ब्रांडिंग से आएंगे बुनकरों के 'अच्छे दिन'

By: | Last Updated: Monday, 7 July 2014 10:41 AM
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वाराणसी: देश की सांस्कृतिक नगरी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी के हथकरघा बुनकर बनारसी साड़ियों की उचित ब्रांडिंग न होने से निराश हैं. बुनकरों की मानें तो सही ब्रांडिंग न होने से सारा लाभ बड़े व्यापारियों को ही मिलता है. उनकी ख्वाहिश है कि साड़ियों की अच्छी ब्रांडिंग हो और उन्हें बेचने की सुविधा मिले तो उनके भी ‘अच्छे दिन’ आ जाएं.

 

हथकरघा बुनकर ही बुनाई करके सर्वोत्तम बनारसी साड़ियां बनाते हैं. पिछले तीन माह से बाजार में तंगी के कारण बनारसी साड़ियों का गट्ठर बुनकरों के घरों में पड़ा है. उचित व्यवस्था न होने की वजह से वे उसे सही दाम पर बेच नहीं पाते, जिससे उनकी मेहनत भी जाया जाती है.

 

बुनकर विकास मंच के अध्यक्ष अब्दुल कादिर अंसारी कहते हैं कि घालमेल की वजह से हथकरघा बुनकर परेशान हैं. पावरलूम से बनने वाली साड़ियां भी बाजार में यह कहकर बेची जाती हैं कि वह हाथ से बनाई गई हैं. इस तरह असली साड़ियां मार्केट में पहुंच ही नहीं पातीं और पावरलूम वाली साड़ियां बिक जाती हैं.

 

अंसारी ने कहा, “साड़ियों में हो रहे इस घालमेल से ही हथकरघा बनुकरों के लिए मंदी का माहौल है. बाजार में उनकी मेहनत की कद्र नहीं होती. सारा फायदा पावरलूम वाले उठा लेते हैं.”

 

उल्लेखनीय है कि हथकरघा बनारसी साड़ियां ऑर्डर पर बनती हैं और इन्हें बनाने में दो दिन से दो माह का समय लगता है. बनारसी साड़ियों को तैयार करने के बाद इन्हें बाजार में पहुंचाया जाता है और वहां इन साड़ियों की बोली लगती है. बुनकर मजदूरी एवं कपड़े की कीमत जोड़कर अपनी मांग रखता है.

 

वहीं, पावरलूम पर बनी साड़ियों में मजदूरी नहीं जोड़ी जाती है और कपड़ों की बनावट में चीन के धागों एवं लूम का इस्तेमाल किया जाता है. इस कारण पावरलूम पर बनी साड़ियों के दाम कम होते हैं और गद्दीदार उन्हें बेचना ज्यादा पसंद करते हैं.

 

हथकरघा विभाग के सहायक निदेशक के.पी. वर्मा ने बताया कि हैंडलूम और पावरलूम साड़ियों की बिक्री को लेकर सरकार ने अपनी तरफ से व्यवस्था दी है. सरकार की तरफ से हैंडलूम मार्क की व्यवस्था की गई है.

 

वर्मा के मुताबिक, सरकार की तरफ से हैंडलूम मार्क दिया जाता है ताकि हैंडलूम और पावरलूम के फर्क को आसानी से समझा जा सके, लेकिन साड़ियों पर मार्क न लगा होने से साड़ियों की बिक्री नहीं हो पाती.

 

बकौल वर्मा, “उप्र हथकरघा निगम की तरफ से भी साड़ियों की खरीदारी नहीं की जातीै. हां, कभी कहीं मेला या प्रदर्शनी लगती है तो वहां साड़ियां भेजी जाती हैं. दिल्ली हाट में भी यहां से साड़ियां जाती हैं, लेकिन यह जरूरी नहीं होता कि सभी साड़ियां बिक जाएं.”

 

इधर, शहर के बजरडीहा क्षेत्र के मोहम्मद बशीर ने बताया, “महंगाई का हमारे ऊपर बहुत असर नहीं है. महंगाई बढ़ती है तो हम मेहनत बढ़ा देते हैं. बस हमें बनारसी साड़ियों का सही मूल्य चाहिए.”

 

उन्होंने कहा, “हमारा परिवार 200 वर्षो से बुनकरी कर रहा है. बजरडीहा में हम सबसे पुराने हैं और हाथ से ही बुनकरी करते हैं. चौक में हमारा तैयार माल बिकता है, लेकिन इधर तीन महीने से कोई ऑर्डर नहीं मिला है.”

 

उन्होंने अपना दुख बताते हुए कहा कि 1972 में बजरडीहा के मदरसे में स्थानीय बाजार लगता था और साड़ियां यहीं बेची जाती थीं, लेकिन बाजार बंद हुआ तो चौक से माल जाने लगा. अगर गद्दीदार माल नहीं लेता है तो भाड़ा-किराया भी खराब हो जाता है.

 

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