इस 'मानसून' में डूबेंगे या हमेशा की तरह फिर बच निकलेंगे छगन भुजबल?

By: | Last Updated: Thursday, 18 June 2015 1:21 PM

मुंबई में मानसून आ गया है, लेकिन लगता है कि जितना पानी बरसा है उससे ज्यादा एनसीपी के वरिष्ठ नेता छगन भुजबल पर आरोपों की बारिश हुई है. महाराष्ट्र सदन घोटाला, आय से ज्यादा संपत्ति, फर्जी डिग्री, पद का दुरूपयोग कर बिल्डर को सरकारी जगह देने, निवेशकों से ठगी करने जैसे आरोप भुजबल पर हाल के दिनों में लगे हैं. ऐसे आरोपों को लेकर जांच एजेंसियां भी हरकत में आईं हुई दिख रहीं हैं. महाराष्ट्र की सियासत में जो सबसे दिलचस्प चेहरें हैं, उनमें से एक छगन भुजबल मुझे नजर आते हैं. बतौर पत्रकार कई मौकों पर भुजबल से मुलाकात हुई और इन मुलाकातों ने मेरी नजर में उनकी जो इमेज बनाई है वो बहुरंगी है.

 

प्रतिशोधी छगन भुजबल

छगन भुजबल में बदला लेने की जबरदस्त भावना है. अगर किसी ने भुजबल को हानि पहुंचाई है तो भुजबल मौका पडने पर उसे नहीं छोडते. भुजबल ने खुद को राजनीति में लाने वाले शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे को भी नहीं छोडा. 1991 में शिवसेना से बगावत करने के बाद से ही भुजबल बाल ठाकरे के निशाने पर थे. भुजबल को सबक सिखाने का मौका ठाकरे को तब मिला जब 1995 में बीजेपी-शिवसेना की गठबंधन सरकार महाराष्ट्र की सत्ता में आई.

 

1996 में भुजबल महाराष्ट्र में विपक्ष के नेता थे और उन्हें मंत्रालय के सामने A-10 बंगला बतौर निवास मिला था. एक दिन शिवसैनिकों की भीड़ ने उनके बंगले पर हमला कर दिया और जमकर तोडफोड की. भुजबल का कहना था कि ये उनकी हत्या की साजिश थी और उन्होने जैसे-तैसे बंगले से निकलकर अपनी जान बचाई. भुजबल इस घटना को भूले नहीं और बदला लेने की ताक में रहे. उन्हें मौका मिला साल 2000 में जब फिर एक बार कांग्रेस-एनसीपी सरकार महाराष्ट्र की सत्ता में आई और भुजबल राज्य के गृहमंत्री बनाये गये.

 

गृहमंत्री बनने के बाद भुजबल ने भडकाऊ लेख लिखने के 6 साल पुराने आरोप के तहत शिवसेना प्रमुख ठाकरे को गिरफ्तार करवा दिया. ये भुजबल का बदला था. भले ही ठाकरे की गिरफ्तारी तकनीकी तौर पर घंटेभर की ही रही हो, लेकिन उन्हें गिरफ्तार करवाना भुजबल के लिये एक बडी जीत थी. जिन बाल ठाकरे की आवाज पर मुंबई हिल जाती थी, जिनके शिवसैनिक एक आदेश पर हिंसा और तोडफोड के लिये तैयार रहते थे, उन नेता को गिरफ्तार करना कोई आसान काम नहीं था.

 

राज्य के गृहमंत्री होने के नाते मुंबई में कानून-व्यवस्था बनी रहे इसकी जिम्मेदारी भी भुजबल पर थी, लेकिन भुजबल ने ये जोखिम उठाया और इसके लिये पूरी तैयारी भी की. राज्यभर की पुलिस को मुंबई में लगा दिया गया और आपराधिक मामलों वाले शिवसैनिकों को पहले ही पकड़ लिया गया. जुलाई 2000 में ठाकरे की गिरफ्तारी से 10 दिनों पहले ही शहर में माहौल गर्म हो गया था, लेकिन गिरफ्तारी वाले दिन भुजबल ने इतने कडे इंतजाम कर रखे थे कि मुंबई में शिवसेना की ओर से कोई बडा उत्पात नहीं मचाया जा सका.

 

अंडरवर्लड से रिश्तों के आरोपों के तहत हीरा कारोबारी और फिल्म प्रोड्यूसर भरत शाह की मकोका कानून के गिरफ्तारी भी सियासी हलकों में भुजबल की प्रतिशोधी भावना की एक मिसाल मानी जाती है, लेकिन इस मामले में पुख्ता तौर पर ज्यादा लिखने के लिये कुछ नहीं है.

 

कलाकार भुजबल

जो पत्रकार राजनीति कवर करते हैं उन्हें पता है कि भुजबल एक अच्छे कलाकार भी हैं. बाल ठाकरे और राज ठाकरे की तरह ही भुजबल को भी दूसरों की मिमिक्री करना आता है. वे अभिनय भी कर लेते हैं, ये तब पता चलता था जब मैं बाल ठाकरे की ओर से लगाये गये किसी आरोप पर उनकी प्रतिक्रिया लेने जाता था. वे आंखें लाल करके, भौंहें टेढी करके, कैमरे की तरफ उंगली दिखाते हुए ऐसे बोलते जैसे ठाकरे उनके सामने ही खडे हों. चेहरे पर ऐसे नाटकीय भाव लाने के बाद वे बोलना शुरू करते – “सुन लो बाल ठाकरे…” बाद में पता चला कि भुजबल एक मराठी फिल्म और पारंपरिक नाटकों में भी काम कर चुके हैं और अपनी इस कला का इस्तेमाल वे राजनीति में भी करते थे.

 

भुजबल को गीत गाने का भी शौक है ये तब पता चला जब एक बार उन्होने क्राईम रिपोर्टरों को रामटेक बंगले पर एक कार्यक्रम में आमंत्रित किया. उस मौके पर टाईम्स औफ इंडिया के वरिष्ठ पत्रकार एस.बालाकृष्णन और भुजबल के बीच अच्छी जुगलबंदी हुई. भुजबल ने उस मौके पर कई पुराने हिंदी फिल्मों के गाने गाये.

 

भुजबल को टोपियां इकट्ठा करने का भी शौक है. उनके पास दुनियाभर की तरह तरह की बनावट वाली टोपियों का कलैक्शन हैं. भुजबल की कलाप्रियता और उनके शौकों पर अलग से पूरा ब्लॉग लिखा जा सकता है.

 

सर्वाइवर भुजबल

 

बडी से बडी मुसीबत आने पर भी भुजबल को खुशमिजाज रहते देखा गया है और ये भी दिलचस्प बात है कि गंभीर मामलों में भी फंसने के बावजूद भुजबल बिना किसी बडी हानि के बाहर निकाल आते हैं जो उनकी जिजीविषा दर्शाती है. साल 2003 में भुजबल पर उस वक्त बन आई थी जब वे करोडों के फर्जी स्टांप पेपर घोटाले जो कि तेलगी घोटाले के नाम से चर्चित हुआ था में फंस गये थे. एक के बाद एक तमाम छोटे बडे पुलिस अफसरों की गिरफ्तारी के बाद नंबर छगन भुजबल और उनके भतीजे समीर का लगने वाला था, लेकिन भुजबल ने हिम्मत नहीं हारी.

 

घोटाले के पर्दाफाश होने के बाद से ही लगातार उनका नाम चर्चा में रहा लेकिन भुजबल ने खुदको बेकसूर बताया. सिर्फ एक बार जी न्यूज के मौजूदा रेसीडेंट एडिटर संजय सिंह के एक सवाल पर वे आपा खो बैठे थे और भरी प्रेस कांफ्रेंस में उन्होने सिंह को चप्पल निकालने की धमकी दे दी थी. साल 2004 में एक वक्त ऐसा आया जब बॉम्बे हाई कोर्ट की ओर से गठित विशेष जांच टीम की ओर से भुजबल की गिरफ्तारी तय मानी गई, लेकिन ऐन वक्त पर केंद्र में सत्ता परिवर्तन हो गया. केंद्र में एनडीए की जगह यूपीए आ गई. शरद पवार सरकार में शामिल होकर कृषि मंत्री बन गये और तेलगी घोटाले की जांच एसआईटी से छीनकर सीबीआई को सौंप दी गई. भुजबल गिरफ्तारी से बच गये.

 

करीब 11 साल बाद भुजबल फिर एक बार कानून के भंवर में फंसे हैं. क्या वे इस बार डूबेंगे या हमेशा की तरह फिर बच निकलेंगे छगन भुजबल?

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Web Title: Chhagan Bhujbal_blog_Jitendra Dixit
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