...क्योंकि ‘बुत’ वोट नहीं होते

By: | Last Updated: Thursday, 5 February 2015 1:48 PM
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नई दिल्ली: कई शहंशाहों की सल्तनत के किलों को बनते बिगड़ते देखने वाली दिल्ली की फिजाओं में चुनावी शोर की गूंज है और दौड़ लगी है कुर्सी की. लेकिन कई बार उजड़ कर फिर बसी इस दिल्ली के इतिहास को अपने में समेटे और शाहों बादशाहों के तख्त के हश्र की कहानी बयां करने वाले ऐतिहासिक स्मारकों की दुर्दशा कभी नेताओं का ध्यान नहीं खींच पाती क्योंकि बुत ‘‘वोट’’ नहीं होते.

 

दिल्ली की सल्तनत पर गद्दीनशीं होने के लिए ‘‘बिजली , पानी , सड़क ’’ जैसे तमाम मुद्दों राजनीतिक दलों के नारों में शुमार हैं लेकिन इस शहर की सांस्कृतिक विरासत के विशेषज्ञ अफसोस जाहिर करते हुए सवाल करते हैं कि कभी भी सांसद निधि या विधायक निधि से किसी स्मारक के संरक्षण के लिए धनराशि निर्धारित किए जाने या किसी स्मारक को गोद लिए जाने की कोई पहल क्यों नहीं होती.

 

इंटक के दिल्ली चैप्टर के संयोजक ए जी के मेनन कहते हैं, ‘‘ किसी भी दल के राजनीतिक घोषणापत्र में विरासत को कहीं कोई जगह नहीं मिली है और इसके स्पष्ट कारण हैं कि इससे उन्हें वोट नहीं मिलने वाले. और राजनेताओं को यह भी पता है कि समाज की भी इसमें कोई रूचि नहीं है तो इसे चुनावी मुद्दा क्यों बनाया जाए.’’

 

यूनेस्को की एक टीम ने पिछले वर्ष दिल्ली का दौरा कर विश्व विरासत शहर का दर्जा पाने के इसके दावे की पड़ताल की थी. मेनन के निर्देशन में इंटक ने दिल्ली सरकार की ओर से एक दस्तावेज तैयार किया था जिसे इस संबंध में यूनेस्को को भेजा गया था.

 

मेनन कहते हैं , ‘‘ नीति निर्माताओं को दिल्ली को विश्व विरासत शहर का दर्जा दिलाने के मुद्दे पर सहमत कराना मुश्किल है क्योंकि कहीं न कहीं यह भावना है कि विरासत विकास विरोधी है. राजनेता नए निर्माण को विकास और पुराने ढांचे को तरक्की के रास्ते का रोड़ा मानते हैं.’’

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