पुण्यतिथि विशेषः जब 14 दिन में ही इंदिरा गांधी ने किए पाकिस्तान के दो टुकड़े ,Former prime minister indira gandhi's death anniversary Special: when indira gandhi broke pakistan in two pieces

इंदिरा पुण्यतिथि विशेष: जब 14 दिन में ही आयरन लेडी ने किए पाकिस्तान के दो टुकड़े

आज देश की पहली महिला प्रधानमंत्री और जवाहर लाल नेहरु की बेटी श्रीमती इंदिरा गांधी की 33वीं पुण्यतिथि है. देश की सबसे ताकतवर और पक्के इरादों वाली नेत्री के तौर पर उन्हें याद किया जाता है.

By: | Updated: 31 Oct 2017 11:59 AM
Former prime minister indira gandhi’s death anniversary Special:  when indira gandhi broke pakistan in two pieces

नई दिल्लीः आज देश की पहली महिला प्रधानमंत्री और जवाहर लाल नेहरु की बेटी श्रीमती इंदिरा गांधी की 33वीं पुण्यतिथि है. देश की सबसे ताकतवर और पक्के इरादों वाली नेत्री के तौर पर उन्हें याद किया जाता है. इंदिरा गांधी के शासनकाल के दौरान 1971 में भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ ऐतिहासिक लड़ाई लड़ी थी और उसे धूल चटाई. आज हम आपको भारत -पाकिस्तान के बीच हुए 1971 की जंग की दास्तां सुनाएंगे जब गांधी ने पाकिस्तान को सबक सिखाने का फैसला किया था.


1971- भारत का सबसे सफल युद्ध
तारीख 25 अप्रैल साल 1971, तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने एक बड़ी मीटिंग में देश के थलसेनाध्यक्ष से कहा कि पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए जंग करनी पड़े तो करें. उन्हें इसकी परवाह नहीं. इंदिरा गांधी को ऐसा इसलिए कहना पड़ा था क्योंकि उस वक्त भारत के पूर्व में बसा पाकिस्तान का वो हिस्सा जिसे अब बांग्लादेश कहा जाता है, वहां ऐसा कुछ हो रहा था जिसका सीधा असर भारत पर पड़ रहा था.


पाकिस्तान की सरकार और सेना पूर्वी पाकिस्तान में रहने वाले अपने ही देश के लोगों पर जुल्म कर रही थी. बेगुनाह लोगों की हत्या कर रही थी और ये सब सिर्फ इसलिए क्योंकि पूर्वी पाकिस्तान के लोग पाकिस्तान की सेना के जुल्म के खिलाफ आवाज उठा रहे थे. उनकी आवाज दबाने के लिए पाकिस्तान ने पूर्वी पाकिस्तान में नरसंहार शुरू कर दिया था. अपनी जान बचाने के लिए लोग वहां से भागने लगे. ये शरणार्थी पूर्वी पाकिस्तान की सीमा से लगे भारतीय राज्यों में पहुंच गए. पूर्वी पाकिस्तान के करीब 10 लाख लोग भारत में शरणार्थी बनकर आ गए. भारत की प्रधानमंत्री होने के नाते इंदिरा पर इस बात का दबाव बढ़ रहा था कि वो जल्द से जल्द इस मसले का हल निकालें और जरूरी कार्रवाई करें. इसीलिए इंदिरा ने एक तरफ भारतीय फौज को युद्ध की तैयारी करने का आदेश दे दिया और दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान पर दबाव बनाने की कोशिश शुरू कर दी.


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अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हेनरी किसिंजर के साथ हुई इस बैठक में इंदिरा ने साफ कर दिया कि अगर अमेरिका पाकिस्तान को नहीं रोकेगा तो भारत पाकिस्तान पर सैनिक कार्रवाई के लिए मजबूर होगा. पूर्वी पाकिस्तान की समस्या को पाकिस्तान अपना अंदरूनी मामला बता रहा था लेकिन इंदिरा ने साफ कर दिया पूर्वी पाकिस्तान में जो हो रहा है वो पाकिस्तान का अंदरूनी मामला नहीं है. उसकी वजह से भारत के कई राज्यों में शांति भंग हो रही थी. इंदिरा ने पूर्वी पाकिस्तान पर उठ रहे हर सवाल का पूरी मजबूती से जवाब दिया. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी एक तरफ पाकिस्तान की डिप्लोमैटिक घेराबंदी कर रही थीं और दूसरी तरफ दुनियाभर में भारत के पक्ष में समर्थन जुटा रही थीं. पाकिस्तान की तरफ अमेरिका के नरम रवैए को देखते हए इंदिरा ने 9 अगस्त 1971 को सोवियत संघ के साथ एक ऐसा समझौता किया जिसके तहत दोनो देशों ने एक दूसरे की सुरक्षा का भरोसा दिया.


उधर पूर्वी पाकिस्तान में हालात बद से बदतर होते जा रहे थे. वहां पुलिस, पैरामिलिट्री फोर्स, ईस्ट बंगाल रेजिमेंट और ईस्ट पाकिस्तान राइफल्स के बंगाली सैनिकों ने पाकिस्तानी फौज के खिलाफ बगावत कर खुद को आजाद घोषित कर दिया था. ये लोग भारत से मदद की उम्मीद कर रहे थे. भारत की तरफ से वहां के लोगों को फौजी ट्रेनिंग दी जाने लगी जिससे वहां मुक्ति वाहिनी सेना का जन्म हुआ. वहीं पाकिस्तान चीन और अमेरिका के दम पर लगातार भारत को उकसा रहा था. नवंबर के आखिरी हफ्ते में पाकिस्तान के विमानों ने बार-बार भारतीय हवाई सीमा में दाखिल होना शुरु कर दिया. इस पर भारत की तरफ से पाकिस्तान को चेतावनी दी गयी लेकिन बजाय संभलने के पाकिस्तानी राष्ट्रपति याया खान ने 10 दिन के अंदर युद्ध की धमकी दे डाली. पाकिस्तान को उस वक्त ये अंदाजा भी नहीं था कि भारतीय सेना पहले ही अपनी तैयारी शुरू कर चुकी है.


इंदिरा के इरादे पक्के थे, युद्ध का माहौल बनता जा रहा था सवाल ये था कि पहला हमला कौन करेगा. पाकिस्तान भारत की तैयारी का अंदाजा नहीं लगा पाया 3 दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी विमानों ने भारत के कुछ शहरों पर बमबारी करने की गलती कर दी. हमले की खबर मिलते ही इंदिरा सीधे मैप रूम पहुंची. जहां उन्हें हालात का ब्यौरा दिया गया. उस वक्त रात के 11 बज चुके थे. सेना के अफसरों से बैठक के बाद इंदिरा ने कैबिनेट बैठक बुलाई और फिर विपक्ष के नेताओं से मुलाकात कर उन्हें भी पूरे हालात की जानकारी दी. आधी रात हो चुकी थी जब इंदिरा ने ऑल इंडिया रेडियो के जरिए पूरे देश को संबोधित किया.

इंदिरा ने भारतीय सेना को ढाका की तरफ बढ़ने का हुक्म दे दिया. वहीं भारतीय वायुसेना ने पश्चिमी पाकिस्तान के अहम ठिकानों और हवाई अड्डों पर बम बरसाने शुरू कर दिये. भारत की तीनों सेनाओं ने पाकिस्तान की जबरदस्त नाकेबंदी की थी . 3 दिसंबर के हमले का जवाब भारत ने आपरेशन ट्राइडेंट शुरु करके दिया था . चार दिसंबर, 1971 को आपरेशन ट्राइडेंट शुरू हुआ. भारतीय नौसेना ने भी युद्ध के दो मोर्चे संभाल रखे थे. एक था बंगाल की खाड़ी में समुद्र की ओर से पाकिस्तानी नौसेना को टक्कर देना और दूसरा पश्चिमी पाकिस्तान की सेना का मुकाबला करना. 5 दिसंबर को भारतीय नौसेना ने कराची बंदरगाह पर जबरदस्त बमबारी कर पाकिस्तानी नौसैनिक मुख्यालय को तबाह कर दिया. पाकिस्तान पूरी तरह घिर चुका था. इसी बीच इंदिरा ने बांग्लादेश को मान्यता देने का एलान कर दिया.


इंदिरा की इस घोषणा का मतलब था कि बांग्लादेश अब पाकिस्तान का हिस्सा नहीं बल्कि एक स्वंत्रत्र राष्ट्र होगा. भारत ने युद्ध में जीत से पहले ही ये फैसला इसलिए किया जिससे युद्धविराम की स्थिति में बांग्लादेश का मामला यूनाइटेड नेशन्स में लटक न जाए. उधर अमेरिका ने पाकिस्तान की मदद के लिए अपनी नौसेना का सबसे शक्तिशाली सातवां बेड़ा बंगाल की खाड़ी की तरफ भेज दिया जिसके जवाब में इंदिरा ने सोवियत संघ के साथ हुई संधि के तहत उन्हें अपने जंगी जहाजों को हिंद महासागर में भेजने के लिए कहा. इस तरह से दो महाशक्तियां अप्रत्यक्ष रूप से इस युद्ध में शामिल हो चुकी थीं. इंदिरा गांधी ने फैसला लिया कि अमेरिकी बेड़े के भारत के करीब पहुंचने से पहले पाकिस्तानी फौज को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर करना होगा. जिसके बाद थल सेनाध्यक्ष जनरल सैम मानेक शॉ ने तुरंत पाकिस्तानी फौज को आत्मसमर्पण की चेतावनी जारी कर दी.


पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तान की सेना के कमांडर जनरल ए ए के नियाजी ने अमेरिका और चीन के दम पर सरेंडर से इंकार कर दिया. उस वक्त तक भारतीय सेना ढाका को 3 तरफ से घेर चुकी थी. 14 दिसंबर को भारतीय सेना ने ढाका में पाकिस्तान के गवर्नर के घर पर हमला किया. उस वक्त वहां पाकिस्तान के सभी बड़े अधिकारी गुप्त मीटिंग के लिये इकट्ठा हुये थे . इस हमले से पाकिस्तानी फौज के हौसले पस्त हो गए. जनरल नियाजी ने तुरंत युद्ध विराम का प्रस्ताव भिजवा दिया. लेकिन भारतीय थलसेनाध्यक्ष सैम मानेकशॉ ने साफ कर दिया कि अब युद्ध विराम नहीं बल्कि सरेंडर होगा.


मेजर जनरल जे एफ आर जैकब को इसकी जिम्मेदारी सौंपी गई. इसके बाद कोलकाता से भारत के पूर्वी कमांड के प्रमुख लेफिटेनेंट जेनरल जगजीत सिंह अरोड़ा ढाका पहुंचे. अरोडा और नियाज़ी एक मेज़ के सामने बैठे और 16 दिसंबर 1971 को दोपहर के 2.30 बजे सरेंडर की प्रक्रिया शुरू हुई.


पाकिस्तानी कमांडर नियाजी ने पहले लेफ्टिनेंट जनरल अरोड़ा के सामने सरेंडर के कागज पर दस्तखत किए और फिर अपने बिल्ले उतारे. सरेंडर के प्रतीक के तौर पर नियाजी ने अपना रिवॉल्वर जनरल अरोड़ा के हवाले कर दिया. पाकिस्तान के सरेंडर के साथ ही प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ये एलान कर दिया. भारत ने सिर्फ 14 दिन में पाकिस्तानी फौज को हथियार डालने के लिए मजबूर कर दिया और इस तरह इंदिरा ने पाकिस्तान को तोड़ दिया उसके 2 टुकड़े कर दिए.

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Web Title: Former prime minister indira gandhi’s death anniversary Special: when indira gandhi broke pakistan in two pieces
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