आख़िर क्यों बालिग़ होने की उम्र को 10 साल कर दें या 25, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा..!

blog mukesh kumar singh

निर्भया कांड से जुड़े नाबालिग दरिन्दे की उम्र को लेकर कितनी ही बातें हुईं, पूरी बहस 16 या 18 साल की उम्र को सही या ग़लत मानने पर जाकर ठहर गयी. आख़िरकार क़ानून तक बदल गया! लेकिन उम्र-सीमा की सारी बहस में असली सवाल तो न जाने कहाँ ग़ुम हो गया. दंड विधान से जुड़े इस सवाल का ताल्लुक, जेल और सुधार गृहों की दशा और उपयोगिता से जुड़ा है. इसीलिए, जब तक इन्हें दुरुस्त नहीं किया जाएगा, तब तक बालिग़-नाबालिग़ की उम्र चाहे जो तय हो जाए, उससे ज़मीनी हालात तो बदलेंगे नहीं. इसीलिए बालिग़ होने की उम्र को 10 साल या 25 साल कर देने से भी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा.. क्योंकि असली बात उम्र की नहीं, बल्कि उम्र से जुड़ी मनोदशा की है. उम्र तो सिर्फ़ प्रतीक है.

 

अब सवाल ये कि आख़िर बालिग़ की परिभाषा क्या हो? इसका जबाव है वो औसत उम्र जब मनुष्य ‘आमतौर’ पर समझदार हो जाता हो, उसे सही-ग़लत समझ का फ़र्क़ और अंज़ाम समझ में आने लगे, उसके स्वभाव में किशोरावस्था से जुड़ा अल्हड़पन थमने लगे और उसके विचार परिपक्व होने लगें. इस लिहाज़ से शरीर-विज्ञानियों ने ये पाया कि ‘आमतौर पर’ 18 साल की उम्र तक इनमें से ‘ज़्यादातर’ शर्तें पूरी हो जाती हैं. पूरे प्रसंग में ‘आमतौर पर’ और ‘ज़्यादातर’. इन दो शब्दों का सर्वोच्च महत्व है. अन्य बातें गौण हैं. लिहाज़ा, कभी भी, किसी भी वजह से, ‘आमतौर पर और ज़्यादातर’ की जगह यदि किसी भी तरह के ‘अपवाद’ ने ले ली तो क्या ‘आमतौर पर और ज़्यादातर’ की शर्तें बेमानी हो जाएँगी? कतई नहीं.

 

सच तो ये है कि क़ानून या विधान बनाते वक़्त ‘आमतौर पर’ और ‘अपवाद’ सभी का ख़्याल रखा जाता है. स्वभाव से ही ‘अपराध’ मनुष्य का असामान्य आचरण है. इसीलिए, जब अपराध की रोकथाम के इरादे से क़ानून बनाया जाता है तब सारे चिन्तन पर ‘अपराध’ हावी रहता है. किशोर न्याय विधान के केन्द्र में किशोरों की ऐसी असामान्य हरक़तें हैं जो इतनी अधिक ‘अपवाद’ हैं कि ‘अपराध’ कहलाती हैं. दूसरी ओर, जब नागरिकों को मताधिकार या पासपोर्ट सम्बन्धी अधिकार देने विधान बनाया जाता है तो उस वक़्त लोगों से जुड़ी ‘आमतौर पर’ वाली प्रवृत्तियों को प्रमुखता मिलती है. यही सार्वभौमिक सिद्धान्त है. दुनिया का हर समाज इसी से संचालित होता है.

 

‘अपराध’, बच्चे करें या सयाने, वो रहता अपराध ही है. अपराध की सज़ा ज़रूरी है. क्योंकि दंड के दो मक़सद होते हैं. पहला, ‘जैसी करनी वैसी भरनी’ के सिद्धान्त को स्थापित करना तथा दूसरा, दंड को सुधारवादी और मानवीय बनाना. दंड विधान का यही आधुनिक चिन्तन है. इसकी मान्यता है कि अपराध, एक मनोविकार है, जिसकी व्यापक पृष्ठभूमि होती है. इसीलिए, सभ्य समाज से ये भी अपेक्षित है कि वो ‘अपराध’ से सबक़ लेकर न सिर्फ़ उसके पनपने की पृष्ठभूमि में बदलाव करे और सुधार लाये बल्कि अपराधी को भी दंडित करने के साथ-साथ सुधरने का मौक़ा दे. क्योंकि यदि जेल के दौरान समाज, अपराधी का हृदय-परिवर्तन करने और उसे सुधारने में सफ़ल हो जाता है, तभी जेल की उपयोगिता है. वर्ना अपराधी को वहाँ रखने से भी क्या फ़ायदा.

जेल का मतलब होना चाहिए – अपनी करनी का फल भोगना और पश्चाताप करके अपने बाक़ी बचे जीवन को सँवारना. भारत का सारा दंड-विधान, उदारवादी और सुधारात्मक चिन्तन का नतीज़ा है. चिन्तन के एक छोर पर हमारा आधुनिक और प्रगतिशील दृष्टिकोण है, तो दूसरे छोर पर है मध्यकाल का बर्बर शरिया क़ानून, जो अपराधी के प्रति वैसी ही बेरहमी में यक़ीन रखता है कि जैसा अपराध है. अब ज़रा ये सोचिए कि जिन लोगों को जेल या किशोर सुधार गृहों में रखा जाता है, अगर उनमें सुधार नहीं आता तो दोष किसका है? अपराधी का या उस बीमारी का, जिसका संक्रमण वहाँ बिखरा रहता है.

 

बीमारी है जेल या सुधार गृहों की अव्यवस्था, कुप्रबन्धन और भ्रष्टाचार. यदि हम इसे नहीं सुधार सकते तो बालिग़ या नाबालिग़ की चाहे जो उम्र तय कर दें, उससे हासिल कुछ नहीं होगा. इसीलिए, सबसे बड़ा सवाल तो ये होना चाहिए कि जेल या सुधार गृह में रहने के बावजूद अपराधी में बदलाव क्यों नहीं आया? इसके लिए कौन ज़िम्मेदार है? किसकी जबावदेही है? ये महकमे तो पूरी तरह से सरकारों की मुट्ठी में होते हैं. जनता की इसमें कोई दख़लंदाज़ी होती नहीं. इन्हें संचालित करने वाले पूरे सरकारी अमले का ख़र्च तो जनता ही उठाती है. तो फिर वहाँ के कर्मचारियों-अफ़सरों और मंत्री-मुख्यमंत्री की ज़िम्मेदारी कैसे तय होगी? कौन तय करेगा?

 

असली सवाल यही हैं. जनता को इसकी ही बातें करनी चाहिए. यदि बहस इन मुद्दों पर होगी तो जनता को ये आशंका क्यों होगी कि जेल या सुधार गृह से बाहर आने वाला व्यक्ति कहीं फिर से समाज के लिए मुसीबत तो नहीं बन जाएगा? हालाँकि, ये सवाल भी होगा कि जेल या सुधार गृह ये गारन्टी कैसे ले सकते हैं कि सज़ा काटने के बाद अपराधी, वापस अपराध की दुनिया में तो नहीं पहुँचेगा? बेशक, इसकी आशंका और जोख़िम हमेशा रहेगा. इसके लिए, क़ानून में ये बदलाव लाना होगा कि अदालत से मिली सज़ा काटने के बाद भी अपराधी की रिहाई तभी हो जबकि मनो-विशेषज्ञ ये ताक़ीद करें कि अपराधी का मनो-विकार दूर गया है, वो सुधर चुका है और उसे वापस समाज की मुख्यधारा में शामिल होने का मौक़ा दिया जा सकता है.
इस काम के लिए मनो-विशेषज्ञों की भी कई श्रेणियाँ बनायी जा सकती हैं. लेकिन अपराधी की रिहाई सिर्फ़ और सिर्फ़ तभी हो, जब ऐसी शर्तें पूरी हो सकें. चुनौती मनो-विशेषज्ञों की जबावदेही तय करने की भी होगी. लेकिन उनका मूल्याँकन रिहा हुए क़ैदियों की छवि के आधार पर क्यों नहीं किया जा सकता. इसीलिए, इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि नृशंस (Heinous) अपराधों के मामले में नाबालिग़ की उम्र 18 साल की जगह 16 हो गयी है. आप इसे घटाकर 10 साल भी कर देंगे तो वो सारी दुश्चिन्ताएं बनी ही रहेंगी जिन्हें ज़ाहिर किया जाता रहा है.

 

यदि हम ये भी मान लें कि अपराधी जिस मनो-विकार से पीड़ित है, उसका प्रभाव 25 साल की उम्र तक भी रह सकता है. तो भी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा. क्योंकि 25 की उम्र पार करने के बाद भी उसके फिर से अपराधी बनने की आशंका तभी ख़त्म हो पाएगी, जब जेल या सुधार गृह अपने काम के सही तरीक़े से अंज़ाम दें. वैसे एक सिद्धान्त ये भी हो सकता है कि आप ये तय कर दीजिए कि अमुक-अमुक अपराध ऐसे होंगे जिन्हें करने वाले को व्यस्क ही माना जाएगा. उसे किशोर सुधार गृह के दायरे में बाहर ही रखा जाएगा. इसके लिए आपको Unsound mental stage यानी ख़राब दिमाग़ी हालत से जुड़ी सारी व्याख्या को बदलना होगा. साफ़ है कि आप एक साथ दो नाँवों की सवारी नहीं कर सकते! यानी, आपको ये तय करना होगा कि अपराध, प्रमुख है या अपराधी की उम्र? पलड़ा हमेशा अपराध की ही भारी रहेगा.

 

ये भी सही है कि निर्भया को अभी तक इंसाफ़ नहीं मिला है. ये भी सही है कि कई बार हमारा क़ानून दुष्कर्म पीड़ित के हक़ से ज़्यादा उदारता, किशोरों के अधिकार के प्रति दिखाने लगता है. अपराध पर अधिकार हावी होने लगता है. लेकिन ये सब ‘अपवाद’ से जुड़ी बहस है. ‘आमतौर पर’ से जुड़ा सन्देश तो ये है कि सुप्रीम कोर्ट में निर्भया के अपराधियों को फ़ाँसी देने का मामला अभी अटका पड़ा है. हालाँकि, निर्भया ही क्यों, करोड़ों मामले इंसाफ़ की बाट जोह रहे हैं. उनकी परवाह कौन करेगा!

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