आत्महत्या को मजबूर ‘देश का अन्नदाता’

By: | Last Updated: Sunday, 21 December 2014 12:02 PM

नई दिल्ली : किसानों की आत्महत्या करने की संख्या महज आंकड़ नहीं बल्कि यह त्रासद समय से गुजर रहे किसानों की जिंदगी की भयावह तस्वीर है जो सूखा, बाढ़, ओलावृष्टि की मार एवं कर्ज के जाल में फंसे ‘देश के अन्नदाता’ की दयनीय स्थिति बयां करते हैं.

 

कृषि मंत्रालय एवं राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2009 में 17,368, साल 2010 में 15,694, साल 2011 में 14,027, साल 2013 में 11,772 किसानों के आत्महत्या की सूचना मिली . इनमें से कृषि वजहों से 2009 में 2,577, 2010 में 2,359, साल 2011 में 2,449 साल 2012 में 918 और साल 2013 में 510 आत्महत्या के मामले शामिल हैं.

 

महाराष्ट्र सरकार ने कृषि संबंधी समस्याओं के चलते इस वर्ष अक्तूबर तक 724 किसानों की आत्महत्या करने की सूचना दी है. तेलंगाना में 84 किसानों के आत्महत्या करने जबकि कर्नाटक में 19 तथा गुजरात, केरल और आंध्रप्रदेश में तीन तीन किसानों के आत्महत्या करने की सूचना है .

 

वर्ष 2013 में महाराष्ट्र में 511 किसानों के आत्महत्या की सूचना थी जबकि 2012 में इनकी संख्या 407 थी. संसद में भी विभिन्न दलों के नेताओं ने इस विषय को उठाया है.

 

विदर्भ जनांदोलन समिति के संयोजकों में शामिल किशोर तिवारी ने कहा कि तीन दशक पहले तक पारंपरिक खेती होती थी और फसलों का बेहतर संतुलन रहता था . लेकिन फिर सरकार नकदी फसलों की नीति लेकर आई. किसानों को नकदी फसलों की ओर सरकार ने आगे बढ़ाया. लेकिन जब से नकदी फसलों पर सब्सिडी समाप्त हुई तब से किसान पूरी तरह से बाजार की दया पर आ गया है.

 

बुंदेलखंड विकास समिति के संयोजक आशीष सागर ने कहा कि बुंदेलखंड एवं देश के अन्य क्षेत्रों में सिंचाई के साधानों का अभाव है लेकिन भूजल का जबर्दस्त दोहन जारी है. जब जमीन के अंदर पानी नहीं होगा और खराब मानसून के कारण बारिश कम होने से सिंचाई नहीं होगी तब फसलें बर्बाद होगी और इसका सीधा असर किसानों पर पड़ता है और उनके समक्ष कोई विकल्प नहीं बचता.

 

सागर ने दावा किया कि 20 प्रतिशत किसानों ने ही बैंकों से कर्ज लिया है जबकि 80 प्रतिशत किसानों ने साहूकारों से कर्ज लिया है. ब्याज की दर इतनी अधिक है कि निरीह किसान कभी भी इनके जाल से नहीं निकल पाता है और आत्महत्या को मजबूर होता है. गौरतलब है कि पिछले कुछ सालों में सरकार ने किसान की रिण माफी समेत काफी बड़ा पैकेज दिया लेकिन किसानों की आत्महत्या का सिलसिला नहीं रूक रहा है.

 

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, कृषि संबंधी समस्याओं के चलते इस साल 800 से अधिक किसानों के आत्महत्या की सूचना है और ऐसे मामलों की ज्यादातर खबरें महाराष्ट्र से रही हैं.

 

कृषि क्षेत्र के पुनरूद्धार और किसानों की हालत में सुधार के लिए केंद्र सरकार ने कई कदम उठाए हैं जिनमें ग्रामीण क्षेत्र में सार्वजनिक निवेश बढ़ाना, अवसंरचना विकास, बाजार तक पहुंच बढ़ाना से लेकर विपणन आदि शामिल हैं.

 

कृषि मंत्रालय शीघ्र ही एक नयी फसल बीमा सिंचाई योजना एवं हर खेत को पानी पहुंचाने के लिए सिंचाई योजना शुरू करने जा रही है ताकि सूखे जैसी स्थिति में किसानों को सुरक्षा प्रदान की जा सके. कृषि मंत्रालय ने साइल हेल्थ कार्ड योजना की पहल की है जिससे किसानों को उर्वरकों का सही चयन करने में मदद मिल सके.

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