'सरकार' को छोटे सरकार की जरूरत है !

By: | Last Updated: Wednesday, 24 June 2015 11:06 AM

करीब बीस साल तक अनंत सिंह अंडरग्राउंड थे. इलाके के लोगों के लिए अनंत सिंह आसानी से उपलब्ध होते थे. लेकिन फरारी के दिनों में पुलिस उन तक कभी पहुंच नहीं पाई. अनंत सिंह ने लालू-राबड़ी राज में सरेंडर किया था. लेकिन आज की तारीख में अनंत सिंह नीतीश कुमार के खास लोगों में शामिल हैं. नीतीश के खास होने के कारण कई हैं. अनंत सिंह जिस इलाके से विधायक हैं वहां उनकी छवि रॉबिन हुड वाली है. बाढ़, मोकामा के इलाके में अनंत सिंह को लोग छोटे सरकार के नाम से जानते और पहचानते हैं. छोटे सरकार इसलिए क्योंकि अनंत सिंह के बड़े भाई दिलीप सिंह भी मोकामा से विधायक हुआ करते थे. दिलीप सिंह के जाने के बाद अनंत सिंह उनके सियासी वारिस बने.

 

2004 में बाढ से लोकसभा चुनाव नीतीश कुमार हार गए थे. माना गया कि उस वक्त भूमिहारों ने नीतीश का साथ नहीं दिया था और वो लोकसभा का चुनाव हार गये थे. इस हार के बाद ही नीतीश ने अनंत सिंह को गले लगाया और 2005 में मोकामा से अपनी पार्टी का टिकट देकर विधायक बनवाया. अनंत को नीतीश के करीब लाने में ललन सिंह का अहम रोल रहा है. अनंत सिंह 2005 से लगातार विधायक हैं. हर दो-चार महीने पर अनंत सिंह की खबर राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियां जरूर बनती है.

 

2006 में एक निजी समारोह के दौरान एके 47 लेकर लहराने की तस्वीर जब सामने आई तो सवाल उठे कि ऐसे लोगों को साथ लेकर नीतीश बिहार में सुशासन कैसे लाएंगे. लेकिन नीतीश ने अनंत सिंह पर कोई सवाल नहीं किया. 2007 में पत्रकार को बंधक बनाने और पिटाई के मामले में भी सरकार की किरकिरी हुई. लेकिन अनंत सिंह का कुछ नहीं हुआ. गले में अजगर लपेट कर अनंत सिंह वन्य जीव वालों के निशाने पर आए जरूर लेकिन फर्क नहीं पड़ा. पिछले दिनों एक बिल्डर से रंगदारी मांगने का आरोप भी लगा. लेकिन इनके राजनीतिक सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ा.

 

पिछले साल राज्य की मंत्री परवीन अमानुल्लाह ने जमीन हड़पने की शिकायत नीतीश कुमार से की. लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. उल्टे परवीन को ही पार्टी और मंत्री का पद छोड़ना पड़ा. विवादों से मानो अनंत सिंह का चोली दामन का रिश्ता है. पटना में बन रहे मॉल को लेकर भी सवाल उठाये जाते रहे हैं.

 

अनंत सिंह भी उसी इलाके के रहने वाले हैं जिस इलाके के रहने वाले नीतीश कुमार हैं. नब्बे के दशक में गंगा के दियारा वाले इलाके में अनंत सिंह की समानांतर सरकार चलती थी. तब अनंत के बड़े भाई दिलीप सिंह लालू-राबड़ी की सरकार में मंत्री हुआ करते थे. अनंत पर दर्जन भर मुकदमे दर्ज थे और वो अंडरग्राउंड थे. करीब से जानने वाले बताते हैं कि गंगा के दियारा वाले इलाके में तब अनंत सिंह अपने लश्कर के साथ घोड़े पर चलते थे. आगे आगे अनंत सिंह और पीछे पीछे घोड़ों पर सवार अनंत की अपनी सेना. इलाके में लोग पुलिस के पास नहीं बल्कि इस छोटे सरकार के पास अपनी समस्या लेकर पहुंचते थे. नाम अनंत सिंह का और राजनीति पर राज करते थे दिलीप सिंह. 2000 में मोकामा से सूरजभान विधायक बने थे. इसके बाद अनंत सिंह के भाई दिलीप सिंह विधान परिषद के सदस्य बन गये. 2004 में सूरजभान सांसद बन गये. और 2005 में जो चुनाव हुआ उसमें अनंत सिंह ने सूरजभान के रिश्तेदार को हराकर सीट पर कब्जा कर लिया. तब से अनंत सिंह विधायक हैं.

 

अनंत सिंह पर जो ज्यादातर केस दर्ज हैं वो अस्सी-नब्बे के दशक के हैं. तब अनंत सिंह का ठिकाना दियारा में होता था. कहा जाता है कि इस इलाके में राजपूत और भूमिहारों के बीच खूनी जंग की शुरुआत तब हुई थी जब अनंत सिंह के रिश्तेदार की हत्या हुई थी. तब से इस इलाके में कई गुट बने. भूमिहारों में भी कई गुट हैं. लेकिन सबसे ताकतवर अनंत सिंह का है.

 

2007 में अनंत सिंह ने सोनपुर मेले में लालू का घोड़ा बादल खरीदा था. लालू के समर्थक आरोप लगाते हैं कि अनंत सिंह ने नाम बदलकर उनका घोड़ा खरीदा था. इस मेले में जब अनंत सिंह ने अपने घोड़े की सवारी की तो घोड़े ने जमीन पर पटक दिया. आज भी जब कोई घोड़े से गिरता है तो टीवी पर घोड़े से गिरने की अनंत सिंह सिंह तस्वीर साथ में जरुर दिखाई जाती है.

 

ताजा विवाद में अनंत सिंह विरोधियों के निशाने पर इसलिए भी हैं क्योंकि बिहार में यादवों का नेता बनने की होड़ मची है. पप्पू यादव खुद को यादवों का सबसे बड़ा रहनुमा बताकर इस मामले में नीतीश के पीछे पड़े हैं. तो मजबूरी में ही सही लालू की पार्टी भी जाति के बहाने अनंत सिंह की गिरफ्तारी की मांग कर रही है. लेकिन ठीक चुनाव से पहले लगता नहीं कि अनंत सिंह के खिलाफ किसी तरह की बड़ी कार्रवाई करने की हिम्मत नीतीश जुटा पाएंगे.

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Web Title: anant singh
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