20 हजार फीट की ऊंचाई पर सेना के इस चमत्कार को सलाम!

excellent rescue operation by indian army in siachen

नई दिल्ली: सियाचिन में छह दिन तक करीब तीस फीट बर्फ के नीचे भी जिंदा बचकर निकलने वाले सेना के जवान हनुमंथप्पा के लिए सेना के बचाव दल ने दिन-रात एक कर दिया. चमत्कार इसी को कहते हैं जिसे बीस हजार फीट ऊंचाई पर सियाचिन में भारतीय सेना ने कर दिखाया. जो साहस हनुमंथप्पा ने दिखाया वैसा ही जज्बा लेकर सेना के बचाव दल ने भी वीर जवान की तलाश की.

तारीख 3 फरवरी सियाचिन की सोनम पोस्ट, 19 हजार 600 फीट की उंचाई पर हनुमंथ्पा और बाकी 9 जवान तैनात थे जब 3 फरवरी को कुदरत का सबसे खौफनाक हमला हिमस्खलन के तौर पर हुआ. बर्फ की चट्टान उनकी पोस्ट पर आकर पलभर में गिरी और फिर सबकुछ शांत हो गया. 1 किलोमीटर चौड़ी और 800 मीटर ऊंची बर्फ की एक दीवार उनके कैंप पर आ गिरी थी. इसके बाद लगातार बर्फबारी, बारिश और बर्फीली-हवाएं चल रही थीं. कभी-कभी 1 मीटर से भी कम दूरी तक कुछ दिखाई नहीं दे रहा था. दिन में तापमान माइनस (-) 15 डिग्री और रात मे माइनस(-) 55 डिग्री तक गिर जाता था. लेकिन इसके बीच जवानों को तलाशने का काम शुरू हुआ.

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सेना की रेस्कयू टीम में करीब 200 सदस्य थे. इनमें डॉक्टर्स, सियाचिन बैटल स्कूल के टीचर (Instructors), 19 मद्रास रेजीमेंट के जवान और अधिकारी (इसी रेजीमेंट के हैं हनुमंथप्पा) और लद्दाख-स्कॉउटस के जवान शामिल थे. इसके अलावा सेना और वायुसेना के मी-17 हेलीकॉप्टर और एएन-31 विमानों की मदद भी ले गई.

ऐसे मौसम मे हेलीकॉप्टर के लिए भी पोस्ट पर उतरना मुश्किल था इसीलिए जवानों को रेस्कयू मिशन के लिए पैदल भी भेजना पड़ा. सबसे पहले वहां पहुंचने वाले थे बाणा-पोस्ट के जवान. ये पोस्ट सियाचिन और दुनिया की सबसे ऊंची मिलेट्री-पोस्ट है जो 24,500 फीट की उंचाई पर है.

बचाव दल बर्फ काटने के लिए अपने साथ खास तरह के रॉक-ड्रिल, बिजली काटने की आरी (electric-saw) और अर्थ-ऑगुअर जैसी मशीनों से लैस थी. साथ ही विशेष प्रशिक्षण लेकर खोजी कुत्ते लाए गए.. रेडियो-सिग्नल और स्पेशल रडार भी खोजने के काम में लगाए गए.

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रेडियो सिग्नल इसलिए ले जाए गए क्योंकि पोस्ट पूरी तरह से बर्फ मे दब चुकी थी. लेकिन ये सिग्नल डिवाइस 20 फुट नीचे तकषका किसी भी मोबाइल या सैटेलाइट फोन का सिग्नल कैच कर सकता है. रडार EQUIPMENT 20 फीट नीचे किसी भी थर्मल-सिग्नेचर, हीट या मैटेल को  DETECT कर सकता है.

बचाव दल ने सबसे पहले वहां जाकर मेडिकल सहायता के लिए पोस्ट तैयार की. इसके बाद टीम ने सोनम पोस्ट के आसपास के इलाके में पांच स्पॉट पता लगाए जहां पर रेडियो सिग्नल और स्पेशल रडार को हलचल मिल रही थी. एक-एक कर सभी स्पॉटस को बारीकी से खोदा गया. रॉक-ड्रिल से ICE-BOULDERS यानी बर्फ की चट्टान जो दीवार या छत से भी ज्यादा मजबूत होती है उसे काटा गया.

करीब 25 फीट पर सोमवार को बचाव दल को ARCTIC-TENT दिखा दरअसल इन खास तरह के टेंटों में ही सियाचिन में पोस्ट तैयार की जाती हैं.

इन Arctic टैंटों की अपनी कहानी है. 1983 में पाकिस्तान ने इन टैंटों का bulk में ऑर्डर दिया था. भारतीय खुफिया एजेंसियो को इसकी भनक लग गई. उसके बाद ही साल 1984 में भारतीय सेना ने ऑपरेशन मेघदूत लॉन्च किया.

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सोमवार दोपहर को पहला शव दिखाई दिया. उसे बाहर निकाला गया उसके बाद 30 फीट नीचे हनुमंथ्पा दिखाई दिये जिनकी धड़कनें चल रही थीं.

बचाव दल ने इसकी जानकारी तुरंत कमांडिग ऑफिसर को दी और फिर कोर कमांडर और उत्तरी कमांड के जीओसी के जरिए सेना प्रमुख को दी गई. इसके बाद हनुमंथ्पा को हेलीकॉप्टर से परतापुर स्थित ब्रिगेड हेडक्वार्टर के मिलेट्री अस्पताल लाया गया.

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वहां से हनुमंथप्पा को दिल्ली में सेना के आरआर अस्पताल लाया गया जहां डॉक्टर उन्हें ठीक करने की कोशिश में दिन-रात जुटे हुए हैं. अब सभी कह रहे रहे हैं कि एक ‘वीर मद्रासी’ (मद्रास रेजीमेंट का motto) की तरह ही हनुमंथ्पा ने मौत को मात दे दी.

डॉक्टर्स का कहना है कि अपने हष्ट-पुष्ट शरीर और सियाचिन में मिलने वाली कड़ी ट्रैनिंग के चलते ही ये वो जिंदा निकल आया. खुद सेना भी इसे एक चमत्कार मान रही है.

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