बजट से पहले संसद में रखा गया आर्थिक सर्वे, महंगाई घटी, अगले साल 8 फीसदी की विकास दर का अनुमान

By: | Last Updated: Saturday, 28 February 2015 1:25 AM

नई दिल्ली: मोदी सरकार के कल पेश होने वाले पहले पूर्ण बजट के बारे में मोटे तौर पर संकेत देते हुये संसद में शुक्रवार को पेश आर्थिक समीक्षा में उच्च आर्थिक वृद्धि हासिल करने, सार्वजनिक निवेश बढ़ाने और नियमों तथा करों को कम कष्टदायी बनाकर व्यावसायिक परिवेश में सुधार लाने पर जोर दिया गया है.

 

वित्त मंत्री अरण जेटली ने वर्ष 2014-15 की आर्थिक समीक्षा शुक्रवार को संसद के पटल पर रखी जिसमें चालू वित्त वर्ष के 7.4 प्रतिशत के मुकाबले अगले वित्त वर्ष 2015-16 के दौरान आर्थिक वृद्धि 8.1 से 8.5 प्रतिशत के दायरे में रहने का अनुमान लगाया गया है. उसके बाद के वषरें में यह 8 से 10 प्रतिशत तक पहुंच सकती है. ये आंकड़े जीडीपी गणना के नये आधार वर्ष और नई पद्धति के अनुरूप हैं.

 

बड़े सुधारों को आगे बढ़ाने पर जोर देते हुये समीक्षा में कहा गया है, ‘‘भारत इस समय एक बेहतर मुकाम पर है. इस समय बड़े सुधारों को आगे बढ़ाने का अच्छा अवसर है.’’ सुधारों के लिये मिले जनादेश और बाह्य परिवेश अनुकूल रहने से भारत को आर्थिक वृद्धि दहाई अंक के दायरे में पहुंचाने का एतिहासिक अवसर मिला है.

 

वित्त मंत्री अरण जेटली को कल पेश होने वाले बजट के बारे में स्पष्ट संकेत देते हुये इसमें कहा गया है, ‘‘राजकोषीय मजबूती की प्रक्रिया अनिवार्य रूप से जारी रखनी चाहिये जिसमें मध्यम अवधि के दौरान क्रियान्वयन की रूपरेखा तैयार की जाये.’

 

समीक्षा में आर्थिक वृद्धि और निवेश को बढ़ावा देने के लिये उन सुधारों को भी रेखांकित किया गया है जिनपर आगे बढ़ने की जरूरत है. इसमें कहा गया है कि कर प्रशासन में सुधार लाया जाना चाहिये. उद्योग-धंधे चलाने का माहौल बेहतर होना चाहिये और लागत कम होनी चाहिये. श्रम और भूमि कानूनों में सुधार की काफी जरूरत है.

 

बजट में सब्सिडी कम करने की तरफ इशारा करते हुये समीक्षा में कहा गया है कि सब्सिडी को तर्कसंगत बनाकर इसका बोझ कम होना चाहिये. इसके साथ ही देश में प्रतिस्पर्धी, विश्वसनीय और साफ सुथरे नीतिगत परिवेश की जरूरत है. विनिवेश बढ़ाने पर भी जोर दिया गया है.

 

संवाददाताओं से बात करते हुये मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमणियन ने कहा, ‘‘हमारे सामने अब निम्न मुद्रास्फीति होगी और हम रिजर्व बैंक के वृद्धि अनुमान के मुकाबले उंची वृद्धि हासिल करेंगे.’’ समीक्षा में निजी क्षेत्र के निवेश पर खासा जोर दिया गया है. इसमें गया है कि दीर्घकालिक वृद्धि के लिये निजी क्षेत्र के निवेश को ही इंजिन का काम करना चाहिये. इसमें कहा गया है कि जब तक निजी क्षेत्र का निवेश जोर पकड़ता है तब तक आर्थिक वृद्धि बढ़ाने के लिये सार्वजनिक निवेश और विशेषतौर से रेलवे क्षेत्र में निवेश की भूमिका काफी अहम होगी.

 

वस्तु एवं सेवाकर (जीएसटी) व्यवस्था लागू करने पर जोर देते हुये समीक्षा में इसे पासा पलटने वाला बताया गया है. इसके साथ ही इसमें कहा गया है कि जनधन-आधार-मोबाइल (जनाधारम) इन तीन प्रौद्योगिकी समर्थित कार्यक्रमों के जरिये शुरू प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरित योजना से ‘‘हर आंख से आसुओं की हर बूंद को पोंछ लिया जायेगा.’ इसमें कहा गया है, ‘‘इससे दोतरफा लाभ होगा, एक तरफ इससे गरीब को सुरक्षा मिलेगी और बचाव साधन उपलब्ध होंगे, दूसरी तरफ वस्तुओं के दाम को संसाधनों का कुशलता के साथ आवंटन करने में अपनी भूमिका निभाने की पूरी आजादी मिलेगी ताकि इससे दीर्घकालिक वृद्धि को बढ़ावा दिया जा सके.’’ समीक्षा में कहा गया है कि आने वाले वषोर्ं में राजकोषीय घाटे को कम करके सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के तीन प्रतिशत तक नीचे लाया जाना चाहिये. जबकि दूसरी तरफ चालू खाते के घाटे (कैड) अगले वित्त वर्ष में जीडीपी का एक प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है.

 

अगले वित्त वर्ष के दौरान खुदरा मुद्रास्फीति 5 से 5.5 प्रतिशत के दायरे में रहने का अनुमान है.

 

देश की वित्तीय स्थिति में आये सुधार पर गौर करते हुये समीक्षा में कहा गया है ‘‘संतुष्ट होकर बैठने का समय नहीं है और भारत को अपने मध्यमकालिक राजकोषीय घाटे के तीन प्रतिशत के लक्ष्य को अवश्य हासिल करना चाहिये.’’ समीक्षा में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि इस लक्ष्य को पाने के लिये सब्सिडी में कमी लाकर खचोर्ं पर नियंत्रण करना होगा. सार्वजनिक उपभोग और निवेश में व्यय की गुणवत्ता को निवेश के पक्ष में रखना होगा और इसके साथ ही केवल सार्वजनिक निवेश के लिये ही उधार लेने के बेहतर नियम को अपनाकर आगे बढ़ना होगा.

 

समीक्षा में कहा गया कि सब्सिडी में आने वाली कमी, विनिवेश से मिलने वाली पूंजी सहित वित्तीय क्षेत्र में बनने वाली गुंजाइश का इसतेमाल सार्वजनिक निवेश बढ़ाने में होना चाहिये.

 

समीक्षा में कहा गया है कि बजट ऐसा होना चाहिये जिससे प्रतिस्पर्धी, विश्वसनीय, साफ सुथरी और हल्की फुल्की कर छूट ही रखने की नीति का माहौल बने, जिससे कि पूंजी की लागत में कमी आये, बचत को प्रोत्साहन और कर अनुपालन को बढ़ावा मिले.

 

समीक्षा कहती है कि राजकोषीय घाटे को नियंत्रित कर तीन प्रतिशत के दायरे में रखने के तमाम उपायों के बावजूद अगले वित्त वर्ष में इस दिशा में होने वाली प्रगति सीमित रह सकती है. इसकी वजह गिनाते हुये कहा गया है कि 14वें वित्त आयोग की सिफारिशों को अमल में लाने, केन्द्रीय बिक्री कर दर घटने के बदले राज्यों को होने वाली क्षतिपूर्ति की भरपाई और निवेश की गति बढ़ाने की जरूरतों के चलते अगले वित्त वर्ष में इस दिशा में प्रगति धीमी रह सकती है.

 

समीक्षा के अनुसार व्यय की गुणवत्ता में सुधार आने और सार्वजनिक उपभोग के बजाय निवेश की तरफ कदम बढ़ाने, आर्थिक वृद्धि, जीएसटी की शुरआत और इससे जुड़ी राजस्व प्राप्ति गतिविधियां बढ़ने से मध्यम अवधि के लक्ष्यों को आसानी से प्राप्त किया जा सकेगा.

 

आर्थिक गतिविधियों में तेजी इतिहास को देखते हुये सुनिश्चित होती है क्योंकि पिछले एक दशक में बिना ठोस सुधारों के भी वृद्धि की गति बढ़ने से सकल कर-जीडीपी अनुपात दो से ढाई प्रतिशत तक बढ़ गया.

 

समीक्षा में आर्थिक वृद्धि को बढ़ावा देने के लिये रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दरों में कटौती को भी एक अहम् कारक बताया गया है. इसमें कहा गया है कि कच्चे तेल के दाम गिरने, सामान्य मानसून और सुधारों से आर्थिक वृद्धि तेजी से बढ़ेगी.

 

14वें वित्त आयोग के मुद्दे पर एक अलग अध्याय में समीक्षा में देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को उदृत करते हुये कहा गया है कि वित्त आयोग की सिफारिशों को अपनाने और नीति आयोग बनाने से सरकार के सहयोगात्मक एवं प्रतिस्पर्धी संघवाद को बढ़ावा मिलेगा.

 

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