ब्लॉग: 'घर वापसी' से किसका घर भर रहा है?

By: | Last Updated: Friday, 12 December 2014 3:55 AM
Anand Pradhan Blog on ‘Ghar Wapsi’

Dr. Anand Pradhan, Associate Professor, Journalism, IIMC

नई दिल्ली: ‘जब मिशनरियां अफ्रीका आईं तो उनके पास बाइबिल और हमारे पास जमीन थी. उन्होंने कहा कि ‘आओ, प्रार्थना करें.’ हमने आँखें बंद कर लीं. जब हमारी आँखें खुलीं तो हमारे पास बाइबिल थी और उनके पास जमीन.’

 

एक लोकप्रिय अफ़्रीकी कहावत जो सबसे पहले पूर्व कीनियाई राष्ट्रपति जोमो केन्याटा और बाद में नोबल पुरस्कार विजेता पादरी डेसमंड टूटू के हवाले से प्रचारित हुई.

 

संघ परिवार के अनुषांगिक हिन्दुत्ववादी संगठनों की अगुवाई में आगरा में 57 गरीब मुस्लिम परिवारों के धर्मांतरण या ‘घर वापसी’ को लेकर संसद से सड़क तक मचे हंगामे और विवाद के बीच अनायास ही यह अफ्रीकी कहन याद गई. मार्क्स ने धर्म को जनता की अफीम यूँ ही नहीं कहा था.

 

उदाहरण के लिए ताजा मामले को ही लीजिए. हिंदुत्व की धर्मध्वजा उठाए संघ परिवार के बजरंग दल और विहिप जैसे हिन्दुत्वादी संगठनों के शुद्धिकरण अभियान के धर्मरक्षकों और दूसरी ओर धर्मांतरण के शोरशराबे के बाद नींद से जगे मुस्लिम धर्मगुरुओं, सेक्युलर राजनेताओं, पुलिस और पत्रकारों से घिरे आगरा की वेद नगर झुग्गी बस्ती के बेहद गरीब मुस्लिम परिवारों को ‘घर वापसी’-‘घर वापसी’ के खेल से क्या मिला?    

    

आखिर धर्मरक्षक वेड नगर की उस झुग्गी में उन 57 गरीब मुस्लिम परिवारों के पास यही कहते हुए तो आये थे कि ‘घर वापसी’ से उनकी जिन्दगी बदल जायेगी. उन गरीबों के लिए उसका मतलब था- एक अदद बीपीएल, राशन कार्ड और आधार कार्ड! यह भारतीय राज्य और लोकतंत्र की नाकामी है कि उन गरीबों के पास राशन कार्ड तक नहीं है.

लेकिन इस नाकामी की कीमत उन गरीब बंगाली मुसलमान परिवारों को कई तरह से चुकानी पड़ती है. वे जानते हैं कि ‘बांग्लादेशी भगाओ’ मुहिम के नामपर उनकी नागरिकता पर उठाए जानेवाले सवालों और भारी असुरक्षा और इस शहर से उस शहर खदेड़े जाने की त्रासदी से मुक्ति धर्म से नहीं बल्कि बीपीएल, राशन और आधार कार्ड से मिल सकती है. इस कारण उनके लिए यह उनके धर्म और रोजी-रोटी से भी ज्यादा जरूरी है.

 

सचमुच, उनके लिए एक अदद राशन कार्ड और आधार कार्ड से बड़ा और कोई प्रलोभन नहीं हो सकता था. लेकिन राशन और आधार कार्ड की उम्मीद में ‘घर वापसी’ करनेवाले इन बेहद गरीब मुस्लिम परिवारों की रोजमर्रा की जिल्लत और तकलीफों से भरी जिंदगी में इससे क्या फर्क पड़ा? ‘घर वापसी’ के बाद भी उनका घर नहीं बदला है.

 

वे शहर की सबसे गन्दी झुग्गी बस्ती में पहले की तरह ही दो जून की रोटी जुटाने की जद्दोजहद में जुटे हैं. ‘घर वापसी’ के बाद भी उन्हें कूड़ा बीनने और कबाड़ इकठ्ठा करने की निहायत ही असुरक्षित और अमानवीय जिंदगी से मुक्ति नहीं मिलने वाली है. उलटे उनकी हालात त्रिशंकु जैसी हो गई है. खबर आ रही है कि ‘घर वापसी’ के बाद उनके घरों को घेर लेनेवाले मुस्लिम धर्मगुरुओं, राजनेताओं और पुलिस के डर से घबराकर वे घर छोड़कर भाग रहे हैं. वे करें भी क्या?

 

हिंदुत्व के धर्मरक्षक ‘घर वापसी’ के लिए शुद्धिकरण का गंगाजल छिड़ककर अलीगढ़ और दूसरे शहरों की ओर निकल गए हैं. वे यह बताकर नहीं गए हैं कि हिंदू धर्म में ‘घर वापसी’ के बाद उनकी जाति और जगह क्या होगी? उन्हें कूड़ा ही बीनते रहना है या कुछ और करना है? यह भी कि अगली बार बांग्लादेशी भगाओ आन्दोलन के निशाने पर वे नहीं होंगे न?

 

दूसरी ओर, उनकी दोबारा ‘घर बहाली’ करने पहुंचे मौलाना उन्हें चेता रहे हैं कि उनपर यह विपदा इसलिए आयद हुई है क्योंकि वे अल्लाह से दूर हो गए हैं और उन्हें काफिरों की तरह कपडे पहनने के बजाय दाढ़ी बढ़ानी चाहिए, अपनी महिलाओं को कुरआन पढ़ने और बुर्का पहनने के लिए कहना चाहिए. गोया यह सब करने से उनकी असली विपदा गरीबी ख़त्म हो जाएगी.

   

लेकिन उनके बीपीएल, राशन और आधार कार्ड के बारे में न तो ‘घर वापसी’ वाले धर्मरक्षक बात कर रहे हैं और न ही ‘घर बहाली’ के लिए शर्तें लादनेवाले मौलाना इसको लेकर चिंतित हैं. सेकुलर राजनेताओं के एजेंडे पर भी इन गरीबों के लिए राशन और आधार कार्ड का मुद्दा कहीं नहीं है. एक मायने में यह सेक्युलर राजनीति की दरिद्रता का सबूत भी है.

 

मीडिया की भी दिलचस्पी तब तक ही है जब तक इस मुद्दे पर राजनीति गर्म है और धर्मरक्षकों की धमाचौकड़ी जारी है. अन्यथा डाउन मार्किट कबाड़ी और कूड़ा बीननेवालों को कौन पूछता है?

सच यह है कि इन गरीबों की गरीबी ही उनका असली धर्म है जिससे निकलना चाहकर भी वे निकल नहीं सकते हैं, चाहे इस हिंदू धर्म में रहें या इस्लाम धर्म में या फिर ‘घर वापसी’ करें या ‘घर बहाली’! आखिर इससे बड़ी विडम्बना क्या हो सकती है कि जिन गरीब मुसलमान परिवारों की कथित रूप ‘घर वापसी’ करवाई गई है, उनका वास्तव में ‘घर’ जैसा कोई घर नहीं है!

 

लेकिन वे अकेले नहीं हैं. देश में उन जैसे करोड़ों बेघर हैं. उनमें लाखों बेघर परिवार हर रात खुले आसमान के नीचे फुटपाथ पर सोने के लिए मजबूर हैं या जानवरों से भी बदतर हालत में झुग्गियों में सर छुपाने के लिए बाध्य हैं. उनमें सबसे ज्यादा हिंदू धर्म में ही हैं. लेकिन बजरंग दल और विहिप शायद ही उधर झाँकने आते हैं. उनकी दिलचस्पी ‘घर’ में नहीं, ‘घर वापसी’में है. आखिर क्यों? इसके लिए ‘घर वापसी’ की राजनीति को समझने की जरूरत है.

 

साफ़ है कि यह धार्मिक से ज्यादा राजनीतिक अभियान है. यहाँ राजनीति और धर्म एक-दूसरे में एक घुलमिल गए हैं जिसमें राजनीति, धर्म का इस्तेमाल अपने राजनीतिक मकसद को पूरा करने के लिए कर रही है. उसकी रणनीति धार्मिक सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के आधार पर बनी राजनीतिक जमीन को फैलाना और टिकाऊ बनाना है. यह गोलबंदी सत्ता में टिके रहने के लिए जरूरी है.

 

असल में, हर राजनीति किसी न किसी वर्ग या वर्गीय समूहों के हितों की अभिव्यक्ति है. इस अर्थ में, ‘घर वापसी’ की राजनीति के पीछे कौन वर्ग हैं? इस राजनीति की मलाई कौन काट रहा है? क्या यह सच नहीं है कि इस राजनीति के असली लाभार्थी ‘घर वापसी’ करनेवाले गरीब मुसलमान या घर में हजारों साल से उपेक्षित पड़े गरीब, दलित, पिछड़े, आदिवासी हिंदू नहीं बल्कि बड़ी देशी-विदेशी पूंजी, कार्पोरेट्स, बड़े व्यापारियों के अलावा उच्च और मध्यम वर्ग का एक हिस्सा, बड़े भूस्वामी और कुलक हैं.

 

इस खेल को समझने के लिए यह देखना होगा कि जब ‘800 सालों के बाद’ हिंदुत्व की धर्म ध्वजा लहरा रही है, तब उसके नीचे क्या हो रहा है?

 

क्या उनको अंदाज़ा है कि पिछले कुछ सप्ताहों से लव जिहाद, रामजादे बनाम हरामजादे, राष्ट्रीय पुस्तक गीता, धर्मांतरण, संस्कृत बनाम जर्मन जैसे विवादों से उन्हें क्या मिला और बंद आँखों और सुन्न कानों के पीछे वे कहाँ, कैसे और क्या गवां रहे हैं? क्या लोगों को पता है कि उसके नीचे जल-जंगल-जमीन-पर्यावरण-खनिजों और लोगों के हक़-हुकूक को लेकर क्या फैसले हो रहे हैं?

 

यहां ध्यान रखने की जरूरत है कि आँख खुलने पर आपके हाथ में ‘राष्ट्रीय पुस्तक’ गीता और उनके हाथ में जमीन और सारी मलाई न हो?

 

(लेखक भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली में एसोसिएट प्रोफ़ेसर हैं. यह लेखक के निजी विचार हैं)

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