व्यक्ति विशेष: FTII के चक्रव्यूह में 'चौहान'!

By: | Last Updated: Saturday, 25 July 2015 3:32 PM
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किताबों के पन्नों में दबी महाभारत एक ऐसे भीषण युद्ध की दास्तान हैं जिसमें अपनों ने ही अपनों के खिलाफ हथियार उठाए हैं. महाभारत की इस कहानी में खून के रिश्तों से जुड़े किरदार सत्य के लिए लड़ते तो कहीं सत्ता के लिए जीते और मरते नजर आते हैं. सत्ता की बिसात पर रिश्तों के धागों से बुनी हुई महाभारत की ये कहानी सदियों से लोगों को प्रेरित करती रही है महाभारत की इस दास्तान में सत्ता के लिए जंग और रिश्तों का मार्मिक अंत दर्ज है. कहते हैं महाभारत की ये जंग युधिष्ठिर ने अपने चार भाइयों के साथ मिलकर सौ कौरवों के खिलाफ लड़ी थी. महाभारत की ये जंग हस्तिनापुर में लड़ी गई थी. जो आज के हरियाणा में मौजूद है लेकिन हरियाणा से करीब डेढ़ हजार किलोमीटर दूर लड़ी जा रही है आज की महाभारत.

 

यूं तो पुणे की इस महाभारत के किरदार अलग है. इस जंग का स्वरुप भी अलग है लेकिन एफटीआईआई की इस जंग के चक्रव्यूह में फंस गए हैं वो चौहान जिन्होंने कभी टीवी की महाभारत में युधिष्ठिर का किरदार निभाया था. पुणे के फिल्म एंड टेलीविजन संस्थान में छिड़ी इस महाभारत में छात्र और गजेंद्र चौहान आमने – सामने खड़े है तो वहीं इनसे अलग राजनीतिक दलों के नेता भी मैदान में अपनी ताल ठोंक रहे है. कहा जाता है कि महाभारत की जंग तीर, तलवार और गदा जैसे हथियारों से लड़ी गई थी लेकिन FTII की ये जंग कलम, कैमरों और माइक्रोफोन के सहारे लडी जा रही है जिस तरह महाभारत में पूरी सृष्टि का विनाश कर देने वाले हथियार ब्रह्मास्त्र का इस्तेमाल हुआ था ठीक उसी तरह FTII की इस महाभारत में हड़ताल बन एक ब्रह्मास्त्र गई है.

 

जिन छात्रों के हाथों में कैमरा, स्क्रिप्ट और जुबान पर डायलॉग होने चाहिए उन छात्रों के हाथ में इस तरह की तख्तियां हैं और जुबान पर कुछ विरोध के बोल हैं.   

 

एक महीने से ज्यादा का वक्त गुजर चुका है लेकिन पुणे के इस मशहूर फिल्म एंड टेलीविजन संस्थान में छिड़ी महाभारत थम नहीं रही है और इसके केंद्र में हैं टीवी सीरियल महाभारत के सबसे चर्चित पात्रों में से एक युधिष्ठिर यानी गजेंद्र चौहान.

 

यूं तो गजेंद्र चौहान ने कई फिल्मों और टीवी सीरियल में काम किया है लेकिन 80 के दशक में महाभारत में युधिष्ठिर का किरदार निभाकर वो सबसे ज्यादा चर्चित हुए थे और करीब 25 साल बाद एक बार फिर वो देश भर में चर्चा के केंद्र में हैं. दरअसल पिछले महीने 9 जून को उन्हें फिल्म एंड टेलीविजन इस्टीट्यूट ऑफ इंडिया यानी FTII का चेयरमैन नियुक्त किया था. लेकिन इस नियुक्त के साथ ही उनको लेकर विवाद भी शुरु हो गया. FTII के छात्र जहां गजेंद्र चौहान को संस्थान का चेयरमैन बनाने का विरोध कर रहे हैं वहीं बॉलीवुड की कई हस्तियों ने भी उनकी नियुक्ती पर सवाल खड़े किए है.

 

अभिनेता सलमान खान ने कहा है कि ये जो उलझन हैं. ये काफी दिनों से बच्चो की FTII में तो इसको सुधारने का एक ही तरीका था कि ओपनली आपको अपोज किया जा रहा है. आपकी खिल्ली उड़ाई जा रही है. आपका जलूस निकाला जा रहा है तो मुझे लगता है कि आपको अपने आप ही रिजाइन कर देना चाहिए.

 

अभिनेता अनुपम खेर बताते हैं कि जो काम उन्होंने किया है उसके लिए वो बहुत अच्छे हैं मगर ये जरुरी है कि जो सरकारी इंस्टीट्यूशनस होते हैं वो वर्ल्ड रेप्यूटेड होते हैं. तो उन लोगों को पद देना चाहिए जो उस पद की साख रख सकें.

 

केंद्र सरकार का सूचना और प्रसारण मंत्रालय फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया को चलाने वाली गवर्निंग काउंसिल और उसके चेयरमैन को नॉमीनेट करता है. बताया जाता है कि  इस बार गवर्निंग काउंसिल के अध्यक्ष पद के लिए अमिताभ बच्चन, रजनीकांत, गीतकार गुलजार जैसे नाम भी लिस्ट में शामिल किए गए थे लेकिन केंद्र सरकार ने महाभारत सीरियल के युधिष्ठिर यानी गजेंद्र चौहान को इस पद के लिए चुना है. मीडिया में आई इस रिपोर्ट पर सूचना प्रसारण राज्यमंत्री राज्यवर्द्धन राठौर ने कहा कि ‘यदि अमिताभ, रजनीकांत एफटीआईआई चलाना चाहते हैं तो इसमें कोई आपत्ति नहीं है लेकिन जब नाम शॉर्टलिस्ट किए गए तो यह ध्यान रखा गया कि इस पद पर चुना जाने वाला व्यक्ति संस्थान को पूरा समय दे सके. चौहान इसमें ज्यादा फिट थे.’ मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक अमिताभ बच्चन, रजनीकांत और गुलजार के अलावा निर्देशक श्याम बेनेगल, अनुपम खेर और फिल्म निर्देशक अदूर गोपालकृष्णन के नाम पर भी विचार किया गया था लेकिन सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने गजेंद्र चौहान को इन सभी में सबसे काबिल उम्मीदवार माना.

 

FTII के चेयरमैन गजेंद्र चौहान बताते हैं कि जो अपोजिशन लोग जो मेरा विरोध करते हो किसी ना किसी स्तर पर. उनकी ये मंशा हो सकती है कि गजेंद्र चौहान इस जगह पर ना पहुंचे. और जैसा कि आपने कहा कि मुझसे बेहतर तो बेहतर तो आदमी तभी जाना जाता है जब उसका काम देखा जाता है. मेरा काम देखा जाए तब ये फैसला किया जाए कि कौन बेहतर है. दूसरा आप अगर इस बात को कह रहे हो कि नाम बड़ा हो तो क्या छोटे आदमी को बड़ा बनने का अधिकार नहीं है. अगर मुझे वो छोटा समझ रहे हैं और मैं छोटा हूं मुझे इसमें कोई गिलाशिकवा नहीं है. लेकिन मैं बड़ा मानने का माद्दा रखता हूं मुझे अपने काम पर भरोसा है. मैं रिजल्ट ओरिएंटेड काम करता हूं, परिणाम देता हूं. और मैने ये कई बार कई स्तर पर ये प्रूव भी किया है.

 

फिल्म एंड टेलीविजन इस्टीट्यूट आफ इंडिया, देश ही नहीं दुनिया भर के टॉप 10 संस्थानों में शुमार किया जाता है. इस संस्थान की अहमियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि संजय लीला भंसाली, ओम पुरी, नसीरुद्दीन शाह, शाबाना आजमी, सुभाष घई और फिल्म निर्देशक राजकुमार हीरानी जैसे ना जाने कितने लोगों ने यहां से ट्रेनिंग लेकर बॉलीवुड की दुनिया में ऊंचा मुकाम हासिल किया है. ऑस्कर अवॉर्ड विजेता साउंड रिकार्डिस्ट रसूल पुकुटी जैसी हस्तियों को प्रशिक्षण देने वाले इस संस्थान में गिरीश कर्नाड, मृणाल सेन, श्याम बेनेगल, सईद अख्तर मिर्जा और यू आर अनंतमूर्ति जैसे सिनेमा जगत के दिग्गज इस FTII के चेयरमैन रह चुके हैं. लेकिन ये पहला मौका है जब चुने गए चेयरमैन की सिनेमाई समझ को लेकर ही तमाम सवाल खड़े किए जा रहे हैं. यहीं नहीं गजेंद्र चौहान की नियुक्ति के विरोध में 10 नेशनल अवॉर्ड विजेता असमी निर्देशक जाह्नू बरुआ, सिनेमेटोग्राफर संतोष सीवान और अभिनेत्री पल्लवी जोशी जैसे एफटीटीआई सोसाइटी के सदस्य जहां अपने पद से इस्तीफा दे चुके हैं वहीं संस्थान के करीब चार सौ स्टूडेंट उनकी नियुक्ती को लेकर पिछले एक महीने से हड़ताल कर रहे हैं.

 

एफटीआईआई स्टूडेंट यूनियन के अध्यक्ष हरिकृष्ण नाचिमुथु बताते हैं कि सीधा हमने एक ही प्वाइंट रखा है कि ये सरकार है और एक रुलिंग गवर्मेंट का मिनस्ट्री ही इसको सलेक्ट करता है. पहले भी जो लोग थे उनका कुछ ना कुछ तो पॉलिटिकल एफीलिएशन होता ही है. लेकिन ऐसा पहली बार हो रहा है कि डायरेक्टली एक राजनीतिक पार्टी के मेंबर का अपाइंटमेंट हुआ है. तो ये कांग्रेस का आदमी भी हो सकता है. ऐसा नहीं है कि ये बीजेपी का आदमी है इसिलए स्टूडेंट लड़ रहे हैं. ये मेसेज हमारे स्ट्रगल को डाउन कर जाता है. ये सिंपल बात नहीं है. सिर्फ ये बीजेपी का लीडर है इसिलए स्टूडेंट लड़ रहे हैं. हमारी बॉडी तो पॉलिटिकली अनबायस्ड है.

 

एफटीआईआई के चेयरमैन पद पर गजेंद्र चौहान की नियुक्ति का विरोध छात्र ही नहीं बॉलीवुड की कई हस्तियों के अलावा राजनीतिक दल भी कर रहे हैं.

 

आखिर क्यों हो रहा है गजेंद्र का इतना विरोध?

 

एफटीआईआई के मौजूदा और पूर्व छात्रों का विरोध इस बात को लेकर है कि गजेंद्र चौहान फिल्मी दुनिया की बड़ी हस्ती नहीं है. उनका करियर प्रोफाइल बेहतर नहीं है क्योंकि वो फिल्मों में छोटा-मोटा रोल ही करते रहे हैं. विरोध की एक वजह ये भी है कि गुलजार, अडूर गोपालकृष्ण और श्याम बेनेगल जैसे वरिष्ठ लोगों को नजरअंदाज कर चेयरमैन पद पर उनकी नियुक्ति की गई है. और तीसरी सबसे बडी वजह ये बताई जा रही है कि बीजेपी का सदस्य होने की वजह से गजेंद्र चौहान को इतना अहम पद दे दिया गया है.

 

एफटीआईआई का एक छात्र बताता है कि जहां का हिस्ट्री देखा जाएगा तो मृणाल सेन से लेकर त्रतविक घटक और गिरीश कर्नाड, उसके बाद सईद अख्तर मिर्जा. ऐसे लोग इस इस्टीट्यूट के चैयरमैन रहे हैं. यू आर अननमूर्ति वगैरह. तो चैयरमैन होने का एक अनरिटन एक तरह का संदेश बन गया था कि ऐसा बंदा जो इंस्टीट्यूट का पासआउट हो या इंस्टीट्यूट से उनका एक संबंध हो.

 

एफटीआईआई के चेयरमैन गजेंद्र चौहान बताते हैं कि किसी भी व्यक्ति की नियुक्ति के बाद उसकी परफार्मेंस देखनी चाहिए उसकी क्षमता देखनी चाहिए उसकी सर्विस देखनी चाहिए. उसकी एफीसिएंशी देखनी चाहिए और आपने ये डिसाइड कर दिया कि एक व्यक्ति में ये पद संभालने की काबलियत नहीं है. ये गलत है. मेरी काबलियत पर प्रश्नचिन्ह लगाना ही गलत बात है.

 

एफटीआईआई के छात्र अनिकेत ने कहा कि हमारी सीधी और सरल मांग ये है कि ऐसा व्यक्ति यहां नियुक्त किया जाए एज ए चेयरपर्सन. जो कि इस जगह से जुड़ा हुआ हो. यहां पर रहा हुआ हो. उसको इस जगह की चीजों के बारे में पता हो. और इस जगह को अच्छी तरह से चला सके. बस इससे ज्यादा हमारी मांग नहीं है.

 

गजेंद्र चौहान बताते हैं कि मिनिस्ट्री आफ इनफार्मेंश एंड ब्राडकॉस्टि ने डिसाइड किया है कि पुट मी देअऱ. तो बीजेपी में ऐसे कई लोग है जो बीजेपी के लिए काम भी कर रहे हैं और वो फिल्मी दुनिया से जुड़े भी रहे हैं. लेकिन उन सबमें से मुझे इस काम के लिए चुना गया तो इसके कई कारण हो सकते हैं. सिर्फ ये नहीं है कि मैं बीजेपी से हूं इसिलए मुझे वहां भेजा गया. मैं बीजेपी के लिए लंबे वक्त से काम करता रहा हूं.

 

एफटीटीआई के इस पूरे विवाद की जड़ में दरअसल वो कनेक्शन है जो गजेंद्र चौहान का बीजेपी के साथ साल 2004 में जुड़ा था. अभिनेता गजेंद्र चौहान ने साल 1985 में फिल्म ‘मैं चुप नहीं रहूंगी’ से बॉलीवुड के दरवाजे पर पहली बार दस्तक दी थी. 34 साल के अपने फिल्मी सफर में वो डेढ़ सौ से ज्यादा फिल्मों में काम कर चुके हैं. अभिनेता गजेंद्र चौहान ने यूं तो फिल्मी दुनिया में एक लंबी पारी खेली है लेकिन उनके खाते में एक भी बड़ी फिल्म दर्ज नहीं है. उन्होंने ज्यादातर सी ग्रेड फिल्मों में ही काम किया है. जैसे फिल्म रूपा रानी रामकली, खुली खिड़की, पुलिस स्टेशन, भयानक पंजा और जंगल लव जैसी सी ग्रेड फिल्मों में काम करने गजेंद्र चौहान को बॉलीवुड में कुछ बड़ी फिल्मों में भी काम करने का मौका मिला है. लेकिन बावजूद इसके उनकी किस्मत का सितारा कभी चमक नहीं सका और इसीलिए वो फिल्मों में छोटे मोटे रोल ही करते नजर भी आए हैं. 

एफटीआईआई के चेयरमैन गजेंद्र चौहान ने बताया कि जिस तरह से सचिन तेंदुलकर से कई रिकॉर्ड है उसी तरह कई रिकॉर्ड मेरे नाम से भी फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े रहे हैं. जिस तरह से टेलीविजन इंडस्ट्री में सबसे ज्यादा माइथोलाइजिकल सीरियल मेरे नाम है. या सबसे ज्यादा पायलट शूट करने का रिकॉर्ड भी मेरे नाम है. या सबसे ज्यादा एपीसोड करने का भी रिकॉर्ड. आज एक सीरियल था आज से पांच साल पहले करीब वो पांच साल तक इंडियन टेलीविजन पर चला. और उसके 817 एपीसोड एक वक्त मैंने किए थे. सीरियल का नाम- अपराजिता. ये दूरदर्शन पर नंबर वन रहा. वो चला काफी चला उसमें मेन रोल मेरा था. औऱ उस वक्त 817 एपीसोड मेरे नाम थे. अब तो खैर दूसरे लंबे सीरियल बनने लगे. लेकिन एक वक्त मैंने ये भी रिकॉर्ड कायम किया था.

 

फिल्मों के अलावा गजेंद्र चौहान ने 6 सौ से ज्यादा टीवी सीरियल में भी काम किया है लेकिन आज भी उन्हें युधिष्ठिर के उस किरदार के लिए ही पहचाना जाता है जिसे उन्होंने महाभारत सीरियल में निभाया था. 1988 में दूरदर्शन पर आने वाले बी आर चोपड़ा के इस मशहूर सीरियल ने उस वक्त बॉलीवुड के कई कलाकारों की किस्मत बदल कर रख दी थी जिनमें धर्मराज युद्धिष्ठिर की भूमिका निभाने वाले गजेंद्र चौहान भी शामिल थे. 

 

एफटीआईआई के चेयरमैन गजेंद्र चौहान बताते हैं कि मैं समझता हूं कि मैं बहुत सौभाग्यशाली हूं वो इमेज आज तक मेरे लिए काम कर रही है. क्योंकि हर एंगल से मेरी आइडेंटीफिकेशन के लिहाज से मेरी पहचान बनाती है. और मैं यह कह सकता हूं कि कलाकार जो होते हैं उनका अपना एक नाम होता है. एक नाम के कई लोग देश में हो सकते हैं लेकिन युद्धिष्ठिर शायद एक यूनिक नेम है. और वो मुझे करने के लिए मिला तो मैं अपने आप को सौभाग्यशाली समझता हूं. क्योंकि आइडेंटिफिकेशन कोई कलाकार अपनी सारी जिंदगी में नहीं पा पाता है. और मुझे मेरे करियर के शुरुवात में मिला.

 

90 के दशक के उस दौर में महाभारत सीरियल के कलाकार बेहद मशहूर हुए थे. यही वजह है कि गजेंद्र चौहान को भी देश- दुनिया में एक नई पहचान भी मिली थी और युधिष्ठिर के किरदार की उनकी वही पहचान आज तक कायम भी है. खास बात ये है कि जिन दिनों टीवी के परदे पर गजेंद्र चौहान शोहरत का आसमान चूम रहे थे उन्हीं दिनों उनकी जिंदगी में मोहब्बत भी परवान चढ रही थी.

 

गजेंद्र चौहान की पत्नी हबीबा रहमान एक डांस डायरेक्टर रही हैं लेकिन दिल्ली के रहने वाले गजेंद्र आईएएस अधिकारी बनना चाहते थे. पैरामेडिकल और हॉस्पिटल एडमिनिस्टरेशन का कोर्स करने के बाद उन्होंने सिविल सर्विसेस की तैयारी भी की थी लेकिन जब आईएएस बनने का उनका ख्वाब पूरा नहीं हो सका उन्होंने एक्टर बनने के लिए मुंबई की राह पकड़ ली थी. नब्बे के दशक की शुरुआत में गजेंद्र चौहान जब मुंबई के रोशना तनेजा एक्टिंग स्कूल में अभिनय करने की ट्रेनिंग ले रहे थे तब उनके साथ इसी इंस्टीट्यूट में अभिनेता गोविंदा, चंकी पांडे और गुलशन ग्रोवर भी अभिनय के गुर सीख रहे थे. बॉलीवुड में संघर्ष के उन दिनों में ही गजेंद्र चौहान की उनकी पत्नी हबीबा रहमान से पहली बार मुलाकात भी हुई खास बात ये है कि हबीबा और गजेंद्र की ये मुलाकात बिल्कुल फिल्मी अंदाज में हुई थी.

 

गजेंद्र चौहान बताते हैं कि हम दोनों पहली बार एक फ्लाइट में मिले थे बॉम्बे से दिल्ली जाती हुई फ्लाइट में और दोनों का सीट को लेकर बहुत झगड़ा हुआ था. गजेंद्र चौहान और हबीबा रहमान की ये लव स्टोरी भी इस मायने में अनूठी ही कही जाएगी क्योंकि बरसों पहले पेशा, रंग–रुप और मजहब अलग होने के बावजूद इन दोनों ने जीवन भर साथ चलने का फैसला कर लिया था. हांलाकि जिंदगी भर साथ निभाने का ये वादा निभाना इतना आसान भी नहीं था यही वजह है कि अपनी जिंदगी में हर कदम पर गजेंद्र और हबीबा को एक दूसरे के मजहब और रंग-रुप को लेकर दुनिया के तानों का सामना भी करना पड़ा.

 

एफटीआईआई के चेयरमैन गजेंद्र चौहान बताते हैं कि संवादों में ये कहना कि हिन्दू और मुस्लिम का खून एक है ये बड़ा आसान है. लेकिन इसको निभाना बड़ा मुशकिल है. आज भी कहीं न कहीं भिन्नताएं हैं. लेकिन इन धर्म के बीच की जो दीवार है उसको गिराने के लिए बहुत स्ट्रांग लोग चाहिए. हमने ये फैसला किया था कि हम लोगों को एक उदहारण पेश करना है दुनिया के लिए कि इस तरह के लोग भी एक साथ चल सकते हैं.

 

गजेंद्र चौहान की पत्नी हबीबा रहमान बताती हैं कि मेरे फ्रेंड्स में और मेरी फैमिली में भी यही था कि ये बड़ा खूबसूरत लड़का है हालांकि उस वक्त मैं भी जवानी के दौर पर थी नमकीन थी. मेरे भी बहुत आगे-पीछे लोग थे लेकिन ये था कि अगर शादी कर रही हूं तो हो सकता है कि 6 महीने में पैक-अप हो जाएगा. शूटिंग लैंगवेज में यानि खत्म हो जाएगा रिश्ता. ये था कि ये लड़का हबीबा को जिंदगी की सारी खुशियां दे देगा. लेकिन यही डर था कि ये खूबसूरत लड़का है कहीं छोड़ न दे. दुनिया के तानों से चाहे खूबसूरत लड़की हो या बदसूरत लड़का हो कोई बच नहीं पाता.

 

साल 1988 का ये वो वक्त था जब गजेंद्र चौहान बॉलीवुड में संघर्ष कर रहे थे लेकिन हबीबा रहमान डांस डायरेक्शन की फील्ड में नाम कमा चुकी थी. हवाई जहाज में हुई पहली मुलाकात के बाद इन दोनों के बीच उस दौरान मुलाकातों का एक सिलसिला भी चला और पांच साल तक एक दूसरे को डेट करने के बाद आखिरकार 22 जुलाई 1988 को गजेंद्र चौहान ने हबीबा रहमान के साथ ब्याह रचा लिया था.

 

गजेंद्र चौहान बताते हैं कि समाज अपना काम करता रहा. हम अपना काम करते रहे. इसमें मैं कहूंगा कि मेरे पेरेंट्स ने मुझे बहुत ताकत दी जिस दिन मैं पहली बार हबीबा को अपने पेरेंट्स से मिलाने ले गया, तो मैंने ये निश्चय किया था कि वहां पर सिर्फ चार लोग होंगे मेरे मम्मी पापा और हम दोनों और जो भी फैसला होगा वो हमें मंजूर होगा. फैसला तो हम लोग कर ही चुके थे लेकिन उनकी मंजूरी चाहिए थी. मेरे फादर ने एक बात बहुत खूबसूरत कही थी. इसको कहा था कि बेटा इस घर में शादी करके आ रही हो. जनाजा यहीं से निकलना चाहिए.

 

गजेंद्र चौहान की पत्नी हबीबा रहमान बताती हैं कि ये राजपूत घराने के और मैं सय्यद घराने की. बहुत ऊंचे लेवल के मुस्लिम. ये बहुत ऊंचे लेवल के हिन्दू यानि एकदम रॉयल टू रॉयल फाइट थी लेकिन ये था कि आप यकीन करें कि मेरी मां अभी जिंदा नहीं है. मेरे मम्मी-डैडी इनकी मेहनत से बहुत खुश होते थे और इनका एक लफ्ज था कि कभी हबीबा मुझे मालूम न पड़े कि तुमने मुझे सपोर्ट किया है.

 

हबीबा और गजेंद्र की शादी को 27 साल गुजर चुके हैं. एक-दूसरे का साथ हर हाल में निभाने का उनका वादा आज भी कायम है लेकिन इनकी इस प्रेम कहानी का एक पहलू ये भी है कि उनके बेटे को स्कूल में एडमिशन दिलाने के लिए भी उनको एक लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी है. 

 

एफटीआईआई के चेयरमैन गजेंद्र चौहान बताते हैं कि मैंने उसके स्कूल का जब फॉर्म भरा था तो मैंने उसमें जो कॉलम था रीलिजन का उसमें ह्यूमनिटी भरा था तो प्रिंसिपल ने ऑब्जेक्शन किया कि इस बेस पर हम एडमिशन नहीं दे सकते. तो मैंने कहा मैं कोर्ट जाऊंगा लेकिन आपको एडमिशन इसी बेस पर देना पड़ेगा. क्या ये जरुरी है कि हम एक बच्चों को जो नासमझ हैं अभी धर्म के विषय में उसको हम ये सिखाए कि तुम कौन से धर्म के हो. क्या ये बीज उसी वक्त बो दिया जाए उसके दिमाग में.

 

मोहब्बत के मैदान में लंबी पारी खेलने वाले गजेंद्र चौहान ने बॉलीवुड में भी एक लंबी पारी खेली है. भले ही फिल्मी दुनिया में वो कोई अहम मुकाम हासिल नहीं कर सके हो लेकिन बॉलीवुड में लंबे वक्त तक टिके रहने में वो जरुर कामयाब रहे है. बॉलीवुड की सिने एंड टीवी आर्टिस्ट एसोसिएशन से भी वो लंबे वक्त तक जुड़े रहे है और इस आधार पर भी गजेंद्र एफटीटीआई में चेयरमैन पद पर अपनी नियुक्ति को जायज ठहरा रहे हैं.

 

एफटीआईआई के चेयरमैन गजेंद्र चौहान बताते हैं कि अगर एडमिनिस्ट्रेशन की बात करेंग ेतो मैने  मुंबई की जो सिने एंड टीवी आर्टिस्ट एसोसिएशन है उसमें 20 साल गुजारे हैं जिंदगी के. और लास्ट प्रेसीडेंट भी था मैं. तो फिल्म इंडस्ट्री के भी एडमिनिस्ट्रेशन का मुझे बुहत सारा अनुभव है. तो मैं उस सारे अनुभव को लेकर फिल्म एंड टीवी इंस्टीट्यूट को एक नया रुप देने की कोशिश करुंगा. और आपकी जो भी समस्याएं है वो एक आदमी से मिले बगैर आप प्रोटेस्ट शुरु कर दे मुझे लगता है ये ठीक नहीं है.

 

पुणे कांग्रेस के जनरल सेक्रेटरी अमित बाबुल ने कहा कि यहां पर जो फिल्म इंस्टीट्यूट है. यहां पर अगर कोई बीजेपी या आरआरएस के लोग यहां पर आकर के? आरएसएस का संघ है यहां पर. हर जगह मोदी सरकार कॉलेज हो, हॉस्पिटल हो या कोई भी संस्था में उनके आरएसएस के लोग डाल रहे हैं. ये यहां पर कौन चाहिए? यहां पर जो स्टूडेंट पढ़ने आए है उन्हें मोदी का चेहरा दिखा रहे हैं क्या सभी को? इसके लिए हम यहां पर प्रोटेस्ट कर रहे है कि गजेन्द्र चौहान जो आरएसएस के और भाजपा के कार्यकर्ता है उनको हटाओ. और यहां पर जो सच्चा आदमी काम कर रहे हैं. इतने आर्टिस्ट हैं. इतने बड़े बड़े आर्टिस्ट हैं उनको लाओ यहां पर.

 

कैसे हुई थी बीजेपी में गजेंद्र चौहान की एंट्री?

 

साल 2004 में गजेंद्र चौहान ने क्रिकेटर नवजोत सिंह सिद्धू और अभिनेता सुरेश ओबरॉय के साथ बीजेपी का दामन थाम लिया था. गजेंद्र चौहान बीजेपी के संस्कृति विभाग के राष्ट्रीय कनवीनर भी रह चुके हैं और वो करीब 12 सालों से पार्टी के लिए चुनावों में स्टार प्रचारक की भूमिका भी निभाते रहे हैं.

 

भारतीय जनता पार्टी में एक लंबा वक्त गुजारने वाले गजेंद्र चौहान को पहली बार बीजेपी की सरकार की तरफ से एक बड़े पद पर बैठाया गया है लेकिन एफटीआईआई के चेयरमैन का जो अहम पद उन्हें मिला है उसके सामने विरोध की ऊंची दीवार भी खड़ी है.

 

पूर्व आप नेता योगेंद्र यादव बताते हैं कि सरकार आई है इसने देश की जो सर्वोच्च संस्थाए है. एकेडेमिक, कल्चरल, संस्थाएं. उनकी स्वायत्ता का हनन पहले से भी ज्यादा करना शुरु किया. ये पहली बार नहीं है कि जब हो रहा है. चाहे इंडियन काउंसिल आफ हिस्टोरिकल रिसर्च हो, चाहे यूजीसी हो, चाहे एनसीईआरटी हो, चाहे फिल्म डिवीजन हो, चाहे नेशनल म्यूजियम हो. तमाम संस्थाओं पर जिस तरह से. बेहतर लोगों को निकाल निकाल के, जिस किस्म के लोग बैठाए जा रहे हैं. वो सिर्फ राजनीतिकरण नहीं है. वो सिर्फ भगवाकरण नहीं है. वो सीधे – सीधे निम्मस्तरीयकरण है. वो डिग्रिडेशन है इन सब संस्थाओं का.

 

गजेंद्र चौहान बताते हैं कि एक संगठन होता है. औऱ एक सरकार होती है. तो ये संगठन का फैसला नहीं है मेरे अपाइंटमेट का ये भारत सरकार का फैसला है. ये सूचना एंव प्रसारण मंत्रायल का फैसला है कि मुझे वहां अपाइंटमेंट किया जाए. ये जरुर है कि मैं दो चीजों से जुड़ा हूं एक अभिनेता हूं कला क्षेत्र से जुड़ा हूं औऱ पार्टी से भी जुड़ा हूं. जब सरकारें बदलती हैं तो उन लोगों को जो पार्टी के लिए काम करते हैं. उन्हें कहीं ना कहीं उनकी कैपेबिल्टीज के आधार पर उनकी क्षमताओं के आधार पर उनको काम दिए जाते हैं. अब सरकार बन गई है अपनी तो हमें हमारे प्रोफेशन से जुड़ा हुआ काम दिया जाए. तो मैने आप्ट किया कि फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट मुझे दिया जाए.

 

फिल्म प्रशिक्षण के सबसे बेहतरीन संस्थान फिल्म एंड टेलीविजन इस्टीट्यूट आफ इंडिया की स्थापना 1961 में की गई थी. इस संस्थान का एक गौरवशाली इतिहास रहा है. यहां से प्रशिक्षण लेकर निकले कई लोग फिल्मी दुनिया में ऊंचा मुकाम हासिल करते रहे हैं. साठ और सत्तर के दशक में बॉलीवुड की कई दिग्गज हस्तियों ने यहां पढाई की है लेकिन गुजरते वक्त के साथ तकनीकी दौड़ में एफटीटीआई कही पीछे भी छूटता चला गया है और इसके पीछे साधनों की कमी सबसे बड़ी वजह है. ऐसा बताया जाता है कि एफटीआईआई के इतने बडे कैंपस में मात्र दो स्टूडियों, दो कैमरो औऱ एक लैस किट से ही काम चलाया जा रहा है. फिल्म औऱ टेलीविजन प्रोग्राम की एडिटिंग के लिए भी छात्रों को लंबा इंतजार करना पडता है. फिल्म प्रशिक्षण का प्रीमियर संस्थान होने के बावजूद अभी तक यहां पुराने दौर के कैमरे और इक्वीपमेंट ही इस्तेमाल हो रहे हैं. तकनीकी तौर पर अभी तक इसे एनालॉग सिस्टम से डिजिटल सिस्टम में अपग्रेड भी नहीं किया जा सका है यही वजह है कि छात्र पुरानी तकनीक और सीमित साधनों में ही पढाई करने के लिए मजबूर हैं. एफटीआईआई में डिप्लोमा और सर्टिफिकेट कोर्स में 132 सीटे हैं जबकि कैंपस में 400 छात्र मौजूद हैं. संस्थान के करीब आधे छात्र तीन साल के तय वक्त में अपना कोर्स पास करने में नाकाम रहे हैं. जाहिर है कि सिलेबस की खामियों, टीचरों की किल्लत और इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी की वजह से एफटीआईआई में पढ़ने वाले छात्रों का बैकलॉक बढता चला गया है. लेकिन इन सारी कमियों के बावजूद भी इस संस्थान की साख पर कभी सवाल खड़ा नहीं हुआ है.

 

एफटीआईआई स्टूडेंट यूनियन के अध्यक्ष हरिकृष्ण नाचिमुथु बताते हैं कि जीसी एक काउंसिल है उसका एक हेड होता है चेयरमैन. एफटीआईआई जैसी जगह पर जो पालिसी लेवल पर डिसीजन होते हैं. जो भी डिसीजन होगा वो चैयरमैन के हाथ में ही है. तो इसलिए कम्यूनिटी फेल्ट और जो आउटसाइड जो हमारे सीनियर्स हैं. जो एलुमिनाई है जो आर्टिस्ट है वो फील कर रहैं है कि एफटीआईआई जैसी जगह पर अभी तो बुहत सा ट्राजिशन फेस भी है डिजिटल ये सब चल रहा है. तो ऐसे बहुत सारे चेजेंज के बीच बहुत समझदार आदमी होना चाहिए कि वो इस जगह के कल्चर को समझ सके.

 

पिछले करीब 40 दिनों से एफटीआईआई के चेयरमैन पद पर गजेंद्र चौहान की  नियुक्ति का विरोध जारी है. एफटीआईआई के छात्रों, राजनीतिक दलों के अलावा एक के बाद एक बॉलीवुड की कई हस्तियां भी उनके विरोध में उतरती नजर आई है. रणबीर कपूर, रिषी कपूर, नवाजुद्दीन सिद्दीक, अनुपम खेर के अलावा बॉलीवुड के बजरंगी भाईजान सलमान खान ने भी गजेंद्र चौहान को रेड कार्ड दिखा दिया है.

 

कहते है कि जब समय का पहिया घूमता है तो किसी के लिए अच्छा तो किसी के लिए बुरा वक्त आता है लेकिन लगता है कि इन दिनों महाभारत के चर्चित किरदार युधिष्ठिर यानी गजेंद्र चौहान के लिए समय, अच्छा और बुरा एक ही वक्त में आ गया है.

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