‘हत्यारे’ औरंगजेब का महिमामंडन क्यों?

By: | Last Updated: Saturday, 29 August 2015 3:14 PM
Aurangzeb road

राजधानी दिल्ली में एक रोड का नाम औरंगजेब रोड है. जिसका नाम बदलकर पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के नाम पर कर दिया गया. इस बात से कुछ लोग ‘आहत’ हैं. इनमें असदुद्दीन ओवैसी से लेकर मार्क्सवादी इतिहासकार इरफान हबीब तक शामिल हैं. उनकी नाराजगी जानने से पहले इस बात पर गौर करना जरूरी है कि किसी सार्वजनिक भवन, सड़क अथवा पार्क के नामकरण के पीछे तर्क क्या होता है?

 

व्यक्तिगत आचरण से लेकर सार्वजनिक जीवन में जो लोग सार्वभौमिक मूल्यों के अनुकूल एक नया मापदंड बनाते हैं वे समाज में अनुकरणीय बन जाते हैं. नामकरण के पीछे दो तर्क होता है. पहला, ऐसे लोगों के प्रति कृतज्ञता का ज्ञापन और दूसरा उनके कर्तृत्व एवं व्यक्तित्व को पीढि़यों के सामने जीवंत और ज्वलंत उदाहरण बनाए रखना. सड़क, उद्यान, सार्वजनिक भवनों के नामों पर बार-बार ध्यान जाता है और हमारी उपचेतना में उसका सहज रूप से असर होता है. हमें अपने आचरण एवं जीवन मूल्यों को सरोकार युक्त बनाने की प्रेरणा मिलती रहती है. ये सरोकार समाज, राष्ट्र एवं मानवता एवं सार्वभौम मूल्यों के प्रति होता है.

 

 

औरंगजेब रोड का नामकरण जिस व्यक्ति के नाम पर है उसका व्यक्तिगत आचरण और सार्वजनिक जीवन में मापदंड क्या था? वह एक मुगल शासक था. वह शासक कैसा था यह तो बाद की बात है. पहला सवाल है वह व्यक्ति कैसा था? ओवैसी या हबीब इस बात को नकार पाएंगे कि उसने अपने बीमार पिता शाहजहां को जीवन के अंतिम सांस तक बंदी बनाए रखा? अपने लाचार पिता को बंदी बनाने तक उसकी क्रूरता समाप्त नहीं होती है बल्कि उससे तो शुरू होती है. मुगल शासक शाहजहां के चार पुत्र थे. जिनमें सबसे बड़े पुत्र का नाम दारा शिकोह था. वह पिता और बहन जहांनारा का प्रिय पात्र तो था ही प्रजा में भी लोकप्रिय था. औरंगजेब ने उसे समुग्रह के युद्ध में 30 मई, 1658 को पराजित किया और उसकी हत्या 30 अगस्त, 1659 को कर दी. असंवेदनषीलता की सीमा देखिए औरंगजेब ने दारा के सिर को लाचार पिता को बंदीगृह में ‘भेंट’ दिया. दारा के पुत्र सुलेमान षिकोह जो पराजित हो चुका था उसे 30 वर्ष की आयु में तड़पा-तड़पा कर मारा गया.

 

औरंगजेब का शासन 49 वर्षों तक था. वह भारत के चरित्र को बदल देना चाहता था. ताकत का क्रूरतापूर्ण प्रयोग उसका मूल चरित्र था. हिन्दुओं को इस्लाम में धर्मांतरण उसका एक मुख्य उपक्रम था. यह कार्य इस्लाम के प्रचार-प्रसार से नहीं बल्कि भेदभाव, क्रूरता और अत्याचार के द्वारा करता था. किसी भी प्रकार का रूकावट उसके लिए असहनीय था. यह किस सीमा तक थी उसका उदाहरण सिखों के नवें गुरू तेगबहादुर (1621-1675) के प्रति उसके फरमान से पता चलता है. तेगबहादुर धर्म रक्षा के लिए एक कटिबद्ध आध्यात्मिक पुरूष थे. वे साहस और अटल व्यक्तित्व के अनुपम उदाहरण थे. वे औरंगजेब के सामने जब नहीं झुके तब उनकी हत्या का फरमान जारी कर दिया गया. सिर काटकर 24 नवम्बर, 1675 को यह कुकृत्य पूरा किया गया. औरंगजेब दुनिया का पहला साम्प्रदायिक फासीवादी शासक था. मार्क्सवादी इतिहासकार इस हत्यारे शासक को ‘उदार’ साबित करने में पिछले साठ सालों से लगे रहे हैं. एक तर्क दिया जाता है कि उसके दरबार में 30 प्रतिषत से अधिक नोब्लस (नौकरषाही) थे. हिन्दू बहुल देष में कोई शासक क्रूर हो या उदार उसे तो हिन्दुओं पर निर्भर रहना ही होगा. अंग्रेजों के प्रशासन में तो 90 प्रतिषत हिन्दुस्तानी थे. तब तो उस तर्क के आधार पर अंग्रेज शासन ‘भारतीय’ और ‘लोकतांत्रिक’ मान लिया जाए?

 

 

हिन्दुओं पर उसने जजिया टैक्स क्यों लगाया था? धर्म के आधार पर वैधानिक रूप से भेदभाव का इसका क्या कोई और दूसरा उदाहरण है?

 

भारतीय पंथनिरपेक्ष विमर्श का खोखलापन का एक उदाहरण हत्यारे औरंगजेब का महिमामंडन और उदार दारा शिकोह की उपेक्षा है. दारा शिकोह सिर्फ उदार व्यक्ति ही नहीं था बल्कि ‘एकं सत विप्रा बहुधा वदन्ति’ के भारतीय अधिष्ठान (मूल विचार) का एक सारथी भी था. वह हिन्दू सभ्यता, संस्कृति और बौद्धिकता को समझना चाहता था. उसने संस्कृत सीखा. उसने उपनिषदों का फारसी में अनुवाद किया. उसका संस्कृत एवं वैदिक विद्वानों के साथ लगातार संवाद चलता था. मन, मानसिकता, बौद्धिकता और उदारता के प्रतीक को क्यों नहीं अपेक्षित स्थान मिला? वस्तुतः दारा शिकोह जिन्नावादी राजनीति एवं मार्क्सवादी-नेहरूवादी इतिहास को न स्वीकार्य था न है. दारा शिकोह इस्लाम के भारतीयकरण और सम्प्रदाय के सांस्कृतिकरण का एक प्रतीक मात्र नहीं बल्कि एक पथ है और अब्दुल कलाम इसी पथ के एक पथिक हैं. उस पथिक के नाम पर औरंगजेब रोड का नामकरण इतिहास का शुद्धीकरण है, राष्ट्रीयकरण है और भारत की सामूहिक चेतना की अभिव्यक्ति है.

 

प्रो. राकेष सिन्हा, मानद निदेशक, भारत नीति प्रतिष्ठान

 

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