जिल्लत को दफनाने या जलाने के लिए कौन सी जगह मुनासिब होगी?

By: | Last Updated: Wednesday, 23 July 2014 11:58 AM
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शमशान और कब्रिस्तान में पाकीजगी के साथ शव जलाए या दफनाए जाते हैं. लेकिन समझ नहीं आता कमजोर की जलालत और जिल्लत को दफनाने या जलाने के लिए कौन सी जगह मुनासिब होगी. क्या कोई ऐसी जगह है जो इस कथित जम्हूरियत को, यहां तक कि इंसानियत को दफनाने के लिए काफी हो?

 

सत्ता में दंभ होता है. पिछले दिनों अलग-अलग सरकारों का अलग-अलग दंभ देखने को मिला. सत्ता अपने स्वरूप में ही हठी है, दंभी है, दमनकारी है. सत्ता में आते ही शालीनता का लबादा उतर जाता है, और नया मुखौटा चस्पां हो जाता है. क्योंकि सत्ता स्वभाव से दंभी है. सत्ता का मद और मद की सत्ता किसी भी समाज के लिए हमेशा से दुखदाई होती है. सत्ता पाकर व्यक्ति मद में आ जाता है और मद में अंधा व्यक्ति सत्ता पाने के लिए दबंगई करता है. सत्ता में बैठे लोग “राज धर्म” को भूल जाते  हैं.

 

सत्ता का नशा कोई आज का नया नशा नहीं है बल्कि प्राचीन काल से चला आ रहा है. सत्ता के नशे का तो इतिहास गवाह है कि इस नशे ने न जाने कितने लोगों को मौत के घाट उतार दिया है. शाहजहां ने भी मजदूरों के हाथ कटवाकर बेकार कर दिया. सत्ता को बनाये रखने के लिए समय-समय पर युद्ध होते रहे हैं. चाहे वह वाक् युद्ध ही क्यों न हो. ताकत का नशा भी बड़ा सुकून देने वाला होता है. छीनने में अपनी ताकत का एहसास होता है. कुर्सी पर विराजमान लोग यही तो करते हैं. अपने अधिकारों का दुरूपयोग. और इससे कुर्सी पर बैठे लोगों को बड़ी ही तसल्ली, संतुष्टि, शान्ति और राहत मिलती है. जब सत्तासीन व्यक्ति सत्ता विहीन व्यक्ति को दीन और निरीह हालात में देखता है तब, उसे बड़ी आनंद की प्राप्ति होती है.

 

आप महाराष्ट्र सदन का एक वीडियो देख रहे होंगे, सांसद महोदय गुरूर से लबालब हैं. मद में चूर हैं. वजह सिर्फ यह है कि ‘अदने’ ने उनके रौब के मुताबिक खाना नहीं परोसने का जुर्रत किया फिर क्या भड़क गये कथित माननीय. जम्हूरियत के पुजारी. और ये फैसला ऑन स्पॉट करने लगे. अदने कर्मचारी को उसकी औकात दिखाने लगे. पिल पड़े. कर्मचारी चिल्लाता रहा. खुदा के नाम पर रहम की मांग की. लेकिन सत्ता के मद में शहंशाह को अदने की फरियाद दिखती कहां है. रमजान के पवित्र मौके पर ठूंस दिया रोटी का निवाला. वैसे तो सत्ताधीश इन जैसों के निवाले को छिनने की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ते लेकिन पद के मद में गुस्सा सांतवे आसमान पर चढ़ा और रोजेदार को दे दी रोटी. उस कमर्चारी का रोजा नहीं दिल और अरमान टूटे. इसे सांत्वना देने के लिए दूसरे कर्मचारी तो आए. लेकिन इसके साथ ही हुक्मरान भी आ गये जो ऐसे मौके की तलाश में रहते हैं.

 

वह कर्मचारी सियासत में गरीब, मजदूर, कमजोर इंसान नहीं अरशद के नाम से चर्चित होने लगा. लोकतंत्र में उसकी आवाज बन खड़े हुए लोग उसे उसकी वास्तविकता के बजाए अपनी रोटी सेंकने के लिए उसे धर्म के आवरण में ढालने लगे. सियासत शुरू हो गई. किसी हुक्मरान ने यह नहीं सोचा कि यह किसी गरीब की जलालत है. बस धर्म के दोनों ठेकेदारों ने अपनी रोटी पकानी शुरू कर दी.

 

ये दोनों ठेकेदार वही हैं. जो गंगाजमनी तहजीब से लेकर इन्साफ तक सबको हर वक्त बर्बाद करने में जुटे रहते हैं. हर वक्त कोशिश करते रहते हैं. मेटाडोरों को रथ बना के घुमाते हैं. बहुत इंटों को रामशिला कहते हैं. हर वक्त कभी इंसान को हिन्दू तो कभी मुसलमान बना देते हैं. ऐसा करके वह सत्ता के शिखर पर पहुंच भी जाते हैं.

 

 

इन्साफ और अमन का कत्ल करने की हर वक्त जुगत में रहने वाले ठेकेदार दरअसल एक दूसरे के मददगार हैं. क्योंकि इन्हें सिर्फ मजलूमों पर जुल्म करने के लिए धर्म का सहारा चाहिए. यहां मुद्दा अरशद के रोजे का नहीं सत्ता के मद में चूर उस सत्ताधीश का है जो मजलूमों की जलालत करने में परहेज नहीं करता. बस इस जालिमाना और सामंती सोच से सत्ता को आजाद करने की जरुरत है.

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