ऑपरेशन भूमिहार: दबंगों के डर से दलितों की बस्ती 60 सालों में नहीं कर सकी वोट

By: | Last Updated: Thursday, 15 October 2015 1:26 AM
bihar election : opration bhumihar

नई दिल्ली: बिहार में पहले चरण का चुनाव हो चुका है. दूसरे चरण का मतदान 16 अक्टूबर को है. 16 तारीख का इंतजार जहानाबाद के उन 10 गांव के दलित और पिछड़ी जातियों के लोग भी कर रहे हैं जिन्हें आज तक दबंगों ने कभी वोट डालने नहीं दिया. वोट देने के अधिकार से वंचित कर दिये गए लोग क्या इस बार वोट दे पाएंगे?

 

बिहार के जहानाबाद जिले का घोषी विधानसभा क्षेत्र

घोषी के 10 गांव ऐसे हैं जहां आज तक दलित और पिछड़ी जातियों के मतदाताओं को वोट देने नहीं दिया गया. एबीपी न्यूज पहुंचा ऐसे तीन गांवों में जहां आजादी के 67 साल बाद भी दबंगों के डर से अपने लोकतांत्रिक अधिकार का इस्तेमाल नहीं कर पाए ये लोग. क्या इस बार ये अपना वोट दे पाएंगे?

 

ऑपरेशन भूमिहारः जहानाबाद के घोसी से स्पेशल रिपोर्ट 

 

अस्सी साल के दो बुज़ुर्ग, दो अलग अलग गांव के वासी, दो अलग व्यक्ति, दोनों मानों एक हकीकत को जीने को मजबूर. दोनों की उम्र भारतीय गणराज्य से भी ज्यादा, मगर दोनों ने एक बार भी वोट नहीं किया. वोट तो छोडिये, इन्हें ये भी नहीं मालूम के बैलट पेपर या EVM कैसा दिखता है? घोषी विधानसभा क्षेत्र जहां के 10 गांव के निवासी पिछले चार दशकों से भी ज्यादा और कुछ मामलों में आजादी से अब तक ये जीवन जीने को श्रापित हैं.

 

“प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कई बार इस बात की दुहाई दी है कि 67 साल से देश में विकास नहीं हुआ. हालांकि के वो ये भूल जाते हैं के इसमें NDA के 6 साल और उनके अपने डेढ़ साल शामिल हैं. मगर हम आपको जो दास्तां बताने जा रहे हैं उसमे ये जानने की कोशिश करेंगे के आज़ादी के 67 साल बाद भी कुछ लोग वोट क्यों नहीं दे पाए हैं ? 67 सालों में 10 गांव सिर्फ 2 किलोमीटर का फासला क्यों तय नहीं कर पाए? किसने रोका और उन्हें महरूम किया उनके बुनियादी अधिकारों से. 

 

घोषी विधानसभा क्षेत्र पर जगदीश शर्मा के परिवार का कब्ज़ा रहा है. वो जगदीश शर्मा जो चारा घोटाले में दोषी पाए गए . वे जगदीश शर्मा जो 2009 से 2014 के बीच जहानाबाद से सांसद भी थे. जिनके बेटे राहुल कुमार अब घोषी से अपनी किस्मत आजमा रहे हैं और वे इस बार NDA के उम्मीदवार हैं. जीतन राम मांझी के हिन्दुस्तानी अवामी मोर्चा की तरफ से. कुछ लोग जगदीश शर्मा को मौसम विज्ञानी भी कहते हैं. क्योंकि ये अक्सर सत्ता के करीब रहते हैं और यही वजह है कि इनकी विधानसभा के तहत 10 गांवों के लोगों के प्रजातांत्रिक अधिकारों के साथ जो होता रहा उसे सबने नज़रंदाज़ किया. 

 

हमारी कहानी का आग़ाज़ होता है अल्लालपुर के शिवमंदिर के बाहर बैठे कुछ बुजुर्गों और कुछ युवाओं के साथ. इनमे उम्र का एक लम्बा फासला, मगर सबकी किस्मत एक.

 

तो अगर इन लोगों को दुसरे गांव के लोग वोट डालने नहीं देते, तो फिर उनके गांव में इसका इंतज़ाम क्यों नहीं किया जाता ? हमने थोडा आगे सफ़र किया तो पाया के यहां एक स्कूल है और इनकी वोटिंग का इंतज़ाम इन्ही के गांव में बाकायदा किया जा सकता है, मगर हैरत है 67 सालों से चली आ रही इस समस्या पर ध्यान किसी का नहीं गया ?

 

स्कूल के बाहार मुलाक़ात अस्सी साल के बुज़ुर्ग से हुई. आंखों में मानों 80 सावन के दर्द का बोझ, एक उम्मीद जो हरसाल बिखरती चली गयी.

 

क्या अस्सी साल के बुज़ुर्ग की हसरत इस साल भी अधूरी रह जाएगी? गांव में दाखिल होते ही हमें बच्चे दिखाई दिए . ताश खेलते हुए . इस बात से बेखबर के हालत नहीं बदले तो इनकी भी किस्मत में यही लिखा हुआ है.

 

अल्लालपुर के गांव की महिलाओं से जब हमने बात की तो मानो सारा गुबार निकल पड़ा. कहती हैं जब मर्दों को वोट नहीं देने दिया जाता तो हमारी क्या बिसात ?

 

अल्लापुर जैसे गांवों का बुरा सपना यहां ख़तम नहीं होता. इसके बाद जो हमने देखा, उस पर तो विश्वास करना भी मुश्किल था. मगर सबूत आपके सामने है. लिहाजा इससे बचना कैसा ? यहां हमने बिजली के खम्बे देखे मगर तारें नदारद.

 

परतें धीरे धीरे खुलती जा रही थीं और हर परत से खुलने वाली तस्वीर पहले से ज्यादा बदनुमा. अल्लालपुर से हम बढ़े एक और गांव पाखर बीघा की ओर . हमारी गाडी यहां की धुल से सनी सड़कों पर रूकी तो इस यादव बहुल गांव में भी तस्वीर हैरान करने वाली. यहां हमारी मुलाक़ात एक और अस्सी साल के बुज़ुर्ग से हुई और उनका ग़म भी वही.

 

यहां मालूम हुआ के हिंसा सिर्फ पोलिंग बूथ पर नहीं, कुछ मामलों में, वोट देने वालों के घर में घुसकर उनको मारा जाता था. और हैरत की बात ये की यह एक यादव बहुल गांव है. और अगर अब भी आपको इस खबर ने नहीं झकझोरा है तो अब हम आपको जो बताने वाले हैं वो अविश्वसनीय मगर सत्य की दास्तां है. घोषी थाणे में हम मिले दो चौकीदारों से. कहने को पुलिस में , मगर इन्हें भी वोट नहीं देने दिया गया.

और यह दास्तां सिर्फ इन दो गांवों या इन चौकीदारों तक सीमित नहीं . ABP न्यूज ने पाया कि कम से दस गांवों की यही दशा है और यह तो सिर्फ एक विधानसभा सीट घोषी का यह हाल है. ABP को स्थानीय सूत्रों से कुछ चौंकाने वाली जानकारियां मिलीं. हमारे सामने फेहरिस्त थी उन तमाम गांवों की और उनमे बसने वाली जातियों की जिन्हें वोट नहीं देने दिया गया.

 

1.पत्लापुर पोखर से पासवान

2. होरिल बाघिचा से यादव और विन्द

3. वाजितपुर से यादव और बढई

4. मीरा पैठ से  रवानी और चंद्रवंशी

5. डैडी से मुसहर

6. बना बीघा से भुइया रविदास और रवानी

7. सोनवा से मुसहर

8. नगवा से यादव और पासवान

9. कुर्रे से पासवान और रविदास

10. चिर्री से रविदास मुसहर और यादव

 

अब आप यह जानना चाहेंगे के आखिर उस गांव का वो पोलिंग बूथ कैसा है जहां इन सबका वोट पड़ता है . धुरियारी गांव दरसल पाखर बीघा गांव से चंद कदमों की दूरी पर है.

 

मामला संगीन था, लिहाजा हम पहुंचे जहानाबाद के DM मनोज कुमार सिंह के पास जो प्रधानमंत्री मोदी की अगली रैली की तैयारी में मशगूल थे. हमने पुछा उनसे कि पोलिंग बूथ इन लोगों के अपने गांव में क्यों नहीं मुहैया कराया जाता है?

 

DM मनोज कुमार सिंह ने कहा ‘देखिये पोलिंग बूथ कहां हो या कैसे हों. वह सबसे मंत्रणा करके बनाया जाता है, मगर मैं आपको आश्वासन देता हूं कि मेरी निगाह हर गांव के हर घर पर है . और उन्हें वोट देने से कोई नहीं रोक सकता है.’

 

यह तस्वीर वाकई हताश कर देने वाली है. क्योंकि आज़ादी के 67 साल बाद भी कोई वोट न दे पाए तो हम क्या करें? क्योंकि न सिर्फ हमें अपने इस अधिकार का इस्तेमाल करना चाहिए बल्कि यह भी देखना होगा के दुसरे इसका इस्तेमाल कर पायें.

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