एबीपी न्यूज स्पेशल गंगा की सौगंध: क्या बांधों से मर जाएगी गंगा?

By: | Last Updated: Tuesday, 30 June 2015 5:10 PM
GANGA

टिहरी बांध जब बन रहा था तब भारी विरोध हुआ था. बांधों का विरोध अब भी हो रहा है. सवाल उठता है कि राजनीति हो रही है और क्या विकास की बात करने वाले मोदी संत समाज की नाराजगी को झेलते हुए बीच का रास्ता निकाल सकेंगे?

 

गोमुख से निकलती है भागीरथी. उछलती कूदती और लगभग दौड़ते हुए गंगोत्री भागीरथी पहुंचती है. यहां से भैरोंघाटी और हर्सिल होते हुए भटवाड़ी पहुंचती है भागीरथी. और भटवाड़ी से ही भागीरथी को बांधों के जरिए बांधने का सिलसिला शुरु हो जाता है. 

 

भटवाड़ी के पास भागीरथी पर दो बड़े बांधों पर काम नबंबर 2010 से बंद पड़ा है. 600 मेगावाट की लोहारी नागपाला पनबिजली परियोजना और 480 मेगावाट की पाला मनेरी पनबिजली परियोजना. इन दोनों परियोजनाओं के तहत बांध बनाकर भागीरथी का पानी रोका जाना था , वो पानी ऐसी सुरंगों के जरिए ले जाया जाता और बिजली बनाने के बाद फिर से पानी नदी में छोड़ा जाता. इस बीच करीब 20-25 किलोमीटर तक भागीरथी नदी एक छोटे से नाले में तब्दील हो कर रह जाती. इसी बात का संत समाज के साथ साथ कुछ पर्यावरणवादियों ने भी विरोध किया था और अविरल निर्मल गंगा का अभियान चलाया था.

 

आपको जानकर हैरानी होगी कि 1912 में पहली बार गंगा पर बांध बनाने की कोशिश हुई थी. हरिद्वार के पास भीमगौड़ा में बांध बनाने की योजना बनाई गयी थी. लेकिन तब संत समाज ने इसका जमकर विरोध किया. पंडित मदन मोहन मालवीय ने इस आंदोलन की कमान संभाली थी. अविरल निर्मल गंगा अभियान तभी से चल रहा है. विपक्ष में रहते हुए उमा भारती ने भी इस आंदोलन में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया था और इसे चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश भी की थी.

 

दरअसल उतराखंड के देवप्रयाग में भागीरथी और अलकनंदा नदियां मिलती हैं और इस संगम को नाम मिलता है गंगा का. इन दो और उनकी सहायक नदियों पर अभी बनी पनबिजली परियोजनाओं से 1851 मेगावाट बिजली का उत्पादन हो रहा है लेकिन कुल बीस हजार मेगावाट बिजली के उत्पादन की क्षमता है. कुल 70 पन बिजली परियोजनाएं स्वीकृत की गयी हैं. इनमें चालू 17 परियोजनाओं से 1851 मेगावाट बिजली मिलती है. पाला मनेरी जैसी 14 बंद कर दी गयी परियोजनाओं से 2538 मेगावाट बिजली मिलनी थी. इसी तरह 4644 मेगावाट की कुल 39 परियोजनाएं प्रस्तावित थी जिन्हे फिलहाल के लिए रदद कर दिया गया है. इन परियोजनाओं के बंद होने से एनटीपीसी और एनएचपीसी जैसी कंपनियों के 17 हजार करोड़ रुपये फंसे हुए हैं.

 

गंगा पर बना सबसे बड़ा बांध है टिहरी का. 2400 मेगावाट बिजली का उत्पादन यहां होता है जो सीधे नेशनल ग्रिड में जाता है और दिल्ली , मुम्बई जैसे महानगर जगमगाते हैं. लेकिन पूरी टिहरी शहर डूब में डूब गया. हजारों गांववालों को विस्थापन का दंश झेलना पड़ा. मुआवजे को लेकर ढेरों शिकायते मिली. सवाल उठता है कि अविरल निर्मल गंगा की वकालत करने वालों ने कभी विस्थापन को मुद्दा क्यों नहीं बनाया.

 

पहाड़ के लोगों का कहना है कि गंगा पर बांध का विरोध करने वाले साधू संत पर्यावरणविद भी गंगा के पानी से बनी बिजली का इस्तेमाल करते हैं. पहाड़ी इलाकों में बिजली की कमी के चलते लकड़ी चीरने वाले कारखानों से लेकर , साइबर कैफे तक बंद रहते हैं. छोटे मोटे लघु उद्यो भी पूरी क्षमता से काम नहीं कर पाते हैं. ऐसे में जीवनदायिनी गंगा से बिजली बनाने और उसके पहले इस्तेमाल का हक स्थानीय लोगों को ही मिलना चाहिए.

 

पिछली मनमोहन सिंह सरकार ने 2010 में भागीरथी अलकनंदा की कुल 135 किलोमीटर की लंबाई को प्रर्यावरण की नजर से संवेदनशील क्षेत्र घोषित किया और सभी बांधों का काम रोक दिया था. मोदी सरकार ने फिलहाल इस रोक को जारी रखा है. उमा भारती बांधों के निर्माण के पक्ष में नहीं है लेकिन प्रकाश जावडेकर का पर्यावरण मंत्रालय अभी भी बांध बनाए जाने की संभावना टटोलने में लगा है. तीन जून 2015 को ही वन और पर्यावरण मंत्रालय ने बांधों से क्षेत्र पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन करने के लिए कमेटी बनाई है. लेकिन इसका विरोध पार्टी के भीतर ही हो रहा है. हाल ही में वरिष्ठ बीजेपी नेता और कानपुर से सांसद मुरली मनोहर जोशी के बयान को इसी से जोड़ कर देखा जा रहा है.  

 

सवाल उठता है कि क्या रन आफ द रीवर 25 मेगावाट के ऐसे छोटे बांध नहीं बनाए जा सकते जो स्थानीय जनता की बिजली की जरुरतें भी पूरी कर सकें और गंगा के कुदरती प्रवाह में भी बाधा नहीं बने.

 

मोदी सरकार ने पिछले साल दिसंबर में आईआईटी कानपुर के प्रोफेसर विनोद तारे की अध्यक्षता में बांधों पर एक कमेटी का गठन किया. इस कमेटी ने भी छह बड़े बांधों को बनाए जाने का विरोध किया है. 

 

हमारे यहां सवाल उठाया जाता है कि जब लंदन की थेम्स नदी साफ हो सकती है तो गंगा क्यों साफ नहीं की जा सकती. थेम्स में पानी की एक निश्चित मात्रा रखी जाती है. वहां थेम्स का पानी खेती के लिए नहीं दिया जाता लेकिन भारत में साठ फीसद पानी गर्मियों में पेयजल और खेती के लिए रखा जाता है.

 

इसके लिए पानी को बांध बनाकर रोकना पड़ता है. यही वजह है कि कानुपर और इलाहाबाद में खासतौर से गंगा एक नाले में तब्दील हो जाती है. इस कारण गंगा में प्रदूषण का स्तर बहुत ज्यादा बढ़ जाता है. कुछ जानकारों का तो मानना है कि अगर गंगा अविरल बहे तो वो कानपुर में भी सीसामाउ जैसे गंदे पानी के झरने के बावजूद साफ स्वच्छ रहेगी. लेकिन फिर वही सवाल जीवनदायिनी गंगा का काम सिर्फ बहना है या उसके किनारे बसी करीब चालीस करोड़ जनता की रोजी रोटी में सहारा भी बनना है.

 

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