33 तरीके से साफा बांधना जानते थे गजेंद्र

By: | Last Updated: Thursday, 23 April 2015 11:44 AM
Gajendra singh

नई दिल्ली: गजेंद्र की मौत से उनके गांव में मातम पसरा हुआ है. किसी को यकीन ही नहीं हो रहा है कि गजेंद्र इस तरह उन्हें छोड़कर चले जाएंगे. किसानों के हक की आवाज उठाने के लिए दौसा से दिल्ली पहुंचे गजेंद्र सिंह की आवाज यूं खामोश हो जाएगी. उन्हें जानने वालों को ये यकीन नहीं हो रहा. दौसा के नांगल झामरवाड़ा के संपन्न किसानों में गजेंद्र सिंह का परिवार गिना जाता है.

 

गांव में बड़ा-सा पक्का मकान, तीन भाइयों में 60 बीघा खेत और चाचा-ताऊ गांव के सरपंच. परिवार के राजनीतिक रसूख ने गजेंद्र को भी राजनीति की ओर मोड़ा. चाचा गोपाल सिंह के जरिये बीजेपी से जुड़े. 2003 में चुनाव लड़ना चाहा. टिकट नहीं मिला. तो समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया.

 

समाजवादी पार्टी में जिला अध्यक्ष समेत कई पदों पर रहे. विधायक का चुनाव भी लड़ा, लेकिन जमानत नहीं बचा पाए. 2013 में टिकट की चाह में कांग्रेस में गए. बात नहीं बनी तो आम आदमी पार्टी का झाड़ू थाम लिया और तब से आप में सक्रिय थे.

 

गजेंद्र 33 तरह की राजस्थानी पगड़ी बांधना जानते थे. अपने दादा ठाकुर भंवर सिंह से सीखी इस कला से भी उन्होंने नाम और दाम दोनों कमाया. देश की बड़ी राजनीतिक हस्तियों के अलावा अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के सिर पर भी पगड़ी सजा कर वे दाद पा चुके थे.

 

आम आदमी पार्टी से जुड़ने के बाद वे अक्सर उसकी रैलियों में जाया करते थे. 22 अप्रैल की जंतर-मंतर की रैली में वे खासतौर से किसानों के हक में आवाज लगाने पहुंचे थे. दरअसल फरवरी मार्च में हुई बेमौसम बारिश और ओला वृष्टि की चपेट में आकर उनकी बीस बीघे की खेती बर्बाद हो गयी थी.

 

गजेन्द्र के पास बचत के जो तीन लाख रुपए थे, वे भी खेती में खर्च हो गए. इस पैसे से वे अपनी भांजी की शादी करना चाहते थे. 20 अप्रैल को वे घरवालों को ये भरोसा दिलाकर दिल्ली के लिए निकले थे कि 22 अप्रैल को लौट आएंगे. इसी दिन उनकी एक भतीजी की शादी थी. लेकिन गजेंद्र अपना वादा पूरा नहीं कर पाए.

 

गजेंद्र राजस्थान के दौसा जिले के एक गांव के रहने वाले थे. हालांकि गजेंद्र को किसान बताया जा रहा है लेकिन वो महज किसान नहीं थे बल्कि सामाजिक और राजनीतिक रूप से काफी सक्रिय और समृद्ध थे. यहां तक कि वो विधानसभा चुनाव भी लड़ चुके थे.

 

गजेंद्र सिंह कल्याणवत मूल रूप से दौसा जिले के बांदीकुई विधानसभा इलाके के रहने वाले थे. वो युवावस्था से ही अपने चाचा गोपाल सिंह नांगल के साथ राजनीति में सक्रिय थे. नांगल प्रधान और सरपंच भी रह चुके थे. गजेंद्र ने बीजेपी के साथ राजनीति की शुरुआत की. वो बीजेपी के स्थानीय कार्यक्रमों में भागीदारी करते रहते थे और चुनाव लड़ने की ख्वाइश भी रखते थे. 2003 में जब बीजेपी की तरफ से गजेंद्र सिंह को टिकट नहीं मिला, तो उन्होंने समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया.

 

गजेंद्र सिंह कल्याणवत ने सपा का दामन थामते ही 2003 का विधानसभा चुनाव लड़ा, जिसमें उनको बीजेपी की अल्का सिंह से हार का मुंह देखना पड़ा. गजेंद्र इसके बाद भी राजनीति में डटे रहे. उन्होंने 2013 तक सपा में रहकर राजनीति की. इस दौरान गजेंद्र ने सपा जिलाध्यक्ष से लेकर प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य तक का सफर तय किया. हालांकि 2013 में उन्होंने विधानसभा टिकट मिलने की आस में कांग्रेस का दामन थाम लिया. लेकिन जब कांग्रेस में गजेंद्र सिंह की अनदेखी की गई, तो वो आम आदमी पार्टी के करीब आ गए.

 

बताया जाता है कि गजेंद्र सिंह घरेलू कलह से जूझ रहे थे और घर से निकाल दिए गए थे. गजेंद्र ने अपने सुसाइड नोट में भी इस बात की तरफ इशारा किया है, जिसमें उन्होंने लिखा है कि मेरे पिता ने मुझे घर से निकाल दिया है.

 

गजेंद्र सिंह जयपुरिया साफे का कारोबार करते थे. उन्होंने देश-दुनिया के नामचीन लोगों को अपने हाथों से साफा पहनाया था, जिनमें बिल क्लिंटन, नेपाल के राष्ट्रपति परमानंद, मुरली मनोहर जोशी, अटल बिहारी वाजपेयी जैसी हस्तियां शामिल हैं. गजेंद्र सिंह इस कला में इतनी महारत रखते थे कि वो एक मिनट में 12 लोगों के सिर पर पगड़ी बांध देते थे. इसके अलावा गजेंद्र 33 स्टाइल की पगडियां बांधने में भी निपुण थे. अपने कारोबार को बढ़ाने के लिए उन्होंने बाकायदा वेबसाइट भी बनाई थी, तो फेसबुक जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर भी वो सक्रिय थे.

 

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