'सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई छोड़ ISIS गया था मैं' जानिए आरीब मजीद ने पूछताछ में क्या कुछ बोला

By: | Last Updated: Sunday, 30 November 2014 3:08 PM
AREEB MAJID TALKS ABOIUT ISIS JOURNEY

नई दिल्ली: इराक का सुन्नी चरमपंथी आतंकी संगठन ISIS जिसने अपनी दहशतगर्दी से पूरी दुनिया को हिला रखा है. निर्दोष लोगों को बेहरमी से मौत के घाट उतारने वाले आतंकी संगठन ISIS के गढ़ से लौटा है मुंबई से सटे कल्याण का अरीब.

 

शुक्रवार को जैसे ही अरीब का विमान तुर्की होते हुए मुंबई पहुंचा उसे पूछताछ के लिए किसी अनजान जगह पर ले जाया गया. एनआईए अरीब से पूछताछ कर रही है.

 

अरीब ने पूछताछ में बताया है कि इराक और सीरिया में अब भी 13 भारतीय ISIS के साथ लड़ रहे हैं और इन 13 लड़ाकों को ISIS ने अपने कैंप में ak-47 जैसे खतरनाक हथियार चलाने की ट्रेनिंग दी है. इंटेलीजेंस की रिपोर्ट के मुताबिक करीब 20 भारतीय ISIS में शामिल हो चुके हैं.

 

एनआईए अरीब मजीद के नारको यानी झूठ पकड़ने वाली मशीन पर टेस्ट कराने की भी तैयारी में है.

 

एनआईए के सामने पूछताछ में अरीब ने सुनाई है आतंक के घर तक पहुंचने की कहानी. इसके साथ ही अरीब ने बताई है हिंदुस्तान से इराक के मोसुल तक पहुंचने की कहानी.

अरीब वहां क्यों गया. कैसे गया. किन लोगों के साथ गया और जब वो आतंकियों के बीच पहुंचा तो वहां क्या हुआ.

 

मुंबई से सटे कल्याण में रहने वाला अरीब मजीद आखिर इराक क्यों जाना चाहता था ऐसा क्या हुआ कि वो आतंकी संगठन ISIS का लड़ाका बनाने के लिए तैयार था.

 

NIA के सामने अरीब का कबूलनामा

22 साल का अरीब मजीद मुंबई के कल्याण में अपने माता-पिता और दो बड़ी बहनों के साथ रहता था. अरीब पढ़ा लिखा है. एनआईए को दिए बयान में अरीब ने बताया है.

“मेरी 10वीं तक पढाई लोढ़ाज हाई स्कूल कल्याण में हुई है. उसके बाद मैंने वाशी के फादर एंजेल पॉलीटेक्निक कॉलेज से सिविल इंजीनियरिंग डिप्लोमा किया और अब मैं पनवेल के कलसेकर कॉलेज में 3 इयर सिविल इंजीनियरिंग का छात्र हूं. “

 

सिविल इंजीनियरिंग कर रहे अरीब का मन अचानक बदलने लगा था.

वो आगे कहता है, “मैं पिछले एक साल से मुंब्रा में पढ़ाई के लिए दोस्त फैय्याज खान के यहां जाता था. फैय्याज का पता है: रूम न. ३०४, बी विंग, अक्सा मस्जिद  के पास.  यहां पर मेरी दोस्ती आरिफ नाचन,  मोहम्मद फैज़ल सिद्दीकी,  वसीम निज़ाम शेख,  सादिक, समीर सैयद, असर मेहँदी, शमीम सलीम खान, जकी अख्तर, अंसारी से हुई. “

 

अरीब के मुताबिक, ” मैं पिछले कुछ अरसे से क़ुरान पढ़ने और समझने लगा.  साथ ही क़ुरान में जो लिखा उसका अर्थ समझने और हदीस के बारे में जानकारी जुटाने लगा. धार्मिक किताबें पढ़ने, इंटरनेट पर यू-टयूब पर मोहम्मद अल अरिफ, इमरान हुसैन, मूसा सेंट टेरिनिओ, अबु वालिद, अबु वाहिद, अंजुम चौधरी, अनवर अल आवलखी, शेख अनवर अवलाखी इनके भाषणों की क्लिप देखता रहता. साथ ही इजराइल और फिलिस्तीन के बीच चल रहे विवाद के बारे जानकारी लेने लगा.  इन सब चीज़ों का मुझ पर गहरा असर हुआ और मैं अक्सर इसके बारे में विचार करने लगा.  मुझे लगने लगा मुझे भी अपनी कौम के लिए कुछ करना चाहिए.  मुझे लगने लगा की इस्मालिक सोच रखने वाले राज्य में रहना चाहिए और कुछ करना चाहिए. इस दौरान मेरा इंजीनियरिंग की पढ़ाई से ध्यान हट गया. मेरे दोस्त फहाद तनवीर शेख और मेरी विचारधारा मिलती जुलती थी. इसीलिए हम इस्लामिक स्टेट कैसे जाएं इसपर विचार करने लगे. ” 

 

एनआईए की पूछताछ में अरीब मजीद ने जो बयान दिया है उसके मुताबिक अरीब और उसके दोस्तों ने इराक तक पहुंचने के लिए काफी मशक्कत की. घर वालों से झूठ बोला और 6 महीने तक पैसे जमा करते रहे.

 

अरीब कहता है कि इराक और सीरिया लैंड ऑफ शाम हैं. हमने ऐसा सुना था कि दुनियाभर के मुसलमानों को यहां जाकर हदीस पढ़ना चाहिए. हमने जानकारी जुटाई. इसी जगह से शरीयत राज की शुरुआत होगी ऐसा हदीस है. फिर हमने भी वहां जाने का फैसला किया. अपने दोस्त फहद फहाद से बातचीत करके पता चला कि हमारे ही इलाके में रहने वाले शहीम और अमन तांडेल की विचारधारा भी हमसे मिलती जुलती है और वो भी इराक जाने का इरादा रखते हैं. फिर मैं इराक जाने के लिए इंटरनेट से जानकारी जुटाने लगा. फिर मुझे पता चला कि ISIS सीरिया में शरीयत राज बनाने के लिए जंग लड़ रहे हैं और सीरिया में जाने के लिए इराक और तुर्की से जा सकते है.

 

कैसे पहुंचा इराक

 

अऱीब ने बताया कि इराक तक पहुंचने की सबसे पहली कड़ी फेसबुक पर मिली.

 

अरीब ने बताया, “मुझे फेसबुक पर ताहिरा भट नाम की एक महिला की जानकारी मिली. हमें पता चला कि ये महिला दुनियाभर से लोगों को ISIS में शामिल करती है. ताहिरा के साथ मैं फेसबुक और उसके फ़ोन नंबर पर चैट करने लगा ताहिरा से मुझे पता चला की ISIS कैसे इस्लाम धर्म लिए अच्छा काम कर रहा है और ताहिरा से मुझे सीरिया और इराक पहुंचने की जानकारी मिली. इसके बाद कल्याण के थॉमस कुक से तुर्की जाने की जानकारी मांगी तो उन्होंने मुझसे 80000 और सैलरी स्लिप मांगी. हमारे पास सैलरी स्लिप नहीं होने की वजह से हमने ये विकल्प छोड़ दिया. हमने इराक के रास्ते जाने का फैसला किया. इराक जाने के लिए जियारत वीजा मिलता है और कई सारी ट्रेवल एजेंसी इसका काम करती है. हमने कई एजेंसियों से संपर्क किया उनमें से सबसे कम पैसे मुंबई के राहत ट्रैवल्स ने बताए और सिर्फ पासपोर्ट मांगा.  हम चारों ने इराक जाने के लिए करीब 6 महीने तक पैसे जुटाए. मैंने करीब 25 से 30 हज़ार रूपए जमा किए थे. ताहिरा भट ने मुझे अबु फज़ूल और अबु फातिमा नाम के दो लोगों की जानकारी और उनका फोन नंबर दिया. मैं दोनों से फेसबुक पर संपर्क में था. इसीलिए अबु फातिमा ने मुझे इराक में एक व्यक्ति का कांटेक्ट नंबर दिया और इराक पहुंचने पर इस नंबर पर कांटेक्ट करने को कहा. ” 

 

इसके बाद शुरू हुई अरीब मजीद, शाहिम टंकी, अमन तंडेल और फहाद शेख के इराक तक पहुंचने की कहानी.

 

राहत ट्रेवेल्स के मुताबिक हम चारों ने 15-15 हजार रूपये और फोटो उनके ऑफिस में दे दिये. हमें बताया गया कि 25 मई से 1 जून तक जियारत के लिये हमे एक ग्रुप के साथ इराक भेजा जायेगा. कुछ दिनों बाद हमने राहत ट्रेवेल्स को बाकी के पैसे दे दिये. मैं अपने घर पर पिछले एक साल से इराक और सीरिया में जियारत के लिये जाने की बात कहता रहता था. इसीलिये मेरे घर वालों ने मुझे पासपोर्ट भी दे दिया था. 22 मई और 23 मई को रात भर मैं अपने दोस्त के घर पढाई करने जा रहा हूं यह कह कर मैं घर से निकला. 24 मई को कौन कैसे आयेगा ये हमने आपस में चर्चा कर योजना बनाई. 24 मई को दिन भर मैं मुंब्रा में फैजल के यहां रूका. शाम को मुंब्रा बाजार से एक बड़ा बैग खरीदा और सामान पैक किया. हमने फोन के जरिये ‘कूल कैब’ बुलाई. किसी को शक न हो इसलिये हमने मुंब्रा में कूल कैब का इंतजार किया. कूल कैब आते ही फहाद को मुंब्रा स्टेशन से अपने साथ लिया और ठाणे के लिए रवाना हो गये. ठाणे में शहीम टंकी और अमन तांडेल हमारा इंतजार कर रहे थे. ठाणे से हम मुंबई अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट के लिये रवाना हुए. 24 मई को हमलोग मुंबई से इराक के लिये रवाना हुए इस कड़ी में सबसे पहले आबूधाबी पहुंचे और वहां से 25 मई को फ्लाइट लेकर बगदाद पहुंचे.

 

अरीब के बयान से इतना तो साफ है कि वो और उसके दोस्त फेसबुक के जरिए आईएसआईएस तक पहुंचे. जाहिर है फेसबुक पर ताहिरा नाम की महिला के जरिए आतंक के आकर्षण में फंस गया अरीब.

 

इराक पहुंचने के बाद कैसे पहुंचा ISIS तक

 

एनआईए को दिए बयान के मुताबिक अरीब मजीद इराक के बगदाद तक तो पहुंच चुका था लेकिन अभी ISIS के आतंकियों तक पहुंचना बाकी था. आईए आपको बताते हैं कि मुंबई से निकले ये चार दोस्त बगदाद से आतंकियों के ठिकाने तक कैसे पहुंचे.

 

अरीब अपने दोस्तों के साथ बगदाद पहुंच चुका था. चारों दोस्त जियारत के वीजा पर बगदाद आए थे 6 दिनों तक ये अब्दुल कादिर गिलानी नाम के शख्स के साथ रहे और टूर पूरा करते रहे. लेकिन टूर पूरा होते ही ISIS तक पहुंचने की कोशिश में जुट गए.

 

अरीब कहता है, “बगदाद से हमने उस नंबर पर फोन किया जो हमें दिया गया था. पहले हमें टूर पूरा करने को कहा गया. लेकिन टूर खत्म होने के बाद भी हमें कोई फोन नहीं आया. हमने दोबारा उस मोबाइल नंबर पर संपर्क किया. तब हमें अबू फातिमा ने टैक्सी लेकर मोसूल आने को कहा. हमने टूर गाईड से अपना-अपना पासपोर्ट वापस लिया और मौका मिलते ही टैक्सी लेकर मोसुल निकल गये. “

 

इराक का मोसूल वही शहर है जहां आतंकी संगठन ISIS ने अपना कब्जा जमा रखा है.

 

अरीब बताता है, “मोसूल पहुंचने के बाद हम एक होटल में रुके और एक बार फिर अबु फातिमा से संपर्क किया. अबु फातिमा ने हमें दोपहर की नमाज पढ़कर साबुन मस्जिद में रुकेने को कहा. नमाज के बाद फिर हमने अबू फतिमा को फोन किया तो उसने कहा-‘मैं आपको देख रहा हूं लेकिन मैं तुम्हारे करीब नहीं आऊंगा, मुझे तुम पर पुलिस के आदमी होने का शक है. अगर ये सच हुआ तो आपको मार दिया जायेगा’ और फोन रख दिया. हम वहां खड़े ही थे कि इराक आर्मी ने हमें पकडा और पूछताछ के लिये आर्मी दफ्तर में ले गये. हमारे पासपोर्ट और वीजा की जांच हुई और फिर दो घंटे तक पूछताछ करने के बाद कहा गया कि यहां रहना महफूज नहीं है इराक की आर्मी ने हमें मोसूल में नहीं रुकने को कहा. ये सब जब हो रहा था तब भी ISIS के लोग हम पर नजर रखे हुए थे. हम दोबार साबुन की मस्जिद के पास आकर रुके. वहां हुंडई कंपनी की एक सफेद कार आई और महज दस मिनट की दूरी पर हमें एक घर में ले जाया गया. वहां हमारे समान की तलाशी ली गई. हमसे वहां आने की वजह पूछी गई. जब हमने ISIS में शामिल होने की बात कही तो उन लोगों को भी ताज्जुब हुआ. लेकिन ISIS में शामिल होने के लिये सिफारिश की जरूरत थी लेकिन हमारे पास सिफारिश नहीं होने की वजह से हमें भारत लौटने के लिए कहा गया. हमने वापस लौटने से इंकार कर दिया. हमने कहा की हम भारत नहीं जायेंगे चाहे तो हमें मार दो.  उसके बाद अली नाम के शख्स ने हमसे पूछताछ की.”

 

अरीब ने एनआईए को जो बयान दिया है उससे ये साफ नजर आ रहा है कि चारों लड़कों पर ISIS में शामिल होने का जुनून सवार था. वो जान की कीमत देकर भी आतंकी संगठन ISIS का हिस्सा बनना चाहते थे. अरीब अपने दोस्तों के साथ ISIS का हिस्सा बना और हथियार चलाने की ट्रेनिंग भी ली.

 

अरीब ने कहा, “हमसे पूछताछ करने वाला अली उमर शिसानी ISIS का बड़ा अफसर था उससे चर्चा की और हमें ISIS में शामिल होने की इजाजत मिली. फिर हमें एक रेगिस्तान में 8 से 10 दिन रखा गया. बाद में हमें एक कार से रक्का ले जाया गया. वहां हमारे नाम बदले गए. मेरा नाम अबु अली अल-हिंदी, शहीम का नाम अबु उस्मान अल-हिंदी, फहाद का नाम अबु बकर अल-हिंदी और अमन का नाम अबु उमर अल-हिंदी रखा गया. रक्का से करीब 45 किमी की दूरी पर युफेट नदी के किनारे पर शरीयत की 25 दिन का ट्रेनिंग दी गई. उस वक्त हमारे साथ अलग अलग देश के 45 से 50 लोग थे . आखिरी 3 दिन हमें एके – 47 चलाने की ट्रेनिंग दी गई.  हमारा लिखित और मौखिक टेस्ट लिया गया और फिर हमें अलग-अलग डिपार्टमेंट दिए गए.”

 

अरीब सिविल इंजीनियरिंग का छात्र था तो उसे सिविल इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट में डाला गया इसी तरह फहाद को कार रिपेयरिंग मिली तो शमीम को इकनॉमिक्स विभाग संभालने को मिला. अमन को इलेक्ट्रॉनिक्स डिपार्टमेंट में डाला गया.

 

रक्का का बॉर्डर क्रॉस करने के बाद हमें वहां एक गांव में रखा गया. उसं गाव में कोई नही था.उस गांव मे एक बिल्डिंग की खिड़कियों को बुलेटप्रूफ बनाने का काम दिया गया. एक दिन काम करते वक्त फायरिग हुई. उस फायरिंग में मुझे गोली लगी..चार पाच घंटे मैं बेहोश था. होश आने के बाद मैं एक किमी चलकर गया और अस्पताल में भर्ती हुआ. आठ दस दिन के इलाज के बाद रक्का में अपने दोस्त को मिलने गया. उसके बाद मुझे मोसूल यूनिवर्सिटी का रास्ता बनाने का काम दिया गया. मैं जख्मी था इसलिए काम करते वक्त चक्कर आता था नाक से खून आता था तो मैंने इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट में जाने की इजाजत मांगी. उन्होंने इजाजत दे दी और दो हजार डॉलर भी दिए. उन लोगों ने मुझे तुर्की छोड़ा और वहां से मैं इंस्तानबुल आया.

 

इंस्तानबुल पहुंचते ही अरीब मजीद ने भारतीय दूतावास से संपर्क किया. वो वहां एक दिन रुका भी. और दूसरे दिन तुर्की एयरलाइंस की फ्लाइट से मुंबई पहुंचा. जहां एनआईए उसे अपने साथ ले जाकर पूछताछ कर रही है. 

 

अरीब फैयाज एजाज अहमद मजीद. 22 साल का वो लड़का जिसे शुक्रवार को एनआईए ने गिरफ्तार किया है. एनआईए के मुताबिक मुंबई से सटे कल्याण के चार लड़के ISIS से प्रभावित होकर उसके लिए काम करने को तैयार हो गए थे और उसी में एक अरीब शुक्रवार को लौटा. अरीब से एनआईए लगातार पूछताछ कर रही है. सूत्रों के मुताबिक एनआईए की पूछताछ में अरीब ने कई अहम राज खोलें जिससे खुफिया विभाग भी हैरान है.

 

अरीब मजीद का खुलासा

 

अरीब ने पूछताछ में बताया है कि इराक और सीरिया में अब भी 13 भारतीय ISIS के साथ लड़ रहे हैं . इन 13 लड़ाकों को ISIS ने अपने कैंप में ak-47 जैसे खतरनाक हथियार चलाने की ट्रेनिंग दी है. इंटेलीजेंस की रिपोर्ट के मुताबिक करीब 20 भारतीय ISIS में शामिल हो चुके हैं .

 

अरीब से ऐसी जानकारियां मिली जो देश की सुरक्षा के लिए खतरा हो सकती हैं लिहाजा ज्यादा से ज्यादा जानकारी निकालने के लिए एनआईए अब अरीब मजीद के नारको टेस्ट कराने की तैयारी कर रही है. इसके अलावा लाइ डिटेक्टर यानी झूठ पकड़ने वाली मशीन पर टेस्ट कराने की भी तैयारी में है एनआईए.

 

अरीब मजीद के खिलाफ केस दर्ज हो चुका है बावजूद उसके सूत्रों की माने तो सरकार उसको लेकर संवेदनशीलता दिखा रही है . संवेदनशीलता शायद इसलिए भी क्योंकि अरीब मजीद या उस जैसे लड़के आतंकवादी संगठनों के हाथों का खिलौना क्यों बन जाते हैं इस सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश हो रही है . इसका एक जवाब शनिवार को गुवाहाटी में देश के गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने दिया.

 

जिन गिने-चुने युवाओँ की बात देश के गृह मंत्री कर रहे हैं उन्हीं युवाओँ में से एक था अरीब मजीद. अरीब इराक और सीरिया में खून खराबा कर रहे आतंकवादी संगठन ISIS के उस आकर्षण में फंस गया था जिसकी बात अभी राजनाथ सिंह कर रहे थे. राजनाथ सिंह के बाद अब यही चिंता IB चीफ सैयद आसिफ इब्राहिम ने भी जताई है .

 

जाहिर है ऐसे आकर्षण को तोड़ने के लिए सरकार को कुछ नया करना पड़ेगा . ये आकर्षण इसलिए भी खतरनाक है क्योंकि इसकी चपेट में वो युवा वर्ग आ रहा है जिसपर देश के भले और तरक्की की जिम्मेदारी होती है . ये चिंताजनक इसलिए भी है क्योंकि खुफिया विभाग को लगता है कि ISIS के आकर्षण में फंसे युवा दूसरों को भी अपने चपेट में ले सकते हैं.

 

कैसे आतंकी सोच में ढल गया

कल्याण का जहीन सा लड़का अरीब मजीद. कैसे आतंकी सोच में ढल गया. ये बड़ी दिलचस्प कहानी है. आप जानकर हैरान होंगे. कल्याण के संपन्न परिवार का बेटा अरीब पढ़ाई-लिखाई के अलावा खेल-कूद में भी शुरू से अव्वल रहा था और जिंदगी को जिंदादिली से जीना जानता था. लेकिन 2014 में कुछ लोगों की संगत ने उसकी सोच बदल दी और वो अपनों को अलविदा कह आतंक के रास्ते पर निकल पड़ा.

 

अरीब मजीद…ये नाम इस साल अगस्त में पहली बार मीडिया में सुर्खियों में आया. खबर थी कि मुंबई से लगे कल्याण का रहने वाला ये नौजवान अपने तीन दोस्तों के साथ आतंकी संगठन ISIS में शामिल होने इराक चला गया है.

 

घर-परिवार नहीं समझ पा रहा था कि पढ़ने में हमेशा अव्वल रहने वाले 23 साल के अरीब ने आतंक का रास्ता आखिर क्यों चुना .

 

नवी मुंबई के कलसेकर कॉलेज में सिविल इंजीयिरिंग में तीसरे साल की पढ़ाई कर रहे अरीब से परिवार ने ढेर सारी उम्मीदें लगा रखीं. ये उम्मीदें गलत भी नहीं थीं, क्योंकि अरीब पढ़ाई के अलावा खेलकूद और दूसरी गतिविधियों में भी शुरू से अव्वल था. 2013 तक अरीब की जिंदगी में सबकुछ ठीकठाक चल रहा था. लेकिन जनवरी 2014 से उसके रवैये में बदलाव दिखने लगा था .

 

अरीब ने आतंक का रास्ता कैसे पकड़ा?

जहीन सोच रखने वाला अरीब अब बहनों को बुर्के में रहने की सलाह देने लगा था. बहनों के जींस पहनने, बाहर घूमने, फिल्म देखने पर उसे आपत्ति होती थी. इसे वो इस्लाम के लिए हराम ठहराने लगा था. मार्च-अप्रैल में उसने मोबाइल रखना भी बंद कर दिया. अरीब की दुनिया अब उसके तीनों दोस्तों…फहद शेख, अमन टंडेल और शमीम टंकी तक सिमट गई थी, जो अरीब के नजरिये से ही दुनिया देखते थे.

 

इराक जाने से पहले घरवालों के लिए छोड़ी गई चिट्ठी में अरीब ने लिखा कि मुझे रोना आता है, जब मैं आप लोगों को खुदा की इबादत की जगह, आरामतलब और पाप में डूबी जिंदगी  जीता देखता हूं. मैं खुदा की राह पर जेहाद के लिए इराक जा रहा हूं.

 

अरीब और उसके दोस्तों को किसने बहकाया?

पुलिस जांच में साफ हुआ कि अरीब और उसके तीनों दोस्तों की उस दौरान आदिल डोलारे नाम के फल दुकानदार से नजदीकी थी, जो इस्लाम की धार्मिक शिक्षा देने का काम भी करता था. दो अफगान नागरिक भी इनके संपर्क में थे. अरीब को बहकाने के लिए ठाणे के एक कारोबारी पर भी पुलिस ने शिकंजा कसा था, जिसने इन चारों दोस्तों के हज पर जाने का खर्च उठाया था.

 

सूत्रों की मानें तो 23 मई को हज यात्रा के बाद अरीब और उसके चारों दोस्त अपने ग्रुप से अलग हो गए. और 25 मई को फजलुल्ला पहुंचकर आतंकी संगठन ISIS में शामिल हो गए. तब से उनकी कोई खोज-खबर नहीं थी.

 

जुलाई में अरीब ने फोन कर अपने घरवालों को ISIS में शामिल होने की जानकारी दी. जिसके बाद उन्होंने पुलिस को खबर की. अगस्त में अरीब के तीनों दोस्तों में से किसी एक ने उसके घर पर फोन कर बताया कि अरीब शहीद हो गया है. लेकिन सच्चाई कुछ और थी.

 

अरीब की अक्ल कब ठिकाने आई?

दरअसल अरीब मोसूल में ISIS के जिस ठिकाने पर था, वो अमेरिकी हवाई हमले में तबाह हो गया. अरीब की जान इसलिए बच गई…क्योंकि वो हवाई हमले से ठीक पहले वहां से निकल गया था.

 

बचता-बचाता अरीब इसके बाद तुर्की पहुंचा, जहां से उसने पिता को फोन कर जान बचाने की गुहार लगाई. इसके बाद NIA और IB की टीम उसे लेकर भारत आई.

 

पढ़ें एनआईए की आरीब माजूद से पूरी पूछताछ

 

मेरा नाम अरीब फैय्याज इजाज़ अहमद मजीद है.  मेरी उम्र 22 साल है.  में ऊपर दिए अपने पत्ते पर अपने माता पिता, दो बड़ो बहने और  रहता हूँ.  मेरे पिता का नाम डॉ इजाज़ मजीद है और मेरी माँ का नाम रज़िया इजाज़ मजीद है

 

मेरी 10 वी तक पढाई लोढ़ाज हाई स्कूल कल्याण यहाँ हुई है. उसके बाद मैंने वाशी के फादर एंजेल पॉलीटेकनिक कॉलेज से सिविल इंजीनियरिंग डिप्लोमा किया और अब मैं पनवेल के कलसेकर कॉलेज में 3 इयर सिविल इंजीनियरिंग का छात्र हूँ

 

मैं पिछले एक साल से मुंब्रा इस जगह पर पढाई करने अपने दोस्त फैय्याज खान के यहाँ जाता था. फैय्याज का पता है : रूम न. ३०४, बी विंग, अक्सा मस्जिद  के पास, कौसा, मुंब्रा है.  यहां पर मेरी दोस्ती आरिफ नाचन, मोहम्मद फैज़ल सिद्दीकी, वसीम निज़ाम शेख, सादिक, समीर सैयद, असर मेहँदी, शमीम सलीम खान, जकी अख्तर, अंसारी से हुई.

 

मैं क़ुरान पढ़ने और समझने लगा. साथ ही क़ुरान में जो लिखा उसका अर्थ समझने और हदीस के  बारे में जानकारी जुटाने लगा. धार्मिक  किताबें पढ़ने, इंटरनेट पर यू टयूब पर मोहम्मद अल अरिफ, इमरान हुसैन, मूसा सेंट टेरिनिओ, अबु वालिद, अबु वाहिद, अंजुम चौधरी, अनवर अल आवलखी, शेख अनवर अवलाखी इनके भाषणों की क्लिप देखता रहता.

 

साथ ही इजराइल और फिलिस्तीन के बीच चल रहे विवाद के बारे जानकारी लेने लगा.  इन सब चीज़ों का मुझपर गहरा असर हुआ और मैं अक्सर इसके बारे में  विचार करने लगा.  मुझे लगने लगा मुझे भी अपने कौम के लिए कुछ करना चाहिए.  मुझे लगने लगा की  इस्मालिक सोच रखनेवाले  राज्य में रहना चाहिए और कुछ करना चाहिए.  इस दौरान मेरी इंजीनियरिंग पढाई से ध्यान हट गया.  मेरे दोस्त फहाद तनवीर शेख और मेरी विचारधारा मिलती जुलती थी. इसीलिए हम इस्लामिक स्टेट कैसे जाएं इसपर विचार करने लगे. 

 

इराक, सीरिया ये देश लैंड ऑफ़ शाम है और दुनियाभर के मुसलमानो नें यहाँ जाकर हदीस करना चाहिए ऐसा हमने सुना था इसके बारे हमें  जानकारियां जुटाई. इसी जगह से शरीयत राज की शुरुवात होगी ऐसा हदीस है और  हमने भी वहां जाने का निर्णय लिया. फहद फहाद से बातचीत करके हमें पता चला की हमारे ही इलाके में रहनेवाले शहीम तांकि और अमान तांडेल की विचारधारा भी हमसे मिलती जुलती है और वो भी इराक जाने का इरादा रखते है.  फिर मैं इराक जाने के लिए इंटरनेट के माध्यम से अधिक जानकारी जुटाने लगा.

 

तभी मुझे पता चला की आईएसआईएस ये सीरिया में शरीयत राज बनाने के लिए जंग लढ रहे है और सीरिया में जाने के लिए इराक और तुर्की से जा सकते है ऐसा पता चला.

 

इसी दौरान मुझे फेसबुक पर ताहिरा भट नाम के एक महिला की जानकारी मिली.  ये महिला दुनियाभर से लोगों को आईएसआईएस में शामिल करती है ऐसा पता चला. ताहिरा के साथ मैं फेसबुक और उसके फ़ोन नंबर पर चैट करने लगा ताहिरा से मुझे पता चला की आईएसआईएस किस प्रकार इस्लाम धर्म लिए अच्छा काम कर रहे है और ताहिरा से मुझे सीरिया और इराक पहुँचने की जानकारी मिली. इसके बाद में कल्याण के थॉमस कुक से तुर्की जाने की जानकारी दी उन्होंने मुझसे 80000 और सैलरी स्लिप मांगी. हमारे पास सैलरी स्लिप नहीं होने की वजह से हमने ये विकल्प छोड़ दिया.  सीरिया में अस्थिरता होने की वजह से वीजा किसी को नहीं मिलता इसीलिए हमने वो विकल्प दिया. इसी लिए हमने इराक के रास्ते जाने का निर्णय लिया.  इराक जाने के लिए जियारत वीसा मिलता है और कई सारे ट्रेवल एजेंसी इसका काम करती है ऐसा पता चला. हमने कई एजेंसियों से संपर्क किया उनमें से सबसे कम दाम मुंबई के रहत ट्रेवल्स ने बताया और सिर्फ पासपोर्ट की मांग की.  हम चारों ने इराक जाने के लिए करीब 6 महीनों से पैसे जुटाना शुरू किया.  मैंने मेरे पास करीब 25 से 30 हज़ार रूपपए जमा किए थे. ताहिरा भट ने मुझे अबु फज़ूल और अबु फातिमा की जानकारी दी और उनका फ़ोन नंबर भी दिया.  मैं दोनों से फेसबुक पर संपर्क में था.  इसीलिए अबु फातिमा ने मुझे इराक में एक व्यक्ति का कांटेक्ट नंबर दिया और इराक पहुँचने पर इस नंबर पर कांटेक्ट करने को कहा. 

 

 

राहत ट्रेवेल्स ने दी जानकारी के मुताबिक हमने प्रत्येक व्यक्ति के 15-15 हजार रूपये, फोटो राहत ट्रेवेल्स के ऑफिस में दिये. राहत ट्रेवेल्स ने हमें बताया कि 25 मई से 1 जून तक जीयारत के लिये हमे एक ग्रूप के साथ इराक भेजा जायेगा. इसके कुछ दिनों बाद हमने राहत ट्रेवेल्स को बाकी के पैसे दे दिये. मैं अपने घर पर पिछले एक साल से इराक और सीरिया जैसे ‘लैंड ऑफ शाम’ कहते हैं वहां हिज़रत के लिये जाने की बात कहता रहता था. इसीलिये मेरे घर वालों ने मुझे पासोपोर्ट भी दे दिया था. 22 मई और 23 मई को रात भर मैं अपने दोस्त के घर पढाई करने जा रहा हूं यह कह कर मैं घर से निकला. 24 मई को कौन कैसे आयेगा ये हमने आपस में चर्चा कर योजना बनाई. 24 मई को दिन भर मैं मुंब्रा में फैजल के यहां रूका. शाम को मुंब्रा बाजार से एक बड़ी बैग खरीदी और उसपर मैंने अपने कपड़े और अन्य सामान पैक किये. शाम को फहाद को मुंब्रा में बुला लिया. उसके बाद हमने फोन के जरिये ‘कुल कैब’ को बुला लिया. किसी को शक न हो इसलिये हमने मुंब्रा में कुल कैब का इंताजर करता रहा और मैने फहाद को मुंब्रा स्टेशन के पास रूकने को कहा. कुला कैब आते ही फहाद को मुंब्रा स्टेशन से अपने साथ लिया और ठाणे की रवाना हो गये. ठाणे में समीम ठाकी और अमन तांडेल हमारा इंतजार कर रहे थे. ठाणे से  हमलोग सभी मुंबई अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट के लिये रवाना हुए. 24 मई को हमलोग मुंबई से इराक के लिये रवाना हुए इस कड़ी में सबसे पहले आबूधाबी पहुंचे और  वहां से 25 मई को फ्लाइट लेकर बगदाद पहुंचे.

 

बगदाद पहुंचने पर हम अब्दूल कादिर गिलानी के साथ 6 दिनों तक रहे. इन 6 दिनो में हमने ग्रूप के साथ अपना टूर पूरा किया. 6 दिन बाद बगदाद से हमने हमें दिए गए नंबर पर फ़ोन किया.  फ़ोन पर बात करते समय हमें टूर कहा गया.  लेकिन यात्रा खत्म होने के बाद भी हमें न कोई फ़ोन आया और ना ही आईएसआईएस की तरफ से कोई खबर आई . हमने फिर उस मोबाईल नंबर पर संपर्क किया. तब हमे अबू फातिमाने टैक्सी कर मोसुल आने को कहा. फिर हमने टूर गाईड से हमारा पासपोर्ट वापस लिया और मौका मिलते ही टैक्सी से मोसुल निकल गये. मोसुल पहुचने के बाद हम एक होटल मे रुके और फिर एक बार अबू फातिमा से संपर्क किया. उसने हमे जोहर की नमाज पढकर साबुन मज्जीद मे रुकने को कहा. नमाज के बाद फिर हमने अबू फतिमा से फोन पर संपर्क करने पर अबू फतिमा ने कहा ‘मै आप को देख रहा हू लेकिन मै तुम्हारे करीब नही आऊंगा, मुझे तुम पर पुलिस के आदमी होने का शक है. अगर यह सच हुआ तो आपको मार दिया जायेगा’ और फोन रख दिया. हम वहा खडे ही थे की इराक आर्मी ने हमे पकडा और पुछताछ के लिये करीबी आर्मी दफ्तर मे ले गये. हमारा पासपोर्ट ओर वीसा जांचने के बाद और करीब दो घंटे पुछताछ करने के बाद जान, यहाँ रहना मेहफ़ूज़ नहीं और हमारी जान को खतरा होने की बात कहकर इराकी आर्मी ने हमे मोसुन न रुकने को कहा.  यह सब हो रहा था तब उनके लोग हमपर नजर रखे हुये थे. हम फीर साबुन की मस्जिद के पास आकर रुके. वहा हुण्डाय कंपनी की एक सफेद कार आयी और महज दस मिनट की दुरी पर एक घर में ले गये. वहा फिर हमारे सब समान की तलाशी की, और वहा आने का कारण पुछने पर हम आईएसआईएस मे शामिल होने के जानकारी देने के बाद उन्हे भी ताजूब हुआ. लेकीन आईएसआईएस में शामिल होने के लिये सिफारस की जरुरत थी और हमारे पास सिफारिश ना होने की वजह से हमे भारत मे लौटने को कहा गया. लेकीन हमने वापिस लौटने से इनकार किया. हमने कहा की हम भारत नहीं जायेंगे चाहे तो हमें मार दो.  उसके बाद अली नाम के शख्स ने हमासे पुछताछ की.

 

दो दीन बाद अलीने उमर शिसानी जो आईएसआईएस  का बडा अफसर था उससे चर्चा की और हमे आईएसआईएस मे शामिल होने के लिये इजाजत मिली. फिर हमे एक रेगीस्तान में 8 से 10 दिन रखा गया. बाद मे हमे एक कार से रक्का ले जाया गया. वहा हमारे नाम बदलकर मेरा नाम अबु अली अल-हिंदी, सहिम का नाम अबु उस्मान अल-हिंदी, फहाद का नाम अबु बकर अल-हिंदी और अमन का नाम अबु उमर अल-हिंदी रखा गया. रक्का से करीब 45 किमी की दुरी पर युफेट नदी के किनारे पर शरीयत की 25 दिन की ट्रेनिंग दिया. उस वक्त हमारे साथ अलग अलग देश के 45 से 50 लोग थे. वहां आखरी 3 दिन हमे एके –47 चलाने की ट्रेनिंग दी गई. 

 

.तब हमारी राईटिंग और ओरल exam लिया. बाद में हमे अलग डिपार्टमेंट दिए गये

आरिब- सिविल इंजीनियरिंग

फहाद — कार रिपेयरिंग

शमीम — इकोनॉमिक्स विभाग

अमान — इलेक्ट्रॉनिक्स विभाग

 

इस जगह पर मैने दस दिन काम किया..रक्का का बोर्डर कॉग्रस करके हमें एक गाव में रखा गया..उसं गाव में कोई नही था.उसं गाव में एक बिल्डींग के विंडोंज को बुलेटफ्रुफ बनाने का काम दिया..एक दिन काम करते वक्त फायरिग हुई..उसं फायगिंर मे मुझे गोली लगी..चार पाच घंटे में बहोश था..होश आने के बाद में. एक कि.मी चल के गया..फिर में अस्पताल में भरती किया..आठ से दस दिन मैंने ट्रीटमेंट ली..उसके बाद रक्का यहां जा कर मैंने अपने दोस्त को मिला ,तब उसने कहा रहिम ने अपने घर पर कॉल करके बताया की मेरी मृत्यू हो गई है

 

-उसके बाद मुझे मोसुल यूनिवर्सिटी का रास्ता बनाने का काम दिया..पर मैं जख्मी था इसीलिए मुझे काम करते वक्त चक्कर आता था, नाक से खून आता था इसिलिए मैंने इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट से जाने की परमिशन मांगी..उन्होने परमिशन दी और दो हजार डॉलर भी दिये..उन्होंने मुझे तुर्की छोड़ा..वहां से मैं इस्तांबुल आया, उस दिन मैंने भारतीय दूतावास को संपर्क किया..एक दिन रूका ..दुसरे दिन तर्की एयरलाइन्स से मुंबई आया.

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Web Title: AREEB MAJID TALKS ABOIUT ISIS JOURNEY
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