क्या केजरीवाल सरकार ये वादा निभाएगी?

By: | Last Updated: Wednesday, 11 February 2015 3:34 PM
arvind kejriwal promisses

नई दिल्ली: अरविंद केजरीवाल को दिल्ली में वो बहुमत मिल गया है जिसकी कमी ने उन्हें पिछली बार महज 49 दिन में इस्तीफा देने पर मजबूर कर दिया था. और अब केजरीवाल 15 फरवरी से शुरू हो रहे विश्वकप से ठीक पहले यानी 14 फरवरी दिल्ली के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर वादों की पिच पर बैटिंग करने को तैयार हैं.

 

केजरीवाल के दिल्ली प्लान का दिल्ली दिल से इंतजार कर रही है क्योंकि इसमें शामिल है बिजली के बिलों में 50 फीसदी कटौती का वादा. केजरीवाल हर महीने 20 हजार लीटर मुफ्त पानी का वादा कर चुके हैं. केजरीवाल पूरी दिल्ली को फ्री वाई-फाई जोन बनाने जा रहे हैं.

 

केजरीवाल की दिल्ली सुरक्षित होगी और चप्पे चप्पे पर 15 लाख सीसीटीवी कैमरे नजर आएंगे. यही नहीं अस्थायी कर्मचारियों के लिए पक्की नौकरी का सपना भी पूरा करेंगे केजरीवाल.

 

केजरीवाल को कुर्सी मिल गई है लेकिन क्या वादे निभा पाएंगे केजरीवाल वो भी पूरे पांच साल. चुनौती बन कर सवाल खड़े हो रहे हैं.

 

दिल्ली का सालाना बजट है महज 37 हजार करोड़ रुपये. केजरीवाल के 5 वादों की कीमत है ढाई लाख करोड़ रुपये . कहां से आएंगे पैसे – केजरीवाल वादे पूरे करेंगे तो कैसे?

 

सबसे पहले बात बिजली की जिसे लेकर केजरीवाल दावा करते रहे हैं कि पहले भी दिल्ली की बिजली का बिल कम किया था और फिर करेंगे. बिजली के बिल आधे कर दिए जाएंगे. ये कैसे हो पाएगा.

 

मीटर दौड़ते हैं और आपकी जेब से निकल जाती है जिंदगी को रौशन रखने के लिए एक बड़ी रकम. ये हाल तब है जब बाकी राज्यों के मुकाबले दिल्ली की बिजली बेहद सस्ती मानी जाती है. दिल्ली में बिजली बिजली बनाने वाली कंपनियां नहीं बांटतीं बल्कि इसके लिए तीन वितरण कंपनियां बिजली खरीद कर आपके घरों को रोशन करती हैं.

 

रौशनी और हवा की ये कीमत हमेशा से राजनीतिक मुद्दा रही है लेकिन इसे आधा करने का वादा केजरीवाल के लिए करिश्मा साबित हुआ है. वो सीएम बन गए हैं

 

दिल्ली की दूसरी केजरीवाल सरकार क्या ये वादा निभाएगी?

 

बिजली की हकीकत को समझने के लिए बिजली की मौजूदा कीमतें देखिए

 

बिजली की मौजूदा दरें –

0 से 200 यूनिट के लिए आप देते हैं 2 रुपये 80 पैसे प्रति यूनिट और इस पर सरकार सब्सिडी देती है 1 रुपये 20 पैसे

 

इसी तरह 201 से 400 यूनिट के लिए आप 5 रुपये 15 पैसे खर्च करते हैं और सरकार सब्सिडी दे रही है 80 पैसे प्रति यूनिट

 

इस सब्सिडी का हिसाब लगाएं तो दिल्ली सरकार पर सालाना करीब 300 करोड़ का बोझ पड़ता है

 

केजरीवाल ने साल 2013 में सरकार बनाने के दूसरे दिन सिर्फ 400 यूनिट तक बिजली के बिल आधे करने का ऐलान किया था. इससे दिल्ली सरकार का बोझ बढ़ गया

 

400 यूनिट तक के बिल पर केजरीवाल की सब्सिडी सिर्फ 3 महीने चली. उन तीन महीनों में दिल्ली की तिजोरी पर 200 करोड़ का बोझ पड़ा. 400 यूनिट के लिए ही साल भर में ये बोझ करीब 800 करोड़ रुपये हो जाता.

 

इस बार भी केजरीवाल ने बिजली के बिल आधे करने का वादा किया है और वो भी पूरी दिल्ली से. कितने यूनिट तक की बिजली के बिल आधे होंगे इसका कोई जिक्र घोषणापत्र में नहीं है. ऐसे में अगर दिल्ली के हर घर की बिजली का बिल आधा होगा तो क्या होगा.

 

दिल्ली का सालाना बिजली का बिल करीब 3000 करोड़ रुपये है. आधी कीमत पर बिजली देने का मतलब है 1500 करोड़ रुपये की सब्सिडी. यानी पांच साल में दिल्ली की सरकार बिजली की सब्सिडी पर 7500 करोड़ खर्च करेगी.

 

जाहिर है दिल्ली के कुल बजट का पांच फीसदी सिर्फ बिजली पर खर्च होगा जो कि बेहद महंगा साबित होगा. ऐसे में क्या बिजली वितरण कंपनिया केजरीवाल के कहने पर कीमतें कम करेंगी जो पहले ही 5 रुपये 60 पैसे प्रति यूनिट की दर से बिजली खरीद कर आप तक पहुंचा रही हैं. उन्हें 22 हजार करोड़ से ज्यादा का घाटा पूरे करने के लिए अगले तीन साल तक 10 फीसदी की दर से हर साल कीमत बढ़ाने की जरूरत है. ऐसे में इंतजार करना होगा उस ऑडिट का जिसके बूते केजरीवाल बिजली की कीमतें आधी करने का दावा करते रहे हैं.

 

दिल्ली सरकार के प्रमुख सचिव रह चुके उमेश सहगल के मुताबिक केजरीवाल का ये वादा दिल्ली सरकार के बजट के लिए बेहद महंगा साबित हो सकता है. हालांकि केजरीवाल ने इस बार दिल्ली के बिजली संकट के लिए नया पॉवर प्लांट लगाने का वादा भी किया है लेकिन इसमें वक्त भी लगेगा और 1000 मेगावाट के प्लांट के लिए 5000 करोड़ रुपये जितनी मोटी रकम भी. ऐसे में फिलहाल देखना होगा कि केजरीवाल क्या करते हैं.

 

अब बात करते हैं पानी की. पिछली सरकार में हर रोज 667 लीटर पानी मुफ्त देने का काम किया था और इस बार भी वही 20 हजार लीटर मुफ्त पानी हर महीने देने का वादा दोहराया गया है. देखते हैं पानी का क्या होगा?

 

केजरीवाले के इसी वादे का इंतजार कर रही है दिल्ली. वो दिल्ली जो पीने के पानी के लिए बरसों से इसी तरह टैंकरों का इंतजार करती है. पानी की एक एक बूंद के लिए जंग लड़ती रही है. परिवार की सबसे अहम जरूरत पानी को केजरीवाल ने चुनावी मुद्दे में भी बदला और सपने में भी. बूंद-बूंद को तरसते दिल्ली के सात लाख झुग्गीवाले और बिना पाइपलाइन वाले इलाकों के 50 लाख लोग केजरीवाल के इस वादे को पूरा होते देखना चाहते हैं.

 

अपने घोषणापत्र में आम आदमी पार्टी ने पानी के मीटर वाले घरों को 20 हजार लीटर पानी मुफ्त देने का दोबारा ऐलान किया है. केजरीवाल की दूसरी पारी में पानी के मोर्चे पर कई और वादे भी हैं.

 

पहला यमुना से पीने लायक पानी का इंतजाम, बरसात के पानी को इकट्ठा करना यानी रेनवाटर हार्वेस्टिंग और हरियाणा की मुनक नहर से दिल्ली को ज्यादा पानी दिलवाना. लेकिन ये वादे जब पूरे होंगे तब होंगे. पहले तो केजरीवाल के सामने दिल्ली के लिए अपने 49 दिनों के पहले कार्यकाल में लागू किया गया मुफ्त पानी का इंतजाम सबसे आसान रास्ता होगा लेकिन देखिए इसका क्या असर पड़ा दिल्ली के बजट पर.

 

मुफ्त पानी का वादा था – 20 हजार लीटर प्रति माह. यानी करीब 667 लीटर हर रोज मुफ्त पानी. केजरीवाल की ये योजना 3 महीने तक चली . तीन महीने में खर्च हुए 40 करोड़ रुपये. मान लीजिए योजना चलती पूरे एक साल दिल्ली जल बोर्ड की जेब से जाते 160 करोड़ रुपये.

 

ये आपका पैसा था जो दिल्ली में मुफ्त पानी बांटने के लिए साधारण सब्सिडी से ज्यादा खर्च किया गया. इस बार भी केजरीवाल इस खर्च पर सवाल उठ सकते हैं लेकिन आम आदमी पार्टी का कहना है कि वादा किया है तो निभाएंगे. केजरीवाल के मुफ्त पानी के वादे पर कई और सवाल हैं जो अनसुलझे हैं.

 

क्या सबको पानी मिलेगा?

दिल्ली की जनसंख्या 1.8 करोड़ है. इसमें से 50 लाख लोगों के पास पानी की पाइपलाइन नहीं पहुंचती. क्या इन्हें पीने का पानी कैसे मिलेगा? क्या मुफ्त पानी से पैसे बरबाद होंगे? दिल्ली जलबोर्ड की सालाना मुनाफा 1000 करोड़ रुपये हैं. लेकिन इसमें से सीवेज और पानी पर 446 करोड़ सब्सिडी में खर्च किया गया. इस पैसे का इस्तेमाल 50 लाख लोगों तक पाइपलाइन पहुंचाने में हो सकता है. इससे 7 लाख झुग्गीवासी को भी पीने का पानी मिल सकता है.

 

अगर यकीन नहीं होता तो महाराष्ट्र के मलकापुर की कहानी सुन लीजिए. मलकापुर में साल के 365 दिन 24 घंटे पानी आता है. 40 हजार की आबादी वाले मलकापुर ने इस प्रोजेक्ट पर महज 13 करोड़ रुपये खर्च किए. अगर यही हिसाब 50 लाख की आबादी के लिए लगाएं तो महज 1600 करोड़ में हर घर को पानी मिल सकता है यानी इसके लिए जलबोर्ड के दो साल का मुनाफा ही काफी होगा.

 

टैंकर माफियाओं पर कड़ाई और बिना पाइपलाइन वाले इलाकों में पानी बंटवाकर अरविंद केजरीवाल ने वाहवाही तो कमाई है लेकिन ऐसे फैसलों से दिल्ली को ग्लोबल सिटी बनाने का वादा कैसे पूरा करेंगे केजरीवाल?

 

अब बात केजरीवाल के नए वादों की. सबसे पहले दिल्ली में सबसे ज्यादा चर्चित हुए वादे की पड़ताल जो दिल्ली को फ्री वाई-फाई देने का सपना दिखा रहा है.

 

दिल्ली का दिल धड़क रहा है. दिल्ली को ग्लोबल सिटी बनाने और महिलाओं की सुरक्षा के वादे के साथ केजरीवाल ने दिल्ली को फ्री वाई-फाई जोन में बदलने का वादा भी किया है. लेकिन क्या ये वादा पूरा होगा.

 

जरा तुलना कीजिए

एक तरफ है दिल्ली और दूसरी तरफ है अमेरिका का शहर मिनेपोलिस. दिल्ली का क्षेत्रफल है करीब 1500 वर्ग किमी जबकि मिनेपोलिस का 150 वर्ग किलोमीटर. दिल्ली का आबादी है 1.8 करोड़ और मिनेपोलिस की आबादी है 4 लाख.

 

मिनेपोलिस पूरी तरह वाईफाई जोन है जिस पर कुल खर्च आया है 25 मिलियन डॉलर यानी करीब 150 करोड़ रुपये . अब अगर क्षेत्रफल के लिहाज से देखें तो दिल्ली को वाई-फाई बनाने के लिए 10 गुना ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ सकता है यानी करीब 1500 करोड़ रुपये. यही नहीं सालाना मेंटिनेस का खर्च भी 2 लाख डॉलर है यानी करीब सवा करोड़ रुपये. ज्यादा आबादी के लिए मेंटिनेस भी महंगा हो सकता है.

 

अमेरिका को छोड़िए. भारत की मिसाल देखिए. प्रधानमंत्री मोदी के चुनावी क्षेत्र के इन दो घाटों को भी इसी हफ्ते फ्री वाई-फाई जोन बनाया गया है. दशाश्वमेध घाट और शीतला घाट पर फ्री वाई-फाई की योजना लागू हो गई है. प्रधानमंत्री के चुनावी क्षेत्र में फ्री वाई-फाई के लिए करीब 100 करोड़ रुपये का खर्च आया है.

 

ऐसे में क्या केजरीवाल उस दिल्ली के महज 37 हजार करोड़ के बजट से मोटी रकम दिल्ली की हवाओं में तैरते इंटरनेट पर खर्च करने जा रहे हैं. दिल्ली के युवा वोटरों के लिए केजरीवाल को प्राइवेट खिलाड़ियों से भी जूझना है और ऐसे में देखना ये होगा कि दिल्ली में कब तक फ्री वाईफाई होता है.

 

इस बात का भी खुलासा नहीं किया गया है कि फ्री वाई-फाई होगा तो उसकी क्या सीमा तय होती है. वाराणसी में फ्री वाईफाई के लिए सीमा तय की गई है. 30 मिनट तक वाई-फाई का इस्तेमाल मुफ्त होगा. इसके बाद के लिए कंपनियों के डाटा कार्ड दिए जाएंगे जिसमें 30 मिनट के लिए 20 रुपये, 60 मिनट के लिए 30 रुपये, 120 मिनट के लिए 50 रुपये, पूरे दिन के लिए 70 रुपये आपको अपनी जेब से खर्च करने पड़ेंगे.

 

मोदी को वाराणसी में 24 घंटे का मुफ्त वाई फाई दे नहीं पाए हैं. अब देखना है कि केजरीवाल का मुफ्त वाई-फाई वाकई में मुफ्त होगा या फिर वोट के बाद आपकी जेब पर भी चलेगी झाड़ू.

 

दिल्ली में महिला सुरक्षा पर भी सभी पार्टियों का जोर था. अपने घोषणापत्र ने केजरीवाल की पार्टी ने इसके लिए सबसे बड़ा ऐलान ये किया था कि पूरी दिल्ली में 15 लाख सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएंगे. ये वादा पूरा होगा?

 

केजरीवाल ने जो वादा किया था उसके मुताबिक महिला सुरक्षा के लिए ना सिर्फ दिल्ली में 15 लाख सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएंगे बल्कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए मोबाइल पर एक बटन भी होगा जिसे दबाते ही उस इलाके में पुलिस की कार्रवाई होगी. यानी सीसीटीवी और मोबाइल को मिलाकर एक सुरक्षा चक्र बनाया जाएगा. केजरीवाल के चुनाव अभियान में ये वादा बार बार महिलाओं की तालियां बटोरता रहा है लेकिन क्या दिल्ली की तिजोरी इसका बोझ सहने के लिए तैयार है.

 

जरा देखिए आम तौर पर सबसे सस्ते सीसीटीवी कैमरे की कीमत है 1200 रुपये. इस हिसाब से 15 लाख सीसीटीवी कैमरों की कीमत होगी करीब 200 करोड़ रुपये. अगर ज्यादा खरीद पर 50 फीसदी छूट भी मिली तो ये कीमत 100 करोड़ रुपये तो होगी ही.

 

लेकिन ये सिर्फ सीसीटीवी कैमरे की कीमत है. इसके बाद केजरीवाल की टीम को जरूरत होगी सर्वर और मेंटिनेंस की. कैमरों की मॉनीटरिंग के लिए 1 लाख से ज्यादा लोगों की. उन्हें तनख्वाह कहां से दी जाएगी.

 

एक अनुमान और लगाइए. मुंबई में 26/11  के हमले के बाद कुछ ऐसी ही कोशिश मुंबई में ही हुई थी ताकि कोई आतंकी हमला ना हो और अगर हो तो उसके सुराग मिल जाएं. योजना के तहत 6000 सीसीटीवी कैमरे लगाए गए, इस प्रोजेक्ट पर मुंबई ने 950 करोड़ रुपये खर्च किए, दिल्ली में इससे 250 गुना ज्यादा सीसीटीवी कैमरे लगने हैं. ऐसे में दिल्ली के प्रोजेक्ट पर खर्च आएगा 2 लाख 37 हजार करोड़ रुपए.

 

सवाल ये है कि केजरीवाल ये पैसे कहां से लाएंगे. वादे करना तो आसान है लेकिन जिस दिल्ली के सीएम की कुर्सी पर वो बैठेंगे उसका कुल सालाना बजट 37 हजार करोड़ ही है यानी केजरीवाल अगले पांच साल के बजट का सारा पैसा अगर सीसीटीवी लगाने पर ही खर्च कर दें तब भी पूरा नहीं होगा केजरीवाल का ये वादा. लेकिन आम आदमी पार्टी अब भी भरोसा दिला रही है.

 

आम आदमी पार्टी भले ही हर वादे के पीछे पूरी पड़ताल का दावा कर रही है लेकिन सच ये भी है कि अमेरिका के बोस्टन शहर में सिर्फ 500 कैमरे लगाने में 10 साल का वक्त लगा था. ऐसे में पांच साल में केजरीवाल ये करिश्मा कैसे करेंगे ये देखना होगा.

 

केजरीवाल ने उन कर्मचारियों से भी वादा किया है जो दिल्ली में अस्थायी नौकरी यानी दिहाड़ी पर नौकरी कर रहे हैं. ऐसे करीब एक लाख कर्मचारियों को जिसमें होमगार्ड भी शामिल हैं केजरीवाल पक्की नौकरी का वादा कर सत्ता में आए हैं. क्या ये वादा पूरा होगा?

 

इस भीड़ में जाने कितने ऐसे होंगे जिन्हें ये भी पता नहीं कि उनका कल कैसा होगा. उनके पास नौकरी रहेगी या नहीं. हर सरकार में ऐसे कर्मचारी काम करते हैं जो पर्मानेंट या नियमित नहीं होते. दिल्ली में ये तादाद एक लाख से ऊपर है. केजरीवाल की जीत के बाद दिल्ली जश्न में डूबी तो ऐसे कर्मचारियों को जैसे मन मांगी मुराद मिल गई हो. केजरीवाल का वादा उनके लिए भविष्य की चाभी बन गया है. लेकिन ये वादा किसी भी सरकार के लिए पूरा करना आसान नहीं है. दरअसल इसका सीधा रिश्ता सरकार के खजाने से जुड़ा है.

 

दिल्ली सरकार के श्रम विभाग के मुताबिक कांट्रेक्ट पर काम करने वाले अकुशल मजदूरों को हर महीने करीब 7 हजार 700 रुपये दिए जाते हैं. वहीं ग्रेजुएट कामगारों को कांन्ट्रेक्ट पर काम करने के लिए हर महीने करीब 10 हजार रुपये मिलते हैं.

 

अगर 9000 के औसत से एक मोटा अनुमान भी लगाएं तो एक लाख कर्मचारियों पर दिल्ली सरकार हर महीने 90 करोड़ रुपये खर्च करती है. यानी साल भर में करीब 1000 करोड़ रुपये.

 

अस्थायी कर्मचारियों का ये खर्च का ये बोझ अरविंद केजरीवाल की सरकार में आने वाले विभागों को भी उठाना है लेकिन अगर अरविंद केजरीवाल कान्ट्रैक्ट पर काम करने वालों को पर्मानेंट करते हैं तो उन्हें सातवें वेतन आयोग के हिसाब से पूरी तनख्वाह देनी होगी.

 

जरा एक बार फिर हिसाब लगाइए. दिल्ली में कुल अस्थायी कर्मचारी हैं करीब 1 लाख. वेतन आयोग के मुताबिक कम से कम तनख्वाह है 21 हजार रुपये. यानी दिल्ली सरकार को हर महीने खर्च करने पड़ेंगे करीब 210 करोड़ रुपये. यानी एक साल में सरकार पर पड़ेगा करीब 2500 करोड़ रुपये का बोझ.

 

यानी सिर्फ अस्थायी कर्मचारियों के लिए केजरी वाल सरकार दिल्ली की जेब पर पहले के मुकाबले डेढ़ हजार करोड़ रुपये ज्यादा खर्च करने की तैयारी में हैं. लेकिन जरा सोचिए दिल्ली की जेब पर पड़ने वाला डेढ़ हजार करोड़ का ये बोझ बाकी वादों पर होने वाले खर्चों के साथ कैसे उठाएगी केजरीवाल सरकार?

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