छोटा राजन : अपराध की दुनिया में उतार चढ़ाव से भरपूर रहा है सफर

By: | Last Updated: Tuesday, 27 October 2015 3:10 AM
chhota rajan: from a ticket blacker to most wanted criminal

मुंबई: सिनेमा की टिकटों को ब्लैक करने वाले मामूली गुंडे से भारत के सबसे वांछित अपराधियों की कतार में पहुंचे खूंखार छोटा राजन का अपराध की दुनिया का दशकों का सफर उतार चढ़ाव से भरपूर रहा.

 

इस दौरान वह एक वक्त के अपने बास दाउद इब्राहिम से अलग हुआ और जानलेवा हमले से भी बच निकला.

 

55 वर्षीय अपराध सरगना छोटा राजन, जिसका असली नाम राजेन्द्र सदाशिव निखालजी है, की गिरफ्तारी मुंबई के अपराध जगत के इतिहास की एक बहुत बड़ी घटना है. उसे कल इंडोनेशिया से गिरफ्तार किया गया.

 

राजन ने अपराध की दुनिया का अपना सफर तिलक नगर में शाहकार सिनेमा में 1970 और 80 के दशक में टिकटों की ब्लैक मार्केटिंग से शुरू किया. उसने राजन महादेव उर्फ बड़ा राजन के साथ काम किया, जो छोटे से गिरोह का मुखिया था और माटुंगा के अपराध सरगना वर्दराजन मुदलियार के लिए काम करता था.

 

तिलक नगर में जन्मे छोटा राजन का परिवार आज भी वहीं रहता है. कहा जाता है कि गरीबी और निरक्षरता के कारण छोटा राजन ने छोटे मोटे अपराध करने शुरू किए.

 

आगे बढ़ने की चाह रखने वाला राजन जल्दी ही एक मामूली गुंडे से बड़ा राजन का दायां हाथ बन गया. 1983 में बड़ा राजन की चंद्रशेखर सफलिका और अब्दुल कुंजू ने गोली मारकर हत्या कर दी.

 

प्रतिद्वंदी गुट के हाथों अपने बॉस की मौत के बाद राजन ने उसका बदला लेने के लिए इंस्पैक्टर एमानुएल अमोलिक को गुप्त सूचना दी, जिसके बाद एक मुठभेड़ में सफलिका मारा गया. उसने एक अन्य घटना में कुंजू का भी सफाया करा दिया. इन दोनो की मौत के बाद अपराध जगत में छोटा राजन की धाक जम गई. इस दौरान वह दाउद के संपर्क में आया जो 1980 के दशक के शुरू में एक जाना माना सोना तस्कर था.

 

दाउद को मुंबई में अपना गिरोह चलाने के लिए एक मजबूत आदमी की जरूरत थी और उसने इस काम के लिए राजन को चुन लिया.

 

इस दौरान पुलिस का दबाव बढ़ने लगा और दाउद 1984 में दुबई भाग गया और राजन ने उसका गिरोह पूरी तरह से संभाल लिया. 1988 में राजन ने भी इसी खाड़ी शहर का रूख किया.

 

12 मार्च 1993 को मुंबई में हुए विस्फोटों के साजिशकर्ताओं में दाउद का भी नाम था. इस घटना ने मुंबई ही नहीं बल्कि पूरे देश को झकझोरने के साथ ही अपराध जगत के कई समीकरण भी बदल दिए.

 

राजन ने दाउद से जान का खतरा होने पर उससे किनारा कर लिया और उसके बाद दोनो के बीच दुश्मनी का एक नया दौर शुरू हुआ. पुलिस सूत्रों का कहना है कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने दाउद से राजन को खत्म करने के लिए कहा था.

 

इस दौरान छोटा शकील ने दाउद की मेहरबानी हासिल कर ली थी और उसने राजन की जगह ले ली थी.

 

दाउद से दुश्मनी के बाद राजन अपने करीबी साथियों के साथ दुबई से भाग गया और दाउद तथा उसके गिरोह के सदस्यों के खात्मे की जुगत में लग गया. जल्दी ही राजन ने 1993 के बम विस्फोट आरोपियों को मारना शुरू किया और खुद को एक ‘हिंदू’ सरगना के तौर पर स्थापित किया. 1990 के दशक के अंतिम सालों में राजन के गिरोह ने दाउद के करीबी दिलशाद बेग को खत्म करके बड़ी कामयाबी हासिल की. यह दाउद, जिसके बारे में कहा जा रहा है कि वह इस समय पाकिस्तान में रहता है, के लिए बड़ा नुकसान था.

 

वर्ष 2000 में छोटा शकील ने राजन पर हमले की योजना बनाई और उसके आदमियों ने बैंकाक के एक होटल में उसपर गोलियां चलाईं, लेकिन वह होटल की छत से भागकर अपनी जान बचाने में कामयाब रहा.

 

उसे चूंकि गोली लगी थी इसलिए बैंकाक के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन बाद में वह वहां से भी भाग गया और तब से उसके पते ठिकाने के बारे में किसी को कुछ पता नहीं था. राजन इस हमले से बच तो गया, लेकिन अपराध जगत में उसकी वह धाक बाकी नहीं रही और उसे कई तरह की स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों से भी जूझना पड़ा.

 

वर्ष 2000 के दशक के शुरू में राजन के गिरोह के कई लोग विरोधी गुटों के हाथों या पुलिस के साथ मुठभेड़ में मारे गए. 2005 में राजन की पत्नी सुजाता को मकोका में गिरफ्तार किया गया. राजन ने इसके बाद रियल एस्टेट और अन्य काम धंधे पर ध्यान केंद्रित करना शुरू किया.

 

11 जून 2011 को पोवई में क्राइम रिपोर्टर जे डे की मौत के मामले में एक बार फिर राजन का नाम सामने आया. पुलिस ने दावा किया कि राजन ने ही डे की हत्या करवाई थी और इस सिलसिले में उसके गिरोह के कुछ लोगों को गिरफ्तार भी किया गया.

 

सिंह कहते हैं कि इस चुनाव में नीतीश कुमार और लालू प्रसाद साथ-साथ हैं, इसलिए उम्मीद की जानी चाहिए कि राघोपुर का राजनीतिक गणित उनके फार्मूले के हिसाब से एक दम निशाने पर लगे, लेकिन सतीश एकबार फिर यादव मतदाताओं में सेंध लगाने की कोशिश में हैं. राजपूत और पासवान जाति के मतदाताओं का झुकाव भी सतीश की ओर है। ऐसे में राघोपुर में मुकाबला कांटे का है.

 

बहरहाल, मतदाता मतदान से पहले कुछ भी खुलकर नहीं बोल रहे हैं, लेकिन इतना तय है कि 28 अक्टूबर को यहां के मतदाता बड़ी संख्या में मतदान केंद्र पहुंचेंगे और अपना मत देंगे.

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Web Title: chhota rajan: from a ticket blacker to most wanted criminal
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