एबीपी न्यूज विशेष: विश्व विरासत का विनाश!

एबीपी न्यूज विशेष: विश्व विरासत का विनाश!

By: | Updated: 01 Jan 1970 12:00 AM
नई दिल्ली: हिमालय पर्वत... ये वो नाम है जो सदियों से हिम्मत और हौसले की सबसे बड़ी पहचान रहा है लेकिन हिमालय महज एक पहाड़ नहीं है बल्कि जिंदगी को रवानी देने वाला ये वो अहसास भी है जिसके साये में बैठ कर इंसान ने भौतिक और आध्यात्मिक विकास के कई नए आयाम खोजे है. सदियों से अटल और अचल खड़े इस पहाड़ की गोद में बसा है खूबसूरत देश नेपाल. हरी-भरी वादियों, झरनों और नदियों की खूबसूरती से सराबोर ऊंची- ऊंची चोटियों वाले इस पूरे इलाके पर कुदरत खास तौर पर मेहरबान रही है और इसीलिए यहां वो संस्कृति और परंपराएं भी पनप सकी जो आज विश्व की अमानत बन चुकी है लेकिन नेपाल की जमीन दो पल के लिए क्या हिली कि इसकी विरासत का ही विनाश हो गया.

 

पिछले शनिवार को आए भूकंप ने नेपाल की सदियों पुरानी विरासत को जमीनदोज कर दिया है. करीब पचास किलोमीटर में फैला मंदिरों का शहर काठमांडू देखते ही देखते मलबे में तब्दील हो गया. मंदिरों के कलश ढह गए...सड़कों में दरारें पड़ गई और काठमांडू की सबसे बड़ी पहचान धरहरा मीनर ध्वस्त होकर जमीनदोज हो गई. भूकंप के तेज झटकों ने नेपाल की इस राजधानी का नक्शा ही बदल दिया है. काठमांडू में भूकंप आया और चला भी गया लेकिन अपने पीछे वो छोड़ गया है बरबादी के ऐसे निशान जिनकी याद बरसों तक इंसानी जिंदगी को रुलाती रहेगी.

 

ऊंची- ऊंची पहाडियों से घिरा शहर काठमांडू. काठमांडू, नेपाल का इकलौता ऐसा शहर है जो दुनिया भर से टूरिस्ट को अपनी ओर खींचता रहा है. यहां खास शैली में बने मकान जहां सैलानियों को लुभाते हैं तो वहीं नेपाल की शानदार संस्कृति और परंपराएं उन्हें मंत्रमुग्ध कर देती हैं. 50 किलोमीटर के दायरे में फैले काठमांडू के प्राचीन बाजारों की रौनक भी दुनिया भर में मशहूर रही है यही वजह है कि प्राचीन सभ्यता और संस्कृति से सजे काठमांडू की खूबसूरती बरबस ही लोगों को अपनी ओर खींचती रही है. नेपाल की राजधानी काठमांडू को मंदिरों का शहर भी कहा जा सकता है. खास तरह की पगौडा शैली में बने यहां के मंदिर पूरी दुनिया में अपनी अलग पहचान रखते हैं. काठमांडू में पशुपतिनाथ का विश्व प्रसिद्ध मंदिर है तो वहीं शहर के बीच वो काष्ठ मंडप मंदिर भी भूकंप से पहले मौजूद था जिसके नाम पर इस शहर का नाम पडा है. खूबसूरत मकानों, मंदिरों और मूर्तियों के गहनों से सजे काठमांडू में जब भूकंप ने दस्तक दी तो एक ही पल में जैसे इस शहर का नक्शा ही बदल गया. यूं तो भूकंप की त्रासदी नेपाल का नसीब रहा है लेकिन इस बार आए महाभूकंप ने काठमांडू के कई गहने उससे छीन लिए हैं.

 

यूं तो भूकंप ने समूचे नेपाल में बरबादी की एक नई और बेहद डराने वाली दास्तान लिख दी है. लेकिन आज हम काठमांडू और उसके आस-पास के उन तीन दरबार स्क्वेर की बात बताएंगे जिन्हें यूनेस्को 1989 में विश्व धरोहर घोषित कर चुका है. भक्तपुर स्क्वेर, पाटन स्क्वेर और काठमांडू का दरबार स्क्वेर नेपाल की ऐतिहासिक और सांस्कृति विरासत का वो चेहरा रहे है. जिनको भूंकप से हुआ नुक्सान मानव सभ्यता के लिए भी एक बड़ा नुकसान है.

 

नेपाल में हुए विरासत के इस विनाश को कुछ इस तरह भी समझा जा सकता है कि अगर आगरा में ताजमहल ना हो या फिर दिल्ली से कुतुब मीनार और लाल किला गायब हो जाए तो क्या होगा. ठीक ऐसा ही कुछ हाल नेपाल का हुआ है. नेपाल की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान काठमांडू के दरबार स्क्वेर, भक्तपुर दरबार स्क्वेर और पाटन दरबार स्क्वेर से जुड़ी रही है. दरअसल दरबार स्कवायर राजा के महल के सामने के इलाके को कहा जाता है और नेपाल के इन तीन स्कवायर में यहां के राजाओं ने अलग – अलग दौर में खूबसूरत महलों, मंदिरों, स्तूपों और इमारतों का निर्माण करवाया था. लेकिन कुदरत की तबाही के बाद अब नेपाल के इन तीनों स्कवायर की तस्वीर पूरी तरह से बदल चुकी है.

 

नेपाल की पहचान काठमांडू, भक्तपुर और पाटन दरबार से है. पाटन यहां के तीन एतिहासिक शहरों मे से एक माना जाता है और कुदरत की तबाही यानि 25 तारीख को आए भूकंप के बाद ये पाटन की बदली हुई तस्वीर है और यहां की तकदीर है अब यहां नो मैन्स लैंड कर दिया गया है किसी को आगे जाने की इजाजत नहीं है. हमें जानकारी दी गई है कि इसके आगे जाने पर कहीं से कोई भी मलवा कभी भी गिर सकता है इसलिए किसी को अंदर जाने की इजाजत नहीं दी गई है इसे हम पुलिस से इजाजत लेकर यहां आए है ये देखिए पाटन द्वार स्क्वायर …पाटन का जो दरबार स्क्वायर है वो यहां का सबसे अहम माना जाता है दुनिया के सबसे पुरानी बौद्ध शहरों में से एक है ये पाटन दरबार जो कि काठमांडू से 10 किलोमीटर दूर ललितपुर जिले का एक हिस्से है.

 

काठमांडू वैली में मौजूद तीन दरबार स्कवायर में से एक पाटन दरबार यूं तो ललितपुर शहर में आता है लेकिन काठमांडू से ये महज 10 किलोमीटर दूर है. बागमती नदी के किनारे बने पाटन दरबार स्कवायर का सबसे बड़ा आकर्षण यहां का ये शाही महल है जिसमें मल्ला राजा रहा करते थे. पाटन दरबार स्कवायर का निर्माण किसने कराया ये तो साफ नहीं है लेकिन ललितपुर पर शासन करने वाले मल्ला राजाओं को इसके निर्माण का श्रेय दिया जाता रहा है. लाल ईटों से बने इस पाटन दरबार स्कवायर के पूरे इलाके में कई मंदिर और मूर्तियां भी बनी हुई है. यहां पर शाही महल के पश्चिमी तरफ मुख्य मंदिर बना है और इस मंदिर की भी अपनी एक दिलचस्प कहानी है.

 

एबीपी न्यूज के संवाददाता पंकज झा नेपाल के पाटन से बताते हैं कि कृष्ण मंदिर के पीछे भी एक पुराणिक कथा है कि राजा नरसिंह मल्य जो थे उन्हें एक सपना आया कि भगवान कृष्ण और राधा उन्हें ये आदेश दे रही हैं सपनें में कि मंदिर बनवाओ फिर कृष्ण मंदिर बना यहां मंदिर बनने की पीछे की ये कहानी है सिद्धेश्वर सिंह मल्य ने 1937 में कृष्ण मंदिर को बनवाया था और इसके नक्कासी पत्थर का पूरा काम अपने आप में एक ऐतिहासिक दर्शन जिसे आप कह सकते हैं दुनिया भर के लोग जो यहां आते हैं उसे यहां जरूर देखते हैं औऱ जो दरबार स्क्वायर बना हुआ है इसकी जो खिड़कियां है इसके बारे में कहावत है कि इसे गोल्डेन विडोंज कहा जाता है तीन ऐसे गोल्डेन विंडोज हैं. सुनहरे रंग में काम किया गया है और ये अपने आप में कारीगरी का एक बेमिसाल नूमना भी. कहते है दरबार स्कावयर में करीब 55 छोटे और बड़े मंदिर है और 136 महल यानि की दरबार हैं. कृष्ण मंदिर को अगर हम देखें तो दो मंजिल है और अब बिल्कुल धराशायी जैसा हो गया है और इसकी पहली मंजिल पर रामायण और महाभारत की कहानी और दूसरे मंजिल पर रामायण की कहानियां है.

 

पाटन दरबार स्क्वेर का करीब 1800 साल पुराना इतिहास है. यहां मंदिरों की एक लंबी कतार सी नजर आती है जो कि एक खास तरह की पगौडा शैली के आधार पर बनाए गए है. ऐसा माना जाता है कि पगौडा शैली से बने ये मंदिर भूंकप के झटकों को भी आसानी से झेल सकते है और यही वजह है कि सैकड़ों साल पुराने ये मंदिर भूकंप के झटकों को सहते हुए आज भी खड़े हैं जबकि उन्ही की बगल में बना कृष्ण मंदिर भूंकप के झटकों से खुद को बचा नहीं सका.

 

पाटन म्यूजियम का हिस्सा. नेपाल जो कोई भी आता है औऱ नेपाल की सांस्कृति और ऐतिहासिक धरहरों के बारे में जिसे जानना होता है वो पाटन म्यूजियम जरूर आता है. ये सुंदर और बेहतरीन दरवाजा है कितना अच्छा काम है इस पर गणेश भगवान की मूर्ती है और लक्ष्मी जी भी उकेरी गई हैं और जो नेपाल औप हिंदू और बौद्ध धर्म से जुड़ी हुई आकृतियां है उन सब को इसमें उकेरा गया है. मंदिरो की जो श्रृखला है पाटन में. पाटन एक बहुत बड़ी पहचान है नेपाल की नेपाल के सांस्कृतिक औऱ ऐतिहासिक धरोहर की लेकिन कुदरत की तबाही ने इस पूरे पहचान पर संकट ला खड़ा कर दिया है.

 

पाटन दरबार स्क्वेर की इस कहानी के बाद अब नेपाल की पुरानी राजधानी भक्तपुर के दरबार स्कवायर की दास्तान पढ़िए. काठमांडू से महज आठ मील के फासले पर नेपाल का वो दूसरा अहम दरबार स्क्वेर है जहां भूंकप ने तबाही के सबसे ज्यादा निशान छोड़े है. कभी नेपाल की राजधानी भक्तपुर हुआ करती थी और यही वजह है कि यहां भी मौजूद है वो दरबार स्क्वेर भी जहां नेपाल के राजाओं ने अपने रहने के लिए शाही महलों के अलावा आस-पास मंदिरों और खूबसूरत इमारतों को बनाया था.  

 

नेपाल में आए जबरदस्त भूकंप में नेपाल की सांस्कृतिक राजधानी कहे जाने वाले भक्तपुर में तबाही की एक नई कहानी लिख दी. भक्तपुर इस वक्त सांस्कृतिक राजधानी कही जाती है और एक वक्त में नेपाल की राजधानी हुआ करती थी. नाटेश्वर मंदिर है औऱ यहां पूरा एक कला का नूमना था वो पूरी तरह से यहां पर ध्वस्त हो चुका है. जब जबरदस्त भूकंप आया था 7.9 मैग्नीट्यूड का ये मंदिर उसे सह नहीं सका और पूरी तरह से ध्वस्त हो गया.

 

भक्तपुर का इतिहास 8 वीं सदी में शुरु होता है. 12 से 15 वीं सदी तक ये नेपाल के मल्ल राजवंश की राजधानी रहा है. दरअसल भक्तपुर, नेपाल के पुराने शहरों का केंद्र भी है और यही वजह है कि यहां संरक्षित महलों और मंदिरों की भरमार सी है. भक्तपुर के दरबार स्क्वेर में बना पचपन खड़कियों वाला ये राजमहल अपनी कलाकारी के लिए दुनिया भर में मशहूर है. यहां के मंदिरो और महलों में लकड़ी, धातु और पत्थऱ पर कलाकारी की प्राचीन विरासत को देखते हुए ही यूनेस्को ने इसे वर्ल्ड हेरिटेज घोषित किया है और यहां की सबसे खास बात ये है कि बदलते दौर के बीच ये एक ऐसा अनछुआ प्राचीन शहर है जिसकी विरासत आज भी अपने मूल स्वरूप में जिंदा है लेकिन भूकंप के तेज झटकों ने इस खूबसूरत शहर की सूरत भी बिगाड़ कर रख दी है.

 

एबीपी न्यूज के संवाददाता उमेश कुमावत नेपाल के भक्तपुर से बताते हैं कि नाटेश्वर मंदिर जो तबाह हो चुका है. एक वक्त में बेहद शानदार दिखता था और अब ये पूरी तरह से बर्बाद हो चुका है जो राजा थे यहां के मल्ल राजा. उनकी जो मूर्ती के ठीक सामने यहां वक्षशाला मंदिर है और इसका एक गोल्डन गेट है गोल्डन गेट इसलिए कहा जाता है कि इसमें सोना लगा हुआ है और सोने से बना हुआ ये गेट है इसलिए इसे गोल्डन गेट कहते हैं पर इसके अंदर अगर जाए तो अंदर आर्मी लगी हुई है. नेपाल की आर्मी आपको यहां दिखाई देगी सुरक्षा के लिए क्योंकि अंदर मां दुर्गा की प्रतिमा है वहां पर और वो सोने से बनी हुई है और बाहर जो मंदिर है जो टूट गया है वहां से जो मूर्तिया निकली है. यानि की 8वीं सदी के जहां का इतिहास शुरू होता है वहां की कारीगरी है काफी एंटिक पीस है ये और इसलिए नेपाल की आर्मी को यहां पर सुरक्षा के लिए लगाया गया है ताकि कोई भी इसे चुरा कर न ले जाए क्योंकि काफी एंटिक जो मूर्तियां है वो यहां पर रखी गई हैं और इस मंदिर के अंदर जो मां दुर्गा की मूर्ती है वो भी सोने की है और अभी जो गेट है वो सोने की गेट है इसलिए इसे गोल्डन गेट कहा जाता है तो जो ये नेपाल की सांस्कृति राजधानी रही है और अभी भी इसे सांस्कृतिक राजधानी ही कहा जाता है. 

 

भक्तपुर का तौमाधी स्क्वेर भी मशहूर है. तौमाधी के मंदिरों में पत्थर औऱ लकड़ी पर किए गए खूबसूरत काम को देखने के लिए दुनिया भर से लोग यहां आते हैं. तमौधी स्क्वेर पर भैरवनाथ का मंदिर और नाटोपोल का ये मंदिर भी नेपाल की खास पगोड़ा शैली में बनाया गया है यही वजह है कि बरसों से भूकंप के झटके सहने के बाद भी ये मंदिर सलामत है. 

 

एबीपी न्यूज संवाददाता भक्तपुर से बताते हैं कि तौमाधी स्क्वेयर है ये शहर का ये दूसरा स्क्वेयर है. ये स्क्वेयर सबसे अहम मानी जाती है भक्तपुर का लेकिन वहां पर दो मंदिर पूरी तरह से बच गए हैं और उनको कुछ नहीं हुआ है. पांच माले का है पेगौड़ा शैली में बना है इसको बिल्कुल कुछ भी नुकसान नहीं हुआ है जबकि अगर भक्तपूर में बात करेंगे तो ज्यादातर भक्तपुर के इलाके तबाह हो चुकें हैं. जैसे इसके ठीक पीछे पुराने तरीके का मकान है जो पूरी तरह से ढह गया है औऱ भैरोनाथ मंदिर है ये भी पेगौड़ा शैली मे बना हुआ है और बिल्कुल ठीक उसके बगल में पूराना मकान है जो पूरी तरह से ढह चुका है और अगर उस गली में देखें तो आपको सब मकान ध्वस्त दिखाई देंगे और यहां पर जो पेगोड़ा शैली  में बने मंदिर है वो वैसे के वैसे हैं इनके बारे में एक बात कही जाती है कि ये जो मंदिर है इनके अंदर भूकंप रोधी शक्ति है.

 

भक्तपुर नेपाल की पुरानी राजधानी है तो वहीं काठमांडू वर्तमान राजधानी है. लिहाजा काठमांडू में भी मौजूद है नेपाल का वो तीसरा दरबार स्क्वेर, जो भूकंप के झटकों से सबसे ज्यादा बर्बाद हुआ है. हिमालय की गोद में बसे काठमांडू का दरबार स्क्वेर भी महाभूकंप से ऐसा तबाह हुआ है कि यहां की ऐतिहासिक निशानियों की पहचान तक मुश्किल हो गई है.

 

काठमांडू के प्राचीन शाही महल के सामने फैला दरबार स्क्वेर इलाका सैलानियों के लिए आकर्षण का केंद्र रहा हैं. दरबार स्क्वेर करीब हजार साल पहले मल्ला राजवंश के शासकों का निवास स्थान रहा है. मल्ल और राणा राजवंश के शासकों ने इस दरबार स्क्वेर इलाके में लकड़ी की नक्काशी के काम वाले मंडपनुमा खूबसूरत महल और मंदिर बनाए थे. ऐसे ढेर सारे काष्ठमंडपों ने इस इलाके की पहचान बदल दी थी और ये शहर कांतिपुर से काठमांडू बन गया था लेकिन शनिवार के भूकंप ने दरबार स्क्वेर इलाके के ज्यादार काष्ठमंडपों को तहस-नहस कर दिया है.

 

काठमांडू के दरबार स्क्वेर इलाके की अहमियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि करीब एक हजार साल तक यहां नेपाल के राजाओं का निवास रहा है. 1769 में पृथ्वी नाराय़ण शाह ने जब काठमांडू पर कब्जा किया था तो उसके बाद से दरबार स्क्वेर शाह वंश के राजाओं का निवास भी बना. खास बात ये है कि 1896 में जब नेपाल का राजपरिवार काठमांडू के इस नारायण हित्ती पैलेस में रहने चला आया तब भी दरबार स्कवेयर की अहमियत खत्म नहीं हुई और वो खास शाही आयोजनों का केंद्र बना रहा. यही वजह है कि 2001 में नेपाल के मौजूदा राजा किंग ज्ञानेंद्र वीर बिक्रम शाह की ताजपोशी भी इसी दरबार स्क्वेर में हुई थी लेकिन नेपाल में जब लोकतंत्र आया तो दरबार स्क्वेर जनता के लिए खोल दिया गया और यहां बने महलों को म्यूजियम में तब्दील कर दिया गया था. जाहिर है काठमांडू के दिल में बसे दरबार स्क्वेर ने नेपाल राजशाही की हजार साल पुरानी विरासत को सहेज कर रखा था लेकिन भूकंप के कहर ने इस विरासत मिटा दिया है.

 

हनुमान ढोका. दरबार स्क्वेर इलाके का पूर्वी हिस्सा है. 16वीं सदी में जब शाह वंश के राजाओं ने यहां महल बनाएं तो संकटों से बचने के लिए हनुमान की मूर्ति भी दरवाजों पर स्थापित कर दी थी. नेवारी स्थापत्य कला में ढली लकड़ी और पत्थरों की जिस नक्काशी को देखने सैलानी दुनिया भर से यहां आते थे वो भूकंप की वजह से अब जर्जर हो चुकी है. इटैलियन स्थापत्य कला में ढला नेपाल का ये शाही महल 1908 में बनाया गया था नेपाल राजपरिवार इसके झरोखों से दरबार स्क्वेर पर होने वाले जलसों को देखा करता था लेकिन सबसे अलग नजर आने वाला ये बसंत दरबार भी भूंकप से अब बिखर चुका है. 

 

एबीपी न्यूज के संवाददाता दिबांग बताते हैं कि अर्थक्वेक एक तरीके से पूरा जो काठमांडू का जो आकाश था उसको भी जमीन का तो उसने किया ही किया आकाश को भी एक तरीके से पूरा बदल दिया स्काईलाइन को चेंज कर दिया. एक अद्दभुत मेल है काठमांडू में जहां आप के साथ एक बहुत ऐसी बिल्डिंग उस राजा की जिसने पहली बार काठमांडू को एक किया पुलशाह जो डायनेस्टी थी वंश को शुरू किया और उसके बिल्कुल सांय में हिप्पी.

 

1934 में आए भूकंप ने भी दरबार स्क्वेर को भारी नुकसान पहुंचाया था. तब कड़ी मेहनत से नेपाल ने अपने इस शाही प्रतीक को फिर से दोबारा खड़ा कर लिया था. लेकिन शनिवार को आए भूकंप के बाद दरबार स्क्वेर में तबाही का ऐसा नजारा है कि यहां के ऐतिहासिक निशानों की पहचान तक मुश्किल हो गई है. नेपाल के महल ही नहीं यहां कई मंदिर भी जमीनदोज हो चुके है. काठमांडू शहर के बीचों में बना वो काष्ठमंडप मंदिर भी भूकंप के झटके नहीं झेल सका जो सदियों से अपना वजूद बचाए हुए थे. 16 वीं शताब्दी में बने काष्ठमंडप की भी अपनी एक कहानी है. माना जाता है कि काष्टमंडप एक ही पेड की लकड़ी से बनाया गया था जिसमें एक भी कील का इस्तेमाल नहीं हुआ था.

 

एबीपी न्यूज संवाददाता कौस्तुभ फलटंकर बताते हैं कि नेपाल में आए भूकंप ने काठमांडू की पहचान पूरी तरह से नष्ट कर दी है काष्ठमंडप नाम का मंदिर था और ये मंदिर भूकंप के बाद पूरी तरह से ध्वस्त हो चुका है इसी मंदिर पर काठमांडू की राजधानी का नामकरण हुआ था जिस वजह से नेपाल में रहने वाले काठमांडू में रहने वाले लोगों का बड़ा ही महत्व हुआ करता था. पुजारी बताते हैं कि काष्ठमंडप मंदिर 3 मंजिला मंदिर था और ये मंदिर के नाम से ही नेपाल की राजधानी काठमांडू का नामकरण हुई है औऱ ये मंदिर शनिवार की भूंकप से ऐसा ध्वस्त हो गया कि जिसका नामोनिशां खत्म हो गया. इसमें है ही नहीं अब तो कुछ भी बाकि नहीं रह गया. मंदिर भगवान गोरखनाथ मंदिर था इस मंदिर का मूल मंदिर के अंदर भगवान गोरखनाथ की मूर्ती था वहां के हम मूल पुजारी मैं हूं.

 

सवाल- कितना पूराना होगा ये मंदिर.

पुजारी- ये राजा नरेंद्र देव के वक्त पर हमारा कहने का मतलब है कि राजा नरेंद्र देव के वक्त पर ये मंदिर बन चुका था मगर नेपाल के इतिहासकारों का कहना है राजा प्रताप मल्य के बाद लक्ष्मीनरसिंह मल्ल ने इनको भव्य स्वरुप दिया ऐसा कहना है लोगों का. मगर हमारा कहना है कि ये मंदिर राजा नरेंद्र देव के वक्त ही बन चुकी थी .

 

मंदिरों के लिए विख्यात काठमांडू में पशुपतिनाथ का मंदिर सबसे ज्यादा मशहूर है. इस मंदिर को नेपाल में हिंदुओं का सबसे बड़ा औऱ पवित्र तीर्थस्थान भी माना जाता है क्योकि ये भगवान शिव का एक घऱ भी माना गया है और यही वजह है कि यहां हर साल लाखों श्रद्धालु शिव दर्शन के लिए आते हैं.

 

एबीपी न्यूज संवाददाता उमेश कुमावत बताते हैं कि नेपाल में भूकंप के इतने जोरदार झटके आये लेकिन बाबा पशुपतिनाथ के मंदिर को कुछ नहीं हुआ यहां जो अंदर काफी सारे मंदिर हैं उसमें से जो प्रतिमाएं है या मंदिर है गर्वस्थल है वहां पर कुछ भी नहीं हुआ है. बाबा पशुपतिनाथ का मंदिर यहां है और यहां पर करोड़ों लोगो की श्रद्दा है पूरे दुनिया भर से करोड़ों लोग यहां पर शिव जी के दर्शन के लिये आते हैं और जो शिव जी के भक्त हैं उनके लिये सबसे अहम ये जगह है और नेपाल की ये एक पहचान है.

 

पशुपतिनाथ मंदिर का परिसर नेपाल की पवित्र बागमती नदी के किनारे फैला हुआ है. पशुपतिनाथ मंदिर का मुख्य ढांचा आम मंदिरों से अलग नजर आता है. इस मंदिर का शिखर सोने से सजा है और इसमें चांदी के दरवाजे लगे हैं. बागमती नदी के किनारे ये मंदिर सीढीनुमा चबूतरे पर बना है. नदी के दूसरी तरफ भी मंदिर का ही परिसर है और यहां आठ छोटे-छोटे मंदिर बने हैं. पशुपतिनाथ मंदिर से जुड़े इस पूरे इलाके की बात करें तो ये करीब 264 हेक्टेयर में फैला हुआ है और यहां छोटे बड़े मंदिरों की संख्या 518 है. इस पूरे मंदिर परिसर में आस-पास के मंदिरों को तो नुकसान पहुंचा है लेकिन महाभूकंप में पशुपतिनाथ मंदिर का मुख्य ढांचा पूरी तरह सुरक्षित बच गया.

 

एबीपी न्यूज संवाददाता दिबांग बताते हैं कि पशुपति नाथ मंदिर में एक तरीके से काठमांडू नहीं पूरे नेपाल की पहचान है पूरे दक्षिण एशिया से यहां लोग आते हैं और ये बहुत धार्मिक तीर्थ स्थल है और एक चीज जो हमनें देखी कि यहां कोई नुकसान नहीं हुआ है कोई खरोंच नहीं आईं.

 

वरिष्ठ पत्रकार कनकमणि दीक्षित बताते हैं कि नुकसान नहीं हुआ एक बात ये हो सकती है कि ये बहुत राकिटेरिएन है और जो इमारत और मंदिर यहां बना हुआ है वो रॉक में ही है औऱ जो मंदिर बना है वो पगौड़ा स्टाइल में पगौड़ा स्टाइल जो नेपाल और काठमांडू की ऑरिजनल शैली है और यहां का जो भूगर्भ है वो भी मजबूत है शायद और ये भी हो सकता है कि जो पशुपतिनाथ नेपाल की वो सबसे महत्वपूर्ण मंदिर है इसलिए हो सकता है कि इसका फाउंडेशन मजबूत बनाया गया है क्योंकि ये तो सबसे महत्वपूर्ण मंदिर है.

 

पशुपतिनाथ मंदिर में नुकसान का भी प्रमाण मिलता है. दरअसल प्राचीन पशुपतिनाथ मंदिर पूरी तरह लकड़ी से बनाया गया था जिसे दीमक ने खा लिया था और इस वजह से मंदिर का ढांचा एक बार पूरी तरह नष्ट हो गया था लेकिन 17वीं शताब्दी में जब नेपाल के राजा कीरत यालंबर ने मंदिर को दोबारा बनवाया तो इसे पगोडा शैली में ढाल दिया गया था जिसके बाद से ये आज तक सुरक्षित है. पिछले शनिवार को आए भूकंप में भी पशुपतिनाथ मंदिर बच गया लेकिन ये उस तबाही की तस्वीरे हैं जिसने नेपाल के नक्शे से उसकी एक अहम विरासत को हमेशा के लिए मिटा दिया है.

 

काठमांडू का मशहूर धरहरा मीनार भी धाराशायी हो चुका है. धरहरा की ये दास्तान नेपाल के इतिहास का वो अहम पन्ना है जब नेपाल के पहले प्रधानमंत्री भीमसेन थापा बनाए गए थे. एक नेपाली सैनिक के बेटे भीमसेन थापा की तब के राजकुमार रणबहादुर थापा के साथ दोस्ती हुआ करती थी और उनकी इसी दोस्ती ने उन्हें प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचा दिया था.

 

प्रधानमंत्री दौर में भीमसेन थापा ने दो बडे काम किए थे. एक तो उन्होंने धरहरा को बसाया और दूसरा अपनी बेटी को तोहफा देने के लिए इस भीमसेन मीनार का निर्माण करवाया था. 1826 में बनी इस मीनार की सीढियां उनकी बेटी को उस ऊंचाई पर ले जाती थीं जहां एक बालकनी बनाई गई थी. यहां से भीमसेन थापा की बेटी ठीक उसी तरह पूरे काठमांडू को निहार सकती थी जैसे की अब तक इस मीनार में घूमने वाले सैलानी निहारा करते थे.

 

दरअसल धरहरा के जाने से जहां काठमांडू का पूरा स्काईलाइन चला गया है वही जिस काष्ठमंडप के नाम पर शहर का नाम काठमांडू पड़ा वो भी अब जमीनदोज हो चुका है. जाहिर है नेपाल की विरासत का एक बड़ा हिस्सा भूंकप निगल चुका है और इसीलिए हर नेपाली के मन में आज एक खालीपन का भाव भर गया है लेकिन काठामांडू की इस कहानी में सिर्फ दर्द और ग़म ही शऱीक नहीं है बल्कि उसकी रगों में हिम्मत और हौसले का संचार भी हो रहा है.

 

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