ब्लॉग: नीतीश के 'बहार' के दावों के उलट ये है बिहार की हक़ीक़त

By: | Last Updated: Monday, 5 October 2015 11:11 AM
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पटना: ‘बिहार में बहार हो नीतीशे कुमार हो’ ये नारा बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का है, उन्होंने बिहार की जनता से अपील की है कि अगर बिहार में फिर से बहार लाना है तो नीतीश कुमार को ही मुख्यमंत्री बनाएं. नीतीश कुमार की अपील का जवाब बीजेपी ने भी एक नारे के साथ  दिया है ‘कल तक के जानी दुश्मन अब सत्ता के यार हैं, हां भैया, बिहार में बहार है’.

 

इस नारे के जरिए बीजेपी ने लालू और नीतीश के गठबंधन पर निशाना साधा है. जब बीजेपी ने जेडीयू पर वार किया तो बिहार की दीवारों पर लालू ने भी एक पोस्टर सजा दिया और लिखा ‘न जुमलों वाली न जुल्मी सरकार गरीबों का चाहिए अपनी सरकार’.

 

चुनाव जीतने के लिए बिहार की सड़कों पर सभी पार्टियां विकास की इबारत लिख रही है. इन सबके इतर अगर देखा जाए तो बिहार आज भी वादों और नारों के बीच सिर्फ झूल ही रहा है. बिहार में फिर से जीत का ख्वाब पाले नीतीश कुमार ने जनता के सामने अपने कार्यकाल का कच्चा-चिट्ठा पेश किया.

 

नीतीश लिखते हैं कि, बिहार ऐसा पहला राज्य है, जहां महिलाओं को पंचायत और नगर निकाय चुनाव में 50 फीसदी आरक्षण दिया गया है. जबकि बिहार में ही रोजगार के लिए महिला भागीदारी की बात करें तो राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (एनएसएस) में ये साफ हुआ है कि महिलाओं की बेरोजगारी मामले में सभी राजधानियों के बीच पटना सभी शहरों में शीर्ष पर है. यहां महिलाओं की बेरोजगारी दर 34.6 फीसदी है.

 

साल 2004-05 में बिहार की जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) करीब 78 हजार करोड़ रुपए था जो साल 2014-15 में बढ़कर 4 लाख 2 हजार करोड़ से अधिक हो गया. लेकिन नीतीश कुमार इस बात को भूल गए कि 2014 में गठित राज्य तेलांगाना की जीडीपी बिहार से कहीं ज्यादा 4 लाख 30 हजार करोड़ से अधिक है.

 

नीतीश के ‘विकास यात्रा’ में इस बात का ज़िक्र किया गया कि 2005 के मुकाबले 2015 में प्रति व्यक्ति बिजली की खपत 70 किलोवाट से बढ़कर 203 किलोवाट हो गई. 2005 में शहरों को करीब 6-8 घंटे और गांवों को करीब 2-3 घंटे बिजली मिलती थी. लेकिन अब शहरों में 22-24 घंटे और गांवों में 15-16 घंटे बिजली मिलती है. जबकि जमीनी हकीकत की बात करें तो पटना से 180 किमी दूर पर ही डुमरी गांव है जहां आजादी के बाद से अभी तक बिजली नहीं आई है. और यकीन मानिए डुमरी अकेला ऐसा गांव नहीं है, डुमरी जैसा ही हजारों गांव बिजली के इंतजार में है.

 

साल 2005 में शिक्षकों की कुल संख्या 2 लाख 7 हज़ार 343 थी जो 2015 में दोगुनी से अधिक बढ़कर 4 लाख 26 हज़ार 849 हो गई है. नीतीश ने ये भी कहा कि उनकी सरकार ने करीब 3 लाख 85 हजार संविदा शिक्षकों को रेगुलर कर दिया. लेकिन उन्हीं संविदा शिक्षकों के शिक्षा के स्तर की बात करें तो हकीकत किसी से छिपी नहीं है.

 

सड़कों की बात करें तो नीतीश ने कहा कि सूबे के किसी भी कोने से राजधानी पटना 6 घंटे में पहुंचा जा सकता है, और इसे अब घटाकर 5 घंटा करने की तैयारी हो रही है. इसके उलट ईएजी राज्यों की बात करें यहां 36 फीसदी राजकीय राजमार्ग है जिनकी आबादी देश की कुल जनसंख्या का 46 फीसदी है. नीतीश का दावा इन आंकड़ों में काफी बौना हो जाता है, क्योंकि बिहार में 4.9 फीसदी राजकीय राजमार्ग है और बिहार अकेला देश की कुल आबादी में 8.6 फीसदी का योगदान देता है.

 

आपको बता दें कि सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े आठ राज्यों -बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, ओडिशा, राजस्थान, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश- को अधिकार प्राप्त कार्य समूह (ईएजी) के रूप में जाना जाता है.

अब नीतीश ने अपने ‘विकास यात्रा’ में जिन बातों का जिक्र नहीं किया है, अगर उन बातों का जिक्र करें तो एक वेबसाइट के मुताबिक बिहार के 45,103 गांवों में करीब 1.68 करोड़ घर हैं, और इनमें से 1.64 करोड़ घरों में शौचालय नहीं है.

 

बिहार की जनसंख्या 10 करोड़ के पार है जिसमें से 31 फीसदी आबादी गरीबी रेखा से नीचे है, गरीबी में बिहार से पीछे सिर्फ छत्तीसगढ़ और झारखंड आता है. जिसकी कुल आबादी का 39.9 और 36.9 फीसदी जनता गरीबी रेखा से नीचे है.

 

सरकारी वेबसाइट के मुताबिक बिहार में एक तिहाई से ज्यादा वोटर 30 साल से कम उम्र के हैं और बेरोजगारी का प्रतिशत 17 से ज्यादा है. आंकड़ों की अगर तुलना करें तो 15-29 साल के उम्र वर्ग में बेरोजगारों का राष्ट्रीय औसत 13 प्रतिशत है जो कि बिहार से काफी कम है.

 

नीतीश पर ये भी आरोप लगते आए हैं कि उन्होंने बिहार में उद्योग लगाने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए और मौजूदा आंकड़ा उन आरोपों को बिल्कुल सच साबित करता है. साल 2013 के आखिर तक बिहार में सिर्फ 3,345 उद्योग थे, जो देश भर के कुल उद्योगों का मात्र 1.5 फीसदी है. यूपी में यह आंकड़ा 7 फीसदी है.

 

बिहार देश को कभी कुल उत्पादन का 40 फीसदी चीनी देने वाला राज्य था लेकिन अब मुश्किल से अब 4 फीसदी उत्पादन ही कर पा रहा है. बिहार में अभी 29 चीनी मीलें हैं जिनकी हालत बद से बदतर होती जा रही है. बिहार के किसान जो गन्ना की खेती में कई राज्यों से आगे थे उन्होंने चीनी मिलों के बंद होने और मिलों पर ज्यादा कर्ज होने की वजह से खेती बंद कर दी. नीतीश कुमार ने साल 2006 में साफ कहा था कि बंद पड़ी चीनी मिलों को अब चालू नहीं किया जा सकता है.

 

विश्व बैंक की तरफ से जारी आंकड़ों के मुताबिक बिहार में कारोबार करने के लिहाज से सुगमता वाले राज्यों की सूची में 21 वें नंबर पर है. और इन सूची से ये साफ होता है कि क्यों व्यापारी बिहार में अपना कारोबार फैलाने से डरते हैं. वहीं बिहार के पड़ोसी राज्य झारखंड की ही बात कर ले तो तीसरे नंबर पर आकर बिहार को सोचने पर मजबूर कर रहा है.

 

बहरहाल बिहार के विकास की बात करे तो चुनावी रण में सभी पार्टी अपने आप को विकास का मसीहा बता रही है. बीजेपी मोदी का चेहरा आगे कर बिहार में परिवर्तन लाने की अपील कर रही है. लालू गरीबों की सरकार लाने की बात कर रहे हैं. नीतीश खुद को जिताने की अपील कर बिहार में बहार लाने की बात कर रहे हैं. लेकिन हकीकत तो ये है कि बिहार आज भी किसी बहार, किसी विकास, और किसी रफ्तार के लिए कराह रहा है.

 

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