शरीयत अदालतों को कानूनी मान्यता नहीं है: सुप्रीम कोर्ट

By: | Last Updated: Monday, 7 July 2014 6:33 AM
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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने शरीयत अदालतों को लेकर सोमवार को बड़ा फैसला दिया है. कोर्ट ने कहा कि शरीयत अदालतों को कानूनी मान्यता नहीं है.

 

अदालत ने कहा कि अगर फतवे किसी शख्स के अधिकार में हस्तक्षेफ करते हों तो इसे अवैध माना जाएगा.

 

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि फतवों को मानना किसी के लिए बाध्य नहीं है. कोर्ट ने फतवा जारी करने वाली संस्थाओं से कहा कि जबतक पीड़ित पक्ष खुद उनके पास फतवा लेने न आए वो फतवा जारी करने से बचें.

 

शरीयत अदालतों के वकील शकील अहमद सयैद ने कहा है कि उन्होंने अदालत को बताया कि दारुल कजा और दारुल इफ्ता समानांतर कोर्ट नहीं हैं, बल्कि वह कोर्ट का बर्डन कम कर रहे हैं.

 

अदालत का फैसला

 

बड़ी अदालत ने शरीयत कोर्ट के जरिए मासूम लोगों को सजा देने के आदेशों पर एतराज जताया. अदालत ने कहा कि कोई भी मज़हब इसकी इजाजत नहीं देता.

 

सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला दिल्ली के वकील विश्व लोचन मदन की साल 2005 की एक याचिका पर आया है, जिसमें उन्होंने सर्वोच्च अदालत में शरीयत कोर्ट की वैधता को चुनौती दी थी.

 

विश्व लोचन मदन ने अपनी याचिका में कहा था कि दारुल क़ज़ा और दारुल इफ्ता समानांतर अदालतों जैसा काम कर रही हैं और ये मुसलमानों के मौलिक अधिकारों पर फैसले देती हैं.

 

याचिकाकर्ता का दावा था कि दारुल कज़ा और दारुल इफ्ता जैसे इदारे मुस्लिम बाहुल्य जिलों में चलते हैं जहां आम जनता उनके फैसला का विरोध नहीं कर पाते.

 

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