राजनीति की फलक पर चमकता नया सितारा केजरीवाल

By: | Last Updated: Tuesday, 10 February 2015 11:50 AM
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नई दिल्ली: साल 2011 से 2014 के बीच केजरीवाल की पहली पारी में देश की राजधानी दिल्ली ने जिस शख्स को आंदोलन से लेकर राजनीति की टेढ़ी मेढ़ी गलियों में मंजिल तलाशते देखा था वो साल 2015 में अपनी दूसरी पारी एक बड़ी कामयाबी के साथ शुरू कर रहा है.

 

साल 2014 में अरविंद केजरीवाल अपनी 49 दिन की सरकार गिरा चुके थे. सपना देखा राष्ट्रीय राजनीति में जगह बनाने का. नरेंद्र मोदी के खिलाफ वाराणसी में चुनाव मैदान में उतरे और मुंह की खाई.

 

आम आदमी पार्टी के 400 से ज्यादा उम्मीदवारों की पूरे देश में जमानत तक जब्त हो गई. केजरीवाल का मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा उनके लिए कुंआ बन गया था और मोदी की लहर गहरी खाई.

 

केजरीवाल के सामने कुएं से निकलकर खाई को पार करते हुए दोबारा दिल्ली की जमीन तलाशने की चुनौती थी. केजरीवाल ने उस चुनौती को आज एक बड़ी जीत में बदल दिया है.

 

आम आदमी पार्टी ने दिल्ली विधानसभा की 70 सीटों में से 67 सीटें जीत ली हैं. सबसे बड़ी विरोधी बीजेपी दिल्ली में अपनी सबसे बड़ी हार के साथ महज 3 सीट पर सिमट गई और 15 साल शासन करने वाली कांग्रेस को दिल्ली ने भुला दिया है.

 

अरविंद केजरीवाल : नए दौर की राजनीति के नायक 

केजरीवाल की कामयाबी की कहानी सिर्फ उनकी नहीं रही. इसे हर राजनीतिक पंडित समझने की कोशिश कर रहा है कि आखिर क्या है केजरीवाल के बढ़े हुए कद, उनके काम और करिश्मों का फार्मूला.

 

आम आदमी के चुनाव अभियान का नारा बना पांच साल केजरीवाल. दरअसल केजरीवाल के खिलाफ जो सबसे बड़ा इल्जाम था वो था कि पिछली बार केजरीवाल ने महज 49 दिनों बाद मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था. नेताओं की परंपरागत छवि के उलट केजरीवाल ने माफी मांगने में देर नहीं की. ये केजरीवाल का मास्टरस्ट्रोक था.

 

दूसरी बड़ी चुनौती खड़ी थी पार्टी को बिखराव से निकालना. अश्विनी उपाध्याय, विनोद कुमार बिन्नी, एमएस धीर, शाजिया इल्मी जैसे कई चेहरों ने एक एक कर उनका साथ छोड़ दिया. लेकिन केजरीवाल ने हिम्मत नहीं हारी. नए कार्यकर्ता जोड़े गए- मजबूत नेटवर्क तैयार किया गया.

 

केजरीवाल ने वोटरों से वादे किए और ताल ठोंक कर किए. आम आदमी पार्टी के 70 वादों वाले घोषणापत्र ने दिल्ली को ये बता दिया कि उन्हें केजरीवाल क्या देने वाले हैं. सस्ती बिजली, मुफ्त पानी, रोजगार और पक्के मकान-पक्की नौकरी जैसे ढेरों वादे के साथ केजरीवाल ने अपने उन्हीं 49 दिनों के कामकाज की मिसाल भी दी. इन वादों का टारगेट था उनका परंपरागत वोटर.

 

अरविंद केजरीवाल को जेड श्रेणी की सुरक्षा 

राजधानी दिल्ली का आर के पुरम विधानसभा क्षेत्र.  यहां पर काफी बड़ी तादाद में केंद्रीय सरकार के कर्मचारी रहते हैं. माना जाता है कि ऐसे इलाके पर मध्यवर्ग की पार्टी मानी जाने वाली बीजेपी का असर ज्यादा होता है लेकिन यहां भी इस बार आप ने बाजी मारी है. और तो और उच्च आयवर्ग के मतदाताओं के बीच आम आदमी पार्टी पैठ बनाने में कामयाब रही. आरके पुरम में आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार ने बीजेपी उम्मीदवार को करीब 20 हजार वोटों से हराया.

 

केजरीवाल की कामयाबी एकतरफा नहीं थी. एक मजबूत विरोधी भी मैदान में था– मोदी का नाम. जिस पर महाराष्ट्र जैसा बड़ा राज्य और हरियाणा जैसा मजबूत कांग्रेसी किला ढह चुका था. बीजेपी और खुद मोदी ने बिना नाम लिए अरविंद केजरीवाल पर तीखे हमले भी किए लेकिन केजरीवाल को पता था कि मोदी की लोकप्रियता पर हमला करने की बजाए मुद्दों की राजनीति ज्यादा कामयाब होगी.

 

केंद्र के साथ टकराव नहीं, सहयोग करेंगे: आप 

बीजेपी शुरू से कहती रही कि दिल्ली में सीएम का कोई उम्मीदवार नहीं होगा लेकिन चुनाव से ठीक पहले 15 जनवरी को पार्टी ने किरन बेदी को दिल्ली में अपना चेहरा बनाने का फैसला किया. किरन उस अन्ना आंदोलन से निकलकर आई हैं जिसके अहम किरदार थे अरविंद केजरीवाल. अन्ना के दो पुराने साथी आमने सामने थे लेकिन केजरीवाल की राजनीति के सामने बेदी बौना साबित हो गईं.

 

आम आदमी पार्टी की दूसरी पारी की शुरूआत भले ही 10 फरवरी को हो रही है लेकिन इसकी तैयारी केजरीवाल ने वाराणसी में मोदी के खिलाफ लोकसभा चुनाव हारने के बाद ही शुरू कर दी थी. 49 दिन की सरकार छोड़ने के बाद जिस तरह से केजरीवाल ने लोकसभा चुनाव लड़ा था उसे लेकर केजरीवाल पर राजनीतिक हमले हुए. उन्हें जल्दबाज कहा गया. इसके बाद केजरीवाल ने अपना पूरा ध्यान दिल्ली पर लगा दिया.

 

केजरीवाल की पार्टी ने निर्वाचन आयोग की चुनावी प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही पार्टी ने अपने उम्मीदवारों का नाम का एलान कर दिया था. इससे उम्मीदवारों को अपने इलाके में मतदाताओं में पैठ बनाने के लिए खूब वक्त मिला. यही नहीं मोदी की चाय पर चर्चा की तर्ज पर दिल्ली डायलॉग के नाम से रायशुमारी भी होती रही और अपनी बात पहुंचाते रहने की तैयारी भी चलती रही.

 

दिल्ली चुनाव: सत्ता में ‘आम आदमी’ की धमाकेदार वापसी 

अलग तरह की राजनीति के पैरोकार केजरीवाल ने परंपरागत राजनीति से भी सीख ली. टिकट बांटने में अपनी छवि के उलट आम आदमी पार्टी ने जातीय समीकरण का खास ख्याल रखा. दिल्ली की उत्तर और पश्चिम ग्रामीण सीटों में आप ने जाति विशेष को ध्यान में रख कर टिकट बांटा. इतना ही नहीं आप ने पूर्वांचल के 40 लाख मतदाताओं का ध्यान रख कर पूरब के उम्मीदवारों को बड़ी संख्या में मैदान में उतारा.

 

कांग्रेस इस चुनाव में 8 से शून्य पर आ गई. कांग्रेस का परंपरागत वोट बीजेपी विरोधी केजरीवाल के पास आ गया. पिछली बार की तरह इस बार मुस्लिम मतदाताओं के सामने दो में से एक को चुनने जैसा संकट नहीं था. इससे आप के जनाधार में भारी इजाफा हुआ.

 

केजरीवाल की पार्टी पर फर्जी कंपनियों से 2 करोड़ का चंदा लेने का इल्जाम लगा वो भी मतदान की तारीख से महज हफ्ते भर के भीतर. लेकिन केजरीवाल ने इस पर चुप्पी नहीं साधी. इस पर केजरीवाल ने खुद को जेल भेजने की बात कहकर एक ठेठ मंझे हुए राजनीतिज्ञ की तरह इल्जाम को भी अपने पक्ष में मोड़ लिया.

 

केजरीवाल ने नुपुर शर्मा को 31 हजार से ज़्यादा मतों से हराया  

मतदान की आखिरी रात तक केजरीवाल की लड़ाई जारी रही. 3 से 4 के समूह में कार्यकर्ता झुग्गी बस्तियों की गलियों में उतर पड़े, खुफिया कैमरा लेकर घूमने का प्रचार किया गया ताकि शराब और पैसे ना बांटे जा सकें.

 

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