FULL INFORMATION: घिर गए, यादव चक्रव्यूह कैसे तोड़ेंगे लालू?

By: | Last Updated: Friday, 4 September 2015 4:00 PM
FULL INFORMATION: Lalu Prasad Yadav politics in bihar

नई दिल्ली: बिहार विधानसभा चुनाव तय करेगा कि गोप का पोप यानि यादवों का नेता कौन होगा? दावेदार बहुत है लेकिन लालू यादव की राजनीति दांव पर है. जो कभी लालू की सेना का हिस्सा हुआ करते थे वो अब राजनीति के अखाड़े में उनके सामने खड़े हैं. बिहार विधानसभा चुनाव में यादवों का एक ऐसा चक्रव्यूह बन गया है जिसे बिना चुनाव लड़े ही लालू को जीतना है.

 

पिछले चुनाव में जनता ने लालू को जमीन पर ला दिया था. लेकिन बिहार में इस बार कुछ भी सीधा नहीं है बिहार की राजनीति के तमाम समीकरण बदल चुके हैं और सबसे ज्यादा बदलाव आया है लालू यादव के जातीय गणित में. लालू का वोट बैंक माने जाने वाले 16 फीसदी मुसलमान को छोड़ भी दें तो 13 फीसदी यादवों के बड़े वोट बैंक के दूसरे दावेदार मैदान में नजर आने हैं. ये लालू के अपने हैं जिनके चक्रव्यूह में फंसा हुआ महसूस कर रहे हैं लालू.

 

लालू के बिंदास अंदाज से उलट राजनीतिक हकीकत को समझने के लिए ये काफी है कि जिस नीतीश के विरोध की राजनीति का चेहरा थे लालू वही अब नीतीश के साथ महागठबंधन में और वो भी नीतीश को सीएम बनाने के लिए हामी भरने पर मजूबर हो चुके हैं.

 

लालू को इस यादव चक्रव्यूह को तोड़कर इस चुनाव में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करनी है क्योंकि इस बार लालू का सबकुछ दांव पर लगा है..

 

इस चक्रव्यूह में पहला चेहरा रामकृपाल यादव का है जो कभी लालू के बाद उनकी पार्टी में नंबर दो पर हुआ करते थे – अब बीजेपी की झोली में हैं. दूसरा चेहरा लालू के करीबी माने जाने वाले पप्पू यादव – अपनी अलग पार्टी बना चुके हैं. तीसरा चेहरा लालू के साले साधु यादव का है – अलग पार्टी के साथ तीसरा मोर्चा बनाने की कोशिश में हैं. और चौथा लालू का दाहिना हाथ माने जाने वाले रंजन यादव – लालू का साथ छोड़ जेडीयू गए थे लेकिन अब जेडीयू छोड़ लालू विरोधियों को मजबूत कर रहे हैं.

 

एक दौर था जब लालू के आगे यादव समाज का कोई नेता खड़ा नहीं हो पाता था. बिहार के मुस्लिम यादव यानि माय समीकरण पर लालू का एकछत्र राज हुआ करता था.

 

लेकिन इसके तेजी से बिखरने के सबूत पिछले लोकसभा चुनावों से ही मिलने लगे हैं. जब से लालू की पत्नी राबड़ी और बेटी मीसा भारती लोकसभा और विधानसभा का चुनाव हारी हैं तब से लालू के नेतृत्व पर सवाल उठ रहे हैं.

 

हाल ही में एमएलसी चुनाव के नतीज़ों ने लालू के वोट बैंक पर सवालिया निशान लगा दिए हैं. 24 सीटों पर हुए चुनाव में महागठबंधन को सिर्फ़ 10 सीटें ही मिलीं. लालू ने ताल ठोंकी कि वो सत्ताधारी नीतीश को को मिली दो सीटों से कहीं आगे हैं. लेकिन सच ये है कि बिना उनके वोट बैंक में सेंध लगे 14 सीटें उनसे नहीं छिन सकती थीं.

 

इसमें कोई दो राय नहीं है कि बिहार में लालू यादव ही यादवों के सबसे बड़े नेता हैं. लेकिन यादवों का वोट सिर्फ लालू यादव की पार्टी को ही मिलेगा ऐसा अब मुमकिन नहीं दिखता. क्योंकि इस यादव वोट के दावेदार लालू की राजनीति से निकले हैं और अब लालू को ही चुनौती दे रहे हैं.

 

पप्पू यादव को इस मुकाम तक पहुंचाने में लालू ने मदद की. ददन यादव को राबड़ी मंत्रिमंडल में लालू ने शामिल कराकर पहला मौका दिया था अब लालू के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं. रंजन यादव किसी ज़माने में डी-फ़ैक्टो सीएम हुआ करते थे.

साधु यादव लालू के जेल जाने के बाद राबड़ी के ज़रिए बिहार की सरकार चलाते थे. रामकृपाल यादव का पार्टी में लालू के बाद दूसरा स्थान था.

 

ये वो नाम हैं जो लालू के यादव वोट को छीनने में लगे हैं लेकिन क्या ये नेता लालू को उनके आधार वोट से अलग कर पाएंगे? वजहें मौजूद हैं. चारा घोटाले में सजा पाने के बाद लालू खुद चुनाव मैदान में उतर नहीं सकते. राबड़ी तमाम कोशिशों के बाद लालू की जगह ले नहीं पाई हैं. दूसरी पीढ़ी में बेटी मीसा लोकसभा चुनाव हार चुकी हैं और अब सारी उम्मीद बेटे तेजस्वी और तेजप्रताप है लेकिन अभी उनकी राजनीति से पर्दा उठना बाकी है.

 

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि लालू इन दिनों बुरे दौर से गुजर रहे हैं. लालू उस यादव जाति से आते हैं जो कभी हाशिये पर थी. बिहार में यादव जाति का मुख्य पेशा गाय–भैंस पालना और दूध बेचना माना जाता था. 1921 में मुंगेर के लख में ऊंची जाति और यादव समूह के बीच में लड़ाई हुई उस वक्त यादव जाति लाइमलाइट में आई. आजादी के बाद पहली बार यादव नेता के तौर पर रामलखन सिंह यादव उभरे. उन्हें शेरे बिहार तक की उपाधि दी गई .

 

लेकिन 90 के दशक में जब लालू यादव ने बिहार की कमान संभाली तो बाढ़ लोक सभा क्षेत्र से रामलखन यादव को हरा कर  बड़े नेता बन बैठे. तब लालू पिछ्ड़ों के नेता के तौर पर जाने गए लेकिन चारा घोटाला में नाम आने के बाद नीतीश ने पिछड़ों के वोट में सेंधमारी की और लालू के पास रह गया यादव वोट बैंक लेकिन वफादार.

 

1994 में लालू और नीतीश के बीच अनबन हुई और दोनों एक-दूसरे से अलग हो गए लेकिन लालू की ताकत बढ़ती गई. 1995 में तो लालू ने कमाल कर दिया अपनी बदौलत सरकार बना ली. लालू ने अपने यादव वोट बैंक के साथ मुसलमान वोट को जोड़ लिया जिससे लालू की ताकत दोगुनी हो गई.

 

आंकड़ों पर गौर करें तो लालू राबड़ी के कार्यकाल में बिहार की राजनीति पर यादवों का साम्राज्य कायम था.

 

लालू जब पहली बार वर्ष 1990 में बिहार के मुख्यमंत्री बने, तब बिहार में यादव विधायकों की संख्या 63 थी. लालू जब राजनीति के शिखर पर थे, 1995 में ये संख्या बढकर 86 तक पहुंच गई. 2000 में ये संख्या 64 थी लेकिन साल 2005 के बाद ये आंकड़ा घटने लगा. 2005 में 54 और 2010 में 39 ही रह गया.

 

मौजूदा वक्त में 39 विधायक यादव जाति के हैं जिसमें 19 विधायक जेडीयू से और 8 विधायक बीजेपी से हैं. हालांकि लालू की पार्टी आरजेडी के 22 उम्मीदवार ही जीते पर उनमें से दस विधायक यादव जाति के थे.

 

2004 के लोक सभा चुनाव में जीत तो मिली पर ये जीत आखिरी जीत साबित हुई. 2005 के विधान सभा चुनाव में लालू ना सिर्फ़ बिहार की सत्ता से बाहर हो गए बल्कि हर चुनाव में उनकी ताकत घटती चली गई. सवाल ये उठता है कि लालू की पार्टी साल दर साल लोक सभा चुनाव हारते जा रही है.

 

राजनीतिक वजूद बचाने के लिए लालू ने इस चुनाव में नीतीश कुमार से हाथ मिलाया है. जिस दिन मुलायम सिंह यादव ने नीतीश कुमार का नाम मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार को तौर पर घोषित किया उस दिन लालू ने जहर पीने वाला बयान देकर जाहिर कर दिया था कि इस वक्त वो कितने मजबूर हो चुके हैं.

 

अब लालू के इसी जहर वाले बयान के जरिये पीएम नरेंद्र मोदी ने मुजफ्फरपुर की रैली में यदुवंशियों पर डोरे डाले हैं.

 

पिछले साल लोकसभा चुनाव से पहले भी पटना की रैली में पीएम ने यदुवंशियों से अपना रिश्ता जोड़कर लालू के वोट पर चोट की थी. लालू को भी इस चुनाव में अपनी जातीय ताकत पर ही भरोसा दिख रहा है. तभी तो जातीय जनगणना के आंकड़े जारी करने के बहाने उन्होंने जाति की राजनीति को हवा दे दी है.

 

तो क्या लालू की जातिगत ताकत खत्म हो रही है. हालांकि लालू इस बात को नहीं मानते उसका सुबूत है ये. जब लालू ने बिहार में मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर दिल्ली में नीतीश कुमार के नाम का ऐलान किया था उसके दूसरे दिन पटना में एक प्रेस कॉनफ्रेंस के दौरान एक पत्रकार ने यादव वोट पर पकड़ को लेकर सवाल किया. लालू इतने भड़के कि उस पत्रकार को घर से बाहर निकालने का फ़रमान ज़ारी कर दिया था लालू का गुस्सा जाहिर करता है कि चुनौती कितनी बड़ी है?

 

बीजेपी की इस बार नीतीश के वोट बैंक पर नज़र तो है ही उसकी कोशिश लालू के वोट को बिखरा देने की ज़्यादा है. तीन बड़े फैसले इसकी मिसाल हैं. नंदकिशोर यादव को नेता प्रतिपक्ष बनाना. बिहार के प्रभारी की कुर्सी से पेट्रोलियम राज्य मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को हटा कर भूपेंद्र यादव को प्रभारी बनाना. और मोदी मंत्रिमंडल में लालू के दाहिने हाथ माने जाने वाले रामकृपाल यादव को मंत्री बनाना.

 

सबसे पहले बात करते हैं रामकृपाल यादव की. जो पाटलिपुत्र से टिकट मीसा भारती को दिए जाने के खिलाफ बीजेपी में शामिल हो गए थे लेकिन यादव वोटबैंक में सेंध लगाने वाले रामकृपाल अकेले नहीं हैं.

 

हुकुमदेव और नित्यानंद राय भी हैं. हुकुमदेव के इलाके में लोकसभा चुनाव के वक्त हिंदू-मुस्लिम वाला फैक्टर प्रभावी था. विधानसभा में भी इसका असर दिख सकता है. जिसका नुकसान लालू को ही उठाना होगा.

 

पप्पू यादव

कोसी इलाके में पप्पू यादव जो भी नुकसान करेंगे वो नुकसान लालू के वोट बैंक का ही होगा. हां पप्पू अब पहले जितना प्रभावी नहीं रहे लेकिन उनका प्रभाव बहुत कम भी नहीं हुआ है. अलग अलग पार्टियों से पति-पत्नी दोनों सांसद हैं.

 

कोसी और पूर्णिया के इलाके में विधानसभा की कुल 37 सीटें हैं. इन 37 सीटों में से जेडीयू और बीजेपी के पास 2010 में 14-14 सीटें थी.

 

रोम पोप का और मधेपुरा गोप का. इस इलाके में ये कहावत प्रचलित है. लेकिन कोसी की जिन 13 सीटों में से 5 सीटों पर यादव उम्मीदवारों की जीत हुई थी उनमें से 4 जेडीयू के खाते में गई थी. इस इलाके में कई ऐसी सीटें हैं जहां यादव वोटर और नीतीश के समर्थकों के बीच हिंसक राजनीतिक रिश्ता रहा है. ऐसी सीटों पर कौन किसके साथ रहेगा कह पाना मुश्किल है.

 

पप्पू यादव तब भी लालू के साथ नहीं थे और अब भी नहीं हैं. लेकिन फर्क इतना है कि तब पप्पू हत्या के दोषी होकर जेल में बंद थे. अब बरी होकर सांसद बन चुके हैं और अब जन क्रांति अधिकार मोर्चा बनाकर राजनीति कर रहे हैं.

 

पप्पू चाहते थे कि लालू उन्हें बिहार चुनाव में अपना राजनीतिक वारिस बनाकर पेश करें. लेकिन लालू इसके लिए राजी नहीं थे. लालू पार्टी को पारिवारिक पार्टी बनाकर रखना चाहते हैं. पप्पू को लग गया कि राजनीतिक महत्वकांक्षा यहां पूरी नहीं हो सकती तो समय रहते उन्होंने रास्ता अलग कर लिया.

 

साधु यादव

 

बिहार की राजनीति में विरोधी लालू को आज जिस जंगल राज का प्रतीक मानते हैं. उस जंगल राज तक लालू को पहुंचाने में उनके सालों का अहम योगदान रहा है. खासकर छोटे साले साधु यादव का. अब तो कहावत बन चुकी है कि लालू की बड़ी बेटी की शादी में साधु ने पटना के शो रूम से कार से लेकर सोफा तक उठवा लाए थे.

 

2005 में जब लालू की सत्ता चली गई तो आग पर पड़े पानी की तरह साधु यादव भी शांत हो गए. लेकिन उनकी राजनीतिक महत्वकांक्षा कम नहीं हुई है. जीजा लालू के सहारे सांसद बन चुके साधु यादव 2009 में कांग्रेस के टिकट पर लड़कर हार गए. 2014 के चुनाव से पहले गुजरात जाकर मोदी के घर चाय नाश्ता कर आए. हंगामा मचा तो बीजेपी ने दरवाजा बंद कर लिया.

 

अब कोई दरबार बाकी नहीं रह गया था तो अपनी पार्टी बनाकर ही किस्मत आजमाने उतर गए हैं. गरीब जनता दल सेक्यूलर के जरिये तीसरा मोर्चा तैयार कर रहे है. सारण के इलाके में साधु यादव लालू की परेशानी बढ़ा सकते हैं लालू के गृह जिला गोपालगंज में साधु यादव का अब भी प्रभाव है. इसलिए साधु भले ही किसी उम्मीदवार को जिता नहीं पाए लेकिन जो पांच सौ- हजार वोटों का नुकसान करेंगे वो अपने जीजा के खजाने से ही करेंगे.

 

लालू यादव के साथ दिक्कत ये है कि वो खुद चुनाव लड़ नहीं सकते. परिवार में अभी बेटे राजनीतिक दांव पेंच के लिए मजबूत नहीं हुए हैं. पत्नी और बेटियां भी मोर्चा संभालने के लिए इस माहौल में फिट नहीं हो रहीं इसीलिए मुख्यमंत्री के लिए उन्हें नीतीश के नाम पर राजी होना पड़ा.

 

एबीपी न्यूज और नीलसन के ओपिनियन पोल के आंकड़े को देखें तो नीतीश से दोस्ती करके लालू बिहार की राजनीति में जबरदस्त वापसी कर रहे हैं. दोनों के मिलकर चुनाव लड़ने की सूरत में गठबंधन को 129 सीटों पर जीत मिल रही है जबकि एनडीए का आंकड़ा 112 पर रुक जा रहा है.

 

बिहार में यादव वोटरों की संख्या करीब 13 फीसदी है. बीते साल लोकसभा चुनाव में करीब 20 फीसदी यादवों ने बीजेपी को वोट दिया था. बीजेपी से 4, आरजेडी से 2, कांग्रेस से 1 यादव जाति के सांसद बने.

 

अब तक जनता दल सेक्यूलर की राजनीति करने वाले ददन यादव भी लालू की ही खोज है लेकिन इस चुनाव में भी ददन यादव भी भोजपुर के आरा-बक्सर वाले इलाके में लालू यादव की परेशानी बढ़ाएंगे.

 

रंजन यादव वैसे तो कोई जनाधार वाले नेता नहीं हैं लेकिन पाटलिपुत्र से पांच साल तक सांसद रहने के बाद कुछ तो प्रभाव बना ही रखा है लिहाजा रंजन यादव के कहने पर जो भी यादव वोट किसी को और मिलेगा वो लालू यादव को भी नुकसान पहुंचाएगा.

 

इस बार बिहार में कोई यादव नेता मुख्यमंत्री की रेस में नहीं है. नीतीश के सीएम उम्मीदवार बनाने के साथ ही पप्पू, साधु सहित और भी कई कारण हैं जो यादव वोटरों को साथ नहीं रहने पर मजबूर कर रहा है. सबसे बडी दिक्कत वोट ट्रांसफर की है. नीतीश का वोट लालू की पार्टी को ट्रांसफर हो जाएगा. लेकिन लालू के लिए यादवों का वोट नीतीश के उम्मीदवार को पूरी तरह से ट्रांसफर हो सकेगा इसमें शक है.

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