल निकालना मुनाफे का धंधा दिखने लगा. अमेरिका में तेल कंपनयों ने फ्रैकिंग और हॉराईजोंटल ड्रिलिंग जैसी तकनीकों के सहारे शेल फॉर्मेशन से कच्चा तेल निकालना शुरू कर दिया. अब ये शेल फॉर्मेशन क्या है? शेल का मतलब होता है चट्टान. शेल फॉर्मेशन चट्टानों की ऐसी स्थिति है जहां गैस के साथ-साथ कच्चा तेल भी होता है. ये चट्टानें धरती के भीतर करीब 3 हजार मीटर की गहराई में पाई जाती है. इन चट्टानों की खुदाई में गैस के साथ कभी-कभी कच्चा तेल भी निकलता है. हालांकि ऐसी चट्टानों से कच्चा तेल निकालने की लागत थोड़ी ज्यादा होती है.

 

अमेरिका के नॉर्थ डकोटा और टेक्सस में शेल फॉर्मेशन से कच्चा तेल निकाला जाने लगा. कनाडा में भी तेल कंपनियों ने अलबर्टा के तेल कुओं को भाप के जरिए गर्म कर, इस्तेमाल में आने वाला कच्चा तेल निकालना शुरू कर दिया. ऐसा होने से कच्चे तेल के उत्पादन में उछाल आया. 2008 से अमेरिका हर दिन 40 लाख बैरल कच्चे तेल का उत्पादन कर रहा है. पूरी दुनिया में हर दिन 7.5 करोड़ बैरल कच्चा तेल निकाला जाता है, ऐसे में अमेरिका में निकाला जानेवाला कच्चे तेल का आंकड़ा काफी अहम कहा जा सकता है. सवाल ये है कि अमेरिका में अगर 2008 से तेल का उत्पादन बढ़ रहा था तो फिर कच्चे तेल की कीमत अब जाकर क्यों कम हुई. पहले कम क्यों नहीं हुई?

 

डिमांड कम क्यों हुई?

ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि इसी दौरान दुनिया के कई तेल निकालनेवाले देशों में राजनीतिक और सामाजिक संकट चल रहा था. लीबिया में गृह युद्ध चल रहा था. इराक में भी हालात खराब थे. अमेरिका और यूरोपीयन यूनियन ने ईरान पर प्रतिबंध लगा दिया जिसके उनके निर्यात पर असर पड़ा. इस संकट की वजह से अंतर्राष्ट्रीय बाजार में करीब 30 लाख बैरल कच्चे तेल की सप्लाई कम हो गई.

 

लेकिन 2014 के मध्य तक हालात बदलने लगे थे. कई संकट सुलझने लगे थे. जुलाई 2014 में लीबिया में विद्रोहियों ने निर्यात के दो अहम टर्मिनल्स एस सिद्र और रास लानुफ को खोल दिया जो करीब साल भर से बंद पड़े थे. इससे लीबिया का निर्यात अचानक बढ़ गया.

 

इससे भी अहम है कि एशिया और यूरोप में तेल की डिमांड कमजोर पड़ने लगी. खास तौर पर चीन और जर्मनी में मंदी के बादल छा गए. कह सकते हैं कि दुनिया के कई हिस्सों में कच्चे तेल की डिमांड बढ़नी कम हो गई. एक समय दुनिया में सबसे ज्यादा तेल का इस्तेमाल करनेवाले देश अमेरिका में भी मंदी के बाद तेल के औद्योगिक इस्तेमाल में कटौती की गई. फ्यूल एफिशिएंट कारों के इस्तेमाल की वजह से पेट्रोल की खपत भी ज्यादा नहीं बढ़ी. इसी दौरान इंडोनेशिया और ईरान जैसे देशों ने भी अपने यहां ईंधन पर सब्सिडी कम कर दी. इससे वहां तेल की खपत में थोड़ी कमी आ गई.

 

ऐसे में कमजोर डिमांड और बढ़ती सप्लाई की वजह से जून से कच्चे तेल की कीमत गिरने लगी. जून में 115 डॉलर प्रति बैरल से कीमत गिरते हुए दिसंबर में कीमत 60 डॉलर प्रति बैरल से भी नीचे पहुंच गई.

 

OPEC का चौंकाने वाला रुख

ऑर्गेनाइजेशन ऑफ पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज यानि ओपेक समूह दुनिया में 40 फीसदी तेल का उत्पादन करता है. इतिहास में इस समूह ने कच्चे तेल की कीमत पर प्रभाव डालने के लिए कई बार उत्पादन बढ़ाया और कम किया है.

 

27 नवंबर को विएना में हुई बैठक में ओपेक देशों में जमकर बहस हुई कि कच्चे तेल की गिरती कीमत पर क्या रुख अपनाया जाए. वेनेजुएला और ईरान जैसे देश चाहते थे कि ओपेक समूह ( खास तौर पर सउदी अरब) तेल के उत्पादन में कटौती करे ताकि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कीमत को बढ़ाया जा सके. इन देशों को तेल की ऊंची कीमत की जरूरत है क्योंकि इन देशों की अर्थव्यवस्था तेल निर्यात पर निर्भर है. अगर निर्यात से इनकी आमदनी घटती रही तो इन देशों को अपना खर्च उठाना मुश्किल पड़ जाएगा.

 

इस बहस के दूसरे छोर पर है सउदी अरब. सउदी अरब दुनिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश है. वो अपना उत्पादन घटाने को तैयार नहीं है. वो कच्चे तेल की गिरती कीमत से होने वाले घाटे को झेलने के लिए तैयार है. ऐसा क्यों? सउदी अरब को 1980 का वो दशक याद है जब तेल की कीमत गिर रही थी और उन्होंने तेल की कीमत बढ़ाने के लिए उत्पादन में कटौती की थी. कच्चे तेल की कीमत में तो गिरावट आई नहीं लेकिन सउदी अरब का मार्केट शेयर कम हो गया. इससे उनकी साख को धक्का लगा. मौजूदा सउदी अरब सरकार ने ऐसे संकेत दिए हैं कि वो फिलहाल कुछ समय के लिए कच्चे तेल की गिरती कीमत को बर्दाश्त कर सकता है. सउदी अरब के पास भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा का भंडार है. ऐसे में वो कुछ समय तक आराम से घाटा सह सकता है.

 

अंत में विएना में हुई बैठक में ओपेक देश आपस में सहमति नहीं बना पाए और उत्पादन में कोई बदलाव नहीं किया गया. इसका असर ये हुआ कि कच्चे तेल की कीमत और गिर गई. हालत ये है कि अब ये 60 डॉलर प्रति बैरल के नीचे पहुंच गई है. हालात कुछ ऐसे बन गए हैं कि ओपेक समूह और अमेरिका में कीमत को लेकर जंग छिड़ी हुई है. इसका मतलब ये है कि सउदी अरब और कुवैत जैसी जगहों से तेल निकालना सस्ता है, वहीं अमेरिका के नॉर्थ डकोटा और टेक्सस जैसी जगहों से शेल फॉर्मेशन से तेल निकालना काफी महंगा. अगर अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत लगातार गिरती रही तो अमेरिकी कंपनियों के लिए व्यापार करना मुश्किल हो जाएगा. हो सकता है कई कंपनियां बंद भी हो जाएं. इस तरह से कच्चे तेल की कीमत में स्थिरता आ सकती है. कम से कम ओपेक समूह तो ऐसी ही उम्मीद कर रहा है.

 

किन देशों के लिए बुरी खबर?

अमेरिका के लिए ये बुरी खबर है क्योंकि शेल फॉर्मेशन से कच्चा तेल निकालनेवाली कंपनियों की लागत ज्यादा पड़ रही है जबकि बाजार में इससे सस्ते दर पर तेल निकाला जा रहा है. एक अनुमान के मुताबिक अगर कच्चे तेल की कीमत 60 डॉलर प्रति बैरल से नीचे रहती है तो कई कंपनियों को अपने उत्पादन में कमी करनी होगी, खर्च घटाने होंगे. हो सकता है कई कंपनियों के बंद होने की नौबत आ जाए. ऐसे में नौकरियां जाने का खतरा होगा. अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर इसका असर पड़ना लाजमी है.

 

रूस की आर्थिक स्थिति इस वक्त काफी चर्चा में है. रूस की अर्थव्यवस्था बड़े पैमाने पर तेल और गैस उत्पादन पर टिकी है. लगभग 45 फीसदी सरकारी खर्च तेल की कमाई से पूरा होता है. ऐसे में कच्चे तेल की कीमत गिरने से उन्हें बड़ा झटका लगा है. अर्थशास्त्रियों का मानना है कि अगर कच्चे तेल की कीमत 60 डॉलर प्रति बैरल से नीचे रहती है तो 2015 में रूस की जीडीपी 4.5% तक कम हो सकती है. कच्चे तेल की गिरती कीमत की वजह से रूस की मुद्रा रूबल में भारी गिरावट आई है. महंगाई बढ़ गई है क्योंकि इंपोर्ट अचानक बहुत महंगा हो गया है. रूस में अफरा तफरी का माहौल है.

 

ईरान में कई साल से सुस्त पड़ी अर्थव्यवस्था में कुछ समय पहले ही थोड़ी तेजी आनी शुरु हुई थी. ऐसे में कच्चे तेल का सस्ता होना उनके लिए बुरी खबर है. चूंकि पहले से ही उनपर पर कई पश्चिमी देशों ने आर्थिक पाबंदी लगा रखी है, ऐसे में कच्चे तेल की गिरती कीमत फिर उन्हें अंधेरे में ढकेल सकती है. अगर ईरान की सरकार को अपने खर्च अपने दम पर उठाने है तो उन्हें कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर चाहिए.

 

एक और अहम तेल उत्पादक देश वेनेजुएला को खतरा है कि अगर कच्चे तेल की कीमत इसी तरह गिरती रही तो उनकी अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा जाएगी. वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था कच्चे तेल के निर्यात पर ही टिकी है. इस साल उनकी जीडीपी 3 फीसदी तक कम हो सकती है.

 

दुनिया के सबसे बड़ा तेल उत्पादक सउदी अरब को फिलहाल तो कोई असर नहीं होगा. कच्चे तेल की गिरती कीमत से उनको जो घाटा होगा उसे वो अपने विशाल विदेशी मुद्रा भंडार से पूरा कर लेंगे. उनके पास करीब 740 बिलियन डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है. तुलना के लिए बताना जरूरी है कि भारत के पास करीब 320 बिलियन डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है. यानि सउदी अरब के आधे से भी कम. लेकिन सउदी अरब इस रुख पर हमेशा कायम नहीं रह सकता.

 

भारत के लिए अच्छी खबर

अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का सस्ता होना कम से कम भारत के लिए अच्छी खबर है. भारत अपनी कुल जरूरत का 85% कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए भारत की विदेशी मुद्रा का ज्यादातर खर्च कच्चा तेल खरीदने में ही होता है. ऐसे में भारत के आयात खर्च में भारी कटौती आ सकती है. चालू खाते का घाटा कम हो सकता है. अगर कच्चे तेल की कीमत में लगातार कटौती होती रही तो पेट्रोल-डीजल की कीमत और कम हो सकती है. पिछले 6 महीने में पेट्रोल की कीमत में कटौती की सबसे बड़ी वजह यही है. दिल्ली में 73 रु./लीटर से पेट्रोल 61 रु./लीटर हो गया है. हालांकि बहुत लंबे समय तक ऐसा नहीं होगा. दूसरा अगर दुनिया में मंदी आती है तो इसका असर भारत पर भी पड़ेगा. लेकिन शॉर्ट टर्म में भारत को कच्चे तेल की कीमत कम होने का फायदा मिलेगा.

 

भारत के लिए मौका है कि सस्ती कीमत का कच्चा तेल भारी मात्रा में स्टोर कर रख ले ताकि जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़े तो स्थानीय बाजार में अचानक झटके से बचा जा सके. हालांकि भारत में स्ट्रैटिजिक ऑयल रिजर्व के कुएं अभी तक बनकर तैयार नहीं हुए हैं. ऐसे में अतिरिक्त कच्चा तेल स्टोर करने की कोई व्यवस्था नहीं है.

 

मोदी सरकार की किस्मत पहले साल में अच्छी रही है. कच्चे तेल की कीमत कम होने से मोदी सरकार बड़ी वित्तीय परेशानी से अब तक बची रही है.  मनमोहन सिंह इतने खुशनसीब नहीं थे. वो कहते रहे कि देश में महंगाई और पेट्रोल-डीजल की कीमत में बढ़ोतरी की वजह अंतर्राष्ट्रीय हालात हैं लेकिन मास-मीडिया में उनके इस तर्क को ठीक से जगह नहीं मिल पाई. फिलहाल नरेंद्र मोदी सरकार के पास अच्छा मौका है कि वो इस स्थिति का फायदा उठाएं और तुरंत कच्चे तेल के स्टोरेज की व्यवस्था करें. किस्मत हमेशा अच्छी नहीं बनी रहती.

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Web Title: Analysis: Will Petrol be more cheaper in 2015?
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