'अल्लाह' का नहीं 'मुल्ला' का है मुस्लिम कानून!

controversy on Muslim personal law

“तीन तलाक़” के मामले में सुप्रीम कोर्ट और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) के बीच की खींचतान चल रही है. सुप्रीम कोर्ट ने खुद संज्ञान लेते हुए “मुस्लिम पर्सनल लॉ” की समीक्षा का फैसला किया है. इस बीच कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने ट्वीटर के ज़रिए ऑल इंडिया मुस्लिम लॉ बोर्ड से ये सवाल पूछ कर विवाद को तूल दे दिया है कि क्या “मुस्लिम पर्सनल लॉ” यानि “शरियत” संविधान से ऊपर है…? बोर्ड पहले ही कह चुका है कि सुप्रीम कोर्ट को “मुस्लिम पर्सनल लॉ” की समीक्षा का अधिकार नहीं है क्योंकि ये “क़ुरआन” की रोशनी में बना “अल्लाह” का क़ानून है. यही राय जमीयत उलमा-ए-हिंद की भी है. वो इस मालमे में सुप्रीम कोर्ट में बाक़ायदा पक्षकार हो गया है. जमीयत 1986 में शाह बानो केस में भी पक्षकार था.

दरअसल भारत में मुसलमानों को शादी, मह्र, रख रखाव, तलाक़, गुज़ारा भत्ता, विरासत, उपहार और वक़्फ़ जैसे निजी मामलों में निजी क़ानून अपनाने का अधिकार है. ये अधिकार “मुस्लिम पर्सनल लॉ अनुप्रयोग अधिनियम 1937” के तहत मिला हुआ है. तात्कालीन अंग्रेज़ सरकार ने “मुस्लिम पर्सनल लॉ” का मसौदा तैयार कराया था. इसमें मुसलमानों के हर फिरके के लिए अलग प्रावधान हैं. इसमें कभी कोई बदलाव नहीं हुआ है. दरअसल ये “अल्लाह” का नहीं बल्कि “उलेमा” का बनाया हुआ क़ानून है. इसके कई प्रावधान “क़ुरआन” की आयतों के उलट और क़ुरान की मूल भावना के ख़िलाफ़ हैं. ऐसे आरोप लगते रहे हैं कि तलाक़ और विरासत के प्रावधान महिला विरोधी हैं. ये क़ानून तलाक़ के मामले में तलाक़ की पूर्व शर्त “आर्बिट्रेशन” यानि आपसी सहमति बनाने की कोशिश किए बग़ैर ही तलाक़ को मान्यता दे देता है.(सूरः निसा की आयत न. 35)

क़ुरान में तलाक़ का साफ़ तरीक़ा बताया गया है. क़ुरान में कहीं भी एक साथ तीन बार तलाक़ बोलने को तीन तलाक़ नहीं माना गया है. लेकिन मुस्लिम क़ानून इसे तीन तलाक़ ही मानता है. कुरान के मुताबिक़ तलाक़ का तरीक़ ये है. अगर पति-पत्नी के बीच संबध ख़राब हो जाएं और तलाक़ की नौबत आ जाए तो दोनों की तरफ़ से एक-एक वकील तय होगा. ये दोनों पति-पत्नी के बीच सुलह की कोशिश करेंगे. सुलह न होने पर पति पत्नी को एक बार तलाक़ देगा. तलाक़ महावारी ख़त्म होने दी जाएगी. तलाक़ के बाद तीन महीन दस दिन या तीन महावारी तक पत्नी-पति साथ रहेंगे मगर दोनों का बिस्तर अलग होगा. इसे तलाक़ की इद्दत कहते हैं. इद्दत पूरी होने पहले अगर दोनों में सुलह हो जाए तो तलाक़ ख़त्म हो जाएगी. अगर सुलह नहीं होती तो दो विकल्प हैं. या तो इद्दत के बाद पति पत्नी को रोक ले यानि उससे दोबारा निकाह कर ले या फिर दूसरी तलाक़ देकर विदा कर दे. इस पर भी इद्दत की अवधि में सुलह करने और इद्दत के बाद दोनों को आपस में निकाह करने का अधिकार है.(सूरः बक़र आयत न. 228 और 232) लेकिन तासरी बार तलाक़ देने के बाद निकाह की गुंजाइश ख़त्म हो जाएगी. ऐसी सूरत में दोनों तभी निकाह कर सकते हैं जब औरत पहले किसी और से निकाह करले और उसका शौहर मर जाए या फिर वो उसे तलाक़ देदे.(सूरः बक़र आयत न. 230) यहां ध्यान देने वेली बात ये है कि उसका दूसरा शौहर को भी उसे दो बार तलाक़ देकर फिर से निकाह करने का अधिकार है. इसी लिए क़ुरान साफ़ कहता है “तलाक़ दो बार है.”(सूरः बक़र आयत न. 229)

मुस्लिम क़ानून विरासत से जुड़े प्रवधानों पर भी विवाद है. यतीम पोते को दादा की विरासत में हिस्सा नहीं मिलता. क़ानून के मुताबिक यतीम बच्चे दादा की मीरास से “महज़ूब” यानि वंचित हो जाते हैं. जबकि “अल्लाह” ने यतीमों का हक़ मारने वालों की जगह जहन्नुम बताई है. (सूरः निसाः आयत न. 8-10) “अल्लाह” की इतनी सख़्त चेतावनी के बावजूद यतीमों का हक़ मारने का भी रास्ता निकाल लिया गया है. क़ुरान के आदेशों का इस तरह मज़ाक़ बनाने वाले क़ानून को भला अल्लाह का क़ानून कैसे माना जा सकता है. देश में इस क़ानून की शिकार लाखों मुस्लिम औरतें अपने यतीम बच्चों के हक़ के लिए दर-दर की ठोकरें खाती घूम रही हैं. लेकिन हमारे मज़हबी रहनुमओं को न तलाक़ की मारी बेबस औरतों पर दया आती है और न ही बेवाओं पर. यतीम बच्चों की हक़ तल्फ़ी पर भी इनका दिल नहीं पसीजता.

मुस्लिम क़ानून संहिताबद्ध नहीं है. अदालतों में सारी बहस क़ुरान की आयतों, परस्पर विरोधी हदीसों और सदियों पुराने फतवों के आधार पर होती है. जजों को इन सबकी जानकारी न होने की वजह से फ़ैसला करने में परेशानी होती है. लिए कभी-कभी ऐसे फैसले भी आ जाते हैं जो मुसलमानों की भावनाओं के खिलाफ़ होते हैं. 1986 में आए शाह बानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर देश भर में मचे बवाल ने तात्कालीन राजीव गांधी सरकार को संसद में बिल लाकर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला बदलने पर मजबूर कर दिया था. उस वक़्त राजीव गांधी की केबिनेट में मंत्री रहे आरिफ़ मोहम्मद ख़ान ने सरकार के इस क़दम का पुरज़ोर विरोध किया था. लेकिन उनकी आवाज़ दबा दी गयी. तब कांग्रेस पर मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगा था. इससे हिंदू समाज में उपजी नाराज़गी को शांत करने के लिए बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाया गया. उसके बाद क्या हुआ, किसे नहीं पता…? एक ग़लत फैसले का ख़ामियाज़ा देश आज तक भुगत रहा है. लेकिन आज पी. चिदंबरम और दिग्विजय सिंह जैसे कई दिग्गज कांग्रेसी क़बूल कर चुके हैं कि शाह बानो मामले में तात्कालीन सरकार का फैसला ग़लत था.

हैरानी की एक और बात ये है कि देश में मुसलमानों के लिए शादी का कोई क़ानून नहीं है. लेकिन शादी तोड़ने के लिए “मुस्लिम विवाह विच्छेदन अधिनियम 1939” मौजूद है. ये क़ानून मुस्लिम महिलाओं को तलाक़ लेने के 9 आधार मुहैया कराता है. इस पर कभी किसी मुस्लिम संगठन ने एतराज़ नहीं किया. 2007 में जम्मू-कश्मीर की विधानसभा ने मुस्लिम समुदाय से जुड़े दीवानी मामलों को सुलझाने के लिए क़ानून बना दिया है. ये क़ानून राज्य के सभी फिरक़ो के मुसलमानों पर समान रूप से लागू होता है. अगर ये काम जम्मू-कश्मीर की विधान सभा कर सकती हो तो देश की संसद ऐसा क्यों नहीं कर सकती. ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को अड़ियल रवैया छोड़ कर मुस्लिम क़ानून को संहिताबद्ध कराने की दिशा में सोचना चाहिए. संसद से पास होने वाला क़ानून सभी फिरक़ों के मुसलमानों पर समान रूप से लागू होगा. एक इस्लाम और एक क़ुरान पर यक़ीन रखने वाले मुसलमान आख़िर सबके लिए एक क़ानून पर राज़ी क्यों नहीं होंगे…?

 

नोट: ये लेखक के अपने विचार हैं. यह जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज संस्थान लेखक के विचार से सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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