जलवायु परिवर्तन का सामना करने के लिए साथ आएं विकसित देश :भारत

By: | Last Updated: Thursday, 3 December 2015 5:45 AM
Developed country should come forward to fight with climate change

नयी दिल्ली: भारत ने जलवायु परिवर्तन का मुकाबला करने के लिए आज विकसित देशों से ‘अपनी कही बातों पर अमल करने’ और 2020 से पहले की प्रतिबद्धताओं का सम्मान करने को कहा. साथ ही, इस सिलसिले में एक स्पष्ट रोडमैप की मांग करने में भारत ब्राजील, चीन और दक्षिण अफ्रीका के साथ शामिल हो गया.

 

ग्लोबल वार्मिंग को सीमित करने के लिए फ्रांस में हो रही अहम वार्ता में अमीर-गरीब देशों के बीच खाई का मुद्दा छाया रहा, वहीं पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने भारत के रूख को बयां करते हुए कहा कि जलवायु परिवर्तन समस्या का हिस्सा बनने की बजाय इसका हल तलाशने में नयी दिल्ली लचीला रहेगा और एक सहायक की भूमिका निभाएगा.

 

उन्होंने यह भी कहा कि विकसित देश अवश्य ही अपनी जिम्मेदारी का एक निष्पक्ष हिस्सा लें और विकास में समानता सुनिश्चित करने के लिए विकासशील देशों को वायुमंडलीय स्पेस (कार्बन स्पेस) की एक निष्पक्ष हिस्सेदारी लेने की इजाजत दे.

 

भारत के विचार को मंजूर करते हुए चार देशों के समूह ‘बेसिक’ (ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और चीन) के अन्य सदस्य देशों ने विकसित राष्ट्रों से जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए 2020 तक 100 अरब डॉलर मुहैया करने को लेकर एक स्पष्ट रोडमैप परिभाषित करने को कहा.

 

साल 2020 से पहले की अवधि में धनी देशों द्वारा सालाना 100 अरब डॉलर की वित्तीय सहायता मुहैया करने की जरूरत है ओर उन्हें जलवायु परिवर्तन से निपटले में विकासशील देशों को प्रौद्योगिकी मुहैया करने की प्रतिबद्धता भी दिखानी होगी. बेसिक देशों की ओर से जलवायु सम्मेलन में चीन द्वारा जारी किए गए एक बयान के जरिए 12 दिवसीय सम्मेलन में एक पारदर्शी और राष्ट्रों द्वारा संचालित प्रक्रिया का समर्थन किया गया है.

 

बयान में कहा गया है कि बेसिक एक न्यायसंगत और संतुलित जलवायु समझौते के लिए अन्य सभी पक्षों के साथ व्यवहारिक रूप से काम करेगा.

 

विकासशील देशों को सहयोग मुहैया करने में अंतराल होने का जिक्र करते हुए बेसिक देशों ने कहा है कि क्योटो प्रोटोकॉल अवधि की दूसरी प्रतिबद्धता समझौते से पहले कंवेंशन को लागू करने में एक अहम कदम और औजार है.

 

इसने कहा है कि विकसित देशों को अपनी प्रतिबद्धताओं का सम्मान करना चाहिए जो साल 2009 में कोपेनहेगेन में जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में किया गया था. इसका लक्ष्य 2020 तक सालाना 100 अरब डॉलर मुहैया करना और यह सुनिश्चित करना है कि 2013 से 2020 के बीच कोष मुहैया करने में कोई अंतराल नहीं हो.

 

बयान में कहा गया है कि विकसित देशों को विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन के हल में मदद करने के लिए लिए ‘फास्ट स्टार्ट फंडिंग’ में 30 अरब डॉलर की पेशकश के अपने वादे को पूरा करना चाहिए.

 

इस बीच, अपनी उर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए कोयले के इस्तेमाल को बढ़ाए जाने की योजनाओं को लेकर निशाने पर लिए जाने की रिपोटरे के बीच भारत ने आज साफ कर दिया कि सौर और पवन उर्जा का विकास उसकी पहली प्रतिबद्धता होगी तथा इसके बाद वह पनबिजली और परमाणु उर्जा पर ध्यान देगा, जबकि बाकी उर्जा कोयले से ली जाएगी.

 

संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन में भारत के प्रमुख वार्ताकारों में एक अजय माथुर ने कहा, ‘‘ हमने इसे पूरी तरह से स्पष्ट कर दिया है कि सौर और पवन उर्जा हमारी पहली प्रतिबद्धता है. पनबिजली और परमाणु जो ये सब गैर कार्बन स्रोत हैं इन्हें हम अधिकतम स्तर तक विकसित करने का प्रयास करेंगे जहां तक हम कर सकते हैं. इनसे जो जरूरतें पूरी नहीं होंगी उन्हें कोयले से पूरा किया जाएगा.’’

 

इसके साथ ही भारत ने यह भी कहा कि यदि विकसित देश पर्याप्त धन और महत्वपूर्ण तकनीक के जरिए भारत की अर्थव्यवस्था को नवीकरणीय उर्जा की दिशा में बढ़ने में मदद कर सकें तो वह आगे कोयले पर अपनी निर्भरता को कम करने के लिए तैयार है.

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Web Title: Developed country should come forward to fight with climate change
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