मुनव्वर राना को उनके मित्र डॉ. अशोक चक्रधर की सलाह

By: | Last Updated: Wednesday, 21 October 2015 1:09 PM
Ashok Chakradhar advice to munavvar rana

नई दिल्ली: देश के मौजूदा हालात पर अपनी नाखुशी का इज़हार करते हुए उर्दू के लोकप्रिय शायर मुनव्वर राना ने ABP न्यूज के कार्यक्रम #साहित्यकारVsसरकार के दौरान अपना साहित्य अकादमी अवॉर्ड लौटा दिया था. मुनव्वर राना ने अवॉर्ड के साथ एक लाख का चेक भी लौटा दिया था. अब मुनव्वर राना के साहित्यकार दोस्त और मशहूर हिंदी कवि अशोक चक्रधर ने फेसबुक पर व्यंग के जरिए अपनी राय रखी है. हम उसे ज्यों का त्यों आपके सामने रख रहे हैं.

 

बेचैनी करें लेखनी के हवाले

 

चौं रे चम्पू! मुनव्वर राना कैसे कबी ऐं?

मुनव्वर राणा हमारे देश की वाचिक परम्परा का एक महत्त्वपूर्ण नाम है. चचा, मुझे यह कहते हुए कोई संकोच नहीं है कि उन्होंने गंगा-जमुनी, चोली-दामनी और दूध-शकरी तहज़ीब के मिले-जुले कविसम्मेलन और मुशायरों को बहुत आगे बढ़ाया. लोगों को उनका सधुक्कड़ी-फ़क़ीरी अंदाज़ बहुत भाया. धीरे-धीरे ऐसा होने लगा कि मुनव्वर राणा हर अच्छे कविसम्मेलन की ज़रूरत बनते गए.

 

उसका कारण यह था कि उनके अशआर भारत में धर्म और जात-पांत से ऊपर उठकर सबको परिवारीजन की तरह एकजुट रहने का संदेश देते रहे. वे बताते रहे कि मां, बहन, बेटियां हमारे हृदय की झंकारें हैं. बिना किसी लतीफ़े या लफ़्फ़ाज़ी के वे माइक पर आते ही शेर सुनाना प्रारम्भ कर देते हैं. शेर में चूंकि आत्मीयता और ख़ुद्दारी का दम होता है इसलिए हर वर्ग और हर धर्म के श्रोता द्वारा पसंद किया जाता है.

भौत भावुक कबी ऐं का?

भावुक तो हर कवि-साहित्यकार होता है चचा! मंच पर जाने वाले कवि थोड़े ज़्यादा भावुक होते हैं.नहीं भी होते हैं तो सामईन के दिलों में उतरने के लिए भावुकता की ओढ़नी ओढ़नी पड़ती है. अगर भावुकता न दिखाएं तो श्रोताओं द्वारा सुने ही न जाएं. यही उनका कौशल होता है कि भावुकता की चाशनी में समझदारी परोस देते हैं.

 

फिर उन्नैं दो तरियां की बात चौं करीं? पैलै उन्नैं पुरस्कार लौटाइबे वारेन कौ बिरोध कियौ फिर खुदऊ लौटाय दियौ?

इस बात का उत्तर वे स्वयं भी नहीं दे पाएंगे चचा. बुद्धिमानी परोसना हर साहित्यकार का धर्म है, परेशानी तब आती है जब उस ओढ़ी हुई भावुकता के कारण बुद्धि से परे के राजनीतिक धार्मिक दबावों को निभाना भी पड़ जाता है. वहीं चूक हो जाती है क्योंकि बुद्धि और बुद्धिहीनता के बीच पिसना हो जाता है. पहले उन्होंने कहा कि जो लोग पुरस्कार लौटा रहे हैं, वे हारे-थके हुए लोग हैं.

 

अवार्ड लौटाना बड़ी बात नहीं है, बड़ी बात यह है कि आप अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज को सुधारें. लेकिन चार दिन बाद ही उन्हें लगा कि वे उन मुसलमानों को क्या जवाब देंगे, जिनके दिमाग़ में ये बात ज़हर की तरह डाल दी गई है कि वे सुरक्षित नहीं हैं. चार दिन के बाद ही अवार्ड उन्हें बोझ लगने लगा. गंगो-जमन तहज़ीब का पैरोकार अपने काल्पनिक डर का साधारणीकरण करने लगा कि कोई उनके घर में आकर हत्या कर सकता है. मालूम है पाकिस्तान में उन्होंने क्या कहा था?

 

बता का कही?

पाकिस्तान में उनसे किसी ने पूछा कि आप रहबराने वतन पर इतने तंज़ करते हैं, हिंदुस्तान मेंआप महफ़ूज़ तो हैं? उन्होंने उत्तर दिया हिंदुस्तान के सत्तर करोड़ हिंदू मेरी हिफ़ाज़त कर रहे हैं, मुझे कोई ख़ौफ़ नहीं. अब क्या हो गया मुनव्वर भाई? सत्तर करोड़ को भूल गए, महज़ सत्तर से डर गए! कहीं ऐसा तो नहीं कि जिन वैल्यूज़ के लिए लड़ रहे थे उन्हें छोड़ कर वक़्त की सियासी आंधी के आगे हार मान ली!

 

तौ तेरौ कहिबे कौ जे मतलब ऐ का कै बिरोध करिबे वारे गल्त ऐं?

नहीं चचा, हरगिज़ नहीं! मैं अधिकांश को जानता हूं. सबके अलग-अलग कारण हैं. उन कारणों के अंतःप्रकोष्ठ में जाएंगे तो अलग-अलग कहानियां मिलेंगी. इसलिए सरलीकरण मत करिए. इंतज़ार करिए तेईस तारीख़ का.

 

चौं तेईस कूं का ऐ?

तेईस को दो चीज़ें हैं. पहली ये कि राष्ट्रपति भवन में संगीत नाटक अकादमी के पुरस्कार दिए जाने वाले हैं. देश में अगर इतने बुरे हालात हैं तो एक भी कलाकार, नाटककार और साहित्यकार को पुरस्कार लेने नहीं जाना चाहिए. चौबीस तारीख को लौटाने का कोई फायदा नहीं है. तेईस को ही साहित्य अकादमी साहित्यकारों की एक आपातकालीन सभा कर रही है कि इस स्थिति में क्या किया जाए.

 

मेरी मुनव्वर भाई से सार्वजनिक अपील है कि कृपया इस तरह के भय को किसी कौम का भय न बनने दें. ये कवियों साहित्यकारों की ज़िम्मेदारी है कि देश में शांति, सुकून, सद्भाव, सहिष्णुता, सौहार्द, सौमनस्य और सद्भाव की रक्षा करें. भयाक्रांत न हों, न होने दें. भय की भंजना करें, अतिरंजना नहीं. टीआरपी के खेल से देश को अवगत कराएं. फ़ितरती हिंसा से लड़ने की व्यापक दीक्षा दें. अपने दिल-दिमाग़ की बेचैनी करें लेखनी के हवाले. अपने ऊपर लादी हुई भावुकता की चट्टान तले दब न जाएं. मैंने एक बड़े शायर बशीर बद्र को इस बोझ के तले दबते हुए देखा है.

 

आप डॉ. अशोक चक्रधर के इस पोस्ट को इस लिंक पर क्लिक करके भी पढ़ सकते हैं

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