व्यक्ति विशेष: क्या हिंदुओं का दुश्मन था औरंगजेब?

By: | Last Updated: Saturday, 5 September 2015 12:21 PM
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हिमालय मेरी सरहदों का निगेहबान है. और गंगा मेरी पवित्रता की सौगंध. इतिहास के आगाज से अंधेरों और उजालों का साथी रहा हूं मैं. मेरे जिस्म पर संगमरमर की चादरों से लिपटी हुई ये खूबसूरत इमारतें गवाह हैं कि जालिमों ने मुझे लूटा और मोहब्बत करने वालों ने मुझे संवारा है. नादानों ने मुझे जंजीरें पहनाई और मेरे चाहने वालों ने उन्हें काट फेंका है. मोहब्बत और नफरत के कई पड़ावो से होकर मेरा काफिला गुजरा है. जंग और जुनून के कई दौर देखे है मैंने. कई बादशाहों के मुस्तकबिल मेरे सामने बने और कई शहंशहों के वजूद  मेरी नजरों के आगे मिट गए. और ऐसा ही एक बादशाह था अबुल मुजफ्फर मोईउद्दीन मुहम्मद औरंगजेब आलमगीर. मुगल साम्राज्य का सबसे ताकतवर बादशाह औरंगजेब इतिहास के पन्नों में दर्ज एक ऐसा शासक है जिसकी हुकूमत के किस्से सदियों बाद एक बार फिर फिजाओं में गूंज रहे हैं.

 

औरंगजेब पर लगे इल्जामों की फेहरिस्त यूं तो काफी लंबी है लेकिन वो एक ऐसा बादशाह भी था जिसने हिन्दुस्तान की सरहदों को नई मंजिले दी. हिन्दुस्तान पर 48 बरस हुकूमत करने वाले औरंगजेब ने अफगानिस्तान से लेकर दक्षिण भारत तक मुगल साम्राज्य का विस्तार किया और अपने पीछे छोड़ गया एक नया और विशाल हिंदुस्तान. औरंगजेब की मौत को अब करीब तीन सौ साल गुजर चुके हैं लेकिन एक बार फिर उसके नाम पर छिड़ एक नया विवाद छिड़ गया है.

 

राजधानी दिल्ली का लुटियन जोन जहां केंद्र सरकार के मंत्रियों से लेकर बड़े सरकारी अधिकारियों के घर और दफ्तर बने है. इसी लुटियन जोन में देश की संसद और राष्ट्रपति भवन भी मौजूद है. और लुटियन जोन्स में बनी शानदार सड़क औरंगजेब रोड. लेकिन अब आने वाले दिनों में इस सड़क को औरंगजेब रोड नहीं बल्कि एपीजे अब्दुल कलाम रोड के नाम से जाना जाएगा.

 

राजधानी दिल्ली की पहचान इंडिया गेट से निकलने वाली 6 सड़कों में से एक औरंगजेब रोड है लेकिन इसका नाम बदल कर अब एपीजे अब्दुल कलाम रोड कर दिया गया है. गौरतलब है कि पिछले महीने ही पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम का निधन हुआ था और इसके बाद पूर्वी दिल्ली से बीजेपी के सांसद महेश गिरि ने सड़क का नाम बदलने के लिए चिट्ठी लिखी थी. उन्होंने अपनी चिट्ठी में इतिहास की गलतियों को सुधारने की बात कही थी. नई दिल्ली महानगर पालिका ने इसके लिए अपनी काउंसिल की बैठक बुलाई थी जिसमें औरंगजेब रोड का नाम बदलने के प्रस्ताव पर मुहर लगा दी गई.

 

मुगल बादशाह औरंगजेब का नाम बदलने की मांग के पीछे तर्क दिया गया है कि चूंकि वह दमनकारी और क्रूर था और अत्याचारों में लिप्त था. उसके नामकरण से भावी पीढ़ियों में गलत संदेश जाएगा. और एपीजे अब्दुल कलाम के सम्मान में सड़क का नाम बदलने से इतिहास की एक गलती को सही में बदला जा सकेगा. लेकिन सड़क का नाम बदलने के एमडीएमसी के इस फैसले के बाद इसको लेकर एक नया विवाद भी खड़ा हो गया है.

 

मुगल बादशाह औरंगजेब को लेकर विवादों की जड़े काफी गहरी रही है. आखिर कैसा था औरंगजेब और क्या थी उसकी शख्सियत कि उसके मरने के तीन सौ साल बाद आज भी उसके नाम को लेकर विवाद छिड़ा हुआ है. क्यों उसके किस्से और कहानियां कथित तौर पर लोगों की भावनाओं को झकझोर रहे है. इसीलिए ये जानना जरुरी है कि आखिर कैसा था मुगल बादशाह औरंगजेब.

 

इतिहासकार इरफान हबीब से सवाल – टोपी सिलकर गुजारा करता था क्या औरंगजेब – जवाब – गलत है ये सब. ये ऐसी ही उड़ाई हुई है. इसमें कोई शक नहीं कि मेहनती था बहुत काम बहुत करता था. ऐश वगैरह ज्यादा नहीं करता था. कागजात हमेशा खुद देखता था. इसके जो कागज है वो हमे मिलते हैं. जिनसे मालूम होता है कि काम ये बहुत करता था. फिर अपने बेटे को लिखता है कि जब ऐलोरा से गुजरो तो एलोरा जरुर देखना. ऐलोरा आप जानते है सब मूर्तियां है वहां. अपने बेटे से कह रहा है उसके लिए उसने एक फारसी लफ्ज भी इस्तेमाल किया है. ये मजहरे इलाही है मतलब इसको अंग्रेजी में कहते है डिवाइन वंडर है ये. खुदा की देन है ये. तो आप कहे कि एक मुसलमान अपने एक बेटे से कह रहा है कि जा के बुतों को देखो जाके मूर्तियों को देखो तो. तो आजकल के तो जो तालिबान वगैरह हैं जिन्होने महात्मा बुद्ध की इतनी बड़ी मूर्ति जला दी. वो तो कभी समझ ही नहीं सकते कि कोई मुसलमान कहेगा कि अपने बेटे से कि जाके एलोरा जरुर देखना. तो ऐलोरा की किसी मूर्ति को हाथ नहीं लगाया उन्होंने. वैसी ही है तो दोनों रुख है.

 

औरंगजेब सन 1658 में हिन्दुस्तान का बादशाह बना था लेकिन मुगलों की ये दस्तान सैकड़ों बरस पुरानी है. साल 1526 से लेकर 1857 तक हिन्दुस्तान की सरजमीन पर मुगलों की हुकूमत रही है. मुगल बादशाह बाबर ने भारत में मुगल साम्राज्य की नींव रखी थी. बाबर का बेटा हुमायूं भी बादशाह बना और उसका बेटा अकबर भारतीय इतिहास में एक महान शासक के तौर पर दर्ज हुआ. अकबर ने 1556 से लेकर 1605 के बीच करीब पचास सालों तक भारत के एक बड़े हिस्से पर हुकूमत की है. अकबर के बाद उसका बेटा सलीम जहांगीर हिंदुस्तान के तख्त पर बैठा और जहांगीर के बाद उसके बेटे शाहजहां ने मुगलिया सलतनत की बागडोर संभाली थी.

 

दुनिया को मोहब्बत की निशानी, ताज महल देने वाले मुगल बादशाह शाहजहां का दौरे हुकूमत हिन्दुस्तान के इतिहास में सुनहरे लफ्जों में दर्ज हुआ है लेकिन शाहजहां का ये दौर भी उस वक्त थम गया जब उसके बेटे और मुगल शहजादे औरंगजेब ने मुगलिया हुकूमत के खिलाफ ही बगावत का परचम बुलंद कर दिया था.

 

सन 1658 में औरंगजेब हिन्दुस्तान के तख्त पर बैठा था. इतिहास गवाह है कि उसने बादशाहत का ताज अपने भाइयों और रिश्तेदारों का खून बहा कर हासिल किया था. औरंगजेब की इस दास्तान को लेकर भी जो सवाल खड़े होते रहे है उन सारे सवालों के जवाब भी हम तलाशेंगे आगे. लेकिन औरंगजेब की इस दास्तान से पहले कहानी सुनिए औरंगजेब रोड की.  

 

दिल्ली के जिस लुटियन जोन्स इलाके में औरंगजेब रोड बनी है ये पूरा इलाका नई दिल्ली के नाम से जाना जाता है और इस इलाके को आज से करीब 104 साल पहले यानी साल 1911 में ब्रिटिश हुकूमत के दौर में बनाया और बसाया गया था. अंग्रेजों ने अपने लिए उस दौर में जब नई दिल्ली को बसाया था तब दिल्ली पर हुकूमत कर चुके हर शासक को उन्होंने याद रखा था.

 

नई दिल्ली का लुटियन जोन इलाका जब बनकर तैयार हुआ था तब यहां की सड़कों चौराहों और इमारतों के नाम अंग्रेज अफसरों और शासकों ही नहीं बल्कि भारतीय हुक्मरानों के नाम पर भी रखे गए थे.

 

268 से 232 ईसा पूर्व मौर्य वंश के शासक अशोक मौर्य के नाम पर सड़क का नाम रखा गया. 12 वीं सदी के हिंदू शासक पृथ्वीराज चौहान, 1325 से 1351 तक शासन करने वाले तुगलक वंश के मुहम्मद बिन तुगलक और 1540 से 1545 के बीच महज 5 साल शासन करने वाले शेरशाह सूरी तक के नाम पर लुटियन जोन्स में सड़क के नाम रखे गए. 1526 में बाबर से मात खाने वाले लोधी वंश के आखिरी सुल्तान इब्राहिम लोधी के नाम पर भी सड़क का नाम रखा गया.

 

इतिहासकार इऱफान हबीब बताते हैं कि ब्रिटिश सरकार ने ये फैसले किए और शासकों के नाम पर रोड रखे. इतिहास नहीं बदलता नाम बदलने से.

 

खास बात ये है कि अंग्रेजों ने सत्ता के लिए मुगलों से सीधी लड़ाई लड़ी थी लेकिन उन्होंने दिल्ली की पहचान से जुड़े मुगल बादशाहों के नाम से भी परहेज नहीं किया और 1526 से 1530 के बीच पहले मुगल बादशाह बाबर, दूसरे मुगल बादशाह हुमायूं और तीसरे मुगल बादशाह अकबर के नाम पर सड़कों के नाम रखे गए. मुगल बादशाह शाहजहां और उसके बेटे औरंगजेब के नाम पर भी लुटियन जोन इलाके में सड़कों के नाम रखे गए थे. लेकिन अब औरंगजेब का नाम हटा कर पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के नाम पर सड़क का नाम रखने से एक नया विवाद और एक नई बहस भी शुरु हो गई.

 

आरएसएस विचारक संदीप महापात्र बताते हैं कि औरंगजेब ने अपने शासनकाल में बहुत लोगों की हत्याऐं की, बहुत लोगों को निर्ममता से प्रताड़ित किया, बहुत सारे मंदिरों को तोड़ा जैसा कि मैनें कहा तो इतिहास गवाह है कि औरंगजेब किस तरह के शासक थे, ये हमारे टेक्सटबुक में भी लिखा है. जब एनसीआरटी की टेक्सटबुक जो सो कॉल्ड इमीनेन्ट हिस्टोरियन ने लिखा है कि औरंगजेब एक कम्युनल शासक थे अगर ये सत्य है तो ये कहां का नियम है कि उसके नाम पे भारत जो कि एक सेक्यूलर स्टेट है, सेक्यूलर नेशन है उसके नाम पे और दिल्ली जो कि भारत की राजधानी है वहां पे एक रास्ते का नाम हो.

 

पत्रकार पवन खेड़ा बताते हैं कि ये जो आरएसएस और संघ परिवार और बीजेपी के लोग हैं या इस मानसिकता के लोग है ये पिछले 200 सालों के इतिहास की बात क्यों नहीं करते जब अंग्रेजों का शासन था और जहां इनका कोई रोल नहीं था एक व्यक्ति का नाम बता दीजिए जिसनें अंग्रेजों से लड़ाई लड़ी हो संघ परिवार का या फिर इस मानसिकता का हिस्सा हो ये उसे भूल कर पूरा ब्रिटिश शासन को भूलकर सीधा मुसलमानों पर क्यों जाते हैं क्योंकि आज ही उन्हें उपयोगी करता है क्योंकि आज वो पोलराइज करना चाहते है ये लोग कई सालों से प्रयास कर रहें है कि औरंगजेब को पुराने विलेन्स बनाए आज नए विलेन्स तो हैं ही पुराने भी बनाएं जिनको आधार बनाकर ये डिवाइड करते रहें समाज को और ये इनकी बहुत पुरानी पंरपरा रही है.

 

दिल्ली के लुटियन जोन में सड़कों के नाम बदलने का ये मौका पहला नहीं है इससे पहले संसद भवन, राष्ट्रपति भवन से लेकर कर्जन रोड समेत उन कुछ सड़कों के नाम भी बदले जा चुके हैं जो अंग्रेज शासकों के नाम पर रखे गए थे लेकिन अंग्रेजों से जुड़ी निशानियों का नाम बदलने का ये सिलसिला अब मुगल शासकों तक आ पहुंचा है. औरंगजेब पहला ऐसा मुगल शासक है जिसकी धार्मिक कट्टरता की कहानियों का सहारा लेकर अब ऐतिहासिक भूल सूधारने की बातें की जा रही है.

 

आऱएसएस विचारक राकेश सिन्हा बताते हैं कि औरंगजेब को अगर याद किया जाएगा तो क्रूरता के लिए किया जाएगा , पंथनिरपेक्षता को ध्वस्त करने के लिए किया जाएगा, और सबसे बड़ी बात है उसने भारतीय जीवन मूल्य को ध्वस्त करने का काम किया है. सिर्फ चार मंदिर तोड़ता तो उसे माफ कर दिया जाता, सिर्फ जजिया कर लगाता तो माफ कर दिया जाता, वो पूरे भारत की परिभाषा को बदलना चाहता था लेकिन भारत में इतनी ताकत थी, हिंदू समाज में इतनी ताकत थी, इतना आंतरिक बल था कि औरंगजेब ऐसा नहीं कर पाया.

 

वरिष्ठ पत्रकार पवन खेड़ा बताते हैं कि कहा जाता है कि जजिया लगा दिया. उन्होंने कब लगाया उन्होंने बनने के 21 साल बाद मुसलमानों पर कितने टैक्स लगाए थे. हिंदुओं पर कितना टैक्स लगाए थे. तो क्या आप उसको कहेंगे एंटी हिंदू या क्या कहेंगे ये प्रश्न है न मेरे पास उत्तर हैं और न ही शायद और लोगों के पास उत्तर होगे. लेकिन ये डिबेट्स बिल्कुल होनी चाहिए और डिबेट्स इतिहास के बारे में भी होनी चाहिए लेकिन उसका इस तरह से राजनीतिकरण कर देना कि आज के मुसलमानों को आप कोई मैसेज देना चाह रहें हैं वो मुझे बिल्कुल मंजूर नहीं है. अगर औरंगजेब क्रूर शासक था उसने अगर हिंदुओं का कंवर्ट किया बहुत लोगों को मारे तो अशोक ने क्या किया अशोक ने बुद्धिस्त बनाया हिंदुओं को और जैनिज को कितने तिर्थांकरों को मारा कंवर्ट भी किया मारा भी बीजेपी का कार्यालय को अशोक मार्ग पर है क्यों नहीं उसका नाम बदल देते हैं.

 

मुगल बादशाह औरंगजेब के पक्ष और विपक्ष में तमाम तर्क मौजूद है. लेकिन यहां अहम सवाल ये है कि महज एक सड़क पर लगे बोर्ड से औरंगजेब का नाम मिटा देने से क्या वो इतिहास भी बदला जा सकता है जिसमें 48 साल लंबा औरंगजेब की हूकूमत का दौर भी दर्ज है. आखिर ऐसे बदलाव से हम क्या हासिल करना चाहते हैं? इस बारे में सोचिएगा जरुर.

 

इतिहास में दर्ज 1525 वो तारीख है जब बाबर ने हिन्दुस्तान में मुगलिया हुकूमत की नींव रखी थी लेकिन मुगल साम्राज्य की सरहदों को सबसे ज्यादा विस्तार औरंगजेब आलमगीर के दौरे हुकूमत में मिला. औरंगजेब 17 वीं सदी का 6 वां मुगल शासक हुआ है जिसने करीब 48 सालों तक भारतीय उपमहाद्वीप पर राज किया है. बीजापुर औऱ गोलकुंडा जैसी ताकतवर मुस्लिम रियासतों के अलावा मराठों को जंग में शिकस्त देकर औरंगजेब ने दक्षिण भारत तक मुगल सलतनत विस्तार किया था. औरंगजेब की हुकूमत में केरल औऱ आसाम के कुछ हिस्सों को छोड़ कर अफगानिस्तान से लेकर दक्षिण भारत तक और गुजरात से लेकर आसाम तक मुगल साम्राज्य फैला हुआ था. जाहिर है भारत को राजनैतिक तौर पर एक करने में औरंगजेब के अहम योगदान से कोई भी इंकार नहीं कर सकता है.

 

इतिहासकार इरफान हबीब बताते हैं कि इतनी देर तक मुगल सल्तन पर हकूमत की . दूसरे उसने मुगलिया सल्तन में पूरे हिन्दुस्तान को शामिल कर लिया. राजकुमारी तक उसकी हुकूमत हो गई थी. तो अगर आप कभी भी देखे हिन्दुस्तान के नक्शे पर तो मोर्या के बाद पहली दफा ऐसा हुआ है मोर्यों के पास भी राजकुमारी तक नहीं था. साउथ नहीं था उनके पास. इनके पास पूरी थी. पहला ऐसा बादशाह है जिसके पास पूरा भारत हो. तो इतिहास में यही है उसके लिए कि उसने तो आप औरंगजेब को भूल जाते हैं लेकिन मुगल एंपरर का ये याद रहा है कि अगर कोई बादशाह हुआ है तो वो मुगल था. तो पेशवा भी मुगल बादशाह से लेते थे कि हम वकीलउल सल्तनत हैं. बडे वजीर हैं. जबकि वो इनका पेनशनर था. तो इसीलिए की उसके होने से ये अंदाजा होता था कि भारत एक देश है. उसका हमारे पास डिप्लोमा होगा तो हम पूरे भारत पर क्लेम कर सकते हैं. ये आइडिया तो हिन्दुस्तान में रहा कि हिन्दुस्तान एक देश है. एक इसकी हुकूमत है एक बादशाह है.

 

मुगलिया हुकूमत को उसके शिखर पर पहुंचाने वाले बादशाह औऱंगजेब को लेकर इतिहास में तमाम तरह की बातें दर्ज है. औरंगजेब को लेकर ये बात भी दर्ज है कि उसने हिंदुओं पर जजिया कर लगाया था. औरंगजेब पर सबसे बड़ा इल्जाम ये भी लगाया जाता है कि उसने अपनी हुकूमत में हिंदुओं पर अत्याचार किए और बडी तादाद में हिंदू मंदिरों को तोड़ दिया था. औरंगजेब पर दूसरा बडा इल्जाम ये भी लगाया जाता है कि वो महजबी तौर पर कट्टरपंथी था और उसकी हुकूमत में हिंदुओं और सिखों का जबरन धर्मपरिवर्तन कराया गया. सिखों के नवे गुरु, गुरु तेगबहादुर को कत्ल करने का इल्जाम भी औरंगजेब के सिर पर ही है. औरंगजेब की एक क्रूर शासक के तौर पर छवि इसलिए भी बनी क्योंकि उसने सत्ता हासिल करने के लिए जहां अपने भाइयों दारा शिकोह और शाह शुजा को कत्ल करा दिया वहीं अपने पिता शाहजहां को भी कैद कर लिया था. इतिहास में ये भी दर्ज है कि अपने जिस भाई मुराद बख्श के साथ मिल कर औरंगजेब ने शाहजहां के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंका था, सत्ता हासिल करने के बाद उसने मुरादबख्श को भी कत्ल करा दिया था.  

 

इतिहासकार इरफान हबीब बताते हैं कि मुरादबख्श इसके छोटे भाई के साथ मिलकर बगावत की तो शाहजहां का ये प्राबल्म था कि ये तो दोनों बेटे थे वो इनको मारना तो नहीं चाहता था लेकिन जसवंत सिंह को भेजा जसवंत सिंह लड़ाई में हार गए. उसके बाद समूह गढ़ की लड़ाई हुई जिसमें दादा शिकोह हार गया. तो फिर इन्होंने शाहजहां को कैद कर लिया. लेकिन कैद में तो रखा ही कोई तकलीफ से नहीं रखा लेकिन कैद में तो रखा. आगरा किला तकरीबन शाहजहां के पास रहा. आगरा राजधानी थी तो ये दिल्ली में ही रहे और जब शाहजहां का इंतकाल हो गया तब औरंगजेब आगरा आए. फिर वहीं से राज करने लगे.

 

औरंगजेब ने अपने पिता शाहजहां को नजरबंद करके अपनी हूकूमत की शुरुआत की थी इतिहासकारों के मुताबिक शाहजहां ने साफ तरीके से ये जाहिर कर दिया था कि उसका वलीअहद यानी उत्तराधिकारी बड़ा बेटा दारा शिकोह है लेकिन जंग और राजनीति के मैदान में दारा शिकोह का तजुर्बा जहां कम था वहीं उसके मुकाबले में खड़ा औरंगजेब इन दोनों चीजों में माहिर था.

 

मई 1658 को आगरा से करीब आठ मील दूर समूहगढ़ में औरंगजेब और मुरादबख्श की फौजों का मुकाबला शाहजहां की शाही फौज से हुआ था. इस जंग में दाराशिकोह के पास पचास हजार फौजी थे तो वही औरंगजेब के पास कोई चालीस हजार सिपाही. लेकिन औरंगजेब के ये सिपाही लड़ाई में सधे हुए थे और हर तरह से तैयार भी थे. समूहगढ़ की इस जंग में दारा शिकोह बुरी तरह हार गया और भाग कर दिल्ली पहुंच गया ताकि औरंगजेब के खिलाफ फौज जमा कर सके. 1 जून 1658 को औरंगजेब जंग जीतने के बाद आगरा पहुंचा और फिर इसके बाद अगले 48 सालों तक हिन्दुस्तान में सत्ता का सूरज बन कर चमकता रहा.  

 

आरएसएस विचारक राकेश सिन्हा बताते हैं कि जो लोग औरंगजेब के नाम का गुणगान करते हैं उनसे पूछिए कि दाराशिकोह ने ऐसा कौन सा गुनाह किया कि उसके नाम को आप भुलाना चाहते है और औरंगजेब ने क्या ऐसा काम किया कि उसके नाम का गुणगान करना चाहते हैं? ये सवाल तो उनसे पूछा जाना चाहिए. दाराशिकोह ने उपनिषद का अनुवाद किया वो पहला ऐसा प्रशासक था जिसे औरंगजेब ने पराजित किया, बाद में उसकी हत्या की. वह वास्तव में शासक था. वह अपने पिता का पहला संतान था. पिता और उसकी बहन उसे शासक बनाना चाहते थे, उसे घोषित कर दिया गया था. दाराशिकोह ने भारत में इस्लाम के भारतीयकरण की प्रक्रिया को शुरू किया जिसे औरंगजेब ने समाप्त कर दिया.

 

वरिष्ठ पत्रकार पवन खेडा बताते हैं कि औरंगजेब का इतिहास उस वक्त के संदर्भ में देखा जाए औरंगजेब अपने भाईयों से संघर्ष कर रहे थे सत्ता हथियाने के लिए उसमें उन्होंने इस्लाम का सहारा लिया औऱ बोला कि अगर दाराशिकोह आ जाता है तो इस्लाम खतरे में है उन्होंने वो सारे हथकंडे अपनाए और वो शासन उनको मिला उस शासन को लेने के बाद उन्होंने इस्लामिक लॉ को लागू किया तो वो बिल्कुल इस्लामिक लीडर थे इसमें कोई शक की बात नहीं थी और उसमें कोई बहस करता भी नहीं है. उस वक्त का संदर्भ भी वहीं था लेकिन औरंगजेब के संदर्भ में मैं फिर आपको वापस कहूंगा कि इतिहास को हमेशा एक प्रास्पेक्टिव में कांटेक्सट के संदर्भ में देखा जाता है तो उस वक्त का जो संदर्भ था आप उसे क्रूर कहिए उसे कट्टरवादी कहिए ये जरुर रहें होंगे और इतिहास में कई जहर रिकार्डेड है कि वो थे कट्टर और क्या हम उस इतिहास को बदल सकते हैं. और क्यों बदलना चाहिए हिंदुस्तान का दिल बहुत बड़ा है मोदी जी को पीएम बना दिया इतना बड़ा दिल है इस देश का तो अगर औरंगजेब रोड हैं तो इनको क्या आपत्ति है देश को मालूम रहना चाहिए कि ये भी एक इतिहास है हमारा.

 

मुगल शहजादे दाराशिकोह के बारे में कहा जाता है कि वो अपने परदादा बादशाह अकबर की तरह ही रोशन ख्याल था और सभी धर्मों को लेकर उसका रुख उदारवादी था. दारा शिकोह ने पहली बार उपनिषद का फारसी में अनुवाद भी किया था. जिसके बाद उपनिषद का पूरी दुनिया में प्रसार हुआ. लेकिन दाराशिकोह के उलट औरंगजेब इतिहास के पन्नों में एक ऐसे मजहबी कट्टर बादशाह के तौर पर दर्ज है जिसने हिंदुओं पर अत्याचार किए और उन पर जजिया कर थोप दिया. कहते हैं कि इतिहास खुद को कभी नहीं दोहराता. औरंगजेब का इतिहास भी कभी दोहराया नहीं गया लेकिन इतिहास के पन्नों में दर्ज उस जजिया कर का जिक्र अक्सर छिड़ता रहा है जो औरंगजेब ने 1679 में हिंदुओं पर लगाया था.

 

आरएसएस विचारक संदीप महापात्र बताते हैं कि जजिया टैक्स जो हिंदुओं पर लगाया गया के आप अपने धर्मस्थली में जा रहे हो तो आपको टैक्स देना होगा. ये कहां का न्याय है? अगर आप भारत के सो कॉल्ड शहंशाह थे या बादशाह थे तो आपको भारत के होने का, भारत से एक संपर्क होने का और भारत के जनमानस से जुड़ने का एक मानसिकता होना चाहिए था जो कि औरंगजेब के पास नहीं है. इसीलिए वो विलेन थे. और अभी भी मैं भी ये मानता हूं और हमारी टैक्सट बुक भी यही कहती है कि वो विलेन थे, एक कम्युनल शासक थे, मजहबी शासक थे, और आज के समय में जो आइएसआइएस या तालिबान जो कर रही है, वो उस समय में करते थे सत्रहवीं शताब्दी में, तो इसीलिए वो विलेन थे.)

 

दरअसल जजिया एक अरबी शब्द है जिसका मतलब ही टैक्स होता है और ये जजिया टैक्स पुराने इस्लामी मुल्कों में गैर मुस्लिमों पर लगाया जाता था. औरंगजेब के दौर में जजिया टैक्स की रकम भी तय थी. मुगल साम्राज्य में रहने वाले गरीब हिंदुओं पर तो ये टैक्स नहीं लगता था लेकिन जो दे सकते थे उन पर तीन रुपये साल, मध्यवर्गीय हिंदुओं पर छह रुपये साल और अमीर हिंदुओं पर 12 रुपये साल जजिया टैक्स लगाया जाता था. गौर करने वाली बात ये है कि तीन रुपये सुनने में आज भले ही कम रकम लगती है लेकिन उस वक्त ये किसी मामूली आदमी की एक महीने की कमाई के बराबर थी. खास बात ये है कि औरंगजेब ने गरीब हिंदुओं और राजपूतों को जजिया कर के दायरे से बाहर रखा था.

 

इतिहासकार इरफान हबीब बताते हैं कि पुराने जमाने में जकात लगती थी मुसलमानों पर और उनसे लैंड टैक्स जो जमीन का टैक्स है वो लिया जाता था लेकिन औरंगजेब ने लगान हिंदू और मुस्लमानों दोनों से बराबर ली. मतलब उसमें कोई रेट में फर्क नहीं था. जो हिंदू देते थे लगान वही मुसलमान देते थे और सबसे बड़ा टैक्स यही था. लेकिन व्यापार पर जो टैक्स होता था उस पर उसने फर्क करना शुरु किया हिंदुओं से दुगना लेता था पांच पर्सेंट और मुसलमानों से ढाई पर्सेंट. लेकिन हुआ ये कि हिंदू व्यापारी अपने मुसलमान नौकरों के नाम से पास कर दिया करते थे. तो वो तो एक मजाक था लेकिन जजिया पर वाकई बहुत एतराज और शिकायत थी. जो मुगल आफिसर थे और जहाआरा जो इसकी सबसे बड़ी बहन थी और दूसरे अफसरों ने इसका विरोध किया. ये मत लगाओ ये हमारे सिस्टम के खिलाफ है. और फारसी में इसके खिलाफ प्रोटेस्ट भी हमें मिलता है. जो उनके जमाने में बडे अफसरों ने एक दूसरे को भेजे थे.

 

मुगल बादशाह अकबर के बाद हिन्दुस्तान पर सबसे लंबे वक्त तक राज करने वाले औरंगजेब की उसकी धार्मिक नीतियों को लेकर ही सबसे ज्यादा आलोचना होती रही है. औरंगजेब के बारे में ये भी कहा जाता है कि उसने हिंदुओं के तीर्थ पर टैक्स लगाया और हिंदू त्योहारों पर प्रतिबंध तक लगा दिया था. इतिहासकारों का भी मानना है कि औरंगजेब अपने परदादा अकबर की तरह उदार नहीं था उसने बहुसंख्यक हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को नजर अंदाज करके इस्लाम धर्म को अपने शासन का आधार बनाया था. यही वजह भी है कि औरंगजेब की छवि एक मजहबी कट्टपंथी बादशाह के तौर पर बनी है. हांलाकि ऐतिहासिक दस्तावेजों और इतिहास की किताबों के हवाले से कुछ इतिहासकार औरंगजेब की ऐसी छवि को गलत भी बताते हैं.

 

इतिहासकार इरफान हबीब बताते हैं कि अगर आप 18 वीं शताब्दी में देखे तो कोई औरंगजेब की बुराई नहीं है. औरंगजेब की बुराई तो अब शुरु हुई वर्ना बाहर वाले जब आते थे जैसे औऱंगजेब के जमाने में थैमिल्टन आया. वो औरंगजेब के ही जमाने में आया 1680 और 1720 तक रहा. तो औरंगजेब के ही जमाने के लिए लिखता है कि हिन्दुस्तान ऐसा मुल्क है जहां हर धर्म को इजाजत है हर धर्म वाले पूजा पाठ कर सकते हैं. तो बाहर वाले को तो मालूम नहीं होता था कि कोई हिंदुओं पर जुल्म हो रहा है कोई. मैनूकी ने लिखा है कुछ उस जमाने की जो किताबे है उसमें जजिया पर जरुर, भीमसेन की निशकदुल कुशा है मुगल आफिसर था उसने लिखा है वो बहुत आजादी से लिखता है उसने जजिया पर जरुर इल्जाम लगाया है कि ये गलत लगाया है.

 

आऱएसएस विचारक राकेश सिन्हा बताते हैं कि भारत की सामूहिक चेतना में औरंगजेब एक क्रूर शासक है और इरफान हबीब जैसे इतिहासकारों का इतिहास लेखन इस सामूहिक चेतना में एक रत्ती भर परिवर्तन इसलिए नहीं कर पायी है कि पीढ़ी दर पीढ़ी उसके अत्याचारों को हिन्दुस्तान न भुला पायी है और ना भुला पायेगी. औरंगजेब इतिहास में रहेगा, औरंगजेब का इतिहास में रहना इसलिए जरुरी है कि हमें पता चले कि क्रूरता की क्या सीमा होती है, क्रूरता का क्या रूप होता है, क्रूरता का क्या रंग होता है?

 

मुगल बादशाह औरंगजेब की क्रूरता के किस्सों की तरह ही अक्सर उसके परदादा बादशाह अकबर की उदारता के किस्से भी मशहूर रहे है इतिहास में अकबर एक उदारवादी शासक के तौर पर दर्ज है. इतिहासकारों का कहना है कि अकबर की धार्मिक नीतियां सर्वधम समभाव की थी और उसका मानना था कि किसी को भी ये बात मालूम नहीं है कि कौन सा मजहब ठीक है इसीलिए उसके दौरे हुकूमत में सभी धर्मो के मानने वालों को पूरी आजादी हासिल थी. अकबर पहला मुगल बादशाह भी था जिसने हिंदुओं पर लगने वाले जजिया कर को खत्म कर दिया था. खास बात ये है कि राजभाषा फारसी होने के बावजूद अकबर को हिंदी में दिलचस्पी थी और इसी तरह औरंगजेब को भी हिंदी पसंद थी यही नहीं वो देवनागरी लिपी पढ़ता भी था. अकबर की तरह ही औरंगजेब ने भी अपनी फौज में राजपूतों को ऊंचे ओहदे दिए और उन्हें अपना जनरल बनाया. यहीं नहीं प्रशासनिक मामलों में भी औरंगजेब ने अकबर की तमाम नीतियों को हूबहू अपनाया था लेकिन उसकी धार्मिक नीतियां अकबर की नीतियों से एकदम अलग थी. औरंगजेब इस्लामिक कानून यानी शरियत के आधार पर अपनी हुकूमत चलाता रहा हालांकि इतिहासकार ये भी कहते हैं कि वो शरीयत के कानून को भी पूरी तरह लागू करने में नाकाम रहा.

 

इतिहासकार इरफान हबीब बताते हैं कि अकबर जैसा आदमी तो बहुत मुश्किल से मिलता है. अब हर कोई अकबर की तरह हो ये तो हो नहीं सकता. जहांगीर की तबीयत बहुत कुछ अकबर की तरह थी लेकिन उसने मेहनत नहीं की उतना. जहां तक धार्मिक पॉलिसी की बात है तो ये तो बुहत अलग थे. एक थ्यौरी है जो इस्लाम में भी है और शंकराचार्या जो वेदांत है हिंदू मजहब में भी है कि हर चीज माया है हर चीज इल्यूजन है. तो वो अकबर का था. इसलिए जो खुदा को ना माने जैसे जैनियों के लिए भी फरमान था कि ना माने तो उनको भी टालरेट करना. औरंगजेब में ये नहीं था उसका ये था कि जहां तक शरियत में कहा गया है उस पर अमल हो. जाहिर है शरियत के लिहाज से मुसलमानों को टैक्स तो माफ नहीं कर सकता था तो इसीलिए उनसे एक बटा दस अगर टैक्स लेगा पंजाब में मुसलमानों से तो हुकूमत ही नहीं चलेगी. तो आधा गल्ला उनसे भी लेता था और आधा हिंदूओ से भी लेता था. कोई फर्क नहीं था तो ये था कि शरीयत पर वो अमल कर सके ये तो नामुमकिन था तो जहां जहां भी उसकी समझ में आया उसने अमल किया तो वो बिल्कुल अकबर से उसकी धार्मिक पालिसी बिल्कुल अलग है.

 

मुगल बादशाह औरंगजेब के बारे में ये बात भी प्रचलित रही है कि वो शाही खजाने से एक पैसा भी अपने ऊपर खर्च नहीं करता था और टोपी और चटाई बुनकर जो पैसे कमाता उससे अपना खर्च चलाया करता था. इस्लाम धर्म के नियमों का पूरी कट्टरता से पालन करने की वजह से औरंगजेब को जिंदा पीर भी कहा जाता था. इतिहासकार भी उसके जिंदा पीर कहे जाने की बात को मानते हैं लेकिन वो औरंगजेब की बाकी कहानियों को सिरे से नकार देते है. कहा जाता है कि हमेशा हुकूमत के काम में डूबे रहने वाले औरंगजेब को नाच गानों, म्यूजिक और पेंटिंग जैसी कलात्मक चीजों में दिलचस्पी नहीं थी और उसने अपनी ज्यादातर जिंदगी मराठों, अफगानों और जाटों से जंग के तपते रेगिस्तान में लडते हुए ही गुजार दी थी. खास तौर पर मराठा राजा शिवाजी महाराज के साथ औरंगजेब की जंग के किस्से इतिहास में भरे पड़े है.

 

इतिहासकार इरफान हबीब बताते हैं कि वो तो बिल्कुल राजनैतिक थी. वैसे तो हर कोई कहता था कि हम गायों और धर्म के प्रोटेक्शन के लिए लड़ रहे हैं. मुगल कहते थे कि हम अपनी बादशाहत के प्रोटेक्शन के लिए लड़ रहे हैं. लेकिन थी तो वो राजनैतिक लड़ाई. शिवाजी ने भी कोई मुसलमानों पर जुल्म नहीं किया उसके भी मुसलमान अफसर थे. एक खत है औरंगजेब का जिसमें फरमान है जब इन्होंने एक किला मराठों का पकड़ा तो वहां मराठे भी थे हिंदू और मुसलमान भी थे शिवाजी के सोल्जर. तो इन्होंने कहा कि साहब ये है कि शरीयत में ये है कि जब कोई सरेंडर कर दे तो उसे मारा नहीं जा सकता है. तो चाहे हिंदू हो या मुसलमान मारा नहीं जा सकता उन्हें. तो औरंगजेब ने लिखा कि नहीं मुसलमानों को तो हमें मारना चाहिए क्योंकि वो हमारे खिलाफ लड़ रहे थे. हिंदुओं को तो छोड़ दो उनका राजा है. तो उन्होंने कहा कि साहब शरियत में तो इसकी इजाजत नहीं है तो उन्होंने कहा कि भई शरीयत को भूल जाओं इन सबका कत्ल कर दो. तो वो सब मार दिए गए जो सब मुसलमान थे. तो आप ये देखिए कि राजनीति चल रही थी सब उसमें.

 

सन 1678 में शिवाजी ने खुद को महाराजा घोषित कर दिया था लेकिन इसके दो साल बाद ही उनकी मौत हो गई लेकिन तब तक मराठों की ताकत बेहद बढ चुकी थी और इसी वजह से दक्कन को कंट्रोल करने के लिए औरंगजेब को अपनी मौत तक दकक्न में ही रहना पड़ा था. करीब 48 साल के अपने दौरे हुकूमत में औरंगजेब ने कई जंगे लड़ी थी. उस दौर में मुगलों का अफगानों, जाटों, मराठों और सिखों के साथ लगातार संघर्ष चलता रहा और इसीलिए औरंगजेब पर सिखों के नवे गुरु तेगबहादुर को कत्ल करने का इल्जाम भी लगता रहा है. कहा जाता है कि उसने सिखों के गुरु तेगबहादुर को धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर किया और बात ना मानने पर औरंगजेब ने उन्हें कत्ल करवा दिया था. यहीं नहीं देश में सैकड़ों हिंदू मंदिरों को तोड़ने के आरोप भी औरंगजेब पर लगते रहे हैं और यही वजह है कि औरंगजेब की शख्सियत को लेकर आज भी विवाद जारी है. हालांकि इतिहासकार भी इन सारे आरोपों को सही बताते हैं लेकिन इन इल्जामों का एक दूसरा पहलू भी बताया जाता है.

 

इतिहासकार इरफान हबीब बताते हैं कि इसमें कोई शक नहीं औरंगजेब ने मसलन मथुरा का केशवराय मंदिर बहुत बड़ा था जो बीर सिंह बुंदेला ने बनाया था जहांगीर के जमाने में बनाया गया था. तो उसको उसने तुड़वाया 1669 में कुछ और मंदिर भी तुड़वाए. इजजात भी दी तोड़ने की. देखिए दो में एक फर्क है एक तो तोड़ना और दूसरा ये कि अगर तुम तोड़ आओ तो हम इसे माइंड नहीं करेंगे ये भी अब मालूम होता है लेकिन उसके ऑफिसर कहते थे कि कोई तोड़ने ही नहीं जाता है भई जब आप कुछ रुपये देंगे तभी तो कोई मंदिर तोड़ा जाएगा. दूसरी तरफ ये है कि जो मंदिरो को ग्रांट थी, जमीने थीं वो उसने बरकरार रखी. वृंदावन के जितने बडे मंदिर थे सबकी जमीने रहीं. इसी तरह जगन्नाथ मंदिर है उस पर कोई टैक्स नहीं लगाया. दक्कन और साउथ में बहुत से मंदिर है जिनके पास फरमान है उस जमाने के. तो दोनो तरह के उसके थे. जहां तक हिंदुओं पर जुल्म की बात है तो उसने ऐसा कोई जुल्म कि उनके खिलाफ राइटस करवाए हों ऐसी कोई बात नहीं थी. लेकिन जाहिर है जैसा मैंने आपको बताया वो तो हुआ ही. लेकिन अगर आप ऐसे मंदिर गिने जो उसने गिराए हैं जिनकी हमें एवीडेंश मिलती है तो मेरे ख्याल में बुहत ही कम होंगे पांच छह होंगे. दर्जन हो सकते हैं.

 

औरंगजेब ने हिन्दुस्तान को राजनैतिक तौर पर एक करने का बड़ा काम अंजाम दिया लेकिन आज उसे एक ऐसे निरंकुश बादशाह के तौर पर याद किया जाता है जिसने हिंदुओं पर जजिया कर लगाया, मंदिर तोड़े और वो सिख गुरुओं के साथ कठोर बर्ताव को लेकर भी बदनाम हुआ. लेकिन इसी के साथ ये सवाल भी हमेशा बना रहा है कि तमाम अच्छाईयों और बुराइयों के बावजूद क्या औरंगजेब को सही समझा गया है.

 

मुगल बादशाह औऱंगजेब के जमाने की किताबों में उसकी आलोचना कम ही दिखाई पड़ती है. खुलासतुत तवारीख और निशकदुल कुशा जैसी हिंदू लेखकों की किताबों में भी जजिया टैक्स पर तो नुक्ताचीनी की गई है लेकिन इसके अलावा औरंगजेब की और कोई बुराई दर्ज नहीं हुई है. इतिहासकारों का ऐसा मानना है कि औरंगजेब के बारे में तमाम तरह की बातें और उससे जुड़े विवाद 19 वीं शताब्दी के आखिरी हिस्से में सामने आने शुरु हुए थे. दरअसल ये वो दौर था जब आजादी के बाद पाकिस्तान वजूद में आ चुका था और यहीं वो दौर भी था जब देश में सांप्रदायिकता के साथ- साथ सांप्रदायिक लेखन की भी शुरुआत हुई थी.

 

इतिहासकार इरफान हबीब बताते हैं कि तारीख की जब स्टडी हुई और औरंगजेब के बारे में किताबे निकलना शुरु हुई. खुशूसन जदूनाथ सरकार की जो किताब है वो सही है. उसमें कोई गलत बात नहीं है. लेकिन जाहिर है कि जब जजिया का कहा जाएगा. कुछ चीजे मुबालगे से ली गई है. कि हर जगह मंदिर डिस्ट्राय हुए सरकार को ऐसा कहना नहीं चाहिए था. तो जदुनाथ सरकार की किताब का भी असर हुआ. इसका भी असर हुआ कि औरंगजेब की खामख्वाह तारीफ हो रही है. बड़ा आलमगीर था ये था वो था. पाकिस्तान की किताबों में तारीफ जो कि बिल्कुल गलत है गलत चीजों की तारीफ हो रही है उसकी जजिया की तारीफ हो रही है. तो उसका भी असर है. बहरहाल औरंगजेब की जो आलोचना शुरु हुई वो 19 वीं और बीसवी शताब्दी की बात है उससे पहले उससे पहले आपको कोई हिंदू किताबों में आलोचना खास नहीं मिलती.

 

इतिहासकार प्रोफेसर सोहेल हाशमी बताते हैं कि कोई एविडेंस नहीं मिलती है कि उसने किसी को जबरदस्ती धर्म परिवर्तन करवाया हो. ये बहुत सारा इतिहास अंग्रेजों का लिखा हुआ था और अंग्रेजों ने 1857 के बाद डेलिबरेटली ये इतिहास लिखा जिसमें से बहुत सारी चीजें गायब कर दीं. जैसे मिसाल के तौर पर उन्होंने ये सारे रिफरेन्सेस गायब कर दिए जो वो सारे मंदिर जिनको उसने ग्रांट दी थी. कुछ मंदिरों में तो ग्रांट इसलिए दी गयी कि उनमें औरंगजेब के नाम का देसी घी का दिया 24 घंटे जलता रहे. तो ऐसे आदमी को आप हिंदू दुश्मन किस तरह साबित कर रहे हैं.

 

मुगलों ने करीब साढे तीन सौ साल तक हिन्दुस्तान पर हुकूमत की थी और मुगल साम्राज्य के सबसे ताकतवर बादशाह औरंगजेब ने भारतीय उपमहाद्वीप के एक बड़े इलाके पर अपनी बादशाहत भी कायम की. उसने दक्षिण की रियासतों को जीता और दूर दक्षिण से बेशकीमती नजराने हासिल किए लेकिन औरंगजेब के आखिरी वक्त में उसकी सल्तनत की भी चूले ढीली पढ़ने लगी थी. सन 1707 में तकरीबन 90 साल की लंबी उम्र के बाद औरंगजेब की मौत हुई और उसकी मौत के फौरन बाद तैयारियां शुरु हो गई कि किस तरह वो बेशकीमती विरासत हथियाई जाए जो उसने छोड़ी थी यानी हिन्दुस्तान.

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