यदि लोकतांत्रिक प्रकिया की 'हत्या' हुयी तो खामोश नहीं रह सकते: SC

By: | Last Updated: Friday, 5 February 2016 1:53 PM
Can’t remain silent if democracy is slaughtered: SC on Arunachal crisis

नयी दिल्ली: राज्यपालों के अधिकारों की समीक्षा कर रहे उच्चतम न्यायालय ने आज इस कथन पर कड़ी आपत्ति की कि राज्यपाल के सारे फैसले न्यायिक समीक्षा के लिये उपलब्ध नहीं है. न्यायालय ने कहा कि यदि लोकतांत्रिक प्रक्रिया की ‘हत्या’ हुयी तो वह मूक दर्शक बना नहीं रह सकता.

न्यायमूर्ति जे.एस. खेहड़ की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा, ‘यदि लोकतंत्र की हत्या हो रही हो तो न्यायालय खामोश कैसे रह सकता है.’ इससे पहले बीजेपी विधायक के वकील ने अपनी बात कहने के लिये राज्यपालों के अधिकारों का हवाला दिया कि अदालतें राज्यपाल के सारे फैसलों की ‘समीक्षा’ नहीं कर सकतीं.

इस बीच, पीठ ने अक्तूबर से अभी तक का अरूणाचल प्रदेश विधानसभा के पत्राचार का विवरण आठ फरवरी को तलब किया है. क्योंकि वह विधानसभा अधिकारी द्वारा पेश दस्तावेजों से संतुष्ट नहीं थी. संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति मदन बी लोकूर, न्यायमूर्ति पी सी घोष और न्यायमूर्ति एन वी रमण शामिल है.

पीठ सदन का सत्र बुलाने, इसकी तारीख पहले करने और कांग्रेस के विद्रोही विधायकों की अयोग्यता को लेकर विधानसभा अध्यक्ष नबम रेबिया और राज्यपाल राजखोवा के बीच हुआ पत्राचार देखना चाहती थी. कुछ कांग्रेस के विद्रोही विधायकों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने राज्यपाल के फैसले का समर्थन किया.

समर्थन में उन्होंने कहा कि विधानसभा का सत्र आहुत करने को ‘अलोकतांत्रिक’ नहीं कहा जा सकता. और, यह ‘लोकतांत्रिक प्रक्रिया’ को निष्फल नहीं करता है. बल्कि विधानसभा भवन को ताला लगाना और उसका सामना नहीं करना अलोकतांत्रिक कृत्य है. द्विदेदी ने कहा कि राज्यपाल के लिये विधान सभा का सत्र बुलाने हेतु मुख्यमंत्री और उनके मंत्रिमंडल की सलाह लेना अनिवार्य नहीं है.

उन्होने कहा कि संविधान की कुछ व्यवस्थाओं में राज्यपाल को ‘विशेष’ परिस्थितियों में खुद ही विशेष कदम उठाने होते हैं. द्विवेदी ने कहा कि राज्यपाल ने विधानसभा का सत्र आहूत करके लोकतांत्रिक प्रक्रिया को क्रियाशील बनाया. उन्होंने सवाल किया कि बहुमत गंवा चुके और सदन से बच रहे लोग इसे गैरकानूनी कैसे करार दे सकते हैं.

उन्होंने कहा कि विधान सभा की इमारत पर ताला लगाना निश्चित ही साधारण और लोकतांत्रिक कृत्य नहीं था. न्यायालय इस मामले में गौहाटी उच्च नयायलाय के आदेश के खिलाफ रेबिया और अन्य कांग्रेसी नेताओं की याचिकाओं पर कल आगे सुनवाई करेगी.

इससे पहले, न्यायालय ने कहा था कि राज्यपालों की नियुक्ति राजनीतिक है. उनकी कार्रवाई न्यायिक समीक्षा के दायरे में आती है क्योंकि आज कल तो इस पद के लिये न्यायाधीशों के नाम पर भी विचार होता है. बीजेपी के विधायक टेग तकी ने कल कांग्रेस द्वारा राज्यपाल के फैसले के खिलाफ गुवाहाटी उच्च न्यायालय में याचिका दायर करने में विलंब पर सवाल उठाया था.

तकी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने कहा था कि यदि राज्यपाल ने इतनी ‘गंभीर’ गलती की थी तो फिर सत्तारूढ़ पार्टी ने मामले को आगे क्यों बढ़ने दिया और अंतिम क्षणों में अदालत क्यों गयी. 60 सदस्यीय विधान सभा में शुरू में नबम तुकी सरकार को 47 विधायकों का समर्थन प्राप्त था, परंतु ईटानगर के सामुदायिक केन्द्र में आयोजित विधानसभा के सत्र में उसने कथित रूप से 33 मतों से विश्वास मत गंवा दिया था.

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Web Title: Can’t remain silent if democracy is slaughtered: SC on Arunachal crisis
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