ब्लॉग: नरेंद्र मोदी भी वही गलती क्यों दोहरा रहे हैं?

By: | Last Updated: Thursday, 27 November 2014 3:16 AM
Blog: Why Narendra Modi doing the same mistake?

नई दिल्ली: पाकिस्तान ने कहा है कि वो बातचीत के लिए तैयार है  बशर्ते भारत पहल करे. इसमें दिक्कत क्या है? अगर हम पहल कर दें तो क्या हम छोटे हो जाएंगे. बिल्कुल नहीं. आखिर ये अंतहीन इंतजार कब तक? 67 साल से हमने इसे नाक का मुद्दा बना रखा है. क्या मिला?  कुछ नहीं.

 

नेपाल में सार्क सम्मेलन में हिस्सा लेने गए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान के अलावा सभी देशों से द्विपक्षीय बातचीत की. लेकिन पाकिस्तान से बात नहीं की. न ही पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की तरफ गर्मजोशी दिखाई. क्यों?  इससे क्या हासिल हुआ? क्या भारत-पाकिस्तान के बीच मुद्दा सुलझ गया?  नहीं न.

 

पाकिस्तान की शर्त सही है या गलत इस बात को एक पल के लिए नजरअंदाज कर देते हैं. बात जरूरत की है. हमें आगे बढ़ना है. हमें अमन-चैन चाहिए. इसलिए पाकिस्तान से बात करना हमारी जरूरत है. उन्हें हमारी जरूरत है या नहीं, ये उन्हें तय करना है. भारत का ये कहना कि पहले पाकिस्तान आतंकवाद पर लगाम लगाए तभी हम उनसे बात करेंगे, इस रुख में काफी कड़ापन है. अगर वो आतंकवाद खत्म नहीं करेंगे तो क्या हम कभी उनसे बात नहीं करेंगे? कब तक कुढ़ते रहेंगे, परेशान रहेंगे? परमाणु बम के दौर में जंग तो हो नहीं सकती. जंग हुई तो सब खत्म. तो क्या इस मुद्दे का कभी कोई इलाज ही नहीं नहीं निकलेगा?

 

अगर हम इंतजार कर रहे हैं कि एक दिन पाकिस्तान खुद-ब-खुद सुधरेगा, भारत में आंतकियों को भेजना बंद करेगा, सरहद पर शांति रखेगा, कश्मीर मुद्दे को कभी नहीं उठाएगा, इत्यादि..इत्यादि, तो फिर तो आनेवाली सात पीढ़ियां भी इस मुद्दे को नहीं सुलझा पाएंगी.

 

कूटनीति के जानकार हमेशा यही कहते रहेंगे कि अभी बात करने का सही समय नहीं है. आखिरकार जब बात ही करनी है तो फिर सही समय का क्या मतलब. जब बात कर लें वही सही समय है. जनता ने मोदी को फिलहाल सिर्फ 60 महीने का वक्त दिया है जिसमें 6 महीने बीत भी चुके हैं. शुरुआत उन्होंने अच्छी की थी. नवाज शरीफ को अपने शपथग्रहण समारोह में बुलाया. साड़ी-शॉल डिप्लोमेसी भी की. सब कुछ अच्छा –अच्छा लग रहा था. 6 महीने में दोनों देशों में कुछ खास बदला भी नहीं. ऐसे में साउथ ब्लॉक के किस बाबू के कहने पर उनका दिमाग फिर गया, पता नहीं.

 

नरेंद्र मोदी अगर सबसे अलग हैं और कुछ नया करना चाहते हैं तो फिर वो ये गलती क्यों कर रहे हैं? वे भी भारत के बाकी प्रधानमंत्रियों की तरह तथाकथित राजनीतिक दबाव में क्यों है? वे तो पूर्ण बहुमत के साथ सरकार में आए हैं. उन्हें काहे का डर?  मनमोहन या वाजपेयी की तरह उनपर गठबंधन सरकार की मजबूरी का बोझ भी नहीं है. वो विपक्ष और विदेश नीति के जानकारों की वही सड़ी, गली, बासी किस्म की आलोचनाओं से घबरा क्यों रहे हैं?  क्यों नहीं लेते कोई बोल्ड फैसला? कहीं ऐसा तो नहीं कि मोदी भी टाइम पास ही कर रहे हैं. भारत-पाकिस्तान का मुद्दा राजनीतिक दलों के लिए पिछले 67 साल से टाइम पास का एक बहाना ही तो रहा है. इस मुद्दे को सुलझाने में न वोट है, न नोट है, ऐसे में दिमाग कौन लगाए. कौन इस पंगे में पड़े?

 

कुछ देर के लिए मान भी लिया जाए कि मोदी भारत-पाकिस्तान के मुद्दे को सुलझाना चाहते हैं. तो क्या फिर उन्हें बड़ा दिल नहीं रखना चाहिए? क्या हर बार बात छोटे-मोटे लोगों की वजह से रुकना ठीक है? हां, हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के अलगाववादी नेता छोटे-मोटे ही हैं. उनको इतनी गंभीरता से लेना ठीक नहीं है. पाकिस्तान को उनसे बात करनी है तो करता रहे. हमें इसे ज्यादा अहमियत नहीं देनी चाहिए. अगर हुर्रियत इतना ही शक्तिशाली है तो फिर हम पाकिस्तान के बात ही क्यों कर रहे हैं. हुर्रियत से बात कर के ही मामला सुलझा लेना चाहिए.

 

कई लोगों का मानना है कि पाकिस्तान की तरफ थोड़ा लचीला रुख रखने से मोदी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद जैसे तथाकथित राष्ट्रवादी संगठनों का गुस्सा झेलना पड़ेगा. जिनकी मेहनत से वो सत्ता में आए हैं, उन्हें वो कैसे खफा कर सकते हैं. अगर मोदी को उनके गुस्से का डर है, तो फिर ये पूरी बहस ही बेकार है.

 

मेरी राय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जल्द से जल्द पाकिस्तान जाना चाहिए. नवाज शरीफ से खुद आगे बढ़कर बात करनी चाहिए. एक बार नहीं, कई बार. पाकिस्तान में निवेश करना चाहिए. व्यापार चार गुना  बढ़ाना चाहिए. एक दूसरे पर आर्थिक निर्भरता बढ़ने से शांति बनाए रखना मजबूरी होती है, ये यूरोपियन यूनियन के सफल एक्सपेरीमेंट से साबित हो चुका है. हमें भी फॉलो करना चाहिए.

 

यही नहीं, भारत के लोगों को पाकिस्तान घूमने जाना चाहिए. स्कूली बच्चों को पाकिस्तान के ट्रिप पर भेजना चाहिए. क्रिकेट टीम को दौरा करते रहना चाहिए. भारतीय अभिनेताओं को पाकिस्तानी फिल्म और टीवी सीरियल में काम करना चाहिए. हर चीज में भारत को पहल करनी चाहिए. बुराई क्या है. अगर वो कड़े तेवर दिखा भी रहे हैं तो भी हमें नरम रुख दिखाना चाहिए. आखिर कभी न कभी तो पाकिस्तान पिघलेगा. अगर इंतजार ही करना है तो बात कर के इंतजार करना चाहिए. बिना बात किए किस बात का इंतजार. बड़प्पन दिखाने का बड़ा असर हो सकता है. अब ये कहना कि ये सब सिर्फ कल्पना में ही संभव है, तो फिर ये मुद्दा कभी सुलझ ही नहीं सकता.

 

जब नरेंद्र मोदी ने अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा, जापान के प्रधानमत्री शिंजो आबे, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री टोनी एबट समेत दुनिया के कई नेताओं को अपने शीशे में उतार लिया हैं तो फिर नवाज शरीफ को शीशे में क्यों नहीं उतार सकते ?  मान लीजिए अगर किसी तरह वो उतर गए तो वारे-न्यारे हो जाएंगे. माना भारत-पाकिस्तान के रिश्तों की तुलना दूसरे देशों से नहीं कर सकते लेकिन बात करेंगे नहीं तो बात बनेगी कैसे. मोदी जी, आप इंटरनेशनल पॉलिटिक्स के नए और उभरते स्टार हैं. बोलने और भाषण देने में एक्सपर्ट हैं. चढ़ते सूरज को सभी सलाम करते हैं. ऐसे में मार दीजिए हथौड़ा, लोहा गर्म है. क्या पता…

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