बिहार: नेताओं के 'दावत-ए-इफ्तार' पर राजनीति के रंग

By: | Last Updated: Monday, 13 July 2015 11:41 AM
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नई दिल्ली: बिहार में चुनाव होने वाला हैं और इफ्तार की राजनीति पटना से लेकर दिल्ली तक हो रही है. वोटबैंक की हकीकत को देखते हुए बीजेपी ने बिहार में खुद तो इफ्तार की दावत नहीं दी लेकिन सहयोगी रामविलास पासवान की इफ्तार पार्टी में सारे नेता टोपी लगाए नजर आए.

रविवार को पटना में एनडीए की इफ्तार पॉलिटिक्स हुई तो दिल्ली में सोनिया की ओर से आज यूपीए की इफ्तार पार्टी हो रही है. आज ही पटना में लालू यादव भी इफ्तार की दावत दे रहे हैं. लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पटना की इफ्तार पार्टी को छोड़कर दिल्ली में शामिल हो रहे हैं.

 

माना जा रहा है कि इस इफ्तार पॉलिटिक्स के जरिये यूपीए के नेता अपनी एकता दिखाने की कोशिश करेंगे. इस कार्यक्रम के जरिये मानसून सत्र में मोदी सरकार को घेरने की रणनीति बन सकती है. लेकिन अभी इस पर सस्पेंस बना हुआ है कि सोनिया की दावत में कौन कौन नेता पहुंचेंगे.

 

अब सवाल ये है कि पार्टियां इफ्तार की राजनीति कर क्यों रही हैं? क्यों इफ्तार के बहाने वोट जुटाने की कोशिश होती है? और क्यों पार्टियां एकजुटता दिखाने के लिए इफ्तार का सहारा लेती हैं?

 

सिर्फ बीजेपी-कांग्रेस ही नहीं आम आदमी पार्टी का भी इफ्तार से नाता पुराना है. मुस्लिमों के हमदर्द दिखने में केजरीवाल भी पीछे नहीं रहते. रविवार को केजरीवाल एलजी से इसी मौके पर गले लगते नजर आए. सभी पार्टियों के नेता पहुंचे और पूर्व सीएम शीला दीक्षित भी इसमें शामिल थीं.. अब खबर है कि केजरीवाल की इफ्तार पार्टी में शीला के जाने से कांग्रेसी नाराज हो गए हैं.

 

बड़ी बात ये कि इफ्तार रोजादारों के लिए होता है. जो दिन भर उपवास करते हैं और शाम को इफ्तार के जरिये रोजा खोलते हैं। लेकिन यहां जिन प्रमुख नेताओं को बुलाया जा रहा है वो न तो रोजा रखते हैं और ना ही उनका इफ्तार से मतलब है.

 

आपको बता दें कि पिछले हफ्ते आरएसएस ने भी पहली बार इफ्तार पार्टी का आयोजन किया था. ऐसे में सवाल यह है कि क्या सिर्फ मुस्लिम समाज को दिखाने के लिए और उनका हमदर्द दिखने के लिए इस तरह के कार्यक्रम आयोजित किये जा रहे हैं ?

 

सियासत की ‘दावत-ए-इफ्तार’

 

बिहार में विधान परिषद चुनाव की गहमागहमी समाप्त होते ही सभी राजनीतिक पार्टियों ने आगामी सितंबर-अक्टूबर महीने में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर तैयारियां शुरू कर दी हैं. ऐसे में नेता मतदाताओं को आकर्षित करने का कोई भी मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहते. इसी के मद्देनजर रमजान के पवित्र महीने में सभी दल के नेता ‘दावत-ए-इफ्तार’ का आयोजन कर मतदाताओं को आकर्षित करने में जुटे हुए हैं.

लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) के अध्यक्ष रामविलास पासवान ने रविवार को पार्टी कार्यालय में इफ्तार का आयोजन किया. बड़ी संख्या में रोजेदारों के साथ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के नेता इसमें शरीक हुए. वहीं बिहार सरकार में मंत्री श्याम रजक की तरफ से फुलवारीशरीफ के प्रसिद्घ खानकाह-ए-मुजिबिया के कम्युनिटी हॉल में दिए गए इफ्तार में लालू प्रसाद और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार शामिल हुए.

 

प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय में भी रविवार को दावत-ए-इफ्तार का आयोजन किया गया. इस इफ्तार में भी बड़ी संख्या में रोजेदार व नेता शामिल हुए.  लालू प्रसाद सोमवार को तथा भरतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के वरिष्ठ नेता सुशील कुमार मोदी बुधवार को दावत-ए-इफ्तार का आयोजन कर रहे हैं.

 

इसके अलावा भी कई नेता दावत-ए-इफ्तार का आयोजन कर रहे हैं. दरअसल, विधानसभा चुनाव की नैया पार करने को लेकर तमाम राजनीतिक दलों के नेताओं की पेशानी पर बल है. इस चुनावी बेला में अपनी गलतियों को सुधारने को लेकर भी नेता आतुर दिख रहे हैं. वहीं, सभी दल मतदाताओं को लुभाने में जुटे हैं. रमजान के महीने में नेताओं को फिलहाल सबसे मुफीद इफ्तार की दावतें नजर आ रही हैं.

 

राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के एक नेता ने नाम प्रकाशित नहीं होने की शर्त पर बताया कि इफ्तार की दावतें तो हर साल होती हैं, लेकिन चुनाव के पूर्व होने वाली इफ्तार पार्टियों का अलग ही महत्व है. इस मौके पर जहां मुस्लिम समुदाय के नेताओं की सोच और भावी रणनीतियों को जानने का मौका मिल जाता है, वहीं मुस्लिम समाज के मन टटोलने का भी मौका मिलता है.

 

इस विषय पर मंत्री श्याम रजक कहते हैं कि रमजान का महीना सिर्फ मुसलमानों का ही नहीं, बल्कि सभी को परहेजगार बना देता है. यह पावन महीना है. इसे राजनीति से जोड़कर देखना उचित नहीं है. बहरहाल, चुनावी साल में इफ्तार की दावत ने रंग पकड़ ली है और अभी ईद बाकी है.

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