1993 का बंगाल गोलीकांड जलियांवाला बाग से भी भयानक: आयोग

By: | Last Updated: Monday, 29 December 2014 2:11 PM

कोलकाताः जस्टिस सुशांत चटर्जी आयोग ने सोमवार को कहा कि 21 जुलाई, 1993 को पुलिस द्वारा की गई गोलीबारी जलियांवाला बाग नरसंहार से भी भयानक थी. आयोग ने कहा है कि यह गोलीबारी बगैर किसी उकसावे के की गई थी और असंवैधानिक थी. गोलीबारी में कांग्रेस के 13 कार्यकर्ता मारे गए थे.

 

आयोग ने सोमवार को अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी. रिपोर्ट में राज्य के गृह मंत्रालय के तत्कालीन अधिकारियों और पुलिस के शीर्ष अधिकारियों को युवक कांग्रेस के कार्यकर्ताओं पर गोलीबारी के लिए जिम्मेदार ठहराया गया है. इन कार्यकर्ताओं ने राज्य सचिवालय राइटर्स बिल्डिंग की घेरेबंदी की थी.

 

ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस सरकार ने मई 2011 में सत्ता संभालने के साथ ही इस बात का पता लगाने के लिए आयोग का गठन किया कि बनर्जी के नेतृत्व में आयोजित रैली पर गोलीबारी करने का आदेश पुलिस को किसने जारी किया था. बनर्जी उस समय युवक कांग्रेस की नेता थीं.

 

न्यायमूर्ति चटर्जी ने रपट के निष्कर्षो का खुलासा करते हुए कहा, “आयोग इस नतीजे पर पहुंचा है कि यह मामला जलियांवाला बाग नरसंहार से भी भयानक है. कई सारे गवाहों और दस्तावेजों से होकर गुजरने के बाद आयोग ने पाया कि गोलीबारी बगैर उकसावे के की गई थी और असंवैधानिक थी.”

 

चटर्जी ने कहा, “जो लोग उस समय गृह मंत्रालय देख रहे थे और पुलिस के शीर्ष अधिकारी गोलीबारी की जिम्मेदारी से बच नहीं सकते.”

 

कलकत्ता उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश चटर्जी ने कहा, “गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी देख रहे लोग और पुलिस उस स्थिति में अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों का निर्वहन नहीं कर पाए, जिससे इस देश के नागरिकों की जिंदगी जुड़ी हुई थी.”

 

पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेब भट्टाचार्य और वाम मोर्चा के अध्यक्ष बिमान बोस सहित 300 से अधिक गवाहों से पूछताछ कर चुके आयोग ने कहा कि गोलीबारी का आदेश एक पुलिस नियंत्रण कक्ष से आया था.

 

आयोग ने कहा है, “पुलिस में इस बात को लेकर कई विरोधाभास हैं कि गोलीबारी का आदेश किसने दिया, जो कि पुलिस नियंत्रण कक्ष से आया था.”

 

न्यायमूर्ति चटर्जी ने कहा, “गवाहियों के आधार पर आयोग किसी खास प्राधिकारी या अधिकारी का नाम लेने के बदले गृह विभाग और पुलिस को संयुक्त रूप से जिम्मेदार ठहराया है.”

 

आयोग ने प्रत्येक मृतकों के परिजनों को मुआवजे के रूप में 25 लाख रुपये और उस समय पुलिस गोलीबारी में घायल हुए लोगों को पांच लाख रुपये देने का भी आदेश दिया है.

 

चटर्जी ने स्पष्ट किया है कि 13 मृतकों में से 12 की मौत गोलीबारी में हुई थी, जबकि एक अन्य व्यक्ति बाद में बीमारी के कारण मर गया था.

 

आयोग ने माना है कि विरोध प्रदर्शन के लिए सड़क पर उतरना जनता का एक लोकतांत्रिक अधिकार है.

 

न्यायमूर्ति चटर्जी ने कहा है कि पुलिस को अधिक संयमी और गंभीर होना चाहिए, ताकि इस तरह की घटनाएं दोबारा न घटें.

 

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