बापू हमें माफ करना : जब महात्मा गांधी बोलने लगे तो तिलमिला गए थे राजकुमार

By: | Last Updated: Monday, 29 September 2014 2:49 PM
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नई दिल्ली : महात्मा गांधी भारत को स्वच्छ बनाना चाहते थे. लेकिन ऐसा हो ना सका और अब महात्मा के उसी पथ पर चलने का बीड़ा उठाया है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने. मौका था बनारस हिंदू विश्व विद्यालय के स्थापना दिवस का. गांधी जी तब 47 साल के थे. तब तक वह बापू नहीं बने थे. बीचयू के स्थापना दिवस के मौके पर वह मंच पर बैठे थे. उनके साथ ऐनी बेसेंट, पंडित मदन मोहन मालवीय और दरभंगा महाराज जैसी कई हस्तियां मौजूद थी. सामने कई राजा महराजा और प्रबुद्ध वर्ग के लोग बैठे हुए थे. मंच से कुछ बोलने की बारी मोहनदास करम चंद गांधी की थी. सभी को उम्मीद थी कि बीएचयू के स्थापना दिवस पर वह शिक्षा के विषय में बोलेगे लेकिन उन्होंने जो बोला उसे सुनकर वहां बैठे सभी लोग हैरान रह गए.

47 साल के गांधी का मंच से भाषण. बीएचयू की स्थापना का मौका. मंच पर ऐनी बेसेंट, पंडित मदन मोहन मालवीय और दरभंगा महाराज. सामने बैठे हुए थे बड़ी संख्या में राजा-महाराजा और प्रबुद्ध लोग.

 

6 फरवरी, 1916

वाराणसी ..कल मैं बाबा विश्वनाथ के दर्शन के लिए गया था. जिन गलियों से मैं जा रहा था उसे देखते हुए मैं यही सोच रहा था कि अगर कोई अजनबी इस महान मंदिर में अचानक आ जाए तो हिंदुओं के बारे में वह क्या सोचेगा. अगर वह हमारी निंदा करेगा, तो क्या वह गलत होगा? इस मंदिर की जो हालत है क्या वह हमारे चरित्र को नहीं दिखा रही.

 

करीब 100 साल पहले महात्मा गांधी का दिया गया ये भाषण भारत में उनका पहला सार्वजनिक भाषण था. तब उन्होंने  गंदगी का जिक्र किया था. हिन्दुओं के सबसे पवित्र तीर्थ स्थानों में से एक बनारस का. शिव की नगरी काशी का. मोक्ष की धरती काशी का. जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति की धरती. उस धरती पर कितनी गंदगी फैली है, उसका जिक्र गांधी जी अपने 1916 के इस भाषण में कर रहे थे.

 

बीएचयू की स्थापना के मौके पर महात्मा गांधी ने कहा था मैं ये बात एक हिन्दू की तरह बड़े दर्द के साथ कह रहा हूं. क्या ये कोई ठीक बात है कि हमारे पवित्र मंदिर के आसपास की गलियां इतनी गंदी हों? उसके आस-पास जो घर बने हुए हैं वे चाहे जैसे तैसे बने हों. गलियां टेढ़ी-मेढी और संकरी हों. अगर हमारे मंदिर भी सादगी और सफाई के नमूने न हों तो हमारा स्वराज्य कैसा होगा? अगर अंग्रेज यहां से बोरिया बिस्तर बांध के चले भी गए तो क्या हमारे मंदिर पवित्रता, स्वच्छता और शांति के धाम बन जाएंगे.

 

ये भाषण महात्मा गांधी ने बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी- बीएचयू की स्थापना के मौके पर दिया था. बीएचयू को बनाने का जिम्मा उठाया था कांग्रेस के बड़े नेता पंडित मदन मोहन मालवीय ने. पंडित मालवीय बीएचयू को दुनिया का सबसे अच्छा विश्वविद्यालय बनाना चाहते थे. मौके पर मौजूद लोगों को लगा कि लंदन में पढ़ाई-लिखाई कर चुके गांधी कुछ बड़ी बातें करेंगे.  पर गांधी तो गंदगी और साफ-सफाई जैसी मामूली बातों का पाठ पढ़ाने लगे. गांधी के भाषण में पूरा जोर था शहर में फैली गंदगी पर. आखिर गांधी धर्म नगरी की इस हालत को देखकर इतने दुखी क्यों थे? 

 

जिस मंच से गांधी भाषण दे रहे थे वहां मौजूद लोगों में उनका चेहरा थोड़ा कम जाना पहचाना था. मंच पर ज्यादा बड़े मेहमान वे राजा और महाराजा थे जिनके पैसे से बीएचयू बना था. कांग्रेस के कई बड़े नेता भी मंच पर गांधी का भाषण सुन रहे थे. गांधी बिना लाग-लपेट के जो कुछ बोल रहे थे उसे अब सुन पाना मेहमानों के लिए मुश्किल हो रहा था. पहले तो गांधी ने अंग्रेजी में भाषण देने वालों की खिंचाई की. उसके बाद वह शान-ओ-शौकत की नुमाइश करने वाले राजा-महाराजाओं पर बरस पड़े.

 

महात्मा गांधी ने कहा मुझे हैरानी इस बात से हो रही है कि ये जो कार्यक्रम चल रहा है इसकी अध्यक्षता के लिए हम विदेशी जुबान का इस्तेमाल क्यों कर रहे हैं . क्या इस कार्यक्रम को चलाने के लिए हम अंग्रेजी की जगह हिन्दी में नहीं बोल सकते. मैं यहां मौजूद राजा-महाराजाओं की शान-ओ-शौकत को देख कर भी हैरान हूं. भारत तब तक मुक्त नहीं हो सकता जब तक कि आप लोग खुद को कीमती गहनों के भार से मुक्त कर देशवासियों के भरोसे को नहीं जीत लेते. 

 

गांधी अभी भाषण दे ही रहे थे कि बीएचयू की स्थापना में बड़ी भूमिका रखने वाले स्वतंत्रता सेनानी मदन मोहन मालवीय और ऐनी बेसेंट ने उन्हें रोकने की कोशिश की. महात्मा गांधी की गंदगी और साफ-सफाई की बातों को सुन कर गहनों से लदे राजकुमार गुस्से में वहां से निकल गए. इतना ही नहीं दरभंगा महाराज रामेश्वर सिंह ने सभा को ही तुरंत बरखास्त कर दिया.

 

मोहन दास करमचंद गांधी आखिर ऐसी बातें क्यों कर रहे थे? गांधी धार्मिक किस्म के व्यक्ति थे. तो क्या काशी की गंदगी को देख कर गांधी की धार्मिक भावना जाग उठी?  या फिर यूरोप और दक्षिण अफ्रीका में रह चुके गांधी वहां की साफ-सफाई की संस्कृति से प्रभावित थे?  

 

तब से अब तक सौ साल गुजर चुके हैं. क्या आस्था की काशी स्वच्छ और निर्मल बन गई? क्या विश्वनाथ मंदिर और वाराणसी की गलियां अब चमक उठी हैं. कितनी साफ और स्वच्छ है देश की धर्म नगरी ?

 

महात्मा गांधी ने गंदी गलियों का जिक्र किया था. आज भी हम देख सकते हैं मंदिर के आसपास की गलियां गंदगी से भरी हैं. सौ साल पहले भी यहां थीं तंग गलियां आज भी यहां कोई बदलाव नहीं हैं. मंदिर की सफाई में सुधार तो हुआ है लेकिन मंदिर से बाहर की दुनिया गंदगी से भरी है. महात्मा गांधी जिस पवित्रता और साफ सफाई की बात किया करते थे उसमें अभी भी कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है.

 

गांधी को 1916 में ही नहीं 1903 से ही काशी की गंदगी परेशान कर रही थी. मोहन दास करमचंद गांधी लंदन से पढ़ाई करने के बाद दक्षिण अफ्रीका में वकालत करने लगे थे. वकालत करते हुए ही वह अश्वेतों के अधिकार की लड़ाई में जुट गए थे. रंगभेद के खिलाफ आवाज बुलंद करने के बाद मोहन दास करमचंद गांधी 1903 में पहली बार वाराणसी आए. गांधी अभी महात्मा नहीं बने थे. गांधी जी काशी के विश्वनाथ मंदिर में पूजा के लिए निकले पर यहां जो कुछ उन्होंने देखा उससे उनका मन बेहद दुखी हो गया. मंदिर के बाहर मक्खियों का झुंड. दुकानदारों और तीर्थयात्रियों का शोर शराबा. ये सब उनके बर्दाश्त के बाहर था. गांधी अपनी डायरी में लिखते हैं- जिस जगह पर लोग ध्यान और शांति के माहौल की उम्मीद करते हैं, वहां यह बिल्कुल नदारद है. मंदिर पहुंचने पर मेरा सामना सड़े हुए फूलों की दुर्गंध से हुआ. मैंने देखा कि लोग सिक्कों को अपनी भक्ति का जरिया बनाया हुआ है, जिसकी वजह से न केवल संगमरमर के फर्श में दरारें दिखने लगी हैं, बल्कि इन सिक्कों पर धूल के जमने से वहां काफी गंदगी भी दिख रही थी. ईश्वर की तलाश में मैं मंदिर के पूरे परिसर में भटकता रहा, मगर मुझे धूल और गंदगी के सिवाय कुछ नहीं दिखा.

 

वाराणशी शहर की गंदगी ने यहां गंगा को भी मैली कर दी है. हर रोज 80 घाटों से पूजा सामग्री और कचरा यहां सीधे गंगा में गिरता है. घाटों पर कारोबार की पाबंदी है लेकिन धड़ल्ले से दुकानें चल रही हैं. वाराणसी में हर रोज 18 करोड़ लीटर गंदगी निकलती है जबकि सफाई सिर्फ 14 करोड़ लीटर पानी का ही हो पाती है. ट्रीटमेंट प्लांट बिजली की किल्लत की वजह से बंद रहते हैं. इसलिए हर रोज 4 करोड़ लीटर गंदगी सीधे गंगा में मिल रही है.

 

क्या है वाराणसी की गंदगी का समाधान?

 

गांधी जी 1903 के बाद 1916 में वाराणसी आए. देश बदल चुका था. गांधी दक्षिण अफ्रीका को छोड़ भारत आने का फैसला कर चुके थे. पर नहीं बदली काशी, 100 साल बाद भी नहीं बदला मोक्ष देने वाला ये शहर. पर ये हाल सिर्फ बनारस का नहीं है.

 

गंगा-यमुना और अदृश्य सरस्वती की त्रिवेणी का शहर इलाहाबाद. कुम्भ और अर्धकुम्भ का शहर इलाहाबाद. विद्या की देवी सरस्वती का शहर इलाहाबाद. मुग़ल बादशाहों और अंग्रेजों की पसंद का शहर इलाहाबाद. पूरब के आक्सफोर्ड के नाम से मशहूर सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी का शहर.

 

इलाहाबाद

17 नवंबर 1929

अभिनंदन समारोह

इलाहाबाद

 

यहां महात्मा गांधी ने कहा मुझे ये जानकर बड़ा धक्का लगा है कि हरिद्वार की तरह प्रयाग की पवित्र नदियां भी नगरपालिका के गंदे नालों के पानी से अपवित्र की जा रही हैं. इस खबर से मुझे काफी दुख हुआ है. इस प्रकार जिला बोर्ड पवित्र नदियों के पानी को गंदा ही नहीं करता बल्कि हजारों रुपया नदी में फेंकता है. नालियों के पानी का सही उपयोग किया जा सकता है. पर मुझे आश्चर्य होता है कि जिला बोर्ड ऐसा क्यों नहीं कर पा रहा है.

 

 

1929 तक 60 साल के महात्मा गांधी आजादी के आंदोलन के सबसे बड़े नेता बन चुके थे. अंग्रेजी हुकूमत से देश को आजाद कराने के लिए पूरा देश उनके साथ खड़ा था. महात्मा गांधी इलाहाबाद के एक कार्यक्रम में गरीबों के लिए चंदा लेने आए थे. पर यहां की गंदगी ने उन्हें परेशान कर दिया.

 

अस्पताल के बाहर कूड़े का ढेर. स्कूल के बाहर गंदगी का अम्बार. सरकारी दफ्तर के बाहर कचरे का जमावड़ा. बजबजाती नालियां, गन्दगी से पटी सड़कें. दीवारों पर पान की पीक और गली मोहल्लों में घूमते आवारा जानवर. ये उस शहर की तस्वीर है जिसकी गंदगी के बारे में 85 साल पहले महात्मा गांधी ने शिकायत की थी. मगर देश को पांच प्रधानमंत्री देने वाला ये इकलौता शहर आज भी गंदगी के ढेर पर ही बैठा है.

 

इलाहाबाद से हर रोज 20 करोड़ लीटर गंदगी निकलती है लेकिन सफाई का इंतजाम सिर्फ 8.9 करोड़ लीटर के लिए है. लिहाजा हर रोज तकरीबन 11 करोड़ लीटर सीवेज गंगा में गिर रहा है.

 

क्या है इलाहाबाद की गंदगी का समाधान?

वाराणसी में गांधी ने गंदगी का सवाल उठाया, प्रयाग गए तो संगम नगरी की गंदगी को देखकर परेशान हो गए. गंगा के किनारे बसे पहले वाराणसी फिर इलाहाबाद- क्या हरिद्वार का तजुर्बा भी गांधी के लिए इतना ही बुरा रहने वाला था!

 

इसमें कोई शक नहीं है कि हरिद्वार और दूसरे जाने-माने तीर्थस्थान एक समय सचमुच पवित्र थे. धर्म के प्रति मेरे मन में सहज प्रेम है और मैं प्राचीन संस्थाओं का हमेशा आदर करता हूं. लेकिन फिर भी इन तीर्थस्थानों में आदमी की बनाई किसी भी चीज में मुझे कोई आकर्षण दिखलाई नहीं दिया.

 

महात्मा गांधी 1929 में पहली बार नहीं दूसरी बार आए थे हरिद्वार. पहली बार वह 1915 में हरिद्वार आए थे जब महाकुंभ लगा था. गांधी जी के यंग इंडिया में लिखे लेख से पता चलता है कि तीर्थस्थानों को लेकर गांधी जी की जो कल्पना थी वैसा कुछ भी हरिद्वार में नहीं था. धार्मिक स्वभाव के गांधी को धर्म नगरी घूमते हुए झटका लग रहा था.

 

महात्मा गांधी ने लिखा कि पहली बार जब सन 1915 में मैं हरिद्वार गया था तब मैं वहां सर्वेंट ऑफ इंडिया सोसाइटी के अध्यक्ष पंडित हृदयनाथ कुंजरू के अधीन एक स्वयंसेवक की तरह गया था. मैं बड़ी-बड़ी आशाएं लगाकर और बड़ी श्रद्धा के साथ हरिद्वार गया था, लेकिन जहां एक ओर गंगा की निर्मल धारा ने और हिमाचल के पवित्र पर्वत शिखरों ने मुझे मोह लिया वहां दूसरी ओर इस पवित्र स्थान पर मनुष्य के कामों से मेरे हृयक को कुछ भी प्रेरणा नहीं मिली. पहले की तरह आज भी धर्म के नाम पर गंगा मैली की जाती है. अज्ञानी और विवेकशून्य स्त्री-पुरुष गंगातट पर जहां ईश्वर दर्शन के लिए ध्यान लगा कर बैठना चाहिए वहां पाखाना, पेशाब करते हैं. इन लोगों का ऐसा करना प्रकृति, आरोग्य और धर्म के नियमों का उल्लंघन करना है.

 

महात्मा गांधी यहीं नहीं रुकते हैं. धर्म और परंपरा के नाम पर जिस तरह से गंगा मैली की जाती है इसके बारे में भी गांधी जी आगे लिखते हैं. धर्म के नाम पर जान बूझ कर भी गंगा को गंदा किया जाता है. विधिवत पूजा कराने के लिए मुझे गंगातट पर ले जाया गया. जिस पानी को लाखों लोग पवित्र समझ कर पीते हैं, उसमें फूल, सूत, गुलाल, चावल, पंचामृत वगैरह चीजें इस विश्वास में डाली गईं कि ये एक पुण्य काम है. मैंने इसका विरोध किया तो जवाब मिला कि ये तो युगों से चली आ रही एक सनातन प्रथा है. इस सबके अलावा मैंने ये भी सुना है कि शहर की गंदी नालियों का गंदा पानी भी आकर नदी में मिलता है, वह एक बड़ा अपराध है.

 

महात्मा गांधी ने 100 साल पहले जिसे अपराध कहा, क्या हरिद्वार को ऐसे अपराधियों से मुक्ति मिल गई. सौ साल पहले जो गंदे नाले गंगा में मिलते थे क्या उससे गंगा मुक्त हो गई?

 

महात्मा गांधी ने यंग इंडिया में लिखे लेख के जरिए 1929 में जो तस्वीर खींची थी. 85 साल बाद आज भी हर रोज दुहराई जाती है वही तस्वीर. हजारों हजार टन फूल, माला, सूत, गुलाल, चावल, पंचामृत गंगा में यूं ही बहाए जाते हैं….गंगा हर रोज पहले से ज्यादा मैली होती है. केंद्रीय प्रदूषण बोर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक हरिद्वार में हर रोज 3.90 करोड़ लीटर सीवर निकलता है जबकि ट्रीटमेंट प्लांट की क्षमता सिर्फ 1.80 करोड़ लीटर ही है. यानी हर रोज 2.10 करोड़ लीटर गंदगी रोजाना बिना ट्रीटमेंट के गंगा में डाली जा रही है. गुरुकुल कांगड़ी यूनिवर्सिटी की रिसर्च में कहा गया है कि हर श्रद्धालु करीब 650 ग्राम पूजन सामग्री गंगा में डालता है. पिछली बार सिर्फ माघी पूर्णिमा के दिन करीब एक हजार टन पूजन सामग्री गंगा में बहा दी गई.

 

गांधी जी ने 1929 में जिस गंदगी के बारे में कहा था क्या उसमें बदलाव आया है? कैसे होगा सुधार, क्या गंदगी फैलाना हमारे चरित्र में है?

 

राष्ट्रपिता ने 100 साल पहले गंदगी और साफ सफाई को एक बड़ा मुद्दा बताया था. देश आजाद हुआ. 15 प्रधानमंत्री बन चुके हैं. पर आज भी चाहे हरिद्वार हो या इलाहाबाद या फिर वाराणसी- हालात नहीं बदले- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वाराणसी से सांसद हैं- उन्होंने वाराणसी ही नहीं गंगा को भी साफ करने का बीड़ा उठाया है- क्या महात्मा का साफ-सुथरे निर्मल भारत सपना पूरा होगा.

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Web Title: bapu forgive us for ganga
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