गंगा की सौगंध | क्यों है गंगा मैली?

By: | Last Updated: Friday, 3 July 2015 3:00 PM
Ganga Ki Saugandh

नई दिल्ली: शाम को गंगा को साफ रखने की सौगंध और सुबह फिर वही कहानी. घाट पर पूजा सामग्री डालना, कपड़े छोड़ जाना, कपड़े धोना, गदंगी फैलाना, गंगा के घाटों पर यही कहानी हर रोज दोहराई जा रही है.

 

एबीपी न्यूज़ ने हरिदवार में विश्वकर्मा घाट के पास इस पुल पर हमें अलग अलग नजारे देखने को मिले. हमनें इन्हे कैमरे पर कैद कर लिया. एक तरफ एक शख्स पूजा करते थे तो दूसरी तरफ एक शख्स गंगा में गंदगी फेंक रहे थे. एक ही पुल , एक ही गंगा , एक ही शहर के दो नागरिक और काम  बिल्कुल उल्टा.

 

गरुकुल कांगड़ी विश्व विधालय हरिद्वार का एक शोध कहता है कि गंगा किनारे विशेष हवन पूजा करवाने वाले औसत रुप से करीब 600 ग्राम की बची हुई पूजा सामग्री गंगा में छोड़ जाते हैं . इसमें फूल मालाएं , धूपपत्ती , अगरबत्ती के साथ साथ पोलीथीन की थैलियां होती हैं . कुंभ और अन्य मौकों पर एक ही दिन में लाखों करोड़ों लोग पूजा अर्चना करते हैं तब प्रदूषण का स्तर बढ़ जाता है .

 

हरिद्वार में गंगा किनारे खाने-पीने के स्टॉल हैं और इनसे गंदगी ना फैले ये कोशिश भी अब तक नाकाम नजर आती है. गदंगी की ये कहानी सिर्फ हरिद्वार में नहीं है वाराणसी और इलाहाबाद के घाटों पर भी गदंगी हैं। मुहिम चलती है तो घाट साफ और मुहिम खत्म होते ही गंदगी वापस.

 

सरकार का इरादा एक टैरिटोरियल सेना की यूनिट के गठन का है  ताकि गंगा मैली करने वालों पर नजर रखी जा सके. इसकी चार बटालियने  होंगी. एक बटालियन में एक हजार कुल चार हजार गंगा रक्षक सिपाही होंगे. सरकार गंगा में प्रदूषण फैलाने वालों पर जुर्माना लगाने से लेकर कानून बनाने पर विचार कर रही है. लेकिन सवाल ये है कि क्या सिर्फ कानून बना देने से गंगा का प्रदूषण रुक जाएगा क्या गंगा के प्रति सोच बदलने की जरूरत नहीं है.

 

कानपुर में चमड़ा फैक्ट्री  ने किया है गंगा को जहरीला

कानपुर को भारत का मैनचेस्टर भी कहा जाता है. यहां के उद्योगों के कारण. लेकिन यही उद्योग कानुपर में गंगा को मैला और जहरीला कर रहे हैं.

 

सीसामउ के इस नाले से रोज 14 करोड़ लीटर गंदा पानी गंगा में इसी रफ्तार से गिरता है. इसमें फैक्टरियों से निकलने वाला पानी भी 90 लाख लीटर गंदा पानी शामिल हैं जिसमें कई खतरनाक रसायन होते हैं. कानपुर में करीब 700 फैक्ट्रियां हैं जिनमें से करीब सौ को खतरनाक माना गया है. चमड़ा फैक्टरी मालिकों का कहना है कि कानपुर में जितना गंदा पानी गंगा में गिरता है उसमें चमड़ा फैक्टरियों का योगदान सिर्फ आठ फीसद ही है वो भी साफ करके ही गंगा में डाला जाता है.

 

कानपुर से जुड़े लोगों का कहना है कि गैप वन और JNURM में करोड़ों रूपया खर्च होने के बाद भी जहरीले रसायन पानी में जा रहे हैं. मोदी सरकार की नमामि गंगे के तहत फैक्टरियों के लिए एक हजार करोड़ रुपये रखे गये हैं .इनसे गंदे पानी का साफ करने के संयंत्र भी लगने हैं और साथ ही नई तकनीक पर भी पैसा खर्च होना है. मकसद ये है कि फैक्टरियों में ही गंदे पानी को एक हद तक साफ किया जा सके। कानपुर में अब तक के अनुभव यही है कि पैसा खर्च होने के बाद भी गंगा साफ नहीं हुई है.

 

बनारस में अंतिम संस्कार की वजह से मैली है गंगा

मोक्षदायिनी की मान्यता गंगा के लिए वाराणसी में मुसीबत बनी हुई है. यहां ना सिर्फ अस्थियां प्रवाहित की जाती हैं बल्कि शव भी गंगा में प्रवाहित कर दिए जाते हैं. गंगा को यहां मोक्षदायिनी भी कहा जाता है. शव दाह गृह है …नावें हैं दो …बनारस के हरीशचन्द्र मर्णिकर्णिका घाट पर रोज औसत रुप से 200 शवों का दाह संस्कार इसी तरह होता है . पूरी गंगा की बात करें तो एक अनुमान के अनुसार दो लाख शवों का अंतिम संस्कार हर साल गंगा किनारे होता है . अधजले शवों को कई बार नदी में बहा दिया जाता है .

गंगा की सौगंध: गंगा ना बन जाए गंदा नाला 

कुछ मान्यताएं तो कुछ गरीबी के कारण लोग शवों को पानी में बहा देते हैं। विद्युत शवदाह गृह हैं लेकिन वो चलते नहीं इसकी वजह है प्राचीन मान्यताएं हैं. जब तक गंगा मान्यताओं का बोझ उठाए रहेगी तब तक कैसे साफ होगी गंगा.

 

कानपुर में गंगा में गंदगी की वजह है नाले

गंगा को मैली करने का 80 प्रतिशत दोषी मलमूत्र वाला वो गंदा पानी है जो 400 करोड़ लीटर प्रतिदिन की दर से गंगा में गिरता है. आपको जानकर हैरानी होगी की गंगा में गंदे नालों को छोड़ने की शुरुआत एक सरकारी आदेश से हुई थी. 1932 से हुई शुरूआत आज गंगा के लिए मुसीबत बन गई है.

 

कानपुर में नाव पर बैठ कर पीछे नाला झरने की तरह गिर रहा है. कानपुर में गंगा का हत्यारा है सीसामाउ का नाला. कानपुर में ऐसे 25 छोटे बड़े नालें हैं और 29 करोड़ लीटर गंदा पानी इसी तरह सीधे गंगा में मिलता है.

 

सिर्फ कानपुर नहीं बल्कि बनारस में ऐसे छोटे बड़े 34 नाले हैं जिसका गंदा पानी सीधे गंगा में गिरता है.14 करोड़ लीटर पानी को ही साफ करने के संयंत्र लगे हैं जबकि करीब चार करोड़ लीटर गंदा पानी सीधे गंगा में मिलता है.

 

इलाहाबाद में ऐसे छोटे बड़े 57 नालें हैं जिनसे रोज बीस करोड़ लीटर गंदगी रोज निकलती है . लेकिन सिर्फ 9 करोड़ लीटर गंदा पानी ही साफ हो पाता है और बाकी 11 करोड़ लीटर गंदा पानी सीधे गंगा में समाहित हो जाता है.

 

दिक्कत ये है कि जब तक STP तैयार होता है नाले ज्यादा गदंगी लाने लगते हैं। उस पर अधिकतर STP अपनी पूरी क्षमता पर काम भी नहीं कर पाते. STP में पैसा पानी की तरह बहता है पर गंगा की हालत देखकर लगता है कि ये पैसा भी गंदे नालों में ही बह जाता है.

 

क्या बांधों से मर जाएगी गंगा?

जब टिहरी बांध बन रहा था तब भारी विरोध हुआ था. बांधों का विरोध अब भी हो रहा है. सवाल उठता है कि राजनीति हो रही है और क्या विकास की बात करने वाले मोदी संत समाज की नाराजगी को झेलते हुए बीच का रास्ता निकाल सकेंगे. भटवाड़ी से ही शुरू हो जाता है बांधों का सिलसिला. विकास के लिए बिजली और पानी चाहिए जो ये बांध मुहैया कराते हैं.

बड़े बाधों के साथ मिल रही है बड़ी चेतावनी. वहीं कुछ पर्यावरणविदों का मानना है कि विकास की चाहत में हम अविरता को खत्म कर गंगा को मार रहे हैं. हमें पहाड़ के लोगों की समस्याएं भी नजर आईं तो ये भी दिखा कि गंगा बह तो रही है पर वैसी नहीं जैसी पहले हुआ करती थी. हमें जानकार भी मिले जिनके मुताबिक अविरता को खत्म कर निर्मल गंगा कभी मिल नहीं सकती. सवाल ये है कि क्या ऐसा कोई रास्ता निकल सकता है कि विकास भी हो और गंगा भी निर्मल और अविरल रहे.

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