द्विपक्षीय संबंधों में सुधार के लिए सुषमा स्वराज अफगानिस्तान पहुंची

By: | Last Updated: Wednesday, 10 September 2014 8:13 AM

नई दिल्ली: अफगानिस्तान के साथ सामरिक सहयोग को बढ़ाने और सुरक्षा तथा स्थिरता जैसी महत्वपूर्ण चुनौतियों से निपटने में अफगानिस्तान की मदद के लिए विदेश मंत्री सुषमा स्वराज आज यहां एक महत्वपूर्ण यात्रा पर इस युद्धग्रस्त देश में पहुंची. 2001 में तालिबान के पतन के बाद अफगानिस्तान पहले लोकतांत्रिक चुनाव के जरिए सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया में है.

 

सुषमा स्वराज की अफगानिस्तान यात्रा इस लिहाज से भी काफी मायने रखती है कि यह ऐसे समय में हो रही है जब इस वर्ष के अंत तक नाटो बलों की वापसी के मद्देनजर देश में तालिबान और अल कायदा से जुड़े अन्य तत्वों के सिर उठाने की आशंकाए तेज हो रही हैं.

 

अफगानिस्तान इस समय 14 जून को हुए राष्ट्रपति पद के चुनाव के बाद विवादास्पद दूसरे दौर के मतों की गिनती के परिणामों का बेसब्री से इंतजार कर रहा है. मतों की गिनती का काम पहले ही पूरा हो चुका है और परिणाम अगले कुछ दिनों में घोषित किए जा सकते हैं.

 

पूर्व विदेश मंत्री अब्दुल्ला अब्दुल्ला तथा पूर्व वित्त मंत्री अशरफ घानी का चुनाव में कड़ा मुकाबला है और दोनों में से जो भी विजेता होगा वह राष्ट्रपति हामिद करजई का उत्तराधिकारी बनेगा जो करीब 13 साल से सत्ता में हैं.

 

विदेश मंत्री के रूप में अफगानिस्तान की अपनी पहली यात्रा के दौरान सुषमा कई महत्वपूर्ण द्विपक्षीय और क्षेत्रीय मसलों पर करजई के साथ चर्चा करेंगी जिनमें भारत के साथ रक्षा और सुरक्षा सहायता को और अधिक मजबूती प्रदान करना भी शामिल है.

 

अफगानिस्तान चाहता है कि नाटो बलों की वापसी के मद्देनजर उसके सुरक्षा तंत्र को मजबूती प्रदान करने के लिए भारत सैन्य उपकरणों की आपूर्ति करे. करजई इस मामले में पहले ही भारत को अपनी ‘‘ वांछित वस्तुओं की सूची’’ सौंप चुके हैं. पिछले वर्ष दिसंबर में नयी दिल्ली की यात्रा के बाद करजई ने सैन्य सहायता बढ़ाने की उनकी मांग पर भारत के जवाब को लेकर संतोष जाहिर किया था और कहा था कि इस प्रकार की आपूर्ति के संबंध में ‘‘तथ्य’’ ‘ज्ञात जानकारी’’ से अधिक बेहतर हैं.

 

अफगानिस्तान के प्रति राजग सरकार द्वारा अपनी नीति की समीक्षा किए जाने के सवाल पर सुषमा ने कहा कि इसमें बदलाव का कोई सवाल नहीं है और साथ ही उन्होंने जोर दिया कि भारत इसके पुनर्निर्माण में इसकी सहायता जारी रखेगा.

 

भारत अफगानिस्तान की मदद और पुनर्निर्माण में दो अरब डालर का निवेश कर चुका है और सैंकड़ों अफगान अधिकारियों को प्रशिक्षित किया गया है. लेकिन वह हथियारों और सैन्य उपकरणों की आपूर्ति के मामले में सावधानी बरत रहा है क्योंकि यह कदम पाकिस्तान और साथ ही अफगानिस्तान में सशस्त्र समूहों को भड़का सकता है.

 

सुषमा स्वराज द्वारा यात्रा के दौरान अफगानिस्तान में भारतीय परिसंपत्तियों की बेहतर सुरक्षा की मांग किए जाने की संभावना है.

 

हेरात स्थित भारतीय वाणिज्य दूतावास पर मई में हमला किया गया था. पिछले वर्ष अगस्त में पाकिस्तान के साथ लगती सीमा पर जलालाबाद शहर में भारतीय वाणिज्य दूतावास पर विफल हमला किया गया जिसमें छह बच्चों समेत नौ लोग मारे गए लेकिन इसमें कोई भारतीय अधिकारी हताहत नहीं हुआ.

 

काबुल में भारतीय दूतावास पर भी 2008 और 2009 में हमले किए गए जिनमें 75 लोग मारे गए. अफगानिस्तान द्वारा अमेरिका के साथ द्विपक्षीय सुरक्षा समझौते (बीएसए) पर हस्ताक्षर से इंकार करने का मुद्दा भी सुषमा और करजई की बैठक में उठने की संभावना है.

 

करजई प्रस्तावित अफगान-अमेरिका सुरक्षा समझौते पर हस्ताक्षर से यह कहते हुए इंकार कर चुके हैं कि अमेरिका को समझौते से पहले अफगान घरों पर सैन्य छापेमारी पर तत्काल रोक लगानी चाहिए और शांति वार्ता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता प्रदर्शित करनी चाहिए.

 

बीएसए के तहत अफगानिस्तान में नौ स्थानों पर करीब 15 हजार अमेरिकी सैनिकों को तैनात किए जाने का प्रावधान है.

 

अफगानिस्तान के अधिकारियों का कहना है कि 350, 000 से अधिक अफगान सुरक्षाकर्मी जिम्मेदारी संभाल चुके हैं और वे देश की सुरक्षा का दायित्व निभाने में सक्षम हैं.

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