BLOG: हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए जल्द हो अयोध्या का फैसला

By: | Last Updated: Sunday, 6 December 2015 2:26 PM
for Hindu- Muslim unity Ayodhya decision should come soon

नई दिल्ली: 6 दिसंबर… जी हां ये वही तारीख जिसने आज से ठीक 23 साल पहले समाज को दो हिस्सों बांट दिया. एक वो जो आज के दिन शौर्य दिवस मनाता है तो दूसरा बाबरी मस्जिद शहादत दिवस मनाता है.

 

सोशल मीडिया के जमाने में सोशल वार शुरू हो जाती है, एक शौर्य दिवस ट्विटर पर ट्रेंड कराता है और एक काला दिवस. ये तारीख आते ही देश में ऐतिहातन सुरक्षा चाकचौबंद कर दिया जाता है, अयोध्या की तो धड़कने बढ़ जाती हैं और डर लगा रहता है कि कहीं कोई अप्रिय घटना ना हो जाए. इस घटना को 23 साल बीत गए हैं लेकिन आज भी समाधान की वो कोशिश नहीं हुई है जो होनी चाहिये थी.

 

1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस आजाद भारत की एक बड़ी घटना है, जिसने देश के सामाजिक और राजनैतिक ताने-बाने को झकझोर कर रख दिया. इतिहास को पीछे मुड़ कर बदला तो नहीं जा सकता है और आज भी आगे बढ़ने की स्थिति में नहीं हैं, एक तरफ कुंआ और एक तरफ खाई जैसी स्थिति बनी हुई है.

 

इस मुद्दे को राजनैतिक इच्छा शक्ति की कमी के तौर पर भी याद किया जाएगा. मेरा मानना है कि जब देश आजाद हुआ तब ही ऐसे सभी विवादित मुद्दों का हल निकाल लेना चाहिए था लेकिन ऐसा न हुआ और इस मुद्दे को जहर की तरह लोगों की नसों में घोल दिया गया और एक दिन ये बाबरी मस्जिद इसी जहर के विस्फोट में गिरा दी गई.

 

मै गंगा-जमुनी तहजीब के शहर इलाहाबाद का रहने वाला हूं और उस दिन भी वहीं था जब बाबरी मस्जिद पर 2010 में इलाहबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच से फैसला आना था. गंगा, जमुना की लहरों के जैसे चंचल शहर में न जाने क्यों सन्नाटा पसरा था, सड़को पर पुलिस उग आई थी, अर्द्धसैनिक बलों की कदमताल लोगों की धड़कने बढ़ा रही थी.  फैसले के दिन से पहले की रात से ही पूरे राज्य में पुलिस का पहरा बढ़ा दिया गया था. एक अजीब सा माहौल था मेरे दोस्त आसिफ को उसकी अम्मी ने मेरे घर आने से मना कर दिया, उस दिन मेरे साथ खेलने से मना कर दिया था.

 

बड़ी भयावह स्थिति थी एक ऐसा मुद्दा जिसने भाई को भाई से बांट दिया, दोस्तों के बीच एक लकीर खींच दी. लोगों के बीच एक अजीब सी सुगबुगाहट, लोगों के मन में डर था कि अगली घड़ी में ना जाने क्या हो जाए. इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला आया तो लगा कि अब मामले का हल निकल आया है. 

 

तीन जजों की बेंच ने तथ्यों को देखते हुए, सभी पक्षों का ख्याल रखते हुए विवादित 2.77 एकड़ जमीन को तीन बराबर हिस्सों में बांट दिया. दो तिहाई हिस्सा मंदिर के लिए और एक तिहाई हिस्सा मस्जिद को देने का आदेश दिया. दोनों पक्षों ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी और मैं यकीन से कह सकता हूं जो लोग सुप्रीम कोर्ट के फैसले को मानने की बात करते हैं,यदि सुप्रीम कोर्ट से भी कोई बड़ा न्यायालय हो तो वहां भी फैसले के खिलाफ भी याचिका दायर कर देंगे. 

 

राम मंदिर के नाम पर आज भी सियासत जोरों पर है, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत राम मंदिर के नाम पर जान देने के लिए तैयार रहने को कहते हैं तो असद्दुदीन ओवैसी मस्जिद बनाने की चुनौती देते हैं. असल ये दोनों ही अपनी राजनीतिक रोटियां सेंक रहे हैं.  देश में लोकतंत्र के नाम पर धर्म की राजनीति और वोट के नाम आस्था की राजनीति का खेल खेला जा रहा है. बाबरी के इतिहास को पलट कर देखेंगे तो इतने दागदार पन्ने देखने को मिलेंगी जिसकी कालिख कभी नहीं मिटाई जा सकती है.

 

उग्र राममंदिर आंदोलन के दौरान 20 कारसेवक बीएसएफ की गोलियों से मारे गए, जिसके बाद उनकी अस्थियों को कलश में रख कर पूरे उत्तर भारत के शहरों में घुमाया गया और लोगों की भावनाएं भड़काई गई. 1992 में बाबरी विध्वंस के बाद देश में कई दंगे हुए जिसमें दोनों तरफ से करीब 2000 लोगों की जानें चली गई. लाशों के ढेर की सीढ़ियों चढ़ राजनैतिक दल सत्ता तक तो पहुंच गए लेकिन मंदिर आंदोलन की आग को लोगों के दिलों में जगाए रखा.

 

वे जो असल राम भक्त हैं रामलला तो उनके के दिल में रहते हैं, जिसके लिय वे कतई खून खराब नहीं चाहेंगे.  लेकिन उग्र विचार धारा के लोग उकसाने का काम करते रहते हैं.  बार बार 6 दिसंबर पर सोशल वॉर, नफरत को हवा, पुलिस की सुरक्षा, ये सिलसिले को रोकने के लिये सुप्रीम कोर्ट को राम मंदिर विवाद का निपटारा जल्द से जल्द करना चाहिए और  जो भी फैसला आए उसे राजनैतिक पार्टियों को तत्काल प्रभाव से अमल में लाना होगा.

 

अगर आगे भी ऐसे ही आस्था से खिलवाड़ होता रहा तो ये मुद्दा अगले 50 साल और भारतीय समाज और संवैधानिक लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चुनौती बना रहेगा.

 

डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेखक के विचारों से एबीपी न्यूज़ का सहमत होना ज़रूरी नहीं है. लेख में पेश किए गए फैक्ट्स के लिये भी एबीपी न्यूज़ ज़िम्मेदार या जवाबदेह नहीं है.

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