ब्लॉग: पहले 'बंटवारे' से तो निपट लें नीतीश और मोदी

By: | Last Updated: Thursday, 6 August 2015 3:32 AM
Bihar Election_

नई दिल्ली: अगले दस दिनों में बिहार विधानसभा चुनाव की तारीखों का एलान करीब-करीब तय है. लेकिन बिहार में एक दूसरे के खिलाफ ताल ठोक रहे दोनों खेमों में सीटों के बंटवारे का गणित अभी भी उलझा हुआ है. दरअसल हाल में हुए चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में जो तस्वीर उभर कर सामने आई है…उसमें अगर-मगर बहुत हैं. लिहाजा आरजेडी, जेडीयू और कांग्रेस का गठजोड़ हो…या बीजेपी, एलजेपी, आरएलएसपी और हम के गठजोड़ वाला एनडीए…दोनों पक्षों की धुकधुकी बढ़ी हुई है.

 

चुनाव से पहले लालू और नीतीश का ‘टिकट’ संग्राम

 

ये हकीकत है कि बदले राजनीतिक समीकरण में जेडीयू और आरजेडी ऊपरी मन से एक खेमे में आए. खींचतान के बाद लालू ने नीतीश को मुख्यमंत्री पद का चेहरा भी मान लिया. लेकिन सीटों के बंटवारे में दोनों अपनी दावेदारी से पीछे हटने को तैयार नहीं दिख रहे हैं. इस गुणा गणित की वजह भी जान लीजिए.

 

साल 2010 के विधानसभा चुनाव में 141 सीटों पर उम्मीदवार उतारने वाली जेडीयू ने 115 सीटों पर विजय पाई थी. यानी तब कामयाबी का आंकड़ा करीब 82 फीसदी था. यही वजह है कि इस चुनाव में भी जेडीयू कम से कम इतनी सीटें तो चाहती है. बची सौ सीटों का बंटवारा करने में उसे गुरेज नहीं है.

 

वहीं सीटों के बंटवारे में ज्यादा हिस्सा लालू को इसलिए चाहिए…क्योंकि उनकी पार्टी आरजेडी के लिए ये विधानसभा चुनाव नई जमीन बनाने का मौका है. लालू भले ही चुनावी बिसात से बाहर हैं, लेकिन हाल के संकेतों से वो भी समझ रहे हैं कि साल 2010 के चुनाव में मिले झटके से उबरना है तो इस बार पूरा जोर लगाना होगा.

 

आपको बता दें कि साल 2010 में बिहार विधानसभा चुनाव में आरजेडी ने 168 उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन जीत सिर्फ 25 सीटों पर ही मिली थी. आंकड़ों में बात करें तो आरजेडी की चुनावी कामयाबी का ग्राफ तब गिरकर 15 फीसदी पर आ गया था.

 

लेकिन मई 2014 के लोकसभा चुनाव में वोट फीसदी में हुए इजाफे ने आरजेडी की उम्मीदें बढ़ा दी हैं. लोकसभा चुनाव में जेडीयू को बिहार में मिले करीब 16 फीसदी वोटों के मुकाबले आरजेडी, कांग्रेस, एनसीपी को साझा तौर पर करीब 30 फीसदी वोट मिले थे.

 

तीन महीने बाद ही अगस्त 2014 में बिहार के 10 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हुए…तो नीतीश की पार्टी जेडीयू को दो सीटें मिली और लालू की पार्टी आरजेडी को तीन…यानी जेडीयू से एक सीट ज्यादा. जबकि कांग्रेस के हिस्से में एक सीट आई. वहीं छह से ज्यादा सीटें जीतने की उम्मीद लगाए बैठी बीजेपी के हिस्से में चार सीटें आई. बीजेपी के लिए ये झटका इसलिए बड़ा था…क्योंकि तब नरेंद्र मोदी का जलवा उफान पर था. लेकिन आरजेडी के लिए ये नतीजे उबरने की उम्मीद बनकर आए. अब सीटों के बंटवारे का मौका है तो आरजेडी की उम्मीद और गहरा रही है.

 

सीटों की दावेदारी पर आरजेडी के रुख का अंदाजा इस बात से भी आप लगा सकते हैं…कि आरजेडी कार्यकर्ताओं को बिहार की सभी 243 सीटों पर चुनावी तैयारी करने के निर्देश हैं. फिलहाल आरजेडी की सफाई ये है कि कि बंटवारे का गणित सुलझेगा तो हिस्से में आई सीटों पर फोकस किया जाएगा.

सीटों के बंटवारे को आरजेडी और जेडीयू के कार्यकर्ताओं की अंदरुनी सोच का गणित भी प्रभावित कर रहा है. दोनों पार्टियां तो गठबंधन में आ गई हैं, लेकिन उनके कार्यकर्ता पुराना बैर ठीक से भूल नहीं पाए हैं. इसलिए विधानसभा चुनाव के दौरान भीतरघात का खतरा भी दोनों पार्टियों को कहीं न कहीं सता रहा है. क्योंकि जिन सीटों पर दोनों पार्टियों के उम्मीदवार अलग-अलग अपनी किस्मत आजमाते…वहां दोनों पार्टियों में से एक ही उम्मीदवार मैदान में होगा.

 

पिछले महीने हुए बिहार विधान परिषद चुनाव के नतीजों को देखकर भी जेडीयू और आरजेडी अपनी चुनावी रणनीति को नए सिरे से कस रहे हैं. बीजेपी ने विधान परिषद चुनाव में 24 में से 12 सीटों पर कब्जा किया था. सहयोगियों को मिला लें तो 14 सीटें बीजेपी गठबंधन के खाते में आईं. जबकि जेडीयू गठबंधन को 10 सीटें हासिल हुईँ. जिसमें जेडीयू की पांच, आरजेडी की चार और कांग्रेस के हिस्से एक सीट आई.

 

इन सारे समीकरणों के बीच ये देखना दिलचस्प होगा कि आरजेडी और जेडीयू में सीटों के बंटवारे की तकरार किस हद तक जाती है…और इसमें कौन बाजी मारता है. दोनों पार्टियां जानती हैं…अगर बिहार में नीतीश राज लौटता है…तो भारी वही पड़ेगा, जिसके ज्यादा विधायक होंगे. जाहिर है इसका रास्ता सीटों के बंटवारे से होकर ही जाता है.

 

आगामी बिहार विधानसभा चुनाव में आरजेडी और जेडीयू की संभावनाओं को बागियों से चोट पहुंचने की पूरी आशंका है. बिहार के सीमांचल में अच्छी पकड़ रखने के कारण बाहुबली पप्पू यादव को लालू ने कभी गले लगाया था और बिहार में पंद्रह साल राज भी किया था. इस बार पप्पू को आरजेडी से बाहर का रास्ता दिखाने से जो संभावित नुकसान होने वाला है, उसकी भरपाई का हिसाब भी लालू सीटों के बंटवारे में जरूर लगाएंगे.

 

नीतीश की दिक्कत ये है कि जिन मांझी को अपनी नैया खेने के लिए लोकसभा चुनाव के बाद मोर्चे पर उतारा था, अब वो उनके खिलाफ ताल ठोक रहे हैं…और उनके दलित-महादलित समीकरण को बिगाड़ने की जुगत में हैं. बीजेपी ने जीतनराम मांझी को एनडीए में शामिल कर अपनी रणनीति का इशारा भी दे दिया है. लिहाजा दलित बहुल सीटों पर होने वाले संभावित नुकसान से बचने के लिए नीतीश भी सीटों के बंटवारे का गणित बहुत संभलकर बना रहे हैं.

 

सीटों के बंटवारे का पेंच और बीजेपी की उलझन

 

आरजेडी और जेडीयू के बीच खींचतान को हवा देने में जुटी बीजेपी के लिए भी सीटों के बंटवारे का गणित आसान नहीं है.

 

2014 लोकसभा चुनाव में बिहार की 40 सीटों में से 22 पर कब्जा जमाने वाली बीजेपी अपने बूते बिहार विधानसभा चुनाव में बहुमत का जादुई आंकड़ा…यानी 243 सीटों में से कम से कम 122 सीटें जीतना चाहती है. इसके लिए पार्टी पीएम मोदी के जादू पर पूरा भरोसा जता रही है.

 

सवा साल पहले हुए लोकसभा चुनाव में मोदी लहर पर सवार होकर बीजेपी ने 282 सीटें जीती थीं…इसके लिए 427 उम्मीदवार मैदान में उतारे थे. आंकड़ों में देखें तो ये कामयाबी 66 फीसदी थी. उसी को पैमाना बनाकर अगर बिहार में सीटों का गणित देखा जाए…तो बीजेपी को 122 सीटें जीतने के लिए कम से कम 182 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने होंगे.

 

ऐसे में अगर आप बीजेपी की सहयोगी आरएलएसपी के उपेंद्र कुशवाहा के बयान को याद करें…तो सीटों के बंटवारे को लेकर एनडीए में चल रही खींचतान को आप बखूबी समझ लेंगे.

 

पिछले महीने उपेंद्र कुशवाहा ने कहा था कि सही फार्मूला ये होगा कि बीजेपी 2010 के विधानसभा चुनाव की तर्ज पर 102 सीटों पर लड़े. एलजेपी उसी पैमाने से 74 सीटें ले और जेडीयू के वारिस के तौर पर आरएलएसपी को बची 67 सीटें दे दी जाए. बिहार चुनाव को लेकर अगर और दल एनडीए में आते हैं तो सभी साथी अपने अपने खाते से कुछ सीटें उन्हें दे देंगे.

 

उपेंद्र कुशवाहा से पहले एलजेपी के रामचंद्र पासवान भी मुंह खोलकर कह चुके हैं कि कम से कम 67 सीटों पर उनकी पार्टी का हक तो बनता है.

 

सहयोगी दलों के रुख से बीजेपी की बेचैनी भी बढ़ी हुई है. लेकिन वो भी जानती है कि इस मसले को अंदरखाने में निपटाने में ही भलाई है. वैसे जिस अंदाज में बिहार चुनाव पीएम नरेंद्र मोदी और अमित शाह की नाक का सवाल बनता जा रहा है…सीटों के बंटवारे का संग्राम ढंग से नहीं निपटा तो आरजेडी और जेडीयू की ओर से की गई रणनीतिक गलतियों का जैसा फायदा बीजेपी उठाने की सोच रही है…वो सपना बन कर रह जाएगा.

 

चलिए इंतजार करते हैं. देखते हैं… बिहार में  सीटों के गणित का संग्राम कौन सी करवट लेता है.

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