दिल्ली चुनाव: विकट चुनौतियों के बीच डटी है आप

By: | Last Updated: Wednesday, 4 February 2015 3:44 PM

नई दिल्ली: लोकसभा चुनाव में पंजाब की चार सीटों पर जीत और बाकी पर हार के बाद जिस पार्टी का लगभग अंत माना जा रहा था, अब दिल्ली विधानसभा चुनाव में वही आम आदमी पार्टी (आप) एक बार फिर से उम्मीद की दहलीज पर खड़ी नजर आ रही है और दिल्ली की सातों सीटें जीतकर केंद्र में सत्तारूढ़ हुई भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की नींद उड़ा दी है.

 

यहां शनिवार को होने वाले मतदान में विजेता कौन बनेगा, यह तो राष्ट्रीय राजधानी की जनता तय करेगी, मगर विजयोन्माद के मात्र नौ माह बाद भाजपा को यहां आप की कड़ी चुनौती मिल रही है.

 

भाजपा नेताओं का भी मानना है कि आप उनके सामने कड़ी चुनौती पेश कर रही है. चुनाव पूर्व कुछ सर्वेक्षणों में भी आप को भाजपा से ज्यादा मत मिलने का अनुमान जाहिर किया गया है.

 

कांग्रेस को इस चुनाव में भी झटका लगने का संकेत है. नई नवेली पार्टी ‘आप’ की कद्दावरी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अपने प्रचार भाषणों में सीधे आप नेता अरविंद केजरीवाल को निशाना बना रहे हैं.

 

हताशा के कगार पर खड़ी भाजपा का आलम यह है कि उसके 120 सांसद, कुछ कबीना मंत्री के साथ ही साथ दूसरे राज्यों के मुख्यमंत्री और विधायक प्रचार के लिए दिल्ली में डेरा डाले हुए हैं.

 

चुनाव राष्ट्रीय राजधानी में है, इसलिए यह हाल ही में संपन्न हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड के विधानसभा चुनाव की मानिंद भाजपा के लिए आसान नहीं है. उन राज्यों में तो ‘मोदी का जादू’ काम कर गया, मगर यहां 2012 में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से जन्मी आप दशकों पुरानी भाजपा को द्वारे-द्वारे घूमने का सबक सिखा रही है.

 

भाजपा को हर कीमत पर चुनाव जीतने की जरूरत है, ताकि यह साबित हो सके कि मोदी का जादू नहीं होने के कारण दिसंबर 2013 में त्रिशंकु विधानसभा बनी और आप को कांग्रेस की मदद से महज 49 दिनों तक सरकार चलाने का सौभाग्य मिल पाया.

 

जन लोकपाल विधेयक पारित न होने पर 14 फरवरी 2014 को जब केजरीवाल ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया तो भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सदन में बेनकाब हुई कांग्रेस और भाजपा को एक जादू हाथ लग गया और दोनों पार्टियों ने केजरीवाल को ‘भगोड़ा’ उपनाम दे दिया. इतना ही नहीं, लोकसभा चुनाव में आप के चार प्रत्याशियों को छोड़ शेष सभी के हार जाने के बाद उन्हें ‘विफल नेता’ तक कहा गया.

 

मगर कुछ ही महीनों में केजरीवाल और आप ने जोरदार वापसी की. आलम यह रहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के मुखपत्र आर्गनाइजर में चेतावनी दी गई कि आप की चुनौती को भाजपा हल्के में न ले.

 

आप की चुनावी रैलियों में बड़ी तादाद में लोग जमा होते हैं. आप की रैलियों में गरीबों के बीच मसीहा माने जा रहे केजरीवाल के निशाने पर मोदी के वे वादे होते हैं जिन्हें सत्ता मिलने के बाद वे पूरे नहीं कर पाए और भाजपा नेताओं के विवादास्पद बयान भी. आप की रैलियों में श्रोताओं के बीच समां बांधने का काम पंजाब के संगरूर से सांसद भगवंत मान निभाते हैं.

 

आप के तेजी से उभरने के कई कारण हैं. एक कारण गरीबों के बीच उसका पक्का जनाधार है. सत्ता में आने पर बिजली का दर घटाना और पानी को मुफ्त करना. आप के आलोचक भी यह मानते हैं कि केजरीवाल जब मुख्यमंत्री थे तो दिल्ली में रिश्वतखोरी पर लगाम लग गई थी.

 

आप ने निम्नआय वर्ग के लोगों और शहर के गांवों में अपना संपर्क बढ़ाया. इसके अलावा पार्टी ने भाजपा और कांग्रेस से कई माह पहले ही विधानसभा चुनाव की तैयारी शुरू कर दी. इसका लाभ भी उसे मिल रहा है.

 

भाजपा नेताओं के विवादास्पद बयान और राष्ट्रीय राजधानी में धार्मिक उन्माद फैलाने के हुए प्रयास के कारण मुस्लम व ईसाई मतदाता भी आप की ताकत हैं. इतना ही नहीं, किरण बेदी को मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनाए जाने से भाजपा की अंदरूनी कलह के कारण भितरघात की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता. सच तो यह है कि कांग्रेस के कई नेता अपनी पार्टी की हार तय मानते हुए पर्दे के पीछे से आप की मदद कर रहे हैं.

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