व्यक्ति विशेष: कैप्टन कूल से कहां हुई भूल, क्या रही चूक?

व्यक्ति विशेष: कैप्टन कूल से कहां हुई भूल, क्या रही चूक?

नई दिल्ली: भारतीय क्रिकेट टीम का वो नायक है. उसे हिन्दुस्तान का अब तक का सर्वश्रेष्ठ कप्तान माना जाता है. देश दुनिया में उभरते खिलाड़ियों को उसकी कप्तानी की सूझबूझ की कहानियां पढ़ाई जाती हैं. मैदान में अपने फैसलों से खेलप्रेमियों को चकित कर देना उसका शगल है. कोई उसे बाजीगर कहता है तो किसी की नजर में वो ‘द ग्रेट गैम्बलर’ है. जिसने अपनी कप्तानी से भारत को दो बार विश्व कप दिलाया. जिसकी कप्तानी में भारत टेस्ट रैंकिंग में दुनिया की नंबर 1 टीम बना. जिसने भारतीय क्रिकेट को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया उसकी कप्तानी पर उठ रहे हैं सवाल. धैर्य और संयम के लिए जिस कप्तान के लिए कैप्टन कूल जैसा शब्द बना वो कप्तान आज बात-बात में अपनी शीतलता खो बैठता है. क्या कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की सल्तनत ढह रही है? क्या धोनी के साथ वही हो रहा है जो अक्सर महान भारतीय कप्तानों के साथ होता रहा है? क्या धोनी भारतीय कप्तानों के दुखद अंत की कहानी दोहरा रहे हैं?

वेस्ट इंडीज के खिलाफ इस हार के साथ ही महेंद्र सिंह धोनी का दूसरा वर्ल्ड टी-20 खिताब जीतने का सपना भी टूट गया. मैच के बाद भारतीय टीम के कप्तान धोनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे. इस दौरान एक पत्रकार ने जब धोनी से रिटायरमेंट से जुड़ा सवाल पूछा तो कैप्टन कूल का हंसमुख अंदाज तो दिखा लेकिन उसके पीछे छिपी थी उनकी खीज और झुंझलाहट. वेस्टइंडीज से मिली हार के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में ऑस्ट्रेलियाई पत्रकार सैमुअल फेरिस ने धोनी से पूछा कि क्या 34 साल की उम्र में वर्ल्ड टी-20 सेमीफाइनल में भारत के हारने के बाद वह आगे खेलना चाहते हैं.

धोनी ने पहले फेरिस से सवाल दोहराने को कहा और उन्होंने ऐसा ही किया. फिर धोनी ने कहा, यहां आइए, कुछ मजाक करते हैं. मीडिया ब्रीफिंग में ऐसा नजारा देखना दिलचस्प था, जब भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान किसी पत्रकार को अपने पास बुलाएं. फेरिस पहले थोड़ा हिचकिचाए, लेकिन बाद में धोनी के कहने पर वह उनके पास जाकर बैठ गए.

महेंद्र सिंह धोनी ने भारतीय मीडिया पर यह कह कर कटाक्ष किया कि संन्यास से जुड़ा सवाल तो कोई भारतीय पत्रकार ही उनसे कर सकता है. दरअसल अपनी आलोचना से झुंझलाए धोनी ने ये भी साबित करने की कोशिश की संन्यास की छोड़ो मैं तो 2019 वर्ल्ड कप खेलने के लिए भी फिट हूं.

महेंद्र सिंह धोनी को एक ऐसे कप्तान के रूप में देखा जाता है जो अतीत और भविष्य के चक्कर में ज्यादा पड़े बगैर अपने सामने के मैचों को अपना लक्ष्य बनाता है. वो हर एक मैच के हिसाब से अपना फोकस बनाते हैं. टीम के प्रदर्शन और कप्तानी की आलोचना के बीच आखिर आने वाली तीन साल की कप्तानी की गारंटी देने की बात कैसे कोई कप्तान कर सकता है.

कैप्टन ‘कूल’ कहे जाने वाले धोनी बहुत कम मौकों पर अपना गुस्सा जाहिर करते हैं लेकिन टी 20 विश्वकप मुकाबले में बांग्लादेश के खिलाफ हुए मैच के बाद प्रेस कांफ्रेस में कप्तान धोनी एक पत्रकार पर भडक गए. बांग्लादेश के खिलाफ टीम इंडिया को मुश्किल से जीत मिली थी. एक रन से मिली रोमांचक जीत के बाद एक पत्रकार ने धोनी से सवाल किया कि इस मैच में भारतीय टीम को बड़े अंतर से जीत हासिल करनी चाहिए थी पर ऐसा नहीं हो सका आखिर क्यों. फिर क्या था धोनी तमतमा उठे.

‘एक मिनट क्योंकि मुझे पता है कि भारत जीता है और आपको खुशी नहीं हुई. आपकी आवाज से, आपकी टोन से ऐसा लग रहा है कि टीम इंडिया के जीतने पर आपको खुशी नहीं हुई. जहां तक क्रिकेट की बात की जाए तो यह स्क्रिप्ट नहीं होता है. आपको खुद ही विचार करना होता है कि जिस विकेट पर हमने टॉस हारने के बाद बल्लेबाजी की, क्या कारण थे कि हम ज्यादा रन नहीं बना पाए अगर आप यह सब बाहर बैठकर नहीं सोच रहे हैं तो आपको यह सवाल नहीं पूछना चाहिए.

वर्ल्ड टी-20 के सेमीफाइनल में मिली हार के बाद धोनी के मैदान पर लिए गए फैसलों पर अब सवाल उठ रहे हैं. आर अश्विन विकेट चटकाने वाले भारत के सबसे कामयाब गेंदबाजों में से एक हैं. वेस्टइंडीज के खिलाफ अश्विन से धोनी ने सिर्फ दो ओवर गेंदबाजी कराई. सवाल उठ रहा है कि कप्तान ने अश्विन से उनके कोटे के पूरे चार ओवर क्यों नहीं करवाए.

महेंद्र सिंह धोनी को एक ऐसे कप्तान के रूप में जाना जाता है जो कप्तानी के नियम और परंपरा के खिलाफ जाकर अपने अनोखे फैसलों से सबको हैरान कर देते हैं.

आपको याद होगा टी 20 पहला विश्व कप. भारत और पाकिस्तान के बीच फाइनल मुकाबला था. आखिरी ओवर की गेंदबाजी करानी थी. योगेंद्र शर्मा नाम के गेंदबाज से गेंदबाजी कराने के बारे में कोई सोच भी नहीं सकता था. लेकिन धोनी ने उनसे बॉलिंग कराई और अपनी रणनीति में वो कामयाब रहे. धोनी का ये रूप आखिर इस टी 20 में क्यों नहीं देखने को मिला?
बाइट- धोनी का आउट ऑफ दि बॉक्स यानी लीक से हट कर फैसला लेने का अंदाज और रूप आखिर इस टी 20 में क्यों नहीं देखने को मिला?

धोनी शांत स्वभाव के हैं और चेहरे से उनके अंदर चल रहे खयालों को जान पाना लगभग नामुमकिन होता है. वो पिच और मौसम के हिसाब से प्रयोग करते हैं और टीम में बदलाव लाते हैं. धोनी टीम में फेरबदल करने से झिझकते नहीं है और खेल में किसी किस्म का समझौता नहीं करते. हाल के मैचों में धोनी का न तो कोई नया प्रयोग दिखा और न ही उनके खेल में पुरानी वाली आक्रामकता ही नजर आई.

महेंद्र सिंह धोनी एक ऐसे कप्तान हैं जो हार या जीत के बारे में नहीं सोचते. वो क्रिकेट को शंतरज के खेल की तरह खेलना चाहते हैं क्योंकि वो जानते हैं किसी भी एक कदम से खेल बदल सकता है. शतरंज की चाल की तरह क्रिकेट की चाल बदलने वाले धोनी आखिर किस चाल को चलने से इन दिनों चूक रहे हैं.

एम एस धोनी की कप्तानी भले आज बहस का विषय बन गई हो लेकिन माही की कामयाबी की जो अनोखी दास्तां हैं उसकी मिसाल कहीं और नहीं मिलती.

एक छोटे से शहर में एक छोटे से लड़के की हैरान कर देने वाली कामयाबी की ये कहानी करीब 14 साल पहले सिर्फ तीन सौ रुपये से शुरु हुई थी जब मैदान पर वो लड़का अपने हुनर को दांव पर लगाता था लेकिन आज ऐसे चमचमाते मैदानों में उस पर करोड़ों रुपये बरसते हैं. भारतीय क्रिकेट को अपनी बेमिसाल कप्तानी से ऊंचा मुकाम दिलाने वाले कैप्टन महेंद्र सिंह धोनी की ये कहानी जितनी सीधी और सपाट नजर आती है उतनी ही ये पेचीदा और उलझी हुई भी है क्योंकि धोनी की इस दास्तान में जहां किस्मत का अहम रोल है तो वहीं उनकी मेहनत और हुनरमंदी का बड़ा खेल भी शामिल है.

महेंद्र सिंह धोनी ने अभावों से जूझते हुए अपने क्रिकेट करियर को आगे बढ़ाया था. बेतरतीब मैदानों पर कभी धोनी ने देश के लिए क्रिकेट खेलने का सपना संजोया था लेकिन किस्मत ने उन्हें उस मुकाम पर भी पहुंचाया जहां सचिन तेड़ुलकर भी उनकी कप्तानी में क्रिकेट खेले. वो सचिन जिन्हें महेंद्र सिंह धोनी भी मानते रहे हैं क्रिकेट का भगवान.

क्रिकेट के मैदान पर अपने अप्रत्याशित फैसलों से चौकाने वाले टीम इंडिया के कप्तान धोनी का करियर जितना चमकदार रहा है उतना ही शानदार है वनडे में उनकी जीत का रिकॉर्ड. कप्तान महेंद्र सिंह धोनी सौ से ज्यादा वनडे मैच जिताने वाले भारत के पहले और दुनिया के तीसरे कप्तान हैं. धोनी के अलावा 165 वनडे मैच जीतने वाले ऑस्ट्रेलिया के रिकी पॉन्टिंग और 107 मैच जीतने वाले एलन बॉर्डर का नाम भी कामयाबी की इस लिस्ट में शामिल हैं.

धोनी ने अपने अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट करियर में अब तक 275 वनडे मैच खेले हैं और उन्होंने 191 मैचों में कप्तानी की है. उनकी कप्तानी में अब तक टीम इंडिया ने 104 मैच जीते, 72 हारे, 4 मैच टाई हुए और 11 मैच बेनतीजा रहे हैं. वनडे में आपका रिकवरी का चांस बहुत ज्यादा होता है जब एक बायलैटरल सीरीज होता है 5 मैच होते है 2 हारे 3 जीते पर ओवरआल आप अगर देखें तो आपका जो रिकार्ड होता है वो ऊपर नीचे चलता रहता है . मैंने पहली बार जब कप्तानी की थी तब आस्ट्रेलिया के खिलाफ इंडिया में मैच खेला था वो सीरीज हम हार गए थे तो ऊपर नीचे लगा ही होता है.

महेंद्र सिंह धोनी पर टेस्ट मैचों में फ्लॉप कप्तानी करने का ठप्पा अक्सर लगता रहा लेकिन भारतीय क्रिकेट के इतिहास में उनसे बेहतर वनडे का कोई कप्तान नहीं हुआ है. साल 2005 में पहली बार टीम इंडिया का हिस्सा बने धोनी पिछले 8 साल से टेस्ट, वनडे और ट्वेंटी – 20 तीनों फॉर्मेट में भारत की कप्तानी कर रहे थे. धोनी ने अपनी कप्तानी में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर क्रिकेट की हर ट्रॉफी जीती है. 2007 में ट्वेंटी-20 वर्ल्ड कप, 2011 में वनडे का विश्व खिताब और एशिया कप समेत आईपीएल और चैम्पियंस लीग में भी धोनी ने अपनी कप्तानी का करिश्मा दिखाया है. उन्होंने वो सब हासिल किया जो एक कप्तान अपने करियर में करना चाहता है.

क्रिकेटर आशीष नेहरा ने बताया कि मैं ये सोचता हूं कि वनडे और टेस्ट मैच की कप्तानी में कुछ थोडा बहुत फर्क देखने को मिलता है पर ओवर आल देखें पीछले 7-8 साल में तो वो काफी अच्छे कप्तान रहें है और उन्होंने ने नए नए खिलाड़ी को ग्रूम भी किया है तो मेरे को नहीं लगता कि और उन पर इतना दबाब है वो एक बहुत अहम बात है कि इतने दवाब के बावजूद वो टीम को हम खराब प्रदर्शन से भी गुजरे हम 8-0 से हम टेस्ट में हारे हैं उसके बाद हम चैंपियन्स लीग जीते फिर इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया में हारे और फिर सेमी फाइनल में पहुंचे तो अप्स एंड डाउन महेंद्र सिंद धोनी ने भी देखे अपने करियर में पर मेरे हिसाब से बहुत ही उम्दा कप्तान हैं और खिलाड़ी हैं.

महेंद्र सिंह धोनी के दोस्त रॉबन सिंह बताते हैं कि उसका स्वभाव ही ऐसा है कि वो किसी की बात सुनने से पहले ही निर्णय ले लेते हैं. रॉबिन कहते हैं कि इंडियन क्रिकेट में शायद ही ऐसा पहले किसी ने किया होगा जैसा उसने किया है. खड़गपुर के क्रिकेट स्टेडियम में करीब चार साल तक महेंद्र सिंह धोनी के साथ क्रिकेट खेलने वाले रणजी खिलाड़ी रॉबिन कुमार बताते हैं कि बल्लेबाजी धोनी के क्रिकेट का शुरु से ही सबसे मजबूत पक्ष रहा है. रॉबिन के मुताबिक धोनी की बैटिंग की टाइमिंग और उनका टेंपरामेंट शुरुआती दिनों से ही लाजवाब रहा है और यही वो खूबियां भी हैं जिन्होंने धोनी को एक बेहतरीन क्रिकेटर और एक कामयाब कप्तान बनाया है.

पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में धोनी के दोस्त आज भी उन्हें एक ऐसे पहलवान क्रिकेटर के तौर पर याद करते हैं जिसका बल्ला गेंद को सीधे स्टेडियम के पार पहुंचा देता था. ट्वेटी-ट्वेटी और वनडे जैसे फटाफट क्रिकेट के फॉर्मेट में फौरन फैसले लेने का सबक भी धोनी ने खड़गपुर के इन्हीं मैदानों पर सीखा था और सबसे खास बात ये कि एक कप्तान के तौर पर फ्रंट से लीड करने का जज्बा भी धोनी में यहीं पर खेलते हुए पैदा हुआ था. खड़गपुर के ग्रीन अकादमी क्लब के सचिव प्रदीप सरकार को आज भी वो दिन याद हैं जब धोनी महज तीन सौ रुपये फीस लेकर रेलवे के ग्राउंड पर क्रिकेट मैच खेला करते थे.

खड़गपुर के ट्रैफिक ग्राउंड पर इन दिनों बड़े -बडे ट्रक खड़े होते हैं लेकिन एक वक्त शहर में ये टेनिस बॉल क्रिकेट टूर्नामेंट का सबसे चर्चित मैदान हुआ करता था. खास बात ये है कि अंतर्राष्ट्रीय मैचों में पहली या आखिरी गेंद पर छक्का जड़ने का हुनर भी धोनी ने इसी मैदान पर सीखा था. दरअसल ग्राउंड का ऑफ साइड बेहद छोटा करीब 22 गज का था. इसीलिए इस ग्राउंड पर नियम था कि ऑफ साइड पर बल्लेबाज को छक्का या चौका मारने पर भी सिर्फ दो ही रन मिलेगें. यानी छक्का औऱ चौका सिर्फ लेग साइड पर मारा जा सकता था. यही वजह थी कि इस मैदान पर गेंदबाज रन बचाने के लिए गेंद को ऑफ स्टंप पर ही ज्यादा डालते थे. ऐसे हालात में धोनी ने इस ग्राउंड पर छक्का और चौका लगाने के लिए हैलीकॉप्टर शॉट इजाद किया जिसने आगे चल कर उनके क्रिकेट करियर में धूम मचा दी.

खड़गपुर शहर के छोटे से मैदान से लेकर वर्ल्ड कप के ऊंचे आसमान तक महेंद्र सिंह धोनी ने बेहद कम वक्त में कामयाबी की लंबी छलांग लगाई है. उनकी कप्तानी में जहां सचिन तेंडुलकर, सौरभ गांगुली और राहुल द्रविड़ जैसे टीम इंडिया के पूर्व कप्तानों ने खेला है वहीं उन्होंने देश को दो फार्मेट में विश्व कप का खिताब भी दिलाया है और धोनी की ऐसी चमत्कारी कामयाबी के पीछे छिपी है तीन डी के फॉर्मेले की एक कहानी. वो कहानी भी सुनिए खुद धोनी के कोच की जुबानी.

मार्च 2001 में महेन्द्र सिंह धोनी ने बतौर टिकट कलेक्टर इसी खड़गपुर स्टेशन पर काम शुरु किया था. बाइस साल के धोनी जब रेलवे की नौकरी करने खड़गपुर आए तो क्रिकेट के मैदान के उनके साथी रांची में ही छूट गए थे लेकिन धोनी की फितरत और स्टेशन पर टिकट कलेक्टरी की नौकरी में कोई मेल ना बन सका. कहां सीधी पटरी पर भागने वाली ट्रेन और कहां रपटिली उछाल मारती गेंद को काबू करने वाले धोनी. यही वजह थी की खड़गपुर में धोनी ने क्रिकेट की अपनी एक नई दुनिया बसा ली थी. साउथ ईस्टर्न रेलवे के कोच सुब्रता बनर्जी बताते हैं कि क्रिकेट को लेकर धोनी की दीवानगी ने उन्हें भी चौंका कर रख दिया था.

2001 से 2003 तक धोनी रेलवे में रहे लेकिन उनसे जुड़ी बेशुमार बातें कही सुनी जाती हैं. ये है खड़गपुर का रेलवे मैदान. धोनी को सफलता मिलने से सालों पहले एक बात यहां हमेशा के लिये कायम हो गयी थी वो ये कि माही जैसा अनुशासित खिलाड़ी इस मैदान पर पहले कभी नहीं आया. सुब्रत कुमार बनर्जी बताते है कि महेन्द्र सिंह धोनी के जिस अनुशासन के चर्चे आज भी खड़गपुर में होते हैं उसकी नींव झारखंड के शहर रांची में पड़ी थी जहां 7 जुलाई 1981 को महेन्द्र सिंह धोनी का जन्म हुआ था. रांची का ये वो जवाहर विद्यालय मंदिर स्कूल है जहां महेंद्र सिंह धोनी ने स्कूल की पढ़ाई की है और इसी स्कूल में सबसे पहले धोनी ने क्रिकेट का बल्ला भी थामा था.

स्कूल के दिनों में हर हाल में जीतने का सबक सीखने वाले धोनी आज भी अपना वो सबक भूले नहीं हैं हांलाकि क्रिकेट का बल्ला थामने से पहले वो फुटबॉल और बैडमिंटन ज्यादा खेलते थे. लेकिन साल 1992 में जब धोनी छटवीं क्लास में पढ़ रहे थे उन दिनों उनके स्कूल को एक विकेट कीपर की जरुरत थी लिहाजा उन्हें विकेट के पीछे खड़ा होने का मौका मिला. ये मौका धोनी के लिए महज एक संयोग भर था जो आज हिंदोस्तान के लिए एक सुखद सुयोग बन गया है.

टीम इंडिया के कैप्टन कूल महेंद्र सिंह धोनी कभी विकेटकीपिंग से तो कभी अपनी कप्तानी से अचंभित करते रहे हैं. धोनी एक ऐसे कप्तान है जो टीम को फ्रंट से लीड करते हैं. वो बेहद दृढनिश्चयी है और कभी अपने फैसले से डगमगाते नजर नहीं आए है.

अपनी टीम का मनोबल बढाने वाले धोनी टीम के लिए हरदम लड़ मरने को तैयार रहते हैं. धोनी की ये वो खूबियां हैं जिन्होंने उन्हें देश ही नहीं क्रिकेट की दुनिया का एक बेहतरीन कप्तान बना दिया है.

हंसी मजाक में ही सही धोनी कह रहे हैं कि वो 2019 में होने वाले विश्व कप के लिए फिट हैं. 2018 में एक बार फिर टी 20 विश्व कप होगा. कप्तानी में उनके हालिया प्रदर्शन को देखते हुए सवाल उठ रहा है क्या धोनी अपनी कप्तानी को और लंबा खींचकर वो अपने शानदार अतीत की उपलब्धियों को छोटा तो नहीं बना रहे हैं.

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