सलाखों के पीछे 'नफरत' की पूरी कहानी

By: | Last Updated: Friday, 17 April 2015 4:38 PM
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नई दिल्ली: मसर्रत आलम गिरफ्तार हो गया. वह मसर्रत आलम है जो साढ़े चार साल जेल में गुजारने के बाद पिछले महीने 7 मार्च को जेल से बाहर आया था लेकिन एक बार फिर देश के खिलाफ भड़काऊ रैली ने उसे सलाखों के पीछे पहुंचा दिया है.

 

ये कहानी नफरत के उस आका की है जिसने जम्मू कश्मीर की धरती को तीन साल तक लहूलुहान रखा. ये कहानी कश्मीर के उस अलगाववादी नेता की है जिसका दिल पाकिस्तान के लिए धड़कता है और भारत के लिए शोले उगलता है. ये कहानी भारत की धरती पर भारत के खिलाफ जंग छेड़ने की हिमाकत करने वाले मसर्रत आलम की है.

 

सलाखों के पीछे नफरत

मसर्रत आलम एक बार फिर गिरफ्तार हो गया है. अपनी जिंदगी के पिछले बीस बरसों में से 17 साल जेल में काटने वाले मसर्रत को कानून की 13 धाराओं में आरोपी बनाकर जेल भेजा गया है. भारत की ही जमीन यानी जम्मू कश्मीर के श्रीनगर में अलगाववादी नेता गिलानी दिल्ली से लौट रहे थे और उनका उत्तराधिकारी माने जाने वाले मसर्रत ने इसे देश के खिलाफ नफरत फैलाने के मौके में बदल दिया.

 

श्रीनगर में हो रही इस रैली की अगुवाई अलगाववादी नेता मसर्रत आलम के हाथ में थी इंतजार था सैयद अली शाह गिलानी का जो पिछले कई महीनों से दिल्ली में थे जैसे ही गिलानी की गाड़ी मौके पर पहुंची उनके घर के बाहर मौजूद भीड़ नारे लगाने लगी.

 

भारत की धरती पर पाकिस्तान का झंडा लहराया गया . भारत की धरती पर पाकिस्तान की हुकूमत के नारे बुलंद किए गए. और फिर मसर्रत ने लिया हाफिज सईद का नाम. वही हाफिज सईद जो मुंबई में 26 नवंबर साल 2008 को हुए सबसे बड़े आतंकी हमले का गुनहगार है. वो हाफिज सईद जिसे अमेरिका से लेकर संयुक्त राष्ट्र तक मोस्ट वांटेड आतंकवादी की लिस्ट में शामिल कर चुके हैं. मसर्रत ने इस रैली में बता दिया कि उसका आका एक आतंकवादी है.

 

मसर्रत की इस हिमाकत के फौरन बाद उसे नजरबंद कर दिया गया था और अब सरकार ने 17 अप्रैल को आधिकारिक ऐलान कर दिया है कि एक बार फिर मसर्रत को गिरफ्तार कर लिया गया है. मसर्रत ने सैयद गिलानी के स्वागत में जिस तरह नफरत की रैली की जिस तरह अगुवाई की वो नई नहीं थी .

 

मसर्रत आलम की कहानी साल 1971 में शुरु हुई थी पुराने कश्मीर के जैनडार मोहल्ला की उस संकरी गली में जहां एक दोमंजिला मकान उसके दादा का घर हुआ करता था लेकिन नफरत और आतंक की दुनिया में मसर्रत ने कदम तब रखा जब वो 16 साल का हो गया.

 

श्रीनगर का tyndle Biscoe स्कूल है जहां मसर्रत आलम को दाखिला करवाया गया था. एक आम स्कूली छात्र से कहीं ज्यादा शोहरत हासिल कर चुका था मसर्रत.

 

मसर्रत खूब गीत गाया करता था. उसके गले से संगीत की मिठास गुम हुई तो मसर्रत की जिंदगी अगले दस सालों में पत्थरों, चीखों और गोलियों के धमाकों तक कैसे पहुंच गई. आज इंजीनियर बन चुके मसर्रत के स्कूली दोस्त बताते हैं कि दसवीं क्लास में वो पीली टीशर्ट और सफेद पैंट के साथ सफेद स्पोर्ट्स शूज में स्कूल आया करता था. एक दिन उसके टीचर ने कहा

 

टीचर – मसर्रत

मसर्रत – जी सर,

टीचर – यार तुम तो अशफाक हो.

मसर्रत – थैंक्यू सर.

 

दरअसल ये अशफाक मसर्रत से 2 साल सीनियर था और उसी की तरह स्कूल में मशहूर था. स्कूल के टीचर नाजिर अहमद लहरवाल शायद इसी शोहरत का जिक्र कर रहे थे. लेकिन ये भी इतिहास है कि अशफाक कश्मीर में पहला आतंकी कमांडर बना था और बदनसीबी मसर्रत को ऐसे ही रास्ते पर ले जाने वाली थी.

 

मसर्रत के गले में एक और गीत ने जगह बना ली . लेकिन अब वो सिर्फ नफरत के गीतों से प्यार करता था. ये सब स्कूली जिंदगी के बाद के 10-11 सालों में हुआ. भारत के कानून की गिरफ्त में आने से कहीं पहले मसर्रत का दिमाग कश्मीर की आजादी के पाकिस्तानी साजिश की गिरफ्त में आ गया.

 

मसर्रत का साल 2007 में आया विवादित बयान उसके दिल में भारत के लिए नफरत का गवाह है. दरअसल अलगाववादी नेता के तौर पर अपनी पहचान बनाने से पहले मसर्रत आलम हिजबुल्लाह नाम के आतंकी संगठन का कमांडर भी बन गया था. देश के खिलाफ उसकी गतिविधियां उसे 6 बार जेल ले जा चुकी हैं. उसने अपनी जिंदगी का एक तिहाई वक्त जेल में ही बिताया है. वजह है उसका दिमाग जो नफरत फैलाने के तरीके ढूंढ़ लेता है.

 

कश्मीर में साल 2008 से 2010 तक पत्थरबाजी का फार्मूला मसरत ने क्यों और कैसे गढ़ा?

 

मसर्रत आलम ने जम्मू कश्मीर में भारत की सरकार और सेना के विरोध के लिए एक गीत तैयार किया था. इस गीत के बोल थे रगड़ा रगड़ा – भारत रगड़ा. कश्मीरी जुबान के इस शब्द का मतलब था कि भारत को मिटा दो.

 

यही नहीं उसकी इस शातिर चाल से ज्यादा से ज्यादा कश्मीरी जुड़ सकें इसके लिए उसने रगड़ा प्रदर्शनों का ये स्टाइल भी इजाद किया था. लोग एक दूसरे का हाथ पकड़ते और एक घेरा बना लेते . फिर शुरू होता देश को गालियां देने का सिलसिला. ये सिर्फ और सिर्फ मसर्रत आलम के दिमाग ही सोच सकता था.

 

साल 2008 में रगड़ा का ये हथियार मसर्रत आलम को पुराना लगने लगा और उसे जेल भी जाना पड़ा. लेकिन महज 21 महीने बाद वो जेल से बाहर आ गया. ठीक वैसे ही जैसा इस बार हुआ. और इस बार की तरह ही बाहर निकलते ही उसने जम्मू कश्मीर की तस्वीर बदल दी.

 

आतंक की आग अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि पत्थरों से लहूलुहान हो गया भारत का स्वर्ग. ना पुलिस का खौफ ना सेना का . पत्थर फेंकने वाले कश्मीरी. पत्थरों से चुटहिल होने वाले भी कश्मीरी.

 

मसर्रत आलम ने अमन के शीशे को अपने इस नए हथियार यानी पत्थर से चकनाचूर कर दिया. नफरत भरे मसर्रत के ऐसे भाषणों में ही कन्नी जंग यानी पत्थर बाजी का प्रचार किया गया. कश्मीरी युवा भटक गए.

 

कोशिश तो ये थी कि पत्थरबाजी की इन घटनाओं को कश्मीर के गुस्से की तरह दुनिया के सामने पेश किया जाए लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

 

आईबी की कोशिशों से ये खुलासा हो गया कि इस पत्थरबाजी के पीछे मसर्रत आलम का हाथ है. डोज़ियर में हुए खुलासे के मुताबिक, मसर्रत की जेल से रिहाई के बाद मुस्लिम लीग के कट्टरपंथी नेता आशिक हुसैन फक्तू के साथ एक समझौता हुआ. जिसमें उसे उपाध्यक्ष बनाया बनाया गया और उसे पूरे प्रदर्शन की जिम्मेदारी सौंपी गई. उसने आजाद कश्मीर के नाम से आंदोलन छेड़ दिया.

 

संजय काक की किताब न्यू इंतिफादा इन कश्मीर में खुद मसर्रत ने माना कि ‘पत्थरबाजी कश्मीर में नई नही हैं ये तो 1980 से ही शुरू गया था और मैं तो बचपन से ही पत्थरबाजी कर रहा हूं. ’

 

मसर्रत आलम के आंदोलन का हथियार बनी पत्थरबाजी. 8 पन्नों के सरकारी डॉजियर में साजिश का जो खुलासा किया गया है उसके मुताबिक मसर्रत ने इसके लिए सैयद गिलानी के अलगाव वाली गुट तहरीक ए हुर्रियत से हर महीने 2 लाख रुपये लिया करता था.

 

वो मसर्रत ही था जिसकी वजह से साल 2010 के तीन महीनों तक कत्ल होता रहा कश्मीर का अमन चैन और मारे गए करीब 112 कश्मीरी. मसर्रत को साल 2010 में पीएसए यानी पब्लिक सेफ्टी एक्ट के तहत जेल भेज दिया गया. उसके खिलाफ 27 मामले दर्ज हुए लेकिन पिछले महीने उसे जमानत पर रिहा कर दिया गया.

 

मसर्रत अब जम्मू एंड कश्मीर मुस्लिम लीग का चेयरमैन है और कश्मीर में काम करने वाले अलगाववादी गुट हुर्रियत कान्फ्रेंस के लीडर सैयर गिलानी की जगह लेने को बेताब नजर आ रहे हैं.

 

यही वजह है कि मसर्रत ने गिलानी की अगुवाई में वो रैली की जिसकी वजह से उसे एक बार फिर जेल जाना पड़ा है.

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