क्या केजरीवाल मुख्यमंत्री की गरिमा को ठेस पहुंचा रहे हैं?

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देश के प्रधानमंत्री और राज्य के मुख्यमंत्री की एक गरिमा होती है. जब गरिमा की लक्ष्मण रेखा तोड़ने की कोशिश की जाती है तो जाहिर है इसपर चर्चा भी होगी. केजरीवाल के विज्ञापन के नये अवतार पर सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक हलको में चर्चा हो रही है और कहा जा रहा है वो मुख्यमंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद की गरिमा को ठेस पहुंचा रहें हैं बल्कि मजाक भी बना रहें हैं. केजरीवाल जो करते हैं वो डंके की चोट पर करते हैं, पूरी रणनीति के साथ कामों को अंजाम देते हैं लेकिन राजनीतिक हलकों में उनके इस विज्ञापन से लोगों में कौतूहल पैदा हो गया है. जाहिर है इसी कौतूहलता में सवाल भी छिपा हुआ है.

 

केजरीवाल के नये अवतार से तीन महत्वपूर्ण सवाल खड़े हो गये हैं. पहला सवाल ये है कि क्या केजरीवाल को इस अंदाज में विज्ञापन करना चाहिए या नहीं. दूसरा सवाल ये है कि क्या वो सुप्रीम कोर्ट के आदेश की धज्जियां उड़ा रहें हैं. तीसरा सवाल है कि जनता की पैसे को क्यों पानी की तरह बहा रहें हैं. जाहिर है कि केजरीवाल की रणनीति है कि इस विज्ञापन के जरिए पूरे देश में वो चर्चा का केन्द्र विंदु बने जो कि बन चुके हैं. दिल्ली में प्रदूषण रोकने के लिए ऑड-ईवन फॉर्मूले पर अरविंद केजरीवाल का विज्ञापन आया है.

 

कैमरा की तरफ पीठ करके खड़े शख्स ने गर्दन और सिर पर मफलर लपेटे हुए हैं जो कि केजरीवाल की तरफ दिख रहें हैं जबकि आवाज उन्हीं की है. एक मिनट 32 सेकेंड के विज्ञापन में केजरीवाल एक कार्यकर्ता की कहानी बताते हैं जिसने उल्लंघन करने वाले एक व्यक्ति का विनम्र तरीके से हृदय परिवर्तन करने की बात करते हैं. ये अंदाज फिल्मी स्टारों के लिए तो ठीक है लेकिन केजरीवाल का ये अंदाज हास्य की बात बन गई है. ये भी कहा जा रहा है कि केजरीवाल विज्ञापन के मामले पर पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना कर रहें हैं और कानूनी कार्रवाई की भी मांग हो रही है.

 

आप से बीजेपी में शामिल हुई शाजिया इल्मी का कहना है कि अरविंद केजरीवाल सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन कर रहे हैं.उन्होंने कहा है कि केजरीवाल का बहरूपिया रूप में बनकर आना, मफलर लगाकर विज्ञापन करना, इतना पैसा बर्बाद करना और खुद का गुणगान कर रहे हैं. दरअसल विज्ञापन को लेकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला एक सोच पर आधारित थी जिसमें विज्ञापन के जरिए नेता अपना चेहरा नहीं चमकाएं. उस आदेश मे राष्ट्पति और प्रधानमंत्री को छूट है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ध्यान में रखते हुए केजरीवाल ने अपना चेहरा नहीं दिखाया है बल्कि उस फैसले की काट को लेकर जुगाड़ भी निकालने की कोशिश की है. दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने दो चीजों पर रोक लगाई थी.

 

पहला सरकारी विज्ञापनों द्वारा पक्षपातपूर्ण प्रचार और दूसरा मुख्यमंत्री की तस्वीर. जाहिर है कि अगर ये मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचता है तो केजरीवाल के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती है. इन दोनों बातों से साफ है कि केजरीवाल ने मुख्यमंत्री की गरिमा को लांघने की कोशिश की है तो दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट के आदेश का भी उल्लंघन दिख रहा है. तीसरी बात ये है कि जिस तरह विज्ञापन पर वो पैसा बहा रहें हैं उसपर भी सवाल उठ रहें हैं. एक तरफ वो तो लोगों की भ्रष्ट्राचार उजागर करके सत्यवादी हरिश्चंद की भूमिका में अपने आपको पेश कर रहें हैं तो दूसरी तरफ सरकारी खजानों को विज्ञापन के नामपर खूब लूटा रहें हैं. केजरीवाल के इस कारनामों में विरोधाभाष भी दिख रहा है. वित्तमंत्री पर डीडीसीए में ही हुई धांधली पर आरोप लगाकर केजरीवाल अरुण जेटली की इस्तीफा की मांग कर रहें हैं. वहीं फिजूलीखर्ची करके केजरीवाल अपना चेहरा चमका रहें हैं. ये सवाल भी उठ रहा है कि केजरीवाल जनता के पैसे को क्यों अपने चेहरा चमकाने में इस्तेमाल कर रहें हैं.

 

केजरीवाल सरकार ने अपने और सरकार के गुणगान के लिए पब्लिसिटी बजट 526 करोड़ कर दिया था यानि 21 गुना बढ़ा दिया था. 2014 में बजट 24 करोड़ का था जबकि शीला दीक्षित की सरकार में 10 से 15 करोड़ का बजट हुआ करता है. केजरीवाल फिजूलखर्ची को जायज बता रहें हैं वहीं दूसरे पर धांधली का आरोप लगाकार नाजायज बता रहें हैं. जाहिर है कि भ्रष्ट्राचार करना नाजायज है लेकिन चेहरा चमकाने के लिए 526 करोड़ को भी जायज नहीं ठहराया जा सकता है.

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