कांग्रेस की बौद्धिक लॉबी के लोग ही लौटा रहे सम्मान: नरेंद्र कोहली 

By: | Last Updated: Friday, 30 October 2015 6:04 AM
Congress intellectual lobby is returning the Awards: Narendra Kohli

नई दिल्ली: इन दिनों सम्मान वापसी का मामला गरमाया हुआ है. पहले साहित्यकारों ने सम्मान वापस किए लेकिन अब इसमें फिल्मकारों और वैज्ञानिकों का नाम भी जुड़ गया है. इस मुद्दे पर बहस भी जारी है. इसी सिलसिले में दिल्ली के हिंदी भवन में प्रवक्ता.कॉम द्वारा ‘सम्मान वापसी: प्रतिरोध या पाखंड’ विषयक संगोष्ठी का आयोजन किया गया. इस विषय पर हुई बहस में साहित्य, पत्रकारिता, कला एवं संस्कृति के क्षेत्र से तमाम दिग्गज शामिल हुए.

 

संगोष्ठी के विषय पर बोलते हुए प्रथम वक्ता के तौर पर वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव ने कहा, “मैं ये मानता हूँ कि कोई भी राष्ट्रीय पुरस्कार कोई राजनीतिक दल नहीं देता बल्कि एक चयन प्रक्रिया के बाद देश अथवा संस्थान के द्वारा दिया जाता है,तो ऐसे में यह पुरस्कार लौटाना उचित नहीं है. लेकिन आज जो कुछ भी हो रहा है उसको सिरे से खारिज भी नहीं किया जा सकता है. सहिष्णुता के सवाल की उपेक्षा नहीं की जा सकती है. मगर आज विरोध की बजाय संवाद की ज़रूरत है. अब हमको पूरी सावधानी के साथ षड्यंत्रों और असहमतियों को समझना होगा.” साथ ही राहुल देव ने यह भ कहा कि जब सम्मान वापसी वैज्ञानिक भी करने लगें तो इसे गंभीरता से लेना चाहिए.

 

राहुल देव के वक्तव्य के बाद उनसे कई बिन्दुओं पर स्पष्ट असहमति जताते हुए प्रख्यात लोकगायिका मालिनी अवस्थी ने कहा, “साहित्यकारों का आदर इसलिए होता है क्योंकि वे समाज में समरसता घोलते हैं, लेकिन आज वही भय का वातावरण बना रहे हैं. ऐसे में क्यों न हम इसको एक साजिश के तौर पर देखें ?

 

वक्तव्य के क्रम में संवाद और वैचारिक बहस से जुड़े सवाल पर बोलते हुए ख्यातिलब्ध साहित्यकार कमलकिशोर गोयनका ने कहा, “मैं चालीस वर्षों से उस विचारधारा वर्ग से संवाद कायम करने की कोशिश कर रहा हूँ लेकिन वे संवाद के लिए तैयार नहीं हैं. वे स्वयं को ही श्रेष्ठ विचार वाले बताते हैं.उदय प्रकाश जी छः महीने पहले वक्तव्य देते हैं कि ‘अकादमी सम्मान उनके चेहरे में लगे दाग के समान है’ उनसे हम क्या अपेक्षा कर सकते हैं? कुछ लोगों को अपने एनजीओ में घट रहे विदेशी चंदों की फ़िक्र सता रही है,ऐसे में ये केंद्र सरकार को बदनाम करने की साजिश के अलावा कुछ भी नहीं है.”

 

बहस मुबाहिसे में बात आगे बढ़ी तो बात राजनीति तक चली गयी और सम्मान वापस करने वाले साहित्यकारों के राजनीतिक जुड़ाव पर अपनी बात रखते हुए संस्कृति कलाकर्मी दया प्रकाश सिन्हा ने कहा कि साहित्यकार व्यक्तिगत रूप से कोई विचार रखे तो अलग बात है लेकिन एक साजिश के तहत संगठन बनाकर विरोध करने वाले लोगों को साहित्यकार नहीं बल्कि राजनितिक कार्यकर्ता मानना चाहिए.

 

वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्र ने तो साहित्य सम्मान वापस करने वालों पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि पुरस्कार लौटाने की तात्कालिक उत्तेजना क्या थी यह समझ से परे है! ये जिस चिंतनधारा से निकले हुए लोग हैं उनका अपना इतिहास रहा है कि वे महात्मा गाँधी को भी अंग्रेजों का एजेंट कहा करते थे. पुरस्कार लौटाने की तात्कालिक उत्तेजना के रूप में केवल और केवल 2014 के  लोकसभा चुनाव में आया परिणाम दिखाई देता है. उनसे गांधी जैसा व्यक्ति तक विमर्श नहीं कर सका.”

 

प्रख्यात कवि बलदेव वंशी ने भी इसे राजनीतिक साजिश बताते हुए इस पूरे हंगामे को बिहार चुनाव से जोड़ दिया. उन्होंने कहा, “साठ वर्ष तक जिन शक्तियों के सहारे वे पुरस्कार पाते रहे हैं उन्हीं शक्तियों का अब दबाव है कि वे पुरस्कार वापस करें. उनकी उत्तेजना का बिंदु बिहार चुनाव है.अत: इस राजनीति का जवाब प्रबल राजनीति से ही देना होगा.

 

संगोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ साहित्यकार नरेंद्र कोहली ने सम्मान वापसी कर रहे साहित्यकारों पर गंभीर आरोप लगाये. नरेंद्र कोहली ने कहा, “ कांग्रेस के इंटलेक्चुअल लॉबी  में वामपंथी ही रहे हैं. इसमें कोई शक नहीं कि साठ वर्षों से एक ही विचार पक्ष को पुरस्कृत किया जाता रहा है. असहिष्णुता की जो लोग बात कर रहे हैं वो एक विशेष किस्म की असिहष्णुता की बात कर रहे है. ये काश्मीरी पंडितों पर नही बोलते हैं बल्कि इनका सारा बल एक विशेष प्रकार की असहिष्णुता पर है वे अन्य प्रकार की असहिष्णुता पर बात नहीं करते लेकिन आज ऐसा क्या बदला कि उन्हें पुरस्कार लौटाने पड़ रहे हैं? देश में उठा ये नियोजित विरोध माहौल बदलने की वजह से नही बल्कि केंद्र की सरकार बदलने की वजह से है.

 

परिचर्चा के दौरान मंच के नीचे दर्शकों के बीच से भी कई सवाल-जवाब हुए. संगोष्ठी में ‘साहित्य सम्मान वापसी का सच’ नाम से एक पुस्तिका का विमोचन हुआ एवं एक डाक्यूमेंट्री के माध्यम से इस विषय का दूसरा पक्ष दिखाने की कोशिश की गयी. 

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